एतिहासिक

दिल्ली का मुस्तफा कमाल अता तुर्क मार्ग

 

दिल्ली के बसंत कुंज में मुस्तफा कमाल अता तुर्क के नाम पर बने मार्ग का नाम बदलने की मुहिम शुरू हो गई  है। अभी हाल ही में हिन्दी के एक साहित्यकार ने अपनी ओर से एक अपील जारी की है कि देश की राजधानी में अता तुर्क के नाम पर बनी सड़क का नाम तब्दील किया जाये। उनका कहना है कि यह नामकरण ‘तुष्टिकरण’ के आधार पर किया गया था क्योंकि मुस्तफा कमाल कभी भारत आया ही नहीं। इस तरह की तर्कहीन बातों और सिलसिलों का यह अप्रतिम दौर है जो अपनी करतूतों से समाज में अनावश्यक हलचलें पैदा करने की कोशिशों में हरदम संलग्न बने रहते है। इन या ऐसे लोगों को सत्ता का खुला संरक्षण और प्रोत्साहन प्राप्त है। आखिर इस बात का क्या अर्थ है कि अता तुर्क कभी भारत आए नहीं इसलिए यहां उनके नाम पर मार्ग नहीं बन सकता। ऐसा कहने वालों को दुनिया के वैश्विक होने का आभास ही नहीं है और न वे तुर्की के इस क्रांतिकारी के बारे अत्यल्प जानकारी भी रखते हैं जिसने अपने मुल्क में खलीफा की धार्मिक सत्ता को अपनी इन्कलाबी कोशिशों से अपदस्थ कर एक लोकतांत्रिक और सर्वथा धर्मनिरपेक्ष सरकार कायम की थी। कमाल पाशा ने वहां पूरी तरह खिलाफत का अंत कर दिया और तुर्की दुनिया के अन्य राज्यों की तरह एक पूर्ण गणतांत्रिक राज्य बन गया।

तुर्की गणराज्य की स्थापना 29 अक्टूबर 1923 को मुस्तफा कमाल ने की थी जिसके वे उसके प्रथम राष्ट्राध्यक्ष बने। उन्होंने इस देश को एक वास्तविक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने में बड़ी और परिवर्तनकामी भूमिका अदा की। उन्होंने राज्य की सभी शिक्षा संस्थाएं सरकारी मंत्रालयों के अधीन कर दीं और मुस्लिम धार्मिक मदरसों को अगले दिन ही बंद कर दिया। 1924 में कमाल पाशा ने तुर्की में नया संविधान लागू कर दिया। कमाल पाशा ने अपने देश में खलीफा की कट्टर धार्मिक सत्ता को अपने क्रांतिकारी अभियान से बेदखल करके शासन की बागडोर संभाली थी। यह खासकर किसी मुस्लिम राष्ट्र में अनोखी क्रांति थी जिसमें कमाल पाशा ने सत्ता संभालने के बाद डंके की चोट पर मुसलमानों से कह दिया कि वे मस्जिद के भीतर मुसलमान है, बाहर सिर्फ तुर्की नागरिक हैं और खुदा तथा मुल्लाओं की जगह मस्जिद के अंदर है। उन्होंने अपने देश में स्त्रियों की पर्दा प्रथा पर पाबंदी लगा दी तथा सत्ता संभालने के तुरन्त बाद तुर्की को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। इन क्रांतिकारी कदमों के लिए कमाल पाशा को दुनिया के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। यद्यपि तुर्की में खलीफा की सत्ता की वापसी के लिए हमारे देश खिलाफत आंदोलन 1921 में चलाया गया जिसे गांधी ने अपने असहयोग के अभियान के साथ जोड़ लिया था।

