
युद्ध, मनुष्यता और संवेदना का क्षरण
नृशंसताओं की आग से निरन्तर झुलस रहे हैं और मनुष्यता की आर्त पुकार कर रहे हैं। आस्थाएँ और जीवन मूल्य त्राहि-त्राहि कर रहे हैं और सोचते हैं कि मानवता की हिफाजत कैसे करें?
“युद्ध रोमांचित करता है / ध्वस्त आबादियों के चित्र / देखने का ढंग / बाद में शर्मिंदा करता है अकेले में / कैसे हम बचे रहते हैं / और हमारा विश्वास बचा रहता है / कि हम बचे रहेंगे।” (नवीन सागर)
समकालीन समय युद्ध के उन्माद से भरा हुआ है। पूरी दुनिया हमारे सामने एक भयावह दृश्य की तरह खुलती है, जहाँ मनुष्य, बस्तियाँ और जीवन ध्वनि, धुएँ और विनाश के बीच निरन्तर ध्वस्त हो रहे हैं। यह केवल युद्ध का समय नहीं, बल्कि हिंसा, नफरत, असहिष्णुता और भय के चरम का समय है। साथ ही यह आतंक, अनियन्त्रित बाजार और व्यक्तिवाद के उभार का भी दौर है, जिसने मनुष्य की संवेदनाओं को भीतर तक झकझोर दिया है।
धरती के विभिन्न हिस्सों में युद्ध की विभीषिका के बीच बच्चे, स्त्रियाँ और आम लोग निरन्तर करुण पुकार कर रहे हैं, लेकिन इन आवाजों को सुनने और समझने वाले कम होते जा रहे हैं। भूख, विस्थापन, यातना और आतंक हमारी मनुष्यता को धीरे-धीरे निगल रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न और भी तीव्र हो उठता है कि दुनिया को कैसे बचाया जाए और मनुष्य की जिजीविषा को कैसे सुरक्षित रखा जाए।
साहित्य और कला इन संकटों के बीच मनुष्यता के लिए स्थान तलाशने का प्रयास कर रहे हैं। वे इस अन्धकार में संवेदना की छोटी-सी रोशनी जलाने की कोशिश हैं। परन्तु वास्तविकता यह है कि दुनिया आज वैश्विक सत्ता संघर्षों, वर्चस्ववादी राजनीति और कट्टरपन्थी प्रवृत्तियों के कारण गहरे संकट में फँसी हुई है। लोकतान्त्रिक मूल्यों और जनोन्मुखता पर निरन्तर आघात हो रहा है, और असहमति के स्वर को कुचलने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। जीवन-मूल्य और नैतिकताएँ विघटित हो रही हैं, मानो पूरी दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी हो।
इस परिदृश्य में एक अजीब-सी खामोशी भी है। लोग देख रहे हैं, समझ रहे हैं, परन्तु प्रतिरोध की ऊर्जा क्षीण होती दिखती है। ऐसा लगता है कि हमारे भीतर भावनाओं, विचारों और संवेदनाओं का ह्रास हो रहा है। श्रीकांत वर्मा की कविता ‘कोसल में विचारों की कमी है’ इस स्थिति को गहराई से उद्घाटित करती है, जहाँ सत्ता के उत्सव के बीच प्रश्नों की उपेक्षा और विचारों का अभाव अन्ततः विनाश का कारण बनता है।
युद्ध अब केवल सीमाओं पर लड़ा जाने वाला संघर्ष नहीं रह गया है। यह मानसिकताओं, विचारों और दृष्टिकोणों में पहले जन्म लेता है और फिर वास्तविक जीवन में विनाश का रूप धारण करता है। जैसा कि बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा है “युद्ध पहले दिमागों में लड़े जाते हैं, फिर युद्धभूमि में।” विभाजन भी पहले सोच में पैदा होता है और बाद में समाज को तोड़ता है।
