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हिन्दूमाता-एक लावारिश जानवर – प्रकाश चंद्र

 

  • प्रकाश चंद्र

 

गौरी, गौ, धेनु, सुरभि, हिन्दुमाता के नाम से हमारे पुराणों में दर्ज आज की गाय की आज की दशा पर चर्चा करने से पहले चलिए आपको गाय की उत्पत्ति की एक-दो पौराणिक कथायें बतलाते चलें| पहली ये कि जब एक बार परमपिता ब्रम्हा अमृतपान कर रहे थे, तो उनके मुख से झाग निकला तो उसी झाग से आदिगाय की उत्पत्ति हुई। दूसरी कथा में ये कहा गया है कि राजा दक्ष प्रजापति की साठ कन्याओं में एक सुरभि भी थी जो आदिगाय का ही स्वरूप थी। तीसरी और सबसे प्रचलित कथा कहती है कि गाय समुद्रमंथन से निकले चैदह रत्नों में एक रत्न थी जिसे कामधेनु गाय भी कहा गया।

गाय के उत्पत्ति के बाद गाय और देवों से जुड़ी अनेक कथायें भी हमारे पुराणों में दर्ज है। कहा जाता है कि कपिलमुनि के श्राप से भस्म हुये राजा रघु के साठ हजार पुरखों की राख जब राजा रघु नहीं ढूँढ पाये तो गुरू वशिष्ठ मुनि के कहने पर गौमूत्र से ही राजा रघु को दिव्य दृष्टि मिली, जिस कारण वो अपने पुरखों की राख ढँढने में कामयाब रहे। ये भी कहा जाता है कि जब गंगा को पृथ्वी पर अवतरित होने के लिये कहा गया तो गंगा इस बात को लेकर विचलित हुई कि पृथ्वीलोक में पापी लोगों के स्नान करने से मैं दूषित हो जाऊँगी। तो परमपिता ब्रम्हा ने समझाया कि मृत्युलोक में लोग आपको कितनी भी दूषित करें, पर गाय के पैरों के स्पर्श मात्र से ही तुम पवित्र हो जाओगी। द्वापरयुग में नंदलाल अपनी एक लाख गायों को लेकर चर्चित थे। भगवान श्रीकृष्ण का बचपन गायों की सेवा में ही बीता। गौ पालने की वजह से भगवान श्रीकृष्ण नाम भी ‘गोपाल’ भी पड़ा।

 

हिन्दू पुराणों में माना जाता है कि गाय के शरीर में सभी देवी-देवता वास करते हैं इसलिये हिन्दू धर्म में गौ-सेवा का बड़ा महत्व माना गया है। पुराणों में ही नहीं चिकित्सीय दृष्टि से भी गाय के संपूर्ण-स्वरूप का काफी महत्व है। गाय का दूध, गौ-मूत्र गाय का गोबर सभी का औषधीय महत्व कई प्रकार से वर्णित है।
सृष्टि की उत्पत्ति से तीनों युगों और अब आधुनिक मानव सभ्यता तक अपने पवित्र और देव स्वरूप में पूजे जाने वाले इस देवप्राणी की अब आज के आधुनिक हिन्द में दशा पर चर्चा करते हैं। दशा जानने के लिये देवभूमि उत्तराखंड जायें तो आप इस हिन्द और हिन्दवासियों को कोसना ना भूलेगें। आप अगर गाय को गौरी, गौ, धेनु, कामधेनु, सुरभि, हिन्दुमाता के नाम से ना जानते हों या आप गाय का पौराणिक इतिहास और महत्व ना भी जानते हों, तो भी आप पशुप्रेमी होने के नाते उनकी आज की दशा देखकर विचलित हों जायेंगें। जी हाँ गाय एक लावारिस, आवारा जानवर है। जो शहरों में भी अवारा है, और गाँवों में भी। उसकी दिनचर्या ये है कि वो शहरों में कचरे के ढेर से प्लास्टिक की थैलियाँ नोच के खाना जुटाती है, तो शुक्र है देवभूमि में वो घास चर लेती है। बांकी की चर्चा के लिये वापस देवभूमि उत्तराखँड ही चलते हैं। गायों के एक बडे से झुंड पर मेरी नजर पड़ी, काफी अच्छा लगा, सोचा गाँवों में आज भी कोई नंदलाल है, जो गायों को पाल रहा है। तो मैंने खुशी से पूछ लिया यार! यहाँ तो गायें पाली जाती हैं। पर जो जवाब था, वो सच में दिल दुखा गया। बताया गया कि ये गाय अब लोंगो ने ऐसे ही छोड़ दी हैं। जो गाय दूध देती हैं उनसे दूध निकाल कर वापस फिर छोड़ देते हैं। घरों के नजदीक जैसे ही इनका झुण्ड दिखता है। गाँव वाले डंडे मारकर इन्हें खदेड़ देते हैं। शहरों की तरह पहाड़ों में चारे की कमी तो नहीं है, पर जल के सूखते प्राकृतिक स्रोतों के चलते जब ये गायें पानी की तलाश में गाँव में घुसती हैं तो लोग इनको ऐसे मारकर दौड़ाते हैं, मानो गाँव में भेड़िया घुस आया हो। युगों से साथ रहे पहचान के जैसे दिखने वालों का ऐसा घृणित तिरिस्कार देख ये वापस दूर खेतों या जंगलों में चले जाते हैं। कई गायों को तो दिन में भी बाघ मार जाता है। कुछ ऊँची पहाड़ियों से फिसलकर जान गवाँ देती हैं। जनसत्ता के दिसम्बर 2018 के एक रिपोर्ट में छपा था कि जो गायें दूध नहीं देती लोग उनको ले जाके कहीं दूर खाई में धकेल देते हैं| घायल और भूख प्यास से तड़पकर ये आखिर में जान गँवा देती हैं। अब अपनी-अपनी किस्मत से जिसको जितना जीना होगा जी रहे हैं। चूँकि ये दुःख भरी दास्तान गायों की थी, सो स्वार्थी होमो सेपियन्स को इस बात से भावूक कर देना इतना आसान नहीं था।

