अंतरराष्ट्रीय

चीन अमेरिका आमने-सामने

ताइवान, हॉन्गकॉन्ग, साउथ चाइना सी और वीगर मुसलमानों का सवाल

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सौ साल 

 इस जुलाई में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी शताब्दी समारोह धूम धाम से मनाया। चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग ने अमेरिका व पश्चिमी देशों को चेतावनी देते हुए कहा कि अब कोई भी देश चाहकर चीन को डरा धमका नहीं सकता, उस पर वर्चस्व नहीं कायम कर सकता। पश्चिमी राष्ट्राध्यक्षों को किसी ग़ैर युरोपीय देश से इस किस्म की बातें सुनने की आदत नहीं रही है। चीन की असामान्य उपलब्धियाँ लोगों में फिर से कहीं समाजवाद के प्रति आकर्षण न पैदा करने लगे इस कारण चीन के बारे में निरन्तर आंग्ल-अमेरिकी मीडिया हाउसों की मदद से ऐसा नैरेटिव फैलाया जा रहा है जिससे लोगों में उलझन बनी रहे। ताइवान से लेकर वीगर मुसलमानों तक का सवाल चीन को असहज करने, उसे बदनाम तथा घेरने के लिहाज से उठाया जा रहा है। ये सूचनाएं इतनी इकतरफा हैं कि एक स्वतन्त्र नागरिक के लिए चीन के मामले में सही राय कायम करना एक चुनौती से कम नहीं है। 

ताइवान का सवाल 

1971 में भू-राजनीति के प्रसिद्ध अमेरिकी रणनीतिकार हेनरी किसिंजर ने चीन की गुप्त यात्रा की। 1949 में हुई चीनी क्रांति के बाद, किसी प्रमुख अमेरिकी अधिकारी की , यह पहली यात्रा थी। हेनरी किसिंजर की मुलाकात तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई से हुई। हेनरी किसिंजर ने अपनी बातचीत में दुनिया भर की तत्कालीन समस्याओं-मसलन वियतनाम युद्ध, सोवियत यूनियन, कोल्ड वार -आदि का जिक्र किया लेकिन चाऊ अपनी तरफ से सिर्फ एक ही बात बार-बार दुहराते रहे ताइवान, ताइवान। 

ताइवान का सवाल चीन के लिए हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है। उसी बातचीत में जब हेनरी किसिंजर ने कहा तत्कालीन राष्ट्र्पति रिचर्ड निक्सन के हवाले से कहा “चीन आगे आने वाले दिनों में सुपर पावर बनेगा”। तो चाऊ एन लाई का जवाब था “चीन कभी भी सुपर पावर नहीं बनेगा भले ही वह कितना भी ताकतवर बन जाये।”

लेकिन आज अमेरिका चीन को घेरने के लिए अन्ततः ताइवान (पुराना नाम फारमोसा) का इस्तेमाल करता रहता है। ताइवान द्वितीय विश्व युद्ध तक चीन का अविभाज्य हिस्सा रहा है। कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद जब कोमिनतांग नेता च्यांग काई शेक भागा, तो चीन का सारा सोना, धन-संपत्ति लेकर, ताइवान चला आया। अमेरिका ने च्यांग काई शेक की की मदद के लिए सातवां बेड़ा तक भेज दिया था फलतः ताइवान चीन का हिस्सा बनने से वंचित रह गया। इस बात की कसक, पीड़ा आज भी चीनी जनता तथा वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी के मन में है। खुद ताइवान के वर्तमान संविधान में यह बात दर्ज है की ताइवान हमेशा से चीन का हिस्सा रहा है।

 अमेरिका संयुक्त राष्ट्र संघ में 1979 तक ताइवान को ही समूचे चीन का प्रतिनिधि मानता आया था।  उसके बाद अमेरिका को चीन को मान्यता देने पर मज़बूर होना पड़ा। 1840 के अफीम युद्ध से लेकर 1949 तक विभिन्न साम्राज्यवादी देशों के हाथों चीन ने जो अपमान झेला है, जो घाव सहा है उसकी गहरी स्मृति चीनी जनमानस में आजतक मौजूद है। अमेरिकी साम्राज्यवाद के हस्तक्षेप के कारण ताइवान आधुनिक चीन का हिस्सा बनने से वंचित रह गया। ताइवान उस वक्त से एक शताब्दी के औपनिवेशिक अपमान का अन्तिम प्रतीक के रूप में माना जाता है। लिहाजा चीन के लिए ताइवान एक बेहद संवेदनशील व नाजुक प्रश्न है।