देखा जाए तो यह गांधी का सर्वथा समय और प्रगति विरोधी कदम था। वे खलीफा की उस धार्मिक कट्टर सत्ता के पक्ष में जा खड़े हुए जो पूर्णतया जनविरोधी थी। ऐसा करके उन्होंने हिन्दुस्तान के मुसलमानों को क्रांतिकारी चेतना के विपक्ष में ले जाकर संलग्न कर दिया। उनकी यह अक्षम्य ऐतिहासिक भूल थी। प्रथम तो यह कि खिलाफत आंदोलन का भारतीय मुसलमानों से कोई रिश्ता नहीं था। गांधी यदि देश की आजादी के सवाल पर यहां के मुसलमानों को अपने साथ जोड़ पाते तब ज्यादा बेहतर होता। गांधी के इस क्रांति विरोधी कदम का नतीजा यह हुआ कि उस दौर में भारतीय मुसलमानों के लिए स्वाधीनता का प्रश्न खिलाफत के मुकाबले दोयम दर्जे का हो गया और खिलाफत के समाप्त होते ही वे अपने घरों को लौट गए। गांधी या उनके असहयोग आंदोलन के साथ देश के मुस्लिम समुदाय की यह निरपेक्षता या विमुखता अत्यंत घातक सिद्ध हुई। हम चाहें तो भविष्य के स्वतंत्रता युद्ध पर भी हम इसके प्रभाव नाप-जोख कर सकते हैं पर मूल्यांकन की निष्पक्ष दृष्टि के बिना यह किसी तरह संभव नहीं है।

भारतीय समाज में साम्प्रदायिक अलगाव की एक गहरी लकीर इतिहास के इसी मोड़ पर खिंच गई थी जिसे बाद को मिटाया नहीं जा सका। यहां मुझे काकोरी काण्ड के प्रमुख क्रांतिकारी और लेखक मन्मथनाथ गुप्त का कथन याद आता है। वे खिलाफत आंदोलन को अपने आप में एक मूर्खतापूर्ण धार्मिक आंदोलन कहा करते थे। अपनी टिप्पणी में उन्होंने कहा था–’भारत के पिछड़े हुए कट्टर मुसलमानों के लिए ही यह सब संभव था। इसका उद्देश्य था कि तुर्की को पूरे तरीके से उसी स्थिति में ला दिया जाए, जैसी स्थिति में वह पहले था। यानी तुर्की साम्राज्य कायम रखा जाए। यह किसी भारतीय मुसलमान ने नहीं पूछा कि अरब के मुसलमान तुर्की के अधीन रहना भी चाहते हैं या नहीं। उन्होंने यहां बैठे-बिठाए ही यह तय कर लिया कि अरब के मुसलमान तुर्की के मुसलमानों के अधीन उनके साम्राज्य में रहना चाहते हैं और उन्हें रहना ही चाहिए। मजे की बात यह है कि राष्ट्रीय आंदोलन के हमारे नेताओं और गांधी ने मुसलमानों को साथ रखने के लिए खिलाफत समस्या को राष्ट्रीय आंदोलन का एक दूसरा पहिया बना दिया। परिणाम यह हुआ कि जब कमाल पाशा ने खिलाफत का पद ही समाप्त कर दिया तो भारतीय मुसलमान राष्ट्रीय आंदोलन से बाहर चले गए।’

स्वाधीनता आंदोलन से मुस्लिमों का यह दूरी आगे चलकर कौमी एकता के क्षत-विक्षत होने का एक बड़ा कारण बना।  यहां जवाहरलाल नेहरू का दृष्टिकोण भी जान लेना हमारे लिए उचित होगा। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है–’1921 में खिलाफत आंदोलन को जो प्रमुखता दी गई उसके कारण बहुत-से मौलवियों तथा मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने राजनीतिक संग्राम में प्रमुख भाग लिया। उनके कारण आंदोलन को एक स्पष्ट धार्मिक रंग प्राप्त हुआ। साधारण रूप से मुसलमान इससे बहुत अधिक प्रभावित हुए। बहुत-से पाश्चात्य भावापन्न मुसलमान, जो विशेष धार्मिक प्रवृत्ति के नहीं थे, अब दाढ़ी रखकर तथा अन्य तरीकों से धार्मिक कट्टरता प्रदर्शित कर कदम-से-कदम मिलाकर चलने लगे। मौलवियों का प्रभाव तथा सम्मान जो नए विचारों और प्रगतिशील पाश्चात्यीकरण के कारण धीरे-धीरे घटता जा रहा था, अब फिर से बढ़ गया और वह मुस्लिम समाज पर छा गए। अली बंधु जो धार्मिक विचारों के थे, इस प्रक्रिया में सहायक हुए। इसी प्रकार गांधी जी भी इसमें सहायक सिद्ध हुए क्योंकि वह मौलवियों और मौलानाओं को बहुत अधिक सम्मान देते थे।’

