देश

खुशफहमी से बाहर यथार्थ देखने का वक़्त – सेवाराम त्रिपाठी

 

  • सेवाराम त्रिपाठी

 

देश दुनिया के जो हालात हैं, उसको गम्भीरता से लेने की ज़रूरत है। फ़ोटो शूट करने में थोड़ी-थोड़ी खुशियों की भी एक दुनिया होती है। इसका मज़ा भी लेना चाहिए, लेकिन केवल इन्हीं में डूबे रहना क्या एकदम ठीक है? जिस तरह के पैंतरे खेले जा रहे हैं, वे हमारे वास्तविक विकास और मनुष्यता को नेस्तनाबूद करने में तुले हैं। देखा यह जा रहा है कि हमारे संगी-साथी थोड़े से स्वार्थों और सुविधाओं में स्वाहा और हवन हो रहे हैं। उन्हें अपने आसपास खतरनाक चीज़ें, भयावह इरादे या तो दिखाई नहीं पड़ते अथवा उसे वे जानबूझ कर देखना ही नहीं चाहते? उनके प्रति लोगों की धारणाएँ निरन्तर बदल रही हैं, हालाँकि वे अपनी चतुर सुजानी में मस्त हैं। सत्‍ता सभी को अपने जाल में फँसाकर गुलाम बना रही है। कल्‍पनाओं की मायावी दुनिया में फेंक रही है। यथार्थ भयावह और जानलेवा भी है। अब आँख मूँद लेने से काम चलने वाला नहीं। हमारे आपके सामने एक भुतहा सच दहाड़ रहा है। उसे देखें, समझे बग़ैर अब शायद काम नहीं चलेगा। अवहेलना हमें भारी पड़ने वाली है। देखभाल कर चलने और ज़रूरी कार्यवाही किए बग़ैर किसी भी तरह निस्तार नहीं। हम मूढ़ताओं के अँधेरे में हैं। हम अति उत्साहियों के निशाने पर हैं। चुप रहना, ज़ुल्म सहना और आँखें मूँद लेने से हम न तो भयावहताओं से बच सकते, न विकास के रास्ते पर जा सकते। एक महामाया जाल धोखे का ऐसा ताना-बाना और वितान निर्मित कर दिया गया है कि हम सच से कन्नी काट रहे हैं। वे में सच देखने ही नहीं देते। धोखा तो आखिर धोखा ही होता है और सत्य तो आखिर सत्य ही। अब राष्‍ट्र के प्रधान को हमें समस्‍याओं से छुटकार दिलाने के विश्‍वासी नहीं है। उन्‍हें युवकों की बेरोज़गारी से कोई लेना-देना नहीं है। विकल्‍पहीनता के भंवरजाल में हमें फसाया जा रहा है। विजय गौण की कविता का एक अंश पढ़ें- ‘’ नागरिक परेशानियों से हों / सम्भावनाओं की तलाश में हों/ कोई मिले सचमुम का/ वह भी क्‍या राष्‍ट्राध्‍यक्ष / खुद के विकल्‍प न होने का हल्‍ला करें।‘’ मेरे मित्र रमेश रंजक कहा करते थे- बन्धु देख भाल कर चलो/ पैंतरे संभाल कर चलो।‘’ सोचने विचारने से परहेज़ क्यों, निर्णय लेने में कोताही क्यों? अब किसी भी तरह की न तो गफ़लत का समय है, न समय को अनदेखा करने का। हम कब तक परेशानियों और हक़ीक़तों को ठेलते रहेंगे। कब तक तमाशों में रीझते रहेंगे, कब तक झाँसों, झूठों और वायदों में कायदे से दफ़न होते रहेंगे?