अमेरिका को इस मामले में फूंक-फूंक कर बेहद सावधानी से कदम बढ़ाना चाहिए। वरना ताइवान को लेकर चीन के अंदर जिस किस्म की भावना जुड़ी है और इस स्थिति में अमेरिकी हस्तक्षेप करने की कोशिश करता है तो यह कभी भी युद्ध की ओर जा सकता है। चीन में ताइवान को लेकर राय इस कदर भावनात्मक है कि जो कोई भी चीन का नेता ताइवान के मसले पर समझौतावादी रुख अपनाएगा वह चीनी जनता का समर्थन खो देगा। 

पहले चीन सोचा करता था कि ताइवान को चीन से एकताबद्ध शांतिपूर्ण तरीके से कर लिया जाएगा परन्तु जिस ढंग से अमेरिका अब तक ताइवान की स्वतन्त्रता की बात किया करता था इससे स्थिति बिगड़ेगी। अब चीन शांतिपूर्ण के साथ सैन्य विकल्पों की भी बात करने लगा है। हाल के कुछ दिनों में चीनी अखबारों में ताइवान को लेकर जिस तरह से सैन्य विकल्प की बात चल रही है उसे उसी रौशनी ने देखा जाना चाहिए। 

बस चंद दिनों पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के वरिष्ठ सलाहकार कर्ट कैम्पबेल को स्वीकार करना पड़ा कि अमेरिका ताइवान की स्वतन्त्रता का समर्थन नहीं करता है। यदि चीन ताइवान को एक चीन की अपनी नीति के अनुकूल मिला ले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए भले उसके लिए उसे सैन्य कार्रवाई क्यों न करनी पड़े। पिछले कुछ दिनों से जैस तरह से स्थितियाँ बदल रही है ऐसे में में सम्भव है चीन इस विकल्प की ओर बढ़ने पर मजबूर हो जाये। चीन ताइवान को अमेरिकी साम्राज्यवाद का अड्डा नहीं बनने देगा। 

   हॉन्गकॉन्ग का सवाल 

 अफीम युद्ध (1839-42) के दौरान चीन का हिस्सा रहे हॉन्गकॉन्ग को ब्रिटेन ने बलपूर्वक अपना उपनिवेश बना डाला था। 1997 में हॉन्गकॉन्ग दुबारा चीन का हिस्सा बना लेकिन अपने स्वतन्त्र संविधान और स्वायत्तता के साथ। यानी एक देश दो व्यवस्था के तहत हॉन्गकॉन्ग आज चीन का भाग बन चुका है। लेकिन आज हॉन्गकॉन्ग में होने वाले विरोध और इंग्लैंड व अमेरिका का उसे शह तथा पश्चिमी मीडिया में उसके मैग्नीफाई कर दिखाने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि हॉन्गकॉन्ग में चीन लोकतन्त्र समर्थकों को दबाने का प्रयास कर रहा है। चीन द्वारा लाये गए ‘नेशनल सिक्युरिटी लॉ’ को इसी नजर से देखा जाता है।

लेकिन यह बात हमें ध्यान में रखना चाहिए कि जिस हॉन्गकॉन्ग को ताकत व हिंसा की बदौलत चीन से छीना गया था उसे चीन ने शांतिपूर्ण ढ़ंग से हासिल किया। इसके साथ साथ चीन ने हॉन्गकॉन्ग में चली आ रही ब्रिटिश उपनिवेश वाली व्यवस्था को बरकरार रहने देकर एक प्रकार से एक अनूठा उदाहरण पेश किया। दुनिया के शायद ही किसी देश ने अपनी सीमा के अंदर दो किस्म की व्यवस्था को सहन नहीं किया होता। 

भारत में कश्मीर में बस थोड़ी सी स्वायत्तता थी उसे खत्म कर दिया गया। भारत में ऐसे लोगों की भरमार है जो हॉन्गकॉन्ग में हो रहे प्रदर्शनों को लेकर चीन को तो खूब खरी खोटी सुनाते हैं लेकिन कश्मीर की स्वायत्तता को भारत द्वारा खत्म किये जाने का उत्साह से समर्थन करते हैं।

