बिहार

बिहार देखने वाले की आँख में है…

 

  • गजेन्द्र  पाठक


विजय नाम्बिसन की इस किताब को जिन्होंने पढ़ा है उनसे भी और जिन्होंने नहीं पढ़ा है उनसे भी निवेदन है कि इस किताब में वर्णित जगहों और चरित्रों को उसी रूप में देखेंगे जिस तरह फिल्मों की शुरुआत में यह घोषणा की जाती है कि अमुक फिल्म की घटनाओं और चरित्रों का वास्तविक जीवनसे कोई भी सम्बन्ध महज संयोगहै।

कला जनता की ही थाती होती है और जनता ही लोक भी है और जनार्दन भी। इसलिए इस घोषणा का दर्शक और पाठक पर उतना ही असर पड़ता है जितना धूम्रपान और मदिरापान करने वाले को उन उत्पादों पर मुद्रित वैधानिक चेतावनी का। लोग कला और किताब का सम्बन्ध जीवन से अलग करके सोच भी नहीं सकते।कला आकाश से नहींउतरती।धरती पर ही इसका जन्म होता है। इस किताब में बिहार की जिस धरती की बात की गयी है वह अपने शिल्प में ऊपर से देखने पर पत्रकारिता की किताब लगेगी। भीतर जाने पर यह किताब एक उपन्यास का स्वरूप धारण करेगी और जब आप किताब एक बैठक में पूरी कर उठेंगे तब अपने भीतर उस महाकाव्यात्मक टीस को महसूस करेंगे जिसे पैदा करने में सदियों का इन्तजार भी कम पड़ता है।

यह कहना गैरजरूरी नहीं होगा कि हिन्दी के पहले कवि सरहपा बिहार से हैं। देसिलबयना का उद्घोष करने वाले भक्ति आन्दोलन के पहले कवि विद्यापति भी बिहार से हैं। इन दोनों कवियों ने हिन्दी में अध्यात्मवाद के बरक्स लोक चेतना और लोकभाषा की अलख जगाकर लोगों के हृदय में प्यास तो जरूर बढ़ाई लेकिन उस प्यास को बुझाने वालों की यह धरती सदियों से इन्तजार करती रही। रेणु के पास यह समझ थी। इसी समझ के आधार पर रेणु,रेणु बने। चमन में दीदावर पैदा होने में सदियों को इन्तजार करना पड़ता है। रेणु उसी इन्तजार के मीठे फल हैं। विजय नाम्बिसन ने रेणु को पढ़ा है इसका कोई साक्ष्य तो नहीं मिला लेकिन मेरा मन यह मानने को तैयार नहीं है कि रेणु को पढ़े बगैर, रेणु के बाद बिहार पर कोई भी रचनात्मक कार्य मुमकिन है।

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म..के लोगों को समर्पित इस किताब के लेखक आज हमारे बीच नहीं हैं।वे म.. के ‘मेसेज बॉक्स’ में एक सन्देश छोड़ गये हैं – “अपने राजाओं के किसी भी पागलपन के लिए,यूनानी लोग स्वयं प्रताड़ित होते हैं।” यह सन्देश चूँकि हॉरिस का उद्धरण है इसलिए यूनान को सम्बोधित है। विजय उसे म.. के लोगों के प्रति समर्पित किताब में उद्धृत करते हुए प्रकारान्तर से एक तरफ जहाँ म…के लोगों को अपने राजाओं पर नजर रखने की सलाह देते हैं तो दूसरी तरफ़ यह भी संकेत करते हैं कि, ‘बैलेटबॉक्स’ या ‘ई.वी.एम.’ से पैदा हुए राजा पर नजर रखना रानी के पेट से पैदा हुए राजा पर नजर रखने से कम मुश्किल काम नहीं होता है।

वे बिहार के यूनान सम्बन्ध की याद भी दिलाते हैं। दुनिया में लोकतन्त्र के सर्वाधिक प्राचीन प्रयोग भी इन्हीं दोनों देशों में हुए और दुनिया में सबसे पुराने राजनयिक सम्बन्ध भी इन्हीं दोनों देशों के बीच स्थापित हुए। वैसे भी बिहार का इतिहास  बाहरी यात्रियों केबिना पूरा नहीं होता।भारत आने वाले पहले यात्री मेगास्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के समय ही राजदूत बन कर आये थे ।वे ईसा-पूर्व 302 से 288तक घूम-फिर कर पाटलिपुत्र में ही रहे।’इण्डिका’ यहीं लिखी। यद्यपि यह किताब प्रामाणिक रूप से उपलब्ध नहीं है।फिर भी हम लोगों ने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुवाद के जरिए जितना कुछ जाना है उससे मगध साम्राज्य के प्राचीन वैभव का पता चलता है।

मेगास्थनीज राजदूत थे। उनके बाद बिन्दुसार और अशोक के समय भी यूनान से क्रमशः दिमेक्स और दिनोसिज राजदूत के रूप में भारत आये थे। यूनानी इतिहासकारों के बीच   ‘इण्डिका’ विवादास्पद किताब थी। कई लोगों को इस बात का यकीन ही नहीं था कि कोई नगर इतना भी वैभव सम्पन्न हो सकता है? 399 ई.से 412 ई.के बीच फाहियान अपने नौ साथियों के साथ पैदल भारत आये। पाटलिपुत्र उनकी यात्रा का मुख्य लक्ष्य था।उन्हें बौद्ध साहित्य की तलाश थी।चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय पाटलिपुत्र में वह रौनक तो नहीं थी लेकिन खण्डहर से भी इमारत के बुलन्द रहने का एहसास हो रहा था। 7वीं शताब्दी में हर्ष के समय ह्वेनसांग आये ।nalanda university

नालन्दा विश्विद्यालय के उनके लम्बे प्रवास के अनुभवों के आधार पर उस बिहार का परिचय मिलता है जहाँ दुनिया भर से लोग ज्ञान की तलाश में आते थे। आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य भी बिहार आये। मण्डन मिश्र के गाँव में पानी भरने वाली स्त्रियों की संस्कृत से वे चकित थे ।  जिस गाँव के साधारण लोगों की भाषा ऐसी थी वहाँ मण्डन मिश्र जैसे लोगों के ज्ञान की कल्पना की जा सकती है । सातवीं-आठवीं शताब्दी में क्रमशः ह्वेनसांग और शंकराचार्य के बिहार यात्रा के सन्दर्भों से बिहार के गौरवशाली अतीत का पता मिलता है । आकस्मिक नहीं कि सरहपा का भी यही समय था और सरहपा की परिधि का विस्तार बिहार से लेकर तिब्बत तक था ।

वही सरहपा जो दार्शनिक धरातल पर शंकराचार्य की मान्यताओं से वैसे ही असहमत थे जैसे शंकराचार्य बुद्ध की मान्यताओं से । बुद्ध की धरती पर यह चीन से लेकर केरल तक का सांस्कृतिक संगम था ।

