
छब्बीस आदमी के बीच टानिया
साहित्य में समाज की तमाम समस्याओं का चित्रण किया जाता रहा है। अलग-अलग रचनाकारों ने इसे अपने-अपने नजरिये से रेखांकित किया है जिनमें से एक कहानी है, मैक्सिम गोर्की की ‘26 आदमी और एक लड़की’। इस कहानी के माध्यम से समाज में महिलाओं की स्थिति और उनके प्रति पुरूषों के रवैये और नजरिये का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया गया है। वैश्विक परिदृश्य में जब हम महिलाओं की बात करते हैं तो हम भारतीय लोगों के मन में उनके प्रति विशेषकर पश्चिमी देशों की महिलाओं के प्रति यह धारणा बनती है कि पश्चिम देशों की महिलायें अत्यंत सुंदर, स्वच्छंद और खुले विचार की होती हैं। वह सिर्फ विचारों से ही नहीं, शारीरिक रूप से भी स्वछंद होती हैं। शायद कुछ हद तक यह सही भी हो सकता है। किंतु, जब हम किसी महिला विशेष पर चर्चा करते हैं तो न सिर्फ़ भारतीय जनमानस में पितृसत्तात्मक सोच का प्रभाव स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है बल्कि, वैश्विक परिदृश्य में भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है। जहाँ महिला की भावनाओं की अपेक्षा उसकी देह के प्रति ज्यादा आकर्षण और लोभ दिखाई पड़ता है। ऐसी सोच-विचार रखने वाले लोग हर जगह बहुत आसानी से मिल जाते हैं। जबकि महिलाओं की सोच इसके विपरीत होती है। बड़े-बड़े ज्ञानी, महात्मा, विद्वान आदि लोग भी महिला सौंदर्य और देह के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। इसके पीछे का एक प्रमुख कारण पुरूषों की पितृसत्तात्मक सोच है, जिसे संयमित रखना आवश्यक है। जब कभी भी किसी महिला को केंद्र में रखकर, कोई पुरूष गलत धारणा बनाता है, उसी समय सही और गलत की पहचान कर ली जाए तो पितृसत्तात्मक सोच से पुरूष बाहर निकल सकता है अन्यथा अधिकांश पुरूषों की सोच में सुंदर स्त्री के प्रति कामवासना वाली धारणा जीवित रहती है। ऐसी सोच ही पितृसत्तात्मक सोच की जड़ों को मजबूती से पकड़े हुए है।
महिलायें संवेदनपूर्ण भावनाओं से परिपूर्ण होती हैं। वह पहले भावनात्मक तौर पर किसी के साथ जुड़ती हैं जिसमें दया, करुणा, प्रेम आदि का समावेश होता है। तदोपरांत किसी व्यक्ति विशेष से गहरा लगाव होने के बाद ही वह अपना शरीर किसी को सौंपती है। अधिकांश महिलाएं इसी सोच-विचार के साथ जीवन जीती हैं। महान रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की की कहानी ’26 आदमी और एक लड़की’ भी कुछ ऐसी ही परिदृश्य का उल्लेख करती है। कहानी 26 गरीब मजदूरों के बारे में है जो एक बेकरी में काम करते हैं। उनका जीवन अत्यंत कठिन, नीरस और अपमानजनक है। वे दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन उन्हें सम्मान या खुशियाँ नहीं मिलती।
इन 26 लोगों को मालिक ने एक तहखाने के समान कमरे में कामगार के तौर पर रखा है। ये लोग कैंडल और सुशका बनाने के लिये आटा गूंथते हैं। यह कमरा दमघोंटू वातावरण वाला था। इस जगह पर एक छोटी सी खिड़की थी, जिसे मालिक ने बंद करवा दिया था। इसके अलावा कमरे में दो छोटे-छोटे रोशनदान लगे थे, जिसकी ओर ये 26 लोग काली नज़र से देखा करते थे। कमरे का वातावरण जेल की तरह होने के कारण 26 लोगों का जीवन नरक के समान व्यतीत हो रहा था। तीन मंजिला इस मकान में दूसरी मंजिल पर सुनहरी कशीदाकारी की एक दुकान थी। उस दुकान में टानिया नाम की एक सोलह वर्ष की घरेलू सेविका थी जो उस तहखाने के कमरे में लगे दरवाजे की छोटी सी खिड़की से झाँकती और कैदियों से पूछती-क्या मेरे लिए कोई कैंडल(ब्रेड) हैं? इस मीठी आवाज़ को सुनते ही सब एक-दूसरे पर गिरते-पड़ते दरवाजा खोलते। सभी टानिया के सौंदर्य को देखकर आनंदित हो जाते हैं और 26 लोगों में से एक व्यक्ति नानबाई सबसे भारी कैंडल को टानिया के एप्रेन में डाल देता है। इस तरह से कैंडल का लेन-देन काफ़ी समय तक चलता रहा। इन कामगारों की दयनीय स्थिति को देखकर इन 26 लोगों से टानिया कभी-कभी हँसी-मज़ाक़ कर लिया करती थी। टानिया सबके साथ मित्रवत व्यवहार किया करती थी। इसी तरह से यह सिलसिला चलता रहा। उनकी इस नीरस जिंदगी में एकमात्र खुशी की किरण थी, एक सुंदर और मासूम लड़की टानिया। उनके लिए टानिया एक पवित्र, आदर्शवादी और प्रेरणादायक प्रतीक बन जाती है- मानो वह उनकी अंधेरी दुनिया में रोशनी हो।