फोटो सोर्स : DW

कोई भी संप्रभु देश किसी बड़े साम्राज्यवादी देश के कॉलोनी रहे हिस्से को अलग बने रहने दे सकता है? 1960 के दशक में जब गोवा पुर्तगाल का उपनिवेश था। तब अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने जवाहर लाल नेहरू को पत्र लिखकर गोवा की स्वायत्तता यानी पुर्तगाली उपनिवेशी बने रहने देने का आग्रह किया। लेकिन नेहरू ने पत्र मिलने के 24 घण्टे के अंदर भारत की सीमा के अंदर अन्तिम पुर्तगाली उपनिवेश पर आक्रमण कर उसे भारत में मिला लिया। जो देश लम्बे वक्त तक किसी साम्राज्यवादी मुल्क के उपनिवेश रहे हैं वह स्वतन्त्र होने के पश्चात अपनी भौगोलिक सीमा में किसी उपनिवेश को बर्दाश्त कर सकता है? भारत ने भी नहीं किया।

दुनिया के किसी भी वैसे हिस्से -मसलन अफ्रीका- में जाकर लोगों से चीन और हॉन्गकॉन्ग के सम्बन्ध में पूछा जाए तो उनका सहज जवाब होगा कि हॉन्गकॉन्ग चूंकि ब्रिटिश उपनिवेश था लिहाजा अब चीन जो उसे खुद, अपने में, मिला लेना चाहिए। 

लेकिन चीन ने इस मामले में बहुत सहनशीलता का परिचय दिया। दुनिया में शायद ही किसी दूसरे देश ने ऐसा किया होता। जब हॉन्गकॉन्ग 1997 में चीन का दुबारा भाग बना तब चीन के जी.एन.पी ( ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट) में हॉन्गकॉन्ग का हिस्सा 20 प्रतिशत था। आज वह आंकड़ा घटकर 2-3 प्रतिशत रह गया है। हॉन्गकॉन्ग की आबादी लगभग 70 लाख है लेकिन चीन की एक अरब 40 करोड़ के लगभग। क्या कोई सम्प्रभु मुल्क अपने देश के 70 लाख के छोटे से अल्पमत को 1 अरब 40 करोड़ बहुमत के खिलाफ जाने की इजाज़त दे सकता है? हॉन्गकॉन्ग के बारे में एक वस्तुपरक राय बनाने के लिए इन बातों को भी ध्यान रखना चाहिए।

 साउथ चाइना सी का सवाल 

साउथ चाइना समुद्र के इलाके में तेल के बड़े खजाने के मिलने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इसकारण पिछले वर्षों से एशिया के इस हिस्से में इंग्लैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों द्वारा चीन का एकाधिकार न रहे इसके लिए हर सम्भव कोशिश की जा रही है। लगभग 1200 नॉटिकल माइल के इस इलाके में ये देश ‘फ्रीडम ऑफ नैविगेशन’ के नाम पर अपने जंगी बेड़ों को वहाँ तैनात कर रहे हैं। सात समंदर पर रहने वाला अमेरिका इस इलाके में चीन के व्यवहार को अनुचित मानता है। आज अमेरिका व पश्चिमी देश चीन की सीमा पर सैन्य जमावड़ा कर चुके हैं। क्या अमेरिका अपनी सीमा पर ऐसा है जमावड़ा बर्दाश्त करता? 

चीन के स्थायी निंदक साउथ चाइना समुद्र में उसके आक्रामक व्यवहार को की हमेशा बात करते हैं कि चीन ने जबरस्ती उस इलाके में नियन्त्रण बना रखा है। साउथ चाइना समुद्र के द्वीपों पर वह कब्जा करना चाहता है चीन आदि आदि।

निस्संदेह चीन दुनिया का उभरता हुआ अमेरिकी का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी है। कईयों का अनुमान है कि कुछ वर्षों में ही वह अमेरिका को पीछे छोड़ सकता है विशेषकर आर्थिक रूप से। चीन कुछ कुछ आज उसी हालत में है जैसा अमेरिका पिछले सौ, सवा सौ पहले विश्व रंगमंच पर बतौर महाशक्ति उभर रहा था। अमेरिकी इतिहास के इस मुकाम पर थियोडोर रूजवेल्ट राष्ट्रपति बनते हैं। इस दौरान उसने कई देशों पर हमले किये। लेकिन चीन का उभार कमोबेश एक शांतिपूर्ण उभार रहा है। 