इसी सांस्कृतिक संगम पर शंकराचार्य के तेरह सौ साल बाद केरल से विजय म.. आते हैं ।अपनी सर्जन पत्नी कावेरी के साथ जिसे देहात में काम करना अच्छा लगता है। मद्रास से वह ऊब चुकी थीं। उन्हें लगता था कि, ‘मद्रास में तो पचास डॉक्टर हैं जो यही काम कर सकते हैं’ पत्नी का यह निर्णय लेखक को अपनी अखबार की नौकरी छोड़कर उत्तर भारत की तरफ ‘भागने’ को बाध्य करता है। यह प्रसंग अगर ‘मैला आँचल’ के डॉ. प्रशान्त की याद दिलाए तो चकित मत होइए।

केरल के लिए हिन्दी कोई पराई भाषा नहीं है। केरल के अपने अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि वहाँ हिन्दी को जितनी लगन से पढ़ने की परम्परा है उसे देखकर हिन्दी प्रदेश के लोग बहुत कुछ सीख सकते हैं। बहुत पहले मैंने कहीं पढ़ा था कि एक बार मुलायम सिंह जी ने केरल की अपनी यात्रा में उत्तर प्रदेश से हिन्दी के शिक्षक निर्यात करने  की इच्छा जाहिर की थी। केरल के तत्कालीन मुख्यमन्त्री ने पलटकर जवाब दिया था कि उनके प्रदेश में हिन्दी के सैकड़ों ग्रेजुएट हैं जो हिन्दी प्रदेश के बच्चों को बेहतर हिन्दी पढ़ा सकते हैं। समुद्र की लहरों के साथ जीने वाले लोग बचपन से ही दूर तक तूफानों के बीच तैरने की हसरत रखते हैं। भाषा की दीवार इन हौसलों के आगे भरभरा कर गिर जाती है।

आप मलयाली नवजागरण के अग्रदूत कुमारन आशान के जीवन और लेखन से परिचित हों तो यह बात बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। मलयाली,कन्नड़,तमिल, बांग्ला और अँग्रेजी में तो वे कविता ही लिखते थे। एक पराई भाषा में कविता लिखने के लिए सिर्फ भाषिक दक्षता की जरूरत नहीं होती बल्कि सांस्कृतिक और हार्दिक लगाव की अपेक्षा होती है। मलयाली के मशहूर उपन्यासकार एम. टी. वासुदेवन नायर ने एक बार कहीं कहा था कि मलयाली और बंगला साहित्य में सांस्कृतिक समानता का सबसे बड़ा कारण नदियों और समुद्र का अनुभव है। उन्होंने एक बहुत प्यारी बात बतायी थी कि आप किसी भी बांग्ला और मलयाली कथाकार को पढ़िए,नदी के बिना बात आगे ही नहीं बढ़ती।

 

जिन प्रदेशों में सबसे ज्यादा नदियाँ होती हों, वहाँ जीवन की नाव उनके बिना एक कदम भी नहीं बढ़ सकती,फिर उस जीवन का पुनर्सृजन करने वाले साहित्य की गाड़ी इसके बिना कैसे बढ़ेगी ? बुद्ध नेभी नदी पार करनेके बाद नाव को भूल जाने की बात की थी ।लेकिन नदी कैसे भूल सकतीहै? म…पटना से 100 किलोमीटर पूर्व गंगा तट पर अवस्थित है। गंगा के बिना इस किताब में भी आप एक कदम चल नहीं सकते। हालाँकि लेखकीय संकल्प है कि, इसी गंगा के किनारे अवस्थित,”मैं इस शहर का नाम नहीं बताउँगा,बस इसे म… कहूँगा; मैं यह भी नहीं बताउँगा कि ये नन किस पन्थ की थीं;हालाँकि अगर कोई चाहे तो आसानी से इन दोनों ही बातों को समझ जाएगा।”

इस किताब में प्रकाशित लेख ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ और ‘द हिन्दू’ के रविवारीय संस्करण में 1997  और 1998 के बीच प्रकाशित हुए थे। मैं तब दिल्ली छोड़कर अपने बचपन की स्मृतियों के नगर आरा में नौकरी के लिए आ चुका था और भारी उत्साह और गहरी जिज्ञासा के साथ बिहार से प्रकाशित होने वाले लगभग सारे अखबारों को पढ़ रहा था। मेरे कुछ शुभचिन्तक यह भी सुझाव देने लगे थे कि अनियमित वेतन की स्थिति में सारा पैसा अखबार और पत्रिकाओं में लुटा देना कोई समझदारी नहीं है। मैं उनकी बात का प्रतिवाद करने की स्थिति में नहीं था लेकिन, अखबार मेरे लिए नशे की तरह कमजोरी बन चुके थे ।

मेरी एक और आदत बन चुकी थी कि दैनिक यात्राके क्रम में ट्रेन में ही अखबार पढ़ लेता था। अखबार मैं नहीं हम के साथ पढ़ रहा था। वैसे भी मेरी मातृभाषा भोजपुरी में ‘मैं’ नहीं है। हम मतलब कई सहयात्री मित्रों के साथ। इस सामूहिक अखबार पाठ का सुफल यह होता कि हर खबर के साथ कई लोगों की आलोचकीय प्रतिक्रियाएँ मुफ्त में मिल जातीं। यह आम के साथ गुठली के दाम जैसा था। गाड़ी में अख़बार बेचने वाले भी कुछ अद्भुत चरित्र मिले। दानापुर में तो मैंने एक ऐसा अखबार विक्रेता देखा था जिसे लगभग सारे अँग्रेजी और हिन्दी अखबारों की सुर्खियाँ याद होती थीं ।  बहुत सारे लोग उसके इस समाचार पाठ से ही काम चला लेते थे।

एक ऐसे व्यक्ति भी पटना से बक्सर के बीच चलते थे जो ‘मेनस्ट्रीम और सेमिनार’ तक बेचा करते थे। बाद में वे मेरे मित्र भी बने और सारे अख़बार और पत्रिकाएँ मेरे लिए सुरक्षित रखते और इस बात की भी चिन्ता नहीं करते कि मैंने उन्हें पैसा अधिक दिया या  कम। उनका नाम सुशील था। छोटे रोजगार और अभाव के बावजूद उन्होंने अपनी मनुष्यता और उदारता को कैसे बरक़रार रखा था यह देख कर मुझे आश्चर्य होता था ।बाद में जब मोबाईल की वजह से अखबार कम बिकने लगे तो वे पानी की बोतल बेचने लगे थे। काम तो उनका किसी तरह चल रहा था लेकिन भीतर से वे टूट चुके थे। जो मानसिक और बौद्धिक प्यास उनके भीतर थी, उसे बिसलेरी की बोतलें दूर नहीं कर पा रही थीं।

