पर्यावरण

#अप्रैल_कूल_कैम्पेन (#April_Cool_Campaign)

 

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र,शोधार्थी एवं शिक्षकों की बागवानी टीम ने कई पौधे एक साथ कोविड महामारी के दौर में अपने-अपने घरों में लगायें और #April_Cool  कैम्पेन को एक खूबसूरत शुरुआत देने की पहल की। कुमार राम, मनीष कुमार, रवि कुमार, लालू राय और विशाल कुमार गुप्ता एवं अन्य छात्रों ने पिछले तीन वर्षों से ऐसे कई पौधारोपण कार्यक्रम (#हरीभरी_फरवरी, #अप्रैल_कूल, #पानी_पिलाओं_जीवन_बचाओं, #मानसून_ब्यूटीफुल, #रियल_ग्रीन_क्रिसमस_ट्री_कैम्पेन इत्यादि) करके कई शिक्षकों एवं दिल्ली विश्वविद्यालय  के छात्रों विशेषकर स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग एवं नॉन कॉलेज के छात्रों को प्रेरित करने का काम किया है।   साथ ही साथ सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफ़ॉर्मों (उदाहरण स्वरूप फेसबुक पेज: बागवानी और प्रोटेक्ट एनिमल्स रिफ्लेक्ट ह्यूमैनिटी) से जनजागृति की अपनी इस मुहीम को आगे बढ़ा रहे है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि अप्रैल का महीना अपने कई खूबियों के कारण जाना जाता है।  इनमे से एक है अप्रैल के महीने में अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को फूल (उल्लू) बनाना और दूसरी विषेशता है अप्रैल के महीने से मौसम का गर्म होना। #April_Cool (#अप्रैल_कूल) एक कैम्पेन है जिसका मुख्य उद्देश्य अप्रैल के गर्म होते महीने को कूल (ठंडा) बनाना है, जिससे हमारा वातावरण और हमारी धरती कूल रह सके।  जब हमारी धरती कूल रहेगी तभी इसमें रहने वाले जीव भी कूल रह सकेंगे।

#April_Cool कैम्पेन के तहत प्रतिभागियों को एक पौधा लगाना है और सोशल मीडिया (फेसबुक, व्हाट्सप्प, इंस्टाग्राम इत्यादि) पर अपने लगायें पौधे कि तस्वीर के साथ #April_Cool टैग लाइन लगाकर अपने दोस्तों एवं रिश्तेदारों के साथ शेयर करना है, ठीक वैसे ही जैसे आप होली, दिवाली या अन्य त्योहारों पर तस्वीरें शेयर करके करते हैं।  साथ ही साथ आपको अपने तीन दोस्तों को भी ऐसा करने के लिए मानना है।

#April_Cool कैम्पेन का महत्व इस मायने में भी बढ़ जाता है कि आज हमारा वातावरण इतना प्रदूषित हो गया है कि हम खुल कर साँस भी नहीं ले पाते, ऐसा लगता है कि हमारे चरों ओर विषैली गैसों कि एक चादर फैली है जिसमे हम सभी जीवन जीने के लिए मजबूर हैं।  हम इंसानो का पूरा जीवन पूरी तरह से प्रकृति पर आश्रित है लेकिन हम हमें जीवन देने वाले वातावरण से सौतेला व्यवहार करते है जिसका परिणाम घातक साबित हुआ है।  यह समस्या और विकराल रूप धारण कर सकती है।  इस कैंपेन को लेकर हमारे कई दोस्तों का एक सवाल था कि इतनी गर्मी में हम पौधे कैसे लगा सकते हैं, वह तो गर्मी में मर जायेंगे। हमारा मानना है कि हम अभी इंडोर प्लांट्स लगा सकते हैं जो घर के अंदर रखे जाते है।  ज्यादातर एयर प्यूरीफायर प्लांटइस श्रेणी में आते है।  घर के अंदर लगाने के लिए कुछ बेस्ट प्लांट्स हैं :मनी प्लांट, पीस लिली, स्नेक प्लांट, बम्बू पाम, स्पाइडर प्लांट्स इत्यादि। ये पौधे न सिर्फ हवा को स्वच्छ करने में अन्य पौधों से ज्यादा सक्षम है, बल्कि यह हमारे घर की सुन्दरता को भी बढाते है।

सम्भावनाओं से भरी ज़िन्दगी की डोर आती-जाती सांसों से बंधी होती है और इन सांसों का आधार है, हरा-भरा वातावरण यानि पर्यावरण।  सांसों से हम जो कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं वो पौधे ग्रहण कर लेते हैं और उसके बदले में वो हमें देते हैं बेशकीमती ऑक्सीज़न। Instead of making April fool we can make April cool by planting trees and  to reduce pollution problem. - Brainly.in