चीन की आज जो स्थिति है उसकी जगह यदि हम अमेरिका को रख कर देखें तो क्या परिणाम होगा। सिंगापुर के प्रसिद्ध राजनीति विज्ञानी किशोर महबूबानी के अनुसार “यदि अमेरिका इस जगह होता या मान लें रूजवेल्ट राष्ट्रपति होता तो उठाने साउथ चाइना समुद्र के सभी द्वीपों पर अब तक कब्जा कर चुका होता। और यह कार्य उसने 24 घण्टे के अंदर कर लिया होता।”

लेकिन चीन ने, जैसा की उसका अब तक का रिकॉर्ड है, ऐसा कुछ नहीं किया है। लेकिन फिर भी अमेरिकी व पश्चिमी सूचनातंत्रो में ‘साउथ चाइना समुद्र’ को लेकर चीन को खलनायक बनाकर पेश किया जाता है। चंद देशों मसलन ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, इंग्लैंड, जापान या फिलिपीन्स की राय को विश्व जनमत की राय बनाकर पेश किया जाता है। कभी भूलकर कर भी एसियान देशों की राय को नहीं दिखाया जाता जो के चीन के कदमों का समर्थन करते हैं।

झिंझियाँग प्रान्त और वीगर मुसलमानों का सवाल 

चीन के पश्चिमी हिस्से के झिंझियाँग प्रान्त में वीगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों, कपास की खेती में वहाँ मौजूद गुलामी प्रथा की खूब चर्चा पश्चिमी मीडिया उठाता है। चीन ने वीगर मुसलमानों का किस प्रकार जनसंहार किया , उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन किया, लाखों मुसलमानों को जेल में रखने सम्बन्धी बातें यूरोपीय व अमेरिकी सूचना तन्त्रो से मिलती रहती है।

यह बात सही है कि झिंझियाँग प्रान्त चीन के पूर्वी भाग की तरह विकसित नहीं है। यह इलाक़ा अपेक्षाकृत रुप से पिछड़ा हुआ है। लेकिन यह कहना कि चीन जनसंहार करता है, उन्हें मध्ययुगीन जीवन स्थितियों में जकड़े हुए है, वीगर मुसलमानों की भाषा, उनकी संस्कृति को चीन मिटा डालना चाहता है। इस किस्म के प्रचार तथ्यों पर आधारित नजर नहीं आते। उत्पादन के उन्नत साधनों का उपयोग करने वाला चीन झिंझियाँग में गुलामी की जबरिया व्यवस्था लागू किये है सहसा विश्वास नहीं होता।

झिंझियाँग प्रान्त और वीगर मुसलमानों में दिक्कत अवश्य है। खासकर चीन का यह इलाका सोवियत रूस के मुसलमान आबादी वाले कई प्रांतों की सीमाओं से सटा है। अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट शासन को समाप्त करने के लिए अमेरिकन साम्राज्यवाद ने इस्लामिक फंडामेटलिज्म का जमकर इस्तेमाल किया है। बल्कि यदि दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि इस्लामिक फ़ण्डामेंटलिज्म साम्राज्यवाद का हमेशा से विश्वस्त सहयोगी रहा है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

तालिबान के उभार के बाद पुराने सोवियत रूस के मुस्लिम क्षेत्र और झिंझियाँग के वीगर मुसलमानों में भी रैडकलाइजेशन बढ़ा है। चीन इससे अपने ढंग से निपट भी रहा है। उस इलाके के पिछड़ापन को भी लगातार दूर करने का प्रयास करता नजर आ रहा है। इस इलाके में चीन ने कार्बन रहित ऊर्जा का बड़े पैमाने पर उपयोग किया है। सूरज की रौशनी से ऊर्जा पैदा करने के चीनी प्रयास को धक्का अमेरिका पहुंचा रहा है। अमेरिका ने सोलर प्लेट के लिए कुछ आवश्यक उपकरणों पर सिर्फ इस कारण पाबन्दी लगा रखा है कि चीन झिंझयाँग में कपास की खेती में गुलामी की स्थिति लागू किये हुए है।

लेकिन यदि यह मान लिया जाए चीन वीगर मुसलमानों पर बहुत जुल्म ढा रहा है, जैसा कि अमेरिका , इंग्लैंड व यूरोपीय देश चीख चीख कर कहते हैं तो फिर किसी भी मुस्लिम देश ने आज तक चीन की इस मामले में आलोचना क्यों नहीं की? सऊदी अरब, कतर, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान सरीखे देश जो कहीं भी मुसलमानों का उत्पीड़न होता है मुखरता से विरोध करते हैं यहाँ चुप क्यों हैं? 