उन्होंने बताया था कि बिहार में सबसे ज़्यादा दो चीजें बिकती हैं-एक दवाई और दूसरा अखबार। उन्हें इस बात को लेकर कोई भ्रम नहीं था कि बिहार की बीमारी को जड़ से मिटाने में अख़बार की भूमिका क्रान्तिकारी हो सकती है। लेकिन अखबार के मालिक और सम्पादक कितने बड़े खिलाड़ी होते हैं इसके सैकड़ों किस्से उनके पास थे। ऐसे किस्से जो किसी अखबार में जगह नहीं पा सकते। अखबार बेचने वालों के प्रति मेरे हृदय में छुटपन से ही विशेष श्रद्धा का भाव रहा है। डाकिये से भी ज्यादा। जब से कलाम साहब के बचपन के बारे में जाना, यह भाव और बढ़ गया। बहरहाल, यह कह पाना मुश्किल था कि अखबार ज्यादा सीखा रहे थे या अखबार पढ़ने वाले या फिर अखबार बेचने वाले या अखबार में छपने वाले या फिर अखबार छापने वाले।

उन्हीं अख़बारी दिनों  में मैंने  विजय नाम्बिसन के कुछ लेख पढ़े थे। मुझे यह देखकर सुखद अचरज हुआथा कि दक्षिण भारत का एक व्यक्ति बिहार की राजनीति और समाज पर इतनी गहरी दिलचस्पी के साथ कैसे लिख रहा है? जो थोडा-बहुत परिचय मिला था वह यह था कि विजय दीक्षित हुए थे आयी आयी टी मद्रास से लेकिन पेशे के रूप में पत्रकारिता का चुनाव किया था। अँग्रेजी के प्रतिभाशाली युवा कवि के रूप में उनकी पहचान थी । वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी  थे।

विजय नाम्बिसन इस किताब में शामिल पहले लेख ‘लालू प्रसाद और लोकतन्त्र का रहस्य’ में बिहार में लालू प्रसाद के जादू का रहस्योद्घाटन कर रहे हैं। दरअसल यह पूरी किताब 1997 – 1998 के उसी लालू युग के इर्द-गिर्द घूमती है जो लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचने  के बाद घोटालों और सामूहिक नरसंहारों की वजह से अवसान की ओर अग्रसर था। संयोगवश लालू प्रसाद जिस दिन मुख्यमन्त्री बने थे उसी दिन मैं भी ‘रविवार’ में काम करने वाले  अपने एक परिचित अजीत जी के साथ बिहार भवन गया था। अजीत जी ने प्रेसवार्ता  में शिरकत की थी। बाहर खड़ा  मैं उस रहस्यलोक  में बिहार में एक नयी राजनीतिक संस्कृति का उदय देख रहा था।

वह राजनीतिक संस्कृति जो चाणक्यपुरी के डिप्लोमेटिक एन्क्लेव में भी खैनी मलते हुए भोजपुरी में किसी को भी चुटकी में उड़ा सकती थी। लालू जी प्रेस वार्ता के बाद अपने साथियों के साथ इसी रूप में बाहर आये थे और शरद यादव के घर लिट्टी खाने निकल पड़े थे । मुख्यमन्त्री के रूप में वह लालू जी का पहला दिन था। मैंने भी उसके पहले किसी मुख्यमन्त्री को इतने नजदीक से नहीं देखा था। लालू जी के काफिले को दूसरी बार पटना में तब देखा जब वे चारा घोटाले में आत्मसर्पण के लिए जेल जा रहे थे।सड़कों पर जनसमुद्र की वह सुनामी जिन्हें याद है, वे समझ सकते हैं कि बिहार की राजनीति में लालू होने का मतलब क्या होता है?

बिहार वापस आने से पहले मैंने अपने गुरु प्रोफेसर मैनेजर पाण्डेय से एक साक्षात्कार लिया था जो बाद में ‘पहल’ में प्रकाशित हुआ। पाण्डेय जी ने उस साक्षात्कार में लालू यादव के बारे में कहा था कि,”वे उस उत्तर आधुनिकता की अवधारणा की तरह हैं जो आकर्षित तो करती है,लेकिन समझ में नहीं आती।” पाण्डेय जी लालूजी के गृह जनपद से थे। उनसे बेहतर भला उन्हें कौन समझ सकता था? उसी  साक्षात्कार में उन्होंने यह भी बताया था कि बिहार के अपमान और उपहास की जड़ें कितनी गहरी हैं? जितना ही पुराना गौरवशाली इतिहास है उतना ही पुराना उपेक्षा और उपहास का भी। व्रात्यों और बौद्धों ने चूँकि स्थापित मान्यताओं और पाखण्डों  को प्रश्नांकित किया था इसलिए भी मगध को एक अपवित्र क्षेत्र के रूप में प्रचारित किया गया।

थोड़े दिन पहले अरविन्द नारायण दास की किताब ‘द रिपब्लिक ऑफ बिहार’ आयी  थी। चर्चित भी हुई थी।लालू प्रसाद ने बिहार की राजनीति के पहिए को उल्टा घुमा दिया था।अब दिल्ली के टेलीफोन पर बिहार का मुख्यमन्त्री नहीं बदलता था। यही नहीं अब दिल्ली की कुर्सी पटना से तय होती थी। यह कोई छोटी बात नहीं थी। बिहार के बहुत सारे लोग लालू प्रसाद के रूप में राजनीतिक स्थिरता का एक नया युग देख रहे थे। यही नहीं,लालू प्रसाद अब सिर्फ ‘किंग’नहीं थे ‘किंगमेकर’ बन चुके थे। मण्डल  राजनीति ने देश भर में पिछड़ा राजनीति के जरिए नेतृत्व परिवर्तन की जो ऐतिहासिक जमीन तैयार की थी,लालू प्रसाद उसके निर्विवाद प्रतिनिधि के रूप में उभरे थे।

लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को रोककर उन्होंने अपनी सेक्युलर छवि का भी प्रमाण दे दिया था। देश के इतिहास में यह एक नये  राजनीतिक समीकरण का प्रयोग था। इस प्रयोग से सवर्ण जातियों में घबराहट थी, तो यादव होना अब पटना की सत्ता से हॉटलाइन पर सीधा कनेक्शन होना था। मेरे घर में पतिवाह काका बचपन से काम करते थे। यादव जाति से थे। मेरे घर में लालू को  ‘ललुआ ‘ कहने से पहले यह सुनिश्चित करना पड़ता था कि काका हैं या नहीं । बिहार में यह पहली बार हुआ कि एक मुख्यमन्त्री के विरोध में सार्वजनिक रूप से कुछ भी बोलना खतरे से खाली नहीं था। अपनी जाति से किसी आदमी का मुख्यमन्त्री की कुर्सी पर बैठना पूरी जाति के लिए आत्मविश्वास और गौरव का इतना बड़ा कारण बन जाएगा ,यह बात तब मेरी समझ में नहीं आती थी।