 

स्वार्थी होने के लिये कुख्यात होमो सेपियन्स की ये आधुनिक प्रजाति अपने स्वार्थी होने की हर बात पर खरी उतरती है। हिन्दू रिवाज के अनुसार देह त्याग चुके किसी होमो सेपियन्स को मुक्ति और और उसके रिश्तेदारों को पुण्य गाय के स्पर्श से ही मिलता है। चालाक और धूर्त ये होमो सेपियन्स किसी अपने की आत्मा को मुक्ति देकर और खुद के पुण्य का इंतजाम कर इसे वापस जंगल में खदेड़ देता है। अचानक ही मिले इस तिरिस्कार से सन्न मोक्षदायिनी गौमाता एक बार के लिये बात को टाल जाती है और स्नेह की आस में वापस लौट आती है, पर इस बार उसे कहीं दूर ऐसी जगह खदेड़ा जाता है जहाँ वो खतरनाक जानवरों का शिकार आसानी से बन सके। और होता भी वही है कुछ ही दिनों के बाद उसकी अस्थियाँ कहीं दूर बिखरी मिलती हैं। हाँलाकि गाय के स्पर्श मात्र से मोक्ष पा चुके होमो सेपियन्स की अस्थियाँ किसी तीरथ में बहाकर किसी ने दोगुने मोक्ष और दोगुने पुण्य का इंतजाम भी कर लिया।

मैं खुद ही खुद को लेखक समझने के कारण थोड़ा भावूक था। सोचा युगों से आज कल तक जो आस्था-धर्म और सामाजिक-व्यहारिक ताने-बाने में हर जगह मौजूद रही अचानक दूर कैसे छिटक गयी। पता चला कि ये व्यापारिक सोच में आये अचानक बदलाव के कारण हुआ। लोंगो ने इसे धर्म और आस्था से अलग कर जब व्यापारिक नजरिये से देखा तो उनको गायों को पालना घाटे का सौदा लगा। ये लगभग वैसा ही था जैसे किसी अफवाह के कारण किसी बड़ी कंपनी के शेयर रातोंरात गिर जाते हैं, और कोई इनके शेयर खरीदने को तैयार नहीं होते। अंत में कंपनी डुबने के कगार पर आ जाती है। दूसरी तरफ बाँकी समकक्ष जानवरों का ठीक-ठाक है लोग उन्हें ऊँचे दाम पर बेच और खरीद रहे हैं। एक वयस्क दूध देने वाली भैंस आज पचास हजार तक बिक रही है, तो बकरियाँ भी काफी ऊँचे दाम में बिक जाती हैं। लोग तो बकरियाँ पालने वाले को बकरियों का दुकानदार भी कहते हैं। मतलब जब चाहो बेचकर कमाई कर लो। कामोबेस मुर्गियों का भी कुछ ऐसा ही है। गायों को लेकर लोगों का रवैया इतना खराब है कि वो इसे आवारा पशु घोषित कर इनके खिलाफ तहसीलों, सरकारी दफ्तरों में धरने देते हैं। सबसे बड़ी और खुद ही खुश होने की बात तो ये है कि पण्डितजी ने मृतशरीर को मोक्ष देने के लिये वैकल्पिक व्यवस्था भी कर ली है| शर्तिया वैकल्पिक व्यवस्था के अंर्तगत वो अब गाय बाँधने वाली रस्सी को मृतशरीर से छुआकर इनस्टेंन्ट मोक्ष दे रहे हैं। इस बावत मैंने एक पण्डितजी से इस अजीबोगरीब कौन्सेप्ट के बारे में पूछा तो उनका वाजिब जवाब था, पण्डितजी ने कहा कि यजमान अपने पुण्य कमाने के लिये हमें तो बछड़े थमा देते हैं, पर हमसे कोई फिर लेने को तैयार नहीं होता। जिन बछड़ों को हम कभी सौ-दो सौ में बेचते थे, उन्हीं बछड़ों को कोई आज मुफ्त में लेने तक तैयार नहीं हैं। ऐसे में हमने ऐसे बिना सर-पैर वाले कौन्सेप्ट को निजात किया।

कई आस्थाओं को अपने अंदर समेटे इस देश की एक आस्था ये भी है कि हम गाय को गौमाता कहते हैं। कुछ हिन्दूवादी संगठन और तो इसे राष्ट्रीय पशु घोषित करने की वकालत भी करते हैं। गाय के प्रति इतने अनुरागी देश में गाय का इतना तिरिस्कार होना एक अजीब सी शर्मनाक घटनाक्रम है।

लेखक व्यंग्यकार, आलोचक एवं शायर हैं|

सम्पर्क- +918860200507, writerprakash.c@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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