समाज

शब्दों के ठेकेदार

 

एक ब्लॉग है, जिस पर प्रकाशित किसी रचना पर कोई पाठक प्रतिक्रिया देता है तो उसकी सूचना लेखक को मेल के द्वारा दे दी जाती है। मेरी भी कुछ रचनाएँ वहाँ हैं और यदा-कदा ऐसी सूचना आती रहती है। एक दिन मेरी बाल कहानी ‘राखी नहीं बाँधूँगी’ पर किन्हीं शर्मा जी की पाठकीय प्रतिक्रिया की सूचना मिली। खोल कर देखा तो मन जैसे झुलस गया। अगर शर्मा जी ने लिखा होता कि ‘आपकी कहानी बेकार लगी’ तो मुझे कोई दुख नहीं होता। उन्होंने ऐसी बात लिखी थी जिसे पढ़कर मेरा दुखी न होना ही अस्वाभाविक होता। उन्होंने लिखा था -“ठाकुर साहब, कहानी लिखने से पहले यह तो सोच लेते कि शबनम नाम रखना उचित भी है या नहीं?”

मैंने देखा, शर्मा जी ने अपने नाम के आगे ‘पंडित’ भी लगा रखा था और खुद को लेखक, समालोचक घोषित कर रखा था। तो मेरी कहानी के एक पात्र के ‘शबनम’ नाम ने उनके ‘पंडित’ होने पर बट्टा लगा दिया था! उनके ब्राह्मणत्व को संकुचित कर दिया था, उनके हिन्दुत्व का अपमान कर दिया था। आज के इस साम्प्रदायिक माहौल में जब बहुत से उदार हिन्दू भी कट्टरता का दामन थाम चुके हैं तब अपने नाम में ‘पंडित’ लगाने वाले हिन्दू से क्या उम्मीद की जा सकती है? ऐसे लोगों के लिए किसी हिन्दू पात्र का उर्दू नाम रखा जाना तो नाकाबिले बर्दाश्त ही होगा न? यह अलग बात है, इसी कहानी के दूसरे पात्र के अंग्रेजी नाम ‘बंटी’ पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई!

दुख की बात यह है कि ऐसे कट्टरपंथी लोगों की ज्ञान-गंगा संकुचित नाले में तबदील हो गई है। समाज और जीवन को ये बहुत कम जानते-समझते हैं फिर भी खुद को सर्वज्ञ समझते हैं। अगर ऐसे लोगों को शब्दों की सही जानकारी होती तो ये हिन्दुओं में रखे जाने वाले ‘मीना’, ‘खुशबू’, ‘मुस्कान’, ‘कशिश’ और ‘खुशी’ जैसे नामों पर भी आपत्ति उठाते। लेकिन शायद उन्हें लगता होगा कि ‘शबनम’ नाम ‘मुसलमानी’ है और ‘खुशबू’,’मुस्कान’ वगैरह ‘हिन्दुआनी!’ उन्हें क्या पता कि ये सभी उर्दू भाषा के सुंदर शब्द हैं। इनका हिन्दू-मुसलमान से कोई लेना-देना नहीं है। फिर अमीर चंद, सेठ दीवान दास, खान चंद, दारोगा राय, सिपाही यादव, सिकंदर सिंह, इकबाल सिंह जैसे उर्दू नाम धारण किए हिन्दुओं और सिखों को ये क्या कहेंगे? उनसे अपना नाम बदल लेने को कहेंगे? ऐसे पोंगापंथियों को शायद इस बात की जानकारी नहीं होगी कि देश के बहुत से मुसलमान इनके हिन्दू नाम-सीमा, नेहा, मुन्ना, गुड्डू, राजू, बबलू वगैरह धारण किए हुए हैं। उनको तो एक अभियान चलाना चाहिए और मुसलमानों से ‘हिन्दुआनी’ नाम और हिन्दुओं से ‘मुसलमानी’ नाम नोंचकर फेंक देना चाहिए। लेकिन नहीं! कोई यूसुफ खान अपना नाम बदल कर दिलीप कुमार बन जाए तो इन्हें कोई आपत्ति नहीं होती। कोई हिन्दू अपना नाम यूसुफ रख ले तो इनका धर्म भ्रष्ट होने लगेगा। इसलिए ये इकतरफा कार्यवाही ही करेंगे।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ऐसे साम्प्रदायिक सोच वाले व्यक्तियों की सांप्रदायिकता हिन्दू-मुसलमान से होते हुए हिन्दी-उर्दू तक पहुँच गई है। हिन्दुत्व के ठेकेदारों को आखिर हिन्दी का ठेका किसने दे दिया है? ये हिन्दी का पक्ष लेने का दिखावा करते-करते उर्दू का विरोध करने लगे हैं। हममें से बहुतों ने देखा होगा कि समय-समय पर फेसबुक से लेकर व्हाट्सप पर हिन्दी-उर्दू शब्दों की एक लंबी-चौड़ी सूची घूम रही होती है जिसमें यह लिखा होता है कि ‘आप बिना मतलब उर्दू के उन शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं जिनके लिए हिन्दी में शब्द उपलब्ध हैं। उर्दू के बदले सूची में दिए गए हिन्दी के इन शब्दों का प्रयोग करें। मतलब मुसलमानों को किनारा करने की राजनीति अब उर्दू को किनारा करने की राजनीति में भी तबदील होती जा रही है।मतलब यह भी कि ये जाहिल साम्प्रदायिक हिन्दी को हिन्दुओं की और उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानते हुए दोनों भाषाओं के बीच दीवार खड़ी कर देने की कोशिश में लगे हुए हैं। एक ही जमीन से उपजी हिन्दी और उर्दू भाषाएँ एक-दूसरे के शब्दों, मुहाबरों और शैलियों को अपनाते हुए आगे बढ़ी हैं इस बात से उन नफरती इंसानों को कोई मतलब नहीं है। दोनों भाषाओं से दोनों भाषाओं के शब्दों और मुहाबरों को छीन लिया जाए तो दोनों भाषाएँ लुंज-पुंज हो जाएँगी-यह बात दोनों भाषाओं के कट्टरपंथियों को समझने की जरूरत है।