Nehru With Indiraहालाँकि, नेहरू और इन्दिरा गाँधी के प्रधानमन्त्री बनने से ब्राह्मणों के भीतर भी लम्बे समय तक इसी तरह का गौरव भाव जगा रहा। यह गौरव भाव राजीव गाँधी  तक बना रहा। लेकिन,यह गौरव भाव विशिष्ट भाव के रूप में  अन्तर्वर्ती धारा के रूप में ही प्रवाहित था। लालू प्रसाद इसी विशिष्ट भाव के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन कर उभर रहे थे।हालाँकि वे जयप्रकाश जी के सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन की ऊपज थे और गैर कॉंग्रेसवाद की लहरों पर सवार होकर आये थे। फिर भी मुझे अच्छी तरह याद है कि सत्ता प्राप्ति के अपने दूसरे दौर में ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ को दिए दो पन्ने के लम्बे साक्षात्कार में उन्होंने बेहिचक यह स्वीकार किया था कि स्टेट्समैन के रूप में उनकी आदर्श इन्दिरा  गाँधी  हैं।

बिहार के बाहर खास कर दिल्ली में लालू प्रसाद एक पहेली भी थे और हम सबकी पहचान भी।बिहारी कहने से बात नहीं बनती थी तो लालू प्रसाद विशेषण के रूप में कुछ अपमानजनक उपसर्ग और प्रत्यय के साथ हमारे न चाहते हुए भी हमसे कार्बनिक रूप में चस्पा हो गये थे। प्रतिक्रिया स्वरूप अब बिहार के साथ लालू को ‘डिफेंड’ करना भी हमारे मौलिक कर्तव्य का हिस्सा था, क्योंकि लालू प्रसाद हमारे लिए बिहारी अस्मिता के प्रतीक बन चुके थे।बिहार में सवर्ण कहे जाने वाले लोगों के दिल्ली प्रवासी बच्चों के साथ यह दोहरा अभिशाप था। घर में लालू का विरोध सुनकर हाँ में हाँ मिलाने और दिल्ली में लालू के लिए लड़ने का दोहरा अभिशाप। ऊपर से पिछड़े कहे जाने वाले मित्रों के बीच अपने तथाकथित पाखण्ड को तार-तार होने से बचाने की जद्दोजहद। 

अपने देश में बहुत सारी चीज़ें जन्म से तय कर दी जाती हैं। आप अपना विचार तो बदल सकते हैं, जाति कैसे बदलेंगे? मण्डल  और मन्दिर की लड़ाई के बीच आज मुझे दिल्ली विश्विद्यालय और फिर जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय के वे दिन याद आ रहे हैं जिसमें नागरिकता की विभाजन रेखा ‘रेडक्लिफ और मैकमोहन लाइन’ से भी ज्यादा गहरी और कंटीली हो गयी थी।आप या तो मण्डल  के साथ थे या फिर विरोध में। जो दोनों के साथ नहीं थे उनकी या तो नागरिकता सन्दिग्ध थी या फिर नैतिकता। जो मण्डल  आयोग की सिफरिशों के साथ थे,लालू प्रसाद उनके लिए सबसे बड़े मसीहा के रूप में उभर रहे थे।ठीक उसी तरह जो उसके खिलाफ थे उनके लिए वी. पी. सिंह और लालू प्रसाद सबसे बड़े खलनायक थे।

मण्डल  के बावजूद उसी बिहार के लालू राज में ही नौकरी मिलना मेरे घर के लिए एक चमत्कार था। हमें अपने ही घर में लालू प्रसाद के पक्ष में खड़ा होने का एक बड़ा आधार मिला था। लेकिन यह आधार धीरे-धीरे तिरोहित हुआ। दिल्ली में रहकर बिहारी अस्मिता और उसके पूरक उपकरण लालू प्रसाद के लिए लड़ना आसान था। बिहार में रहकर अब स्वप्नलोक यथार्थ में तब्दील हो चुका था। यह यथार्थबोध इतना जटिल था कि इसे देखकर इसके रहस्य को एक बारगी समझना मुश्किल था। दूसरे, विश्वविद्यालय में अध्यापन को लेकर जो गरिमा और गौरव का भाव था उसे विचलित करने के लिए तमाम ऐसे प्रयत्न हो रहे थे जो नालन्दा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय की गौरवशाली परम्परा से मेल नहीं खा रहे थे।

बिहार की धरती अब बुद्ध की करुणा के साथ नहीं बेकसूर लोगों के सामूहिक नरसंहार की खबरों से अपने को कलंकित कर रही थी। हत्यारों के हृदय में छोटे-छोटे बच्चों और स्त्रियों के प्रति इतनी नफरत का कारण आज तक मेरी समझ में नहीं आया। एक हिंसा दूसरी हिंसा का इन्तजार करती थी। जाति के नाम पर सेनाएँ शायद ही देश और दुनिया के किसी कोने में बनी हों।गौरव गाथाओं के साथ कलंक कथाओं को भी याद रखना चाहिए। इतिहास हमें अपनी गलतियों से भी सीखने का अवसर प्रदान करता है।अशोक के बारे में यह सच हो या न हो कि उन्होंने सत्ता के लिए निन्यानवे भाइयों की हत्या की लेकिन इस सच से कौन इनकार करेगा कि कलिंग युद्घ में उन्होंने रक्तपात का कलंकित कीर्तिमान बनाया। उनके इस क्रूर सत्य को जाने बगैर उनके बुद्ध की शरण में जाने की घटना को समझा ही नहीं जा सकता।

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पढ़ाई और रोजगार के लिए बिहार से बाहर भागने वाले छात्रों और श्रमिकों को आकर्षित करने के लिए जो ऐतिहासिक प्रयत्न होने चाहिए थे वे छोटी-छोटी इच्छाओं की पूर्ति में ही नष्ट हो गये। विजय नाम्बिसन  ने इस किताब में इस बात पर आश्चर्य जाहिर किया है कि आजादी के बाद बरौनी से लेकर बोकारो और जमशेदपुर के बड़े-बड़े कारखानों के बावजूद बिहार के लोगों को यहाँ काम नहीं मिला। कुशल श्रमिक बाहर से आये। जमींदारी प्रथा के क्रूर रूप की वजह से धरती के हक से वंचित लोगों के लिए बिहार की फैक्ट्रियों में भी जगह नहीं थी। इधर जब महामारी के कारण महानगरों से रोजगार के अभाव में लाचार मजदूर अपने गाँव  पहुँचने के लिए हजारों मील की पैदल यात्रा को विवश हैं तब कुछ प्रदेशों में श्रम कानूनों में परिवर्तन करते हुए काम के घंटे बढ़ाए जा रहे हैं।