यह शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर छिपाने का शायद समय नहीं है। हर आदमी को जी भरकर ठोंका-पटीला जा रहा है और उसके उज्ज्वल इरादों पर पलीता लगाया जा रहा है। प्रश्न है कि क्या ऊबड़-खाबड़ चीज़ों का रंग-रोगन करने से तथाकथित विकास का समाजशास्त्र ठीक किया जा सकता है? हम मात्र उम्मीदों और आश्वासनों पर जी रहे हैं। राजनीतिबाज और काबिज़ सत्ताएँ धुएँ में लट्ठ ठोंक रही हैं और अपने मन की उड़ानों पर ज़ि‍न्‍दा हैं और सतत् ललकार रही हैं। यह ऐसा समय है जब सत्ता को सत्ता कहने और जनतन्त्र को जनतन्त्र कहने से किसी तरह का काम नहीं चल रहा है, बल्कि नागरिकता का निरन्तर अपमान हो रहा है। सबके मायने बदल गए हैं। काबिज़ सत्ताओं के स्वभाव में बार-बार सत्ता में मन की बातों का रूपाकार सजाने और लगातार बने रहने की चाहत है। जाहिर है कि हमारे जीवन से हँसी ग़ायब है। अच्छा वेतन पाने वाले भी हँसना भूल चुके हैं। वे निरन्तर तनावग्रस्त हैं। सत्ता अपनी ‘गुड़कतान’ में हैं और किसी तरह फिर पाँच वर्षों के लिए निष्कंटक और जनतन्त्र की चाशनी में लिपट कर तानाशाहियत लाने की धुन तीन-तिकड़म कर रही है। ऐसा लगता है जैसे उन्होंने जनतन्त्र का और नागरिकों का समूचा जीवन रस निचोड़ लिया है। हम जिए जा रहे हैं/हम मरे जा रहे हैं। बहरहाल सत्ता की राजनीति यथार्थ से एकदम कट चुकी है। कहते हैं कि जब सत्ता ‘डिप्रेशन’ में होती है, तब वह कुछ का कुछ कर बैठती है। वहाँ थ्‍योरी और प्रेक्टिकल,  एक तरह की धांधलेबाजी का असन्तुलन कीमियागिरी के बाज़ार में तन जाता है और उसके इरादों में ढल जाता है, क्योंकि उसमें कारपोरेट घरानों और अदृश्य हाथों का करिश्मा छा जाता है। हम प्रश्‍नों के बीच हैं हम खंदक-खाइयों में हैं- हम न तो इस पार हैं न तो उस पार तभी शायर कहता है- ‘’हवा मझधार में लाई है लेकिन/ अभी हौसला पतवार में है।‘’ जाहिर है कि तब सत्ता के मुँह से जो भी निकलता है वह ‘डिसीप्‍लीन’ का बड़ा खूँटा ही होता है। उसमें बन्ध जाइए और राष्ट्र भक्ति की बहार लीजिए। यदि सत्ता के इरादों में आंय-बांय-सांय है, तो प्रशासन वैसा ही चलेगा। प्रशासन तो सत्ता की खोल में ही जीवित रहने का आदी होता है। लोग चुप नहीं हैं, वह सत्‍ता के गणित को भलीभाँति जान-पहचान गया है। रामकुमार कृषक के शब्‍दों मे-लोक पर जब भी कड़ा पहरा हुआ/तन्त्र से सम्बन्ध ही गहरा हुआ/००० राष्‍ट्र तो फुटपाथ पर बेदम बिछा/ और उनका राष्‍ट्रध्‍वज फहरा हुआ।‘’ सत्‍ता की जनतन्त्र की छाया तले अपने लिए तानाशाहियत तलाश रही है। उसे राष्‍ट्र से, नागरिकों से उनकी समस्‍याओं से कोई वास्‍ता नहीं।सत्‍ता जिन्दगी के हर प्रश्‍न को झुठलाकर अपने को सही सिद्ध कर रही है। धीरे-धीरे समूचे अच्‍छे दृश्‍य हादसों में तब्‍दील हो रहे हैं।

अब सत्ता खुलकर खेल रही है। उसके छिपने की खोलें भी हैं, जिसमें तरह-तरह के मुखौटे हैं, जो थोड़ा भी अक्ल रखता है वह ज़ल्दी ही जान लेती है कि सत्‍ता क्‍या करने पर उतारू हैा आप जानते हैं, लेकिन फिर भी कुछ और चीजें,  कुछ और रहस्य और उनकी परतों में जिन्दा हक़ीक़तें देखने के मूड में हैं। नाटक नए-नए रूप में देखने के लिए उजागर हो रहा है। हम देश को स्वच्छ बनाने का प्रहसन करेंगें और राजनीति को कूड़ा-कचराघर बना देंगे। यह कैसी स्‍वच्‍छता है। दोगलापन कितनी देर तक चलेगा। देश के ज़रूरी मुद्दों पर यानी प्राथमिकताओं पर हर तरह के शिगूफे छोंड़ेंगे और ग़ैरज़रूरी मुद्दों पर ज़्यादा फोकस करेंगें। सत्‍ता की चुहलबाजी होती है कि वह किस तरह असली मुद्दों से ध्‍यान हटाए। जैसे- कभी धूमिल ने कहा था- ‘’वे भूख की जगह भाषा रख देते हैं और भाषा की जब चर्चा होती है, तो भूख रख देते हैं इसलिए वे न तो भाषा को मुद्दा बनने देते, न भूख को।‘’ आमजन साहित्यकारों के भारी भरकम प्रतीकों और बिम्बों को नहीं जान पाता है। सत्ता के झाँसे में तथाकथित बड़े-बड़े विद्वान तक लहा लोट-पोट हैं। जाहिर है कि कोई कितना ही गन्दा और ख़राब हो सत्ता से जुड़ जाने पर वह ‘पाक’ साफ हो जाता है। सौ पाप गठरी में बाँध दिए जाते हैं। तब भी साफ-स्‍वच्‍छ ऊपर से आपको वेस्ट ऑफ ऑनर दिया जाता है। यदि हम जीवित और जागृत हैं तो कई तरह की चीज़ें देखने से बच नहीं सकते? हम अपने आसपास के जीवन्त यथार्थ को न देखकर आसमान या तथाकथित आभासी यथार्थ के कल्पना लोक में विचरण कर रहे हैं। वे हम सब को पटकने पर तुले हुए हैं। चुनावी सरहद पर पार्टियों के तरह-तरह के नमूनों की भगदड़ मची है। कहाँ ठिकाना मिलेगा। जहाँ भी गिल्ली हिलग जाए वहीं रहेंगे। मुद्दे अनेक हैं तो हुद्दे भी अनेक हैं। अच्छे लोगों, कवियों, विचारकों और साफ़ दिलवालों को अदनान कफ़ील दरवेश का यह कवितांश पढ़ना और गुनना चाहिए-  ‘’जब दुःख रिस रहे थे/ हमारी आत्मा के कोनों-अँतरों से/ हम पागलों की तरह सर धुनते थे/ हम स्वप्न में भी भागते/ और बार-बार गिर पड़ते/ हम अँधेरे द्वीपों के किनारों पर खड़े/ विलाप करते/ हमारा अंत हमें मालूम था/ आप बस इतना ही समझिए/ कि हम कवि थे/ और कविता के निर्मम बीहड़ एकांत में/ मारे गए।‘’

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं|

सम्पर्क- +919425185272, sevaramtripathi@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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