क्या मजेदार बात है कि दोनों ही भाषाओं के कट्टरपंथी अंग्रेजी से जरा भी परहेज नहीं करना चाहते। दोनों ही भाषाओं में अंग्रेजी के शब्द बहुतायत में प्रयोग किए जाते हैं मगर अंग्रेजी के शब्दों को विस्थापित करने की बात कोई नहीं करता। किसी भी भाषा के विकास के लिए दूसरी भाषाओं के शब्दों को अनायास अपनाते जाना जरूरी होता है इसलिए अंग्रेजी के शब्दों को हिन्दी-उर्दू से विस्थापित करने की ज़रूरत भी नहीं है। फिर हिन्दी और उर्दू से एक-दूसरे के शब्दों को विस्थापित करने की माँग कहाँ से उचित है?

नाम पर वापस आते हुए गौर करें तो हिन्दू परिवारों में ढेर सारे अंग्रेजी नाम मिल जाएँगे-डॉली, डॉल, विक्की, स्वीटी, क्यूटी, पिंकी, बेबी, मिनी, रॉकी, प्रिंस, डबलू, सनी वगैरह-वगैरह! इन नामों पर आपत्ति जताने के लिए तो कोई शर्मा जी उठ खड़े नहीं होते? ‘शबनम’ पर आपत्ति जताने के लिए क्यों उठ खड़े हो जाते हैं?

पता नहीं, शर्मा जी किस देश के वासी हैं? मैं उन्हें एक जानकारी दे दूँ कि बिहार के सहरसा जिले में एक गाँव है-बनगाँव! उस गाँव के ब्राह्मण ‘खान’ टायटिल लगाते हैं। इस बात पर आज तक बिहार के संपूर्ण ब्राह्मण समाज में से किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई है। शर्मा जी जैसे ब्राह्मणत्व और हिन्दुत्व के रक्षकों को चाहिए कि वे बनगाँव जाएँ और वहाँ के ब्राह्मणों के माथे से ‘खान’ का ‘कलंक’ मिटा दें!

एक लगातार विकसित होते समाज में होना तो यह चाहिए कि कोई अपना नाम सुनील अंसारी रख ले तो कोई मोहम्मद मिश्रा! कोई अरुण अली बन जाए तो कोई सुल्तान सिंह! कोई हिन्दू लड़की अपना नाम फातिमा रखना चाहे या कोई मुस्लिम लड़की अपना नाम दुर्गा-किसी को कोई आपत्ति न हो। (प्रसंगवश पंडित रविशंकर और उस्ताद अली अकबर खाँ जैसे दिग्गज संगीतकारों के गुरु बाबा अलाउद्दीन खाँ ने अपनी पुत्री का नाम अन्नपूर्णा रखा था, पंडित रविशंकर से उनका विवाह भी हुआ था।) जिस दिन से ऐसा होने लगेगा, उसी दिन से शर्मा जी जैसे लोगों का नफरती ताबीज़ बाँटने का धंधा चौपट हो जाएगा

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संजीव ठाकुर

लेखक वरिष्ठ कथाकार हैं। सम्पर्क- skthakur67@gmail.com
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