लग रहा है जैसे दिन 36घंटे के हो गये हैं या फिर मजदूरों के पोषण का स्तर बढ़ गया है।’ओवरटाइम’के नाम इन संशोधनों से निवेशक कितने प्रसन्न होंगे यह कहना तो मुश्किल है लेकिन दुनिया जरूर सोचेगी कि महामारी के जिस दौर में भारत का गरीब मजदूर सबसे कमजोर और लाचार था उस समय कुछ लोग ऐसे भी थे जो उनके ज़ख्म पर मलहम नहीं नमक लगा रहा थे। बिहार में इन श्रमिकों की कुशलता का परीक्षण किया जाएगा, ऐसा ही कुछ सरकार का बयान था।जिन मजदूरों ने पूरे देश के निर्माण क्षेत्र का कायाकल्प कर दिया हो उन्हें अपने घर में ही कुशलता की परीक्षा देनी पड़े इससे बड़ा मजाक कुछ हो ही नहीं सकता।

मजदूरों के लिए न तो श्रम कानून में परिवर्तन की जरूरत थी और न ही किसी तरह के कौशल जाँच की जरूरत है।उन्हें बेहतर स्वास्थ्य,पोषण और सुरक्षा के साथ काम की जरूरत है। अपनी श्रम सम्पदा और बौद्घिक सम्पदा के प्रति सम्मान से ही कोई देश आगे बढ़ा है। कोई देश या राज्य अगर पीछे है तो इसका कारण  सिर्फ और सिर्फ इन्हीं दोनों का अपमान है।बिहार में लम्बे समय से इसका सिलसिला जारी है। महामारी में यही लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। बिहार की अर्थव्यवस्था को ‘मनीआर्डर इकॉनमी’ के नाम से जाना जाता है।

लेकिन आज जब इस अर्थव्यस्था के स्रोत अपने जीवन के सबसे मुश्किल हाल में बिहार के तमाम क्व़ारेंटाइन केन्द्रों में पड़े हुए हैं तब उन्हें यदि पेट पर लात के साथ पीठ पर लात का भी एहसास हो रहा हो तो इसमें अचरज की बात नहीं।कई गाँव ऐसे भी हैं जो अपने ही भाई को गाँव में घुसने से रोक रहे हैं। किसकी चोट भारी होगी यह तय करना मुश्किल है। जगजीवन बाबू ने इन्दिरा  जी से कहा था कि, ‘मजदूर पेट पर लात बर्दाश्त कर जाएगा लेकिन पीठ पर लात कभी बर्दाश्त नहीं कर पायेगा।’अब सवाल यह भी है कि ये लात किसके हैं?मुझे लगता है कि दूसरों के लात परदेश में आदमी बर्दाश्त कर लेगा लेकिन अपने घर में अपनों का लात बर्दाश्त से बाहर होता है। 

बहरहाल,आप पीछे चलिए और किताब के पहले लेख में लेखक की टिप्पणी  पर गौर करिए – “वर्ष 1997 और 1998 में काफी समय तक बिहार को समाचार माध्यमों में काफी जगह मिली।लेकिन इसका अधिक श्रेय किसी विशुद्ध चिन्ता के भाव को न जाकर लालू प्रसाद की मसखरी को जाता है।उनकी खास किस्म-किस्म की वेशभूषा,अँग्रेजी बोलने की उनकी आत्मविश्वास भरी कोशिशें,इस ओर से उनका बिल्कुल उदासीन रहना कि उनसे बात करने वाले उनके बारे में क्या सोचते हैं,उनके पीछे पीकदान लेकर खड़ा चाटुकार…शायद वह राजीव गाँधी  के शिखर पर पहुँचने के बाद के सबसे अधिक करिश्माई भारतीय राजनीतिज्ञ थे,और फिर राजीव को उनका करिश्मा उनके वंश से ही मिला था।

लालू प्रसाद महीनों तक टी. वी. दर्शकों के लिए ‘बिहार का मुखारबिंद’बने रहे।”विजय को इस बात पर आश्चर्य होता है कि परम्परा और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध बिहार के पढ़े-लिखे लोग उत्तर प्रदेश के प्रति प्रशंसा का भाव तो रखते हैं जबकि अपने ही राज्य के बारे में सबसे बुरी राय रखते हैं।जाहिर है यह आत्ममूल्यांकन की प्रक्रिया का परिणाम नहीं है बल्कि इसका कारण एक  विशेष किस्म की राजनीतिक संस्कृति से क्षोभ है।वह राजनीतिक संस्कृति जिसके सूत्रधार लालू प्रसाद हैं।जातिगत नरसंहार और रेल की डकैतियों से बिहार की जो छवि बनी उसका सबसे बुरा प्रभाव प्रवासी बिहारियों पर पड़ा। लोगों ने भय वशअपने प्रदेश की पहचान छिपाने की कोशिश की।

बाहर जाकर बिहार के लोग अपने को उत्तर प्रदेश का निवासी बताने लगे। मेरे ख्याल से अस्मिता का यह संकट लगभग उसी तरह का था, जिसमें किराया का घर पाने के लिए अभी भी  बहुतों को अपनी जाति  और  मजहब छुपाने की लाचारी होती है।

लेखक ने लालू प्रसाद और कॉंग्रेस पार्टी की लुकाछिपी के खेल को आश्चर्य की दृष्टि से देखा है।कॉंग्रेस पार्टी के विरोध की राजनीति के गर्भ से निकले लालू के प्रति कॉंग्रेस की दिलचस्पी इनके लिए शोध का विषय है। धीरे-धीरे लालू प्रसाद से बहुतों ने किनारा कर लिया लेकिन कॉंग्रेस ने अपने जनाधार को निरन्तर दूर होते जाते देखकर भी लालू प्रसाद से अपना सम्बन्ध बनाए रखा है। वे काल-परीक्षित विचारधारा का सवाल उठाते हैं। वह विचारधारा जो काल प्रवाह में अपनी गलतियों से सीखती है।क्या देश भर में कॉंग्रेस पार्टी का ग्राफ नीचे गिरा है उसके पीछे एक कारण निरन्तर घोटाले की सुर्खियों से जुड़े लालू प्रसाद को हरी झण्डी  दिखाने से नहीं जुड़ा है? लालू प्रसाद से गठबन्धन बिहार में था।

कॉंग्रेस को इसकी कीमत पूरे देश में चुकानी पड़ी। लेखक का आशय यही है कि राजनीति में रिश्तेदारी रक्त की नहीं होती,विचार और विचारधारा की होती है। इस गठबन्धन के पीछे उन्हें ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता।ऐसे में उन्हें गाँधी  याद आते हैं।वहीं गाँधी  जो रेणु के‘मैला आँचल’ की प्रेरणा हैं। 1942के आन्दोलन में रेणु अपनी पढ़ाई छोड़ कर गाँधी  के आह्वान पर देश के स्वाधीनता आन्दोलन में शामिल हुए थे। यह कैसा विचित्र संयोग है कि जिस रेणु को अश्रुपूरित नेत्रों से याद करते हुए जयप्रकाश नारायण सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान कर रहे थे,लालू प्रसाद अपने को उसी जयप्रकाश जी का मानस पुत्र मानते थे।