पश्चिम के देशों के जिन लोगों ने झिंझियाँग प्रान्त की यात्रा की है वे बिल्कुल अलग तस्वीर बताते हैं। ब्रिटेन के चर्चित राजनीतिक कार्यकर्ता रॉबर्ट ग्रिफिथ ने झिंझियाँग प्रान्त की यात्रा के अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया “जब हम लोग झिंझियाँग और उसकी राजधानी से कुछ दूर के इलाकों में सुबह-सुबह गए तो बाजार में काफी चहल-पहल थी। लोग वीगर भाषा मे बात कर रहे थे जो कि उनके बोलने के ढंग से हमने पकड़ा। वीगर, चीनी या मंदारिन जो हान लोग बोलते हैं उससे, भिन्न होता है। दुकानों की साइनबोर्ड वीगर के साथ साथ चीनी व रूसी भाषा में लिखे होते थे। उस इलाके में रूसी भी खासी संख्या में रहा करते हैं।” 

रॉबर्ट ग्रिफिथ आगे कहते हैं “इंग्लैंड लौटने के कुछ ही दिनों बाद हमने यूरोपियन संसद में चीन के बाहर रहने वाले वीगर मुसलमानों के संगठन के अध्यक्ष का भाषण सुना। इस भाषण में अध्यक्ष ने इस बात पर विस्तार से जिक्र किया कि कैसे झिंझियाँग प्रान्त में वीगर मुसलमानों को उनकी अपनी भाषा बोलने पर प्रतिबंध है। वीगर में बातचीत करना अपराध की श्रेणी में गिना जाता है।” रॉबर्ट ग्रिफिथ ने वीगर मुसलमानों के उस संगठन के बारे में कहा “जब मैं ये बातें सुन रहा था तो मुझे घोर आश्चर्य हो रहा था। दरअसल चीन के बाहर रहने वाले वीगर मुसलमानों के इस संगठन को अमेरिकी के ‘नेशनल इन्दौमेंट ऑफ डेमोक्रेसी’ द्वारा धन मुहैया कराया जाता है।”

वीगर मुसलमानों के मीडिया में छवि के सम्बन्धी अपने दिलचस्प अनुभव को साझा करते हुए रॉबर्ट ग्रिफिथ ने कहा “तब मैंने गार्डियन पत्रिका को पत्र लिखा कि मैंने खुद झिंझियाँग प्रान्त जाकर वहाँ के स्थितियों की जाँच की है। विदेश में बसे वीगर मुसलमानों के तथाकथित प्रतिनिधि जिन बातों का दावा कर रहे हैं मेरा अनुभव बिल्कुल उलट है। लेकिन मेरा वह पत्र नहीं प्रकाशित किया गया। मैनें इंग्लैंड में बी.बी.सी वडियो वालों से बात की की मैं झिंझियाँग प्रान्त घूम कर आया हूँ वहाँ की कुछ बातें रखना चाहता हूँ। लेकिन किसी ने मुझे बात रखने के मौका नहीं दिया।” अन्त में रॉबर्ट ग्रिफिथ की सलाह थी “हमें अक्सर टेलीविजन और अखबारों में झिंझियाँग और वीगर मुसलमानों के बारे में एकतरफा बातों को सुनने के लिए अभिशप्त हैं। ऐसी स्थिति में हमें अमेरिकी व यूरोपीय मीडिया के अतिरिक्त दूसरे स्रोतों पर भी नजर रखनी चाहिए मसलन चीन से आने वाली सूचनाओं को भी देखना चाहिए तभी एक सही राय बनाई जा सकती है

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अनीश अंकुर

लेखक संस्कृतिकर्मी व स्वतन्त्र पत्रकार हैं। सम्पर्क- +919835430548, anish.ankur@gmail.com
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