असहयोग को खिलाफत आंदोलन से मिला देने के दूरगामी घातक परिणाम हुए। उस समय के राष्ट्रीय संग्राम में खिलाफत को गूंथ देने से थोड़ी देर को भले ही यह लगा हो कि स्वतंत्रता के संग्राम की गति द्रुत हुई है, पर ऐसा हुआ नहीं। इससे मुक्ति के उस युद्ध को बड़ी हानि पहुंची जिसे भारतीय राजनीति में तब बहुतों ने गांधी के नए प्रयोग के तौर पर देखा ही नहीं बल्कि उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी भी की थी। ऐसे लोगों में भविष्य के वे क्रांतिकारी भी थे जिनके कंधों पर आगे चल कर इतिहास को बड़ी जिम्मेदारियां सौंपनी थीं।

क्रांतिकारी रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ काकोरी कांड को अंजाम देने से पहले एक सुदीर्घ क्रांतिकारी यात्रा तय कर चुके थे। वे 1918-19 के प्रसिद्ध मैनपुरी षड्यंत्र मामले के एक प्रमुख अभियुक्त थे जो बंगाली क्रांतिकारियों के प्रभाव से मुक्त अपनी तरह का पहला उत्तर भारतीय विप्लवी प्रयास था। क्रांतिकारियों की ओर से इस मुकदमे की पैरवी प्रसिद्ध वैरिस्टर देशबंधु चित्तरंजन दास ने की थी। बिस्मिल इस केस में फरार बने रहे और तब ही प्रकट हुए जब सरकारी सबूत की कमजोरी और बड़े क्रांतिकारी नेताओं के गिरफ्त में न आने के चलते मुकदमे में सभी को आम माफी दे दी गई। यह जानने योग्य है कि इसके बाद भी बिस्मिल ने गांधी के असहयोग की तरफ एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा। वे मानते थे कि असहयोग आंदोलन असफल और शिथिल हो चुका था। पर उन्हें आशा थी कि देश के नवयुवक जिन्होंने उसमें भाग लिया था, उनमें से अधिकतर क्रांतिकारी आंदोलन में सहायता देंगे और पूरी लगन से काम करेंगे। उन्होंने असहयोगियों को खूब टटोला, पर गांधी के इन सिपाहियों के भीतर तो बुरी तरह अकर्मण्यता और निराशा घर कर चुकी थी। ऐसे में बिस्मिल की आशाओं पर पानी फिर गया और वे क्रांतिकारी संग्राम के पुनर्गठन में तेजी से जुट गए। सच तो यह है कि गांधीवादी संग्राम की ओर उनका आकर्षण तनिक भी नहीं था। शायद खिलाफत आंदोलन का चरित्र और उसके बरक्स कमाल पाशा का क्रांतिकारी अभियान ही वह बिंदु था जिसने बिस्मिल को अतातुर्क की ओर आकर्षित किया और वे ‘विजयी कमाल पाशा’ के घोर प्रशंसक बन गए। अभी वह संक्षिप्त पत्र-व्यवहार उपलब्ध नहीं हो सका है जिसका सूत्रपात बिस्मिल और कमाल पाशा के मध्य होने की सूचनाएं प्राप्त हुई हैं।

बिस्मिल ने जेल में लिखी अपनी आत्मकथा में कमाल पाशा की प्रशंसा की है तथा उन दिनों छपने वाली ‘प्रभा’ पत्रिका में नवम्बर, 1922 में कमाल पाशा पर एक लेख भी लिखा। बिस्मिल का नाम उनकी शहादत के समय तक हिंदुस्तान में क्रांति का प्रतीक बन चुका था और कमाल पाशा उनसे बहुत प्रभावित थे। ‘बिस्मिल’ का क्रांति और कलम से समान रिश्ता था। वे अपने समय में ‘राम’ और ‘अज्ञात’ जैसे छद्म नामों से विभिन्न पत्रिकाओं में लेख लिखा करते थे। उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखीं और छपवाईं जिनमें ‘कैथराइन या स्वाधीनता की देवी’ और ‘बोलशेविकों की करतूत’ मशहूर हैं। अपनी शहादत से दो दिन पूर्व तक बिस्मिल ने गोरखपुर के फांसीघर में जेल अधिकारियों की नजर बचाकर अपनी जिस आत्मकथा को लिपिबद्ध करते रहे, उसे तीन खेपों में चुपके से बाहर भेजा गया था। इसे बिस्मिल की शहादत के कुछ दिनों बाद ही 1927 में सबसे पहले भजनलाल बुकसेलर द्वारा आर्ट प्रेस सिंध ने ‘काकोरी षड्यंत्र’ शीर्षक से पुस्तकाकार छापा