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एक फिल्मकार का हलफ़नामा : भाग 7
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एक फिल्मकार का हलफ़नामा : भाग 7

 

गतांक से आगे…

           अब फिल्म शूट करने के लिए लोकेशन का प्रश्न सामने खड़ा था। सौ-डेढ़ सौ साल पहले का ऐसा मकान चाहिए था जो उस काल का दिखे और देखने वालों को खत्री जी के घर का आभास हो। बजट तो था नहीं कि किसी खाली जगह पर सेट खड़ा करवा मकान का रूप दे पाता। ऐसे वक्त प्रकाश झा याद आएं ! उन्होंने कुँवर सिंह पर धारावाहिक बनाते समय बेतिया का इलाका इसलिए चुना कि बेतिया महाराज की खंडहर होती हवेली और उस जमाने के वस्तुओं,  फर्नीचर आदि का इस्तेमाल रंग-रोगन करा कर सकें। मैंने भी यही राह चुनी। कुँवर सिंह की तरह खत्री जी कोई राजा तो थे नहीं, इसलिए एक आम व्यक्ति का घर उस समय जैसा होता होगा उस दृष्टि से खोज शुरू की। खत्रीजी का घर कैसा रहा होगा उसका तो पता नहीं चलता, लेकिन उस काल में मिट्टी-खपरैल का मकान हुआ करता था। देहातों में ज्यादातर मिट्टी का होता था लेकिन कस्बाई जगह और खाते-पीते लोगों का मकान अमूमन ईंट और खपड़े का होता था। तब आसपास के गाँव का चक्कर लगाने लगा। स्वाधीन दास के साथ चक्कर लगाते-खोजते अंततः मुशहरी अंचल के रघुनाथपुर गाँव के एक खपरपोस मकान पर नज़र टिकी-अटकी ! यह न केवल बड़ा खपरैल मकान था, बल्कि मकान के आगे लंबा-चौड़ा जाता भी था, जिसमें शूटिंग का सामान और गाडियाँ आदि भी आराम से रखे जा सकते थे। ट्रॉली या क्रेन शॉट लेने के लिए अच्छी खासी जगह थी। मकान मालिक का नाम पता किया तो मालूम चला कि कोई श्रीमान रमेशचन्द्र सिंह हैं, जो अच्छे किसान हैं।

केदार नाथ महथा की हवेली

अब उन तक पहुँचने का स्रोत ढूंढना था। ढूँढकर पहुँच और जब उन्हें बताया कि उनका मकान अपनी फिल्म की शूटिंग के लिए लेना चाहता हूँ तो गदगद भाव से मिले, बैठाया और अपने घर की महिलाओं को पर्दानशीं कर घर के आँगन तक का हिस्सा घुमा-फिराकर दिखाया। सब कुछ देख दाख जब पूरी तरह संतुष्ट हो गए तो उन्होंने  प्रेम से ‘चाह’ पिलवाई। चाय-चू के बाद बोले- “आपको फिल्म बनाने के लिए अपना मकान दूँगा तो आप मुझे क्या देंगे?” उत्तर दिए बिना मैंने प्रश्न किया कि आप क्या चाहते हैं? इस पर कहें – ‘आप फिलिम बनाइयेगा, मेरा घर पंद्रह से बीस दिनों तक डीसटरबो रहेगा तो मुझको का फायदा होगा?’ ‘आप क्या फायदा चाहते हैं वह कहिए’- मेरे यह कहने पर लपलपायी नजरों से कहा कि मुझे कै ठो रुपये देंगे? मैंने कहा- ‘फिल्म में आपका नाम जाएगा।’ यह सुन खिन्न हो बोले- ‘नाम लेकर का करूँगा। आप पच्चीस हजार दीजिए तो बात बढ़े। फिलिम में करोड़ों खर्चा कीजियेगा तो इस मद में इतना ठो तो होना ही चाहिए न?’ मैंने समझाया कि ये मुम्बइया फिल्म नहीं है, एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म बना रहा हूँ जिसका बजट बहुत ही कम है, और यह इसी शहर के व्यक्ति को लेकर बनने वाली फिल्म है, जिनका हिन्दी-साहित्य को बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन क्या मजाल कि मेरी बात सुनते। साहित्य से उन्हें क्या लेना-देना था ! वे अपने ‘ठो’ से टस से मस होने को तैयार नहीं। फिल्म का नाम सुनते ही बनाने वाले को करोड़पति समझने वाले को समझाना टेढ़ी खीर थी। उन्हें लग रहा था कि मैं मालदार आसामी हूँ इसलिए ज्यादा-से-ज्यादा उगाही की फिराक में थे। जिस माध्यम से उनतक पहुँचा था, उनका घर भी बगल में ही था। बात बनता न देख उनके पास जाकर सारी बात बताई। वे साथ आकर काफी हो-हुज्जत के बाद पाँच हजार में बात पटवाई। पाँच सौ रुपये पेशगी देते उन्हें कहा कि दलान पर चढ़ने वाली सीढ़ी के साथ यह जो मोटरसाइकिल चढ़ाने का स्लोप बना हुआ है उसे तोड़वा कर चिकना करवा देंगे। वे चौंकते हुए बोले- ‘क्यों?’ इसलिए कि डेढ़ सौ साल पहले मोटरसाइकिल नहीं हुआ करता था और तोड़वाने में जो खर्च होगा वह हमसे ले लीजिएगा। तो झट खींसे निपोड़ते कहा- ‘ठीक है, करवा तो दूँगा लेकिन इसका खर्च दूना होगा क्योंकि शूटिंग के बाद फिर मुझे बनवाना भी तो पड़ेगा न !’ उनकी तेजी पर मुस्कुरा कर ‘ठीक है’ कहता वापस। 