आज हम हर स्तर पर युद्ध में फँसे हुए हैं—एक बाहरी युद्ध, जो राष्ट्रों के बीच है, और एक आन्तरिक युद्ध, जो मनुष्य के भीतर चल रहा है। यह द्वन्द्व हमारी समूची जीवन-प्रक्रिया को प्रभावित करता है। युद्ध का स्वरूप भी बदल चुका है; अब यह केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन, बाजार और वैश्विक प्रभुत्व का उपकरण बन चुका है।
समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया के जरिए युद्ध की भाषा और अधिक आक्रामक और अमानवीय होती जा रही है। नेताओं के बयान अक्सर अहंकार, धमकी और विनाश की मानसिकता को दर्शाते हैं। इसके विपरीत, कुछ स्वर ऐसे भी हैं जो धैर्य, प्रतिरोध और सभ्यता की दीर्घकालिक शक्ति पर भरोसा जताते हैं। वे याद दिलाते हैं कि सभ्यताएँ किसी एक व्यक्ति या क्षण से नष्ट नहीं होतीं, बल्कि उनका अस्तित्व पीढ़ियों की चेतना और संघर्ष से निर्मित होता है।
युद्ध हमारी सामाजिकता, सामूहिकता और मनुष्यता का सबसे बड़ा शत्रु है। यह केवल भौतिक विनाश नहीं करता, बल्कि हमारे भीतर की करुणा, विश्वास और नैतिकता को भी क्षतिग्रस्त करता है। आज की दुनिया में मनुष्यता घायल पक्षी की तरह तड़प रही है। हम युद्ध की आंधियों में झुलसते हुए भी शांति, सह-अस्तित्व और संवेदना की पुकार कर रहे हैं। प्रश्न यही है कि क्या हम इस पुकार को सुन पाएँगे? क्या हम अपने भीतर बचे हुए मनुष्य को बचा पाएँगे? यही इस समय की सबसे बड़ी चुनौती है।
इतिहास गवाह है कि युद्धों से न तो राजाओं का कुछ बिगड़ता है, न राज्याध्यक्षों का, और न ही अपने अहंकार में डूबे तानाशाहों का। बर्टोल्ट ब्रेख़्त के शब्दों में “युद्ध जो आ रहा है, पहला युद्ध नहीं है… पिछले युद्ध के बाद भी विजेताओं के बीच आम आदमी भूखा मरा।” यह कथन युद्ध की उस विडम्बना को उद्घाटित करता है जिसमें विजेता और विजित दोनों ही मानवीय स्तर पर पराजित होते हैं।
महाभारत का युद्ध इसका एक गहरा उदाहरण है। कुरुक्षेत्र के बाद पाण्डव भले ही गद्दी पर बैठे, लेकिन उनके अपने ही रक्त-सम्बन्धी, मित्र और समूचा सामाजिक ताना-बाना नष्ट हो चुका था। कितनी स्त्रियाँ विधवा हुईं, कितनी माँओं की गोदें सूनी हुईं, कितने बच्चे अनाथ हुए इसका कोई समुचित लेखा-जोखा इतिहास के पास नहीं है।
आधुनिक इतिहास में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम विस्फोट इस सच्चाई को और भयावह ढंग से सामने लाते हैं। 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा में और उसके बाद नागासाकी में लाखों लोगों की मौत ने यह साबित किया कि युद्ध का अन्तिम परिणाम केवल विनाश है। यह स्मृति आज भी मानवता के विवेक पर एक स्थायी धब्बे की तरह अंकित है। इसी तरह आज फिलिस्तीन में हो रहा रक्तपात हमारे समय की त्रासदी को जीवित रूप में प्रस्तुत करता है, जहाँ सड़कें, घर और सार्वजनिक स्थल तक मृत्यु के मैदान में बदल गये हैं।