एक अनुमान के अनुसार एक स्वस्थ पेड़ से 260 पौंड ऑक्सीज़न हर साल हमें मिलता है।  इस तरह के दो पेड़ दो से तीन लोगों की ऑक्सीज़न की जरूरतों को पूरा करते हैं।  यानि जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है वैसे-वैसे हमारे लिए पौधे और बेहतर पर्यावरण की आवश्यकता भी बढ़ गयी है।  हम सब पर्यावरण को अपने-अपने ढंग से जानते और समझते हैं।  पर्यावरण यानि जो प्राकृतिक रूप से हमारे चारों तरफ है और पृथ्वी पर हमारे रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करता है।  हवा, जिसे हम हर पल साँस लेते हैं।  पानी, जिसे हम अपनी दिनचर्या में इस्तेमाल करते हैं।  पौधे, जानवर और सभी जीवित चीजें सब पर्यावरण के तहत ही आते हैं। स्वस्थ वातावरण प्रकृति के संतुलन  को बनाये रखता है और साथ ही साथ पृथ्वी पर सभी जीवित चीजों को बढ़ने और विकसित करने में मदद करता है।

आधुनिक होते समाज में पर्यावरण की समस्या विकासशील राष्ट्रों की ही नहीं बल्कि पुरे विश्व की समस्या बन गयी है।  सभी ऋतुएं अपने अस्तित्व को खोती नज़र आ रही है।  समय पर ठण्ड न पड़ना, गर्मी में बहुत ज्यादा गर्मी, वर्षा का समय पर न आना या कहीं-कहीं बेमौसम अधिक वर्षा होना, कहीं अकाल की स्थिति पैदा होना…ये सब पर्यावरण में बदलाव का ही नतीजा है।  पर्यावरणीय समस्याओं से मनुष्य और दूसरे जीवधारियों को अपना सामान्य जीवन जीने में कठिनाई होने लगती है और कई बार जीवन-मरण का सवाल पैदा हो जाता है।

प्रदुषण एक पर्यावरणीय समस्या है जो आज एक विश्व-व्यापी समस्या बन गयी है।  पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और इंसान सब उसकी चपेट में हैं।  कारखानों, बिजली घरों और मोटर वाहनों में खनिज ईंधनों का अंधाधुंध प्रयोग होता है, इनके जलने पर कार्बन-डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड आदि खतरनाक गैसें निकलती हैं जिससे धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और मौसम में असामान्य बदलाव हो रहा है।

पिछले सौ सालों में वायुमंडल का तापमान 3 से 6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। लगातार बढ़ते तापमान से दोनों ध्रुवों पर बर्फ गलने लगेगी जिससे कई देशों की डूबने की सम्भावना बढ़ गयी है।  इसके आलावा कुछ क्षेत्रों में सुखा पड़ेगा तो कई जगहों पर तूफ़ान आएगा और कहीं भरी वर्षा हो सकती है। उद्योगों से निकलने वाली विषैली गैसों से वायु प्रदुषण कई गुना बढ़ गया है जिससे पर्यावरण और जीव-जंतुओं को भारी नुकसान पहुँच रहा है। Save our rivers by planting more Trees before its too late - Save Mother  Earth - NurseryLive Wikipedia

हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने के पीछे भी यही मकसद है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया जा सके।  लेकिन साल के किसी एक दिन इस तरह का दिवस मनाकर हम इस विकराल समस्या को नही सुलझा सकते, इसके लिए पूरे वर्ष सतत प्रयास करते रहने की जरूरत है।  इसी को ध्यान में रखते हुए टीम बागवानी की डेडिकेटेड टीम ने 1 अप्रैल, 2017से प्रत्येक वर्षअप्रैल के महीने में अप्रैल फूल मनाने के बजाय #अप्रैल_कूल मनाने का निर्णय किया।

कुछ उपायों को अमल में लाकर हम पर्यावरण के स्वरुप को बिगड़ने से बचा सकते हैं।  युवा वर्ग आगे आकर सकारात्मक योगदान दे सकते हैं। सही मायनो में गो-ग्रीन कहने के लिए ही नही बल्कि करने में भी आसान है।  आज के समय में पर्यावरण का ध्यान रखना हर किसी की जिम्मेदारी और अधिकार होना चाहिये और खासकर आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण का संरक्षण बहुत जरुरी है।

“आइये  हम सभी एक शपथ लें की हम सब अपने-अपने स्तर से पर्यावरण को बचाने की पूरी कोशिश करेंगे जिससे बनेगा हरा-भरा वातावरण और खुशहाल पर्यावरण। ” इस#अप्रैल_कूल कैंपेन से जुड़े और अपने दोस्तों, रिश्तेदारों को भी जोड़ें क्योंकि कोई अकेला हमारे पर्यावरण को स्वच्छ एवं स्वस्थ नहीं कर सकता।  इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सभी का योगदान अनिवार्य है।

धरती हो रही गर्म,

सासें होने लगी कम

आओ पेड लगायें हम…

 .

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लेखक प्रौढ़ सतत शिक्षा एवं विस्तार विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं। सम्पर्क +919716124147, vishaldujnu@gmail.com

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जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
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