             दूसरे दिन रहुआ, बेला, मणिका, नरौली, डुमरी आदि गाँव के इलाके का भ्रमण किया। डुमरी में अरुण ठाकुर से बात कर वहाँ शूटिंग करने की बात कही। अरुण ठाकुर बिना मूल्य सहयोग का आश्वासन दिया। जेल चौक पर मानू बाबू की कोठी और गोशाला रोड स्थित केदारनाथ महथा की हवेली में शूटिंग के लिए मानू बाबू और अश्विनी खत्री से बात की। क्योंकि इन दोनों की हवेली में बहुत सारे बहुमूल्य एंटीक फर्नीचर भी मौजूद थे, जो फिल्म के लिए सुरुचिपूर्ण था और इसका कोई मूल्य भी नहीं देना था। दोनों ने सहर्ष अपनी सहमति दी। तो उन दोनों का आभार प्रकट करता लौटा।

रघुनाथपुर का मकान

             खादी भंडार का प्रांगण भी शूटिंग के लिहाज़ से बहुत ही सुंदर दिखा। इसके तीसरे गेट से घुसते ही दाहिनी तरफ एक छोटा सा दुमंजिला मकान था, जिसमें लकड़ियों का काम ज्यादा  था और थोड़ा ऐतिहासिक लुक दे रहा था। इसे भी शूटिंग के लिए चिन्हित किया। इस स्थल को शूटिंग के लिए मुहैय्या कराने में गीता देवी ने अपनी अहम भूमिका निभाई। वर्तमान में गीता देवी वार्ड पार्षद है। इसके बाद धर्म समाज संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य से मिलकर वहाँ फिल्म के कुछ सीन फिल्माने की बात की। उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए इसकी स्वीकृति दे दी। अब बंगाल गवर्नर से भूदेव मुखोपाध्याय की बातचीत, फ्रेडरिक पिन्काट और ग्रियर्सन वाले सीन पर माथापच्ची करने लगा। बहुत सोचने के बाद भी जब कुछ न सूझा तो इसे फ़िलहाल ठंडे बस्ते में डाल सबसे अंत में फिल्माने की सोच इस पर दिमाग खपाना छोड़ आगे बढ़ा।