आकस्मिक नहीं कि बिहार की धरती पर लेखक को इस गौरवशाली अतीत की टीस झंकृत न करे।लालू प्रसाद जिस महान धरती की महान राजनीतिक परम्परा से जुड़े हैं उसका सीधा सम्बन्ध गाँधी  से जुड़ा है। लालू प्रसाद के जरिए बिहार का काया पलट होना चाहिए था। लेकिन वह राजनीतिक परम्परा जो गाँधी  से होते हुए लोहिया और जयप्रकाश के रास्ते लालू प्रसाद को सत्ता के शिखर तक ले गयी पता नहीं किस साजिश का शिकार हो गयी? यह उन आँखों का दुर्भाग्य था जिनके आँसुओं को पोछने का सपना गाँधी  ने देखा था।  अपने आखिरी दिनों में  गाँधी  को नेहरू भी रहस्यमय लगने लगे थे।

विजय ने उसी गाँधी  को याद किया है जो आजादी का लक्ष्य हासिल होने के बाद एक राजनीतिक दल के रूप में कॉंग्रेस की प्रासंगिकता को लेकर सन्देह व्यक्त कर चुके थे।प्रतिरोध,  संघर्ष और सत्याग्रह के बल पर जैसी कॉंग्रेस पार्टी गाँधी  ने बनाई थी उसकी प्रकृति ही सत्ता विरोधी थी। सत्ता के साथ उसे जोड़ना उसकी स्वाभाविक प्रकृति की हत्या थी। गाँधी  की यही आशंका थी कि उसमें अब बावनदास जैसे लोगों की जरूरत नहीं रहेगी बल्कि कमल नारायण काबरा जैसे लोग उससे जुड़ कर उसे बदनाम करेंगे। गाँधी  इसी कलंक से बचना चाहते थे। कबीर के बेटे कमाल ने कबीर के फूल बन जाने पर उनके नाम पर पन्थ स्थापित करने का विरोध किया था।

मठ वालों को यह बात उचित नहीं लगी। कमाल कपूत बताए गये। यही होता है -“साँच कहे तो मारन धावे,झूठे जग पतियाना।” लेखक की टिप्पणी देखिए,”गाँधी  ने जब यह सुझाव दिया कि नयी दिल्ली के वायसरॉय पैलेस को एक अस्पताल में तब्दील कर दिया जाए और भारत का पहला राष्ट्रपति किसी हरिजन लड़की को बनाया जाए,तो यह उनका सही विचार था।लेकिन नेहरू और कॉंग्रेस को राज के ताम – झाम ने मोह लिया। वे यह सोचने लगे कि इसे उन्होंने अपनी तमाम परेशानियों और बरसों के कारावास से अर्जित किया है।”

 विजय नाम्बिसन ने लालू प्रसाद के एक जनसभा की चर्चा की है।एक दलित सन्त की याद में आयोजित होने वाला वह मेला एक वर्चस्वशाली जाति के पराजय के जख्मों से जुड़ी हुई लगभग सौ साल पुरानी स्मृतियों से जुड़ा हुआ था। लालू प्रसाद वहाँ बारह-पन्द्रह कारों के काफिले में पहुँचते हैं।‘चैता’देखते हैं।सन्त के मन्दिर जाते हैं और पास बने मंच से भाषण देते हैं।इस किताब में लालू प्रसाद की जनसभा का सिर्फ यही प्रसंग मिलता है।लेकिन सिर्फ इस एक प्रसंग से वे उनकी भाषण शैली और जनता से कनेक्ट करने की कला के कायल हो जाते हैं।

लालू जी के शब्दों को ही वे सीधे उद्धृत करते हैं।”जैसे आपके गावों में फेरीवाले आकर कहते हैं,हर माल मिलेगा चार आने में,(वह गरज कर कह रहे थे)वैसे ही मेरी सरकार के हाकिम आप जो चाहेंगे आपके लिए वही लेकर आएँगे। मुफ़्त की साड़ियाँ,मुफ्त की धोतियाँ.. वे आपके गाँव में डेरा डालेंगे..वे आपके नौकर हैं..आपको जो चाहिए ले लीजिए।

” आप खुद सोंचे कि जिस जनसभा में जिले के कलेक्टर के सामने उसे जनता का नौकर बताया जाए वहाँ लोकतन्त्र के मालिक का हौसला क्यों नहीं सातवें आसमान पर होगा? जनसामान्य से जुड़ने के लिए जिस शब्दावली और मनोविज्ञान की दरकार होती है उसे समझने में लालू प्रसाद देश के अद्वितीय नेता रहे हैं, यह इलहाम विजय की किताब में एक अन्तर्निहित आख्यान के रूप में मौजूद है।

लेकिन,उन्हें इस लोकप्रियता के पीछे के खतरे का भी इल्हाम है,”लालू प्रसाद जब मंच से नीचे देखते हैं तो उन्हें क्या दिखाई देता है – लोग या मतदाता? जब आपको केवल उस मंच के नीचे अनचीन्हें जनसमूह में आपके चुनाव क्षेत्र के लोग दिखाई देते हैं जहाँ से आप उसी दिन पाँच बार पहले पढ़े जा चुके भाषण को दोहरा रहे होते हैं; जहाँ आपकी व्यक्तिगत मुलाकात केवल उन मतदाताओं से होती है जो व्यापारी और पार्टी के आका लोग हैं; तब लोकतन्त्र का वजूद समाप्त हो जाता है,और आप जनता को उत्तेजित करने वाले वक्ता भर होते हैं।

” राजनीति में और वह भी बिहार जैसे अपेक्षाकृत पीछे की कतार में खड़े राज्य में जहाँ विकास के नाम पर वोट लेने से ज्यादा आसान जाति के नाम पर उत्तेजना फैला कर वोट लेना होता है वहाँ लेखक का आकलन है कि,”जो शासक अपनी आँखों पर पट्टी बांधे रहता है वह अपनी प्रजा को विकास के लाभों से दूर रखने में कामयाब रहता है,क्योंकि ईमानदारी की बात तो यह है कि वह खुद उन्हें नहीं देख सकता।

कोपेनहेगेन की लड़ाई के दौरान नेलसन को पता था कि युद्ध समाप्त करने की झण्डी दिखा दी गयी है,फिर भी दूरबीन को जानबूझकर अपनी आँख पर लगाए रहा।” जगन्नाथ मिश्र को अपेक्षाकृत विनीत मानते हुए वे लालू प्रसाद को नेलसन और जगन्नाथ मिश्र के विपरीत मानते हैं क्योंकि,”लालू प्रसाद सत्ता के उपयोग और दुरुपयोग के बीच फर्क नहीं करते। जैसे वह अनैतिक न होकर केवल नैतिकता निरपेक्ष हैं,वैसे ही वह अनुदार न होकर केवल उदारता निरपेक्ष हैं।”