किन्तु, एक दिन एक सिपाही अपना दंभ दिखाते हुए कैदियों से कहता है कि कितनी ही महिलाएं मुझ पर मोहित है, मेरे आकर्षण से कोई नहीं बच सकती। वह दावा करता है कि वह किसी भी लड़की को अपने आकर्षण में फंसा सकता है। मजदूर, टानिया की पवित्रता पर विश्वास करते थे और सिपाही को चुनौती देते हैं। कुछ समय बाद पता चलता है कि सिपाही ने टानिया को बहला-फुसलाकर अपने प्रभाव में ले लिया है। फिर क्या था सभी लोग टानिया की शुद्धता अर्थात् चरित्र की निगरानी करने में लग गये। कुछ समय बाद ये 26 लोग देखते हैं कि उस तीन मंजिल मकान से पहले सिपाही निकलता है, जिनकी मूछें कांप रही थी और फिर पीछे से टानिया बाहर निकलती है। टानिया की आँखों में चमक और खुशी थी और वह मानो नींद में चल रही हो। सच्चाई का पता नहीं किन्तु, इस दृश्य को देखकर टानिया को 26 लोगों ने घेरकर गालियां देनी शुरू कर दी। सभी उसे अजीबो-गरीब नजरों से देखने लगे। एक ने तो टानिया की कमीज की बाजू तक को फाड़ दिया। टानिया अपने बाजू को ऊपर करते हुए नफरत भरी नजरों से देखते हुए इन 26 लोगों से कहती है- ‘तुम अभागे कैदी हो!’ तुम जंगली जानवर हो…पृथ्वी की गंदगी हो’, यह कहते हुए वह चली जाती है।
इन 26 लोगों के विचार की तरह ही वैश्विक समाज की सोच भी बहुत हद तक वैसी ही बनी हुई है। कई दशक बीतने के बाद भी पुरुषवादी सोच में परिवर्तन नहीं आया है जो एक बड़ी समस्या है। इसकी वजह से न जाने कितनी महिलाओं को हैवानियत का शिकार होना पड़ रहा है। यह हैवानियत समाज में छोटी- छोटी बच्चियों तक पहुंच गया है। समाज में इन जैसे विकृत मानसिकता वाले लोगों को जड़ से खत्म कर देना चाहिए। इस तरह के सोच रखने वाले लोगों के कारण महिलाओं का जीवन अत्यंत संघर्षशील हो जाता है। महिलायें अपनी अस्मिता को बचाने के लिये संघर्ष करती रहती हैं और पुरुषों के लिए सबसे आसान काम उनके चरित्र पर लांछन लगा कर उन्हें चरित्रहीन साबित करना होता है। इसलिये पुरूषवादी सोच से निकलकर मानवीय और नैतिक मूल्यों के साथ मानववादी, स्त्रीवादी और संवेदनशील होने की आवश्यकता है जो कि अच्छे संस्कारी वातावरण के माध्यम से बनाया जा सकता है। इस तरह का आचरण कर सभ्य नागरिक का परिचय दे सकते हैं। गोर्की दिखाते हैं कि जब मनुष्य अत्यधिक दमन और अभाव में जीता है, तो वह किसी छोटे से सहारे को भी आदर्श बना लेता है। लेकिन जब वह आदर्श टूटता है, तो उसके भीतर की कड़वाहट और निराशा बाहर आ जाती है। उन कैदियों का प्रेम निस्वार्थ या मानवीय नहीं था, बल्कि अपने मन को सहारा देने का एक माध्यम था। जब वह सहारा छीन गया, तो उनकी कुंठा और निराशा बाहर आ गई। वे टानिया को दोषी ठहराते हैं, जबकि दोष उनकी कल्पनाओं का था। गोर्की यहाँ यह संकेत देते हैं कि अत्याचार सहने वाला व्यक्ति भी मौका मिलते ही दूसरों पर अत्याचार करने लगता है। शोषित वर्ग स्वयं भी कभी-कभी क्रूरता का व्यवहार करता है। यह मानव स्वभाव की विडंबना है। यदि इसे महिला हिंसा और महिला अधिकारों के दृष्टिकोण से पढ़ा जाए, तो यह रचना पितृसत्तात्मक मानसिकता, स्त्री-देह के वस्तुकरण और सामूहिक पुरूष-हिंसा को समाज के समक्ष मार्मिक तरीके से प्रस्तुत करती है।
कहानी में टानिया को 26 मजदूर एक “पवित्र” और “अछूती” लड़की के रूप में देखते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि हर किसी की अपनी इच्छाएँ होती हैं। वे उसे सम्मान देते हैं, परंतु यह सम्मान उसकी स्वतंत्रता या व्यक्तित्व के लिए नहीं, बल्कि उनके बनाए हुए आदर्श के लिए था। सैनिक का चरित्र स्त्री के वस्तुकरण का स्पष्ट उदाहरण है। वह टानिया को एक चुनौती और विजय की वस्तु समझता है जैसा की प्रारंभ से होता रहा है। युद्ध हो या दंगा महिलाओं पर विजय पाना प्रमुख उद्देश्य रहा है। इसी तरह उनके लिए टानिया की भावनाएँ या स्वायत्तता महत्वहीन हैं; महत्वपूर्ण है उसका अहंकार और पुरूष होने का दंभ। यह मानसिकता आज भी समाज में देखी जाती है, जहाँ स्त्री को अपनी इच्छा से निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया जाता, बल्कि उसे पुरुष की उपलब्धि या संपत्ति की तरह देखा जाता है। मजदूर सिपाही को दोष नहीं देते; वे टानिया को ही सबका दोषी मानते हैं। यह “पीड़िता अथवा महिला को दोष देने” की प्रवृत्ति का उदाहरण है, जो आज भी कई समाजों में मौजूद है। जब किसी महिला के साथ अन्याय होता है, तो समाज अक्सर उसके पहनावे, व्यवहार या निर्णयों को दोषी मानता है जिसे यह कहानी चरितार्थ करती प्रतीत होती है।