              लोकेशन सुनिश्चित होने के बाद अब प्रत्येक सीन के लिए प्रॉपर्टीज की दरकार थी। बहुत सारी प्रॉपर्टीज तो मानू बाबू और अश्वनी खत्री की हवेली में थी फिर भी बहुत सारी चीजों की जरूरत थी, जैसे लकड़ी की मेज, कुर्सी, अलमारी, अलगनी, चौकी, पलंग, गद्दा, चादर, आईना, आराम कुर्सी, नक्काशीदार कुर्सियां, छाता, एक्का, पगड़ी, टोपी, बेंत की छड़ी, लैम्प, लालटेन, कलम, दावात, कॉपी, किताब, फ़ाइल, सड़क-मुहल्लों को रात में रौशन करने के लिए मिट्टीतेल से जलने वाला लैम्पपोस्ट, ढिबड़ी, क़िताबों के रैक, खरल-मूसल, कांसे का फूलदान, पनबट्टा, पीतल का पीकदान, मिट्टी का चूल्हा, खाना बनाने के बर्तन, अनाजों की बोरी, खत्री जी के घर की महिलाओं के लिए रेशमी चादर, सोने की चूड़ियाँ, कंगन, झुमका, मांगटीका, हँसुली, नथिया, कमरबंद, कमरघनी, चाँदी का पाजेब, बिछिया, चाँदी का पुराना सिक्का, सिक्का रखने वाली कपड़े की थैली आदि-आदि-इत्यादि। ये सब चीजें सौ-डेढ़सौ वर्ष पहले जैसी बनावट की चाहिए थी।

डुमरी गाँव

                कंपनी बाग से कुछ ढिबड़ी, पुराने जमाने के शीशे के लैंप और लालटेन ढूँढ-ढाड कर खरीदा। लैम्पपोस्ट जब कहीं नहीं मिला तब पुरानी गुदरी रोड स्थित एक कारीगर से उस जमाने में सड़क और मुहल्ले को रौशन करने के लिए मिट्टीतेल से जलने वाला लैम्पपोस्ट का नक्शा बनाकर समझाया। वह गुनी कारीगर था। उसने पंद्रह दिन का समय लिया और हूबहू उसी तरह का बनाकर हमें खुश कर दिया ! उसे उसकी माँगी कीमत दे पीठ ठोंका और घर लाकर उसपर खुद से काला पेंट चढ़ाया। मानू बाबू और अश्विनी खत्री के यहाँ बहुत सारी एंटीक फर्नीचर तो देख ही चुका था। कुछ फर्नीचर स्वाधीन दास ने देने की बात कही। इसके बावजूद कुछ लकड़ी के फर्नीचर बढई रखकर बनवाया। सोने के तमाम ऐंटिक जेवर पवन नाथानी ने शूटिंग के समय उपलब्ध कराना स्वीकार किया। इन सबको करते-कराते, कुछ सामान लोगों से माँगते-मुंगते, इकट्ठा करते, जुटाते, खरीदते, बनवाते हुए कई महीने गुजर गए। जब सब कुछ लगभग मुकम्मल हो गया तो फिल्म का मुहूर्त करने की तिथि सुनिश्चित की और राधाचरण गोस्वामी, प्रतापनारायण मिश्र और श्रीधर पाठक के बीच चलने वाली बहस को मुहूर्त के दिन फिल्माना तय किया। इन तीनों भूमिका के लिए  दूरदर्शन से जुड़े लोग पहले से तय थे। प्रताप नारायण मिश्र की भूमिका के लिए हाजीपुर के डॉ. शैलेन्द्र राकेश को राजी किया चूंकि वे वर्षों मुंबई भी रहे थे और दूरदर्शन के लिए फिल्म बनाते रहे थे।

                 स्वाधीन दास के साथ पटना जाकर यूमैटिक कैमरा के लिए कैमरामैन से बात की। डॉ. शैलेन्द्र राकेश ने टेक्नीशियन, लाइट, रिफ्लेक्टर, ट्राली आदि इक्विपमेंट्स के लिए पटना के सप्लायर से बात करवा दी। सभी को पेशगी दे लौट आया। इस तरह सबकुछ तय-तमन्ना हो जाने के बाद कड़ाके की ठंड में मुहूर्त का दिन निश्चित हुआ – 24 दिसंबर 2004…..

जारी…..

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