बिहार की राजनीति के बहाने विजय नाम्बिसन दुनिया के अन्य विकसित देशों के लोकतान्त्रिक इतिहास के पास एक लम्बी यात्रा पर भी निकलते हैं।इस यात्रा में प्राप्त निष्कर्ष उनकी गहरी अध्ययनशीलता और विश्लेषण की विलक्षण प्रतिभा का परिचय देते हैं।मसलन, फ्रैंकलिन रूजवेल्ट और मार्टिन लूथर किंग के जमानों के बीच के दौर में साफ सफाई से पहले के अमेरिकी लोकतन्त्र को वे आज के भारतीय लोकतन्त्र जैसा ही मानते हैं। इस सन्दर्भ में वे रेमंड सैंडलर की चर्चित किताब “द लेडी इन दि लेक” के हवाले से यह बताना नहीं भूलते कि पुलिस का धन्धा राजनीति की तरह होता है जो,”सर्वोच्च किस्म के आदमियों की माँग करता है,और इसमें सर्वोच्च किस्म  के आदमियों को आकर्षित करने लायक कुछ भी  नहीं है।  इसलिए हमें जो मिलता है हमें उसी से काम  चलाना पड़ता है।”


लोकतन्त्र  के प्रति अपनी अगाध निष्ठा के बावजूद वे इस बाद से आहत दिखाई पड़ते हैं कि,”लोकतन्त्र को अक्सर तोड़ा-मरोड़ा,विकृत और अपवित्र किया गया है।दरअसल अमरीका और ब्रिटेन का समूची उन्नीसवीं शताब्दी का लगभग पूरा का पूरा इतिहास ही लोकतन्त्र के दुरुपयोग पर एक वक्तव्य है।लेकिन हाल के वर्षों में ऐसी मिसालें भी बहुत कम मिलती हैं जहाँ उसे इस तरह माँजा गया हो जैसा कि बिहार में होता है,जहाँ हर व्यक्ति को वोट देने का अधिकार है और समाचारपत्रों को आजादी है।”उन्हें इस बात की चिन्ता है कि इतने बड़े जनादेश और विश्वास के बावजूद लालू प्रसाद बिहार के लिए कुछ कर नहीं पाये और चारा घोटाले और भ्रष्टाचार की दूसरी मिसालों ने गरीबों के बीच उनकी मसीहा की छवि को भी ध्वस्त कर दियाहै ।

जिस वंशवाद और परिवारवाद के आरोप ने एक जमाने में कॉंग्रेस को कटघरे में खड़ा किया था,पुनः वे खुद उसी कठघरे में खड़े हो गये। लेकिन इससे भी बड़ी चिन्ता उन्हें इस बात को लेकर है कि जमींदारी प्रथा के खिलाफ जिस प्रदेश में आजादी से पहले आवाज उठती रही हो और लालू प्रसाद जैसे नेता उस प्रतीकात्मक राजनीतिक आकांक्षा का उपयोग करने के बावजूद वास्तविक धरातल पर कुछ भी ठोस कर पाने में सस्ते लोक लुभावन नारे से आगे बढ़ कर कुछ भी नहीं  कर पाये। जिस प्रदेश में ठाकुर जी से लेकर  कुत्ता और बिल्ली के नाम पर हजारों एकड़ जमीन मौजूद रही हो वहाँ लाखों के पास अपने रहने के लिए भी घर न हो तो इसमें अचरज क्या है?जमीन रबर तो है नहीं।

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बिहार की राजनीति लम्बे  समय तक जमींदारों की राजनीति रही है।जमीन को बचाने और उसे बढ़ाने की ललक में भूमिहीनों को उनके औकात में रखना भी राजनीतिक वर्चस्व का एक बड़ा एजेण्डा रहा है।लालू प्रसाद ने शुरू में इस तबके में कुछ सपने भी बोए थे।वे सपने जो कर्पूरी जी के बाद ध्वस्त हुए थे और मण्डल  आयोग के बाद जिनके लिए पर्याप्त उर्वर जमीन भी मिली थी ।लेकिन लेखक को इस बात का दंश है कि पिछड़ा वर्ग की राजनीति और मुस्लिम-यादव समीकरण में दलित भूमिहीनों की हालत में कोई आमूल परिवर्तन नहीं हुआ।मधेपुरा के जमींदार यादवों के जरिए लेखक ने इस बात की ओर संकेत किया है कि लालू प्रसाद भूमि सुधार और भूमिहीन दलितों के पक्ष में कोई बड़ा बदलाव करने का खतरा नहीं मोल ले सकते।

लड़ाई सिर्फ जाति की होती तो इतनी जटिल नहीं होती।यह लड़ाई  जमीन की है।जो जाति में भी हीन हैं और जमीन में भी उनकी श्रेणी ही अलग है । प्रेमचन्द और रेणु ने अपने कथा-संसार में इस श्रेणी की नागरिकता को जानवर से भी बदतर माना है।   उनकी अहमियत सिर्फ इतनी है कि जमीन वालों की जमीन पर उनकी शर्तों के अनुरूप काम करें अन्यथा बाहर का दरवाजा खुला है । बिहार में खेतिहर मजदूरों की दुर्दशा का करुण चित्र इस किताब में मौजूद है ।

“कटनी के समय गाँव के गरीबों की भीड़ की भीड़ रोज सुबह सुबह उन खेतों में जमा होती है जो अक्सर दस या बीस किलोमीटर दूर होते हैं।वहाँ वे तपती धूप में तीसरे पहर तक गुलामी करते हैं और मजदूरी के तौर पर उन्हें मिलता है उन्हीं के मेहनत का एक छोटा सा हिस्सा।कभी कभी उन्हें एक या दो किलो दाल या सरसों के दाने या थोड़ा सा अनाज मिल जाता है।नकद उन्हें एक पैसा भी नहीं मिलता,खाना भी नहीं।केरल में इस समय कोई भी अकुशल मजदूर भी रोजाना डेढ़ सौ रुपए से कम पर अपना पसीना बहाने को तैयार नहीं होता,दो जून का खाना और चाय वह अलग से लेता है..।”

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भारत की आजादी के पचास साल पूरा होने पर प्रसिद्ध अँग्रेजी साहित्यिक पत्रिका  ‘ग्रांटा’का  एक विशेषांक प्रकाशित हुआ था। यह वही पत्रिका है जिसकी शुरुआत 1889 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय के छात्रों ने वहाँ बहने वाली नदी के नाम पर की थी। जहाँ तक मुझे अभी ध्यान में  आ रहा है कि हिन्दी में शायद ही कोई  पत्रिका हो जो  नदी के नाम पर निकली हो।लेकिन ‘ग्रांटा’ नदी के नाम पर  है और आज तक अपने ऑनलाइन संस्करण के साथ दुनिया के साहित्य प्रेमियों के बीच टी.एल. एस. की तरह समादृत है।बहरहाल,इस पत्रिका के 1997 के अप्रैल अंक में प्रकाशित दो आलेखों के सन्दर्भ से विजय ने कुछ मौलिक सवाल उठाये हैं।