युद्ध के विरुद्ध प्रतिरोध केवल राजनीति में नहीं, बल्कि साहित्य, कला और संस्कृति में भी लगातार व्यक्त होता रहा है। पाब्लो पिकासो की प्रसिद्ध पेंटिंग गुएर्निका इस प्रतिरोध का एक सशक्त उदाहरण है। इसमें टूटी हुई देहें, विकृत चेहरे, घोड़ों की व्याकुलता और मृत शिशु को गोद में लिए माँ की आकृति—सब मिलकर युद्ध की भयावहता को एक चीख में बदल देते हैं। इसी तरह फ्रांसिस्को गोया की शृंखला द डिजास्टर्स ऑफ वॉर युद्ध को वीरता नहीं, बल्कि अमानवीयता और क्रूरता के रूप में प्रस्तुत करती है, जहाँ सैनिक और नागरिक के बीच की रेखा मिट जाती है।
साहित्य में भी युद्ध की विभीषिका अनेक रूपों में सामने आयी है। कृष्णा सोबती की “सिक्का बदल गया”, भीष्म साहनी की “अमृतसर आ गया है”, चंद्रधर शर्मा गुलेरी की “उसने कहा था” जैसी रचनाएँ मानवीय संवेदना को केन्द्र में रखती हैं। विश्व साहित्य में ऑल क्वायट ऑन द वेस्टर्न फ्रंट युद्ध की निरर्थकता का मार्मिक चित्रण करता है। धर्मवीर भारती का काव्य-नाटक ‘अन्धा युग’ युद्ध के बाद की नैतिक और मानसिक विघटन की कथा है, जहाँ मनुष्य अपने ही अन्धकार में फँस जाता है।
युद्ध केवल भौतिक विनाश नहीं करता, बल्कि मानवीय मूल्यों, नैतिकताओं और आन्तरिक संवेदनाओं को भी झुलसा देता है। बमों और मिसाइलों के विस्फोट के साथ जो ध्वंस होता है, उसमें केवल इमारतें ही नहीं गिरतीं, बल्कि विश्वास, सुरक्षा और मानवीय रिश्तों की नींव भी दरक जाती है। धुएँ के गुबार, क्षत-विक्षत देहें, बेघर लोग, विस्थापन और भय—ये सब मिलकर एक ऐसे संसार का निर्माण करते हैं जहाँ जीवन का सामान्य अर्थ ही बदल जाता है।
इसके साथ ही युद्ध के समानान्तर वर्चस्ववाद, प्रचार और झूठ का निर्माण भी होता है। घृणा, हिंसा, नरसंहार और दमन की प्रवृत्तियाँ तेज होती हैं। लेकिन इन्हीं के बीच प्रतिरोध की एक सशक्त धारा भी बहती है। पॉल सेलान और तादेयुश रोजेविच जैसे कवियों ने युद्ध की पीड़ा को शब्द दिये। समकालीन कवयित्री इया किवा लिखती हैं कि युद्ध में लिखी जा रही कविता एक दर्पण है, जिसमें मनुष्य अपने घायल और बदले हुए चेहरे को देखता है।
फिलिस्तीन के सन्दर्भ में सम्पादित संकलनों में नासिरा शर्मा द्वारा प्रस्तुत कविताएँ इस त्रासदी को और गहराई से उजागर करती हैं। तौफीक जयाद की पंक्तियाँ—“विजय पराजय से बदतर है”—युद्ध की विडम्बना को तीखे ढंग से सामने लाती हैं, जहाँ जीत भी एक अस्थायी ठहराव मात्र है। बाबुषा कोहली की पंक्तियाँ युद्ध और प्रेम के बीच के अन्तर को संवेदनात्मक रूप से व्यक्त करती हैं “जो युद्ध में मारे जाते हैं, वे फूल बनकर लौट आते हैं… और जो प्रेम में मारे जाते हैं, वे कविता बनकर।” यह केवल काव्यात्मक कल्पना नहीं, बल्कि मनुष्य की उस गहरी आकांक्षा का प्रतीक है जो विनाश के बीच भी सृजन और संवेदना को बचाए रखना चाहती है।
युद्ध मनुष्यता के प्रतिपक्ष में खड़ा होता है। इसके बरक्स साहित्य, कला और संस्कृति एक ऐसे मानवीय पक्ष की रक्षा करते हैं, जहाँ संवाद, करुणा और सह-अस्तित्व की सम्भावना बची रहती है।