पहला लेख है इयान जैक का जो सम्पादकीय के रूप में प्रकाशित हुआ था। लालू प्रसाद के बाद बिहार में पैदा हुई  नयी राजनीतिक संस्कृति के सन्दर्भ में वे लिखते हैं कि,”पहले की अपेक्षा आज यह स्थिति सबसे अधिक है कि गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोग और उससे ठीक ऊपर रहने वाले लोग अपनी माँगों को पूरा करने के लिए राजनीतिक कारवाई की माँग कर रहे हैं और अधिक सब्सिडी वाला खाना और अधिक सरकारी नौकरियाँ माँग रहे हैं।वे उन लोगों को वोट देते हैं जो अधिकतम उनकी तरह हैं। इस अर्थ में हिन्दुस्तान में ऐसे प्रतिनिधि राजनीतिज्ञ कभी नहीं हुए।कुलीन,अँग्रेजी भाषी नेता तो लगभग गायब हो गये हैं।हालाँकि, अँग्रेजी नये  व्यापारिक दमखम की और उनलोगों की भाषा है जिन्हें इससे फायदा पहुँचा है।अर्थशास्त्र और लोकतन्त्र की ताकतें एक दूसरे के विरुद्ध हैं।

“ब्रिटेन के सर्वाधिक प्रसिद्ध पत्रकार इयान जैक के इस सम्पादकीय अंश के उद्धरण से विजय नाम्बिसन ने इस बात की ओर संकेत किया है कि लालू प्रसाद के माध्यम से मण्डल  आयोग के बाद जिस राजनीतिक संस्कृति का उदय हुआ है उस पर देश के अन्य हिस्सों की ही नहीं पश्चिमी मीडिया की भी निगाह है। 

मेगास्थनीज ने ‘इण्डिका’ के जरिए बिहार को समझने की जो सूत्रपात की थी उस पर ‘द गार्जियन’और ‘ग्रांटा’ जैसे पत्र-पत्रिकाओं की भी नजर है। विजय नाम्बिसन के लिए इयान जैक ने एक बहुत बड़ा सूत्र दिया- अर्थशास्त्र और लोकतन्त्र की शक्तियों का विरोधी स्वरूप। लेकिन वे इस तर्क से सहमत  नहीं हैं। टिप्पणी देखिए, “उनका यह सोचना गलत है कि आर्थिक शक्तियों का जुड़ाव कुलीन राजनीतिज्ञों से इसलिए है क्योंकि दोनों ही अँग्रेजी बोलते हैं। भारत में जो आर्थिक शक्तियाँ हैं उनका इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि आप अँग्रेजी बोल सकते हैं या नहीं।

आपकी कामयाबी तो इस बात पर निर्भर करती है कि आप मौजूदा स्थितियों का दोहन कितनी अच्छी तरह से कर सकते हैं,और विकास को कैसे रूप दे सकते हैं कि उससे आपको लाभ हो। राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों ही पैसे की भाषा बोलते हैं।लोकतन्त्र का इन दोनों में से किसी से भी लेना देना नहीं है।

विजय नाम्बिसन पेशे से पत्रकार जरूर थे लेकिन उनके हृदय में एक किसान हमेशा जीवित रहा।वह किसान जो खेत देखते ही हुलस कर उसकी मेड़ों पर दौड़ने के लिए मचल जाए। उसे खेतों की मिट्टी की पहचान है।बाबर जब गाजीपुर के पास से गुजर रहे थे तो वहाँ की उर्वर मिट्टी को देखकर मचल उठे थे। अबुल फजल ने दर्ज किया है कि,”डर है कि मिट्टी से जुड़ते ही छड़ी में कोंपल न निकल जाए।” विजय बाबर नहीं थे लेकिन उन्हें  गाजीपुर से गंगा के किनारे ही 250 किलो मीटर दूर म… की मिट्टी की उर्वरा शक्ति का परिचय मिल गया है,”यहाँ की मिट्टी इतनी उपजाऊ है कि विश्वास ही नहीं होता; एक बीज डालिए और वह फूट आयेगा।

हमने जो पहली सर्दियाँ वहाँ देखीं,उनमें आलू और प्याज एक रुपए किलो बिक रहे थे।मैंने वहाँ फूलगोभी जैसे बड़े गुलाब और डहलिया,और फुटबाल जितनी बड़ी  गोभिया देखी हैं।” आलू,प्याज और फूलगोभी से पुलकित हृदय भारत माता के ‘मैला आँचल’ में मैल की तरफ ही नहीं देखता उसे इस धवल पक्ष की भी पहचान है जो इसकी उर्वर भूमि में छिपी है।इसके पास अपने सभी बच्चों का पेट भरने की ताकत है ।बशर्ते, इस धरती माता का दुलार उसके सारे बच्चों को नसीब हो। फिर, उन्हें  ‘ए फेयरवेल टू आर्म्स’के अर्नेस्ट हेमिंग्वे का  एक मशहूर कथन याद आता है,”किसान में अक्ल होती है,क्योंकि वह आरम्भ से ही पराजित होता है।

आप उसे सत्ता दीजिए और फिर देखिए कि उसमें कितनी अक्ल है।” विजय नाम्बिसन को इस बात का अफ़सोस है कि काश! हेमिंग्वे किसान होते? किसान न होते हुए अगर किसान पर इतना भरोसा है तो किसान होने पर कितना होता?यह तो लगभग उसी तरह की बात हुई कि शंकराचार्य जैसा संन्यासी किसान के जीवन को सर्वश्रेष्ठ मानता है। पत्रकार होने के बावजूद उन्होंने अपने भीतर किसान और मिट्टी के प्रति सम्मान को कम नहीं होने दिया है। यही नेह का धागा उन्हें बिहार के गाँवों से भी उतना ही जोड़ता था जितना केरल या तमिलनाडु या कर्नाटक के गाँवों से।

विजय नाम्बिसन जैसे लोग बिहार बार बार नहीं आते।बिहार छोड़ने की टीस उनके मन में कितनी थी इसे बताने के लिए उन्होंने आकस्मिक रूप से औरंगजेब के शब्दों का सहारा लिया है,”मैं इस दुनिया में कुछ भी लेकर नहीं आया था,और मैं अपने गुनाहों का फल लेकर इस दुनिया से जा रहा हूँ।”

लेखक हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद में प्रोफेसर हैं|

सम्पर्क- +918374701410, gpathak.jnu@gmail.com

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सबलोग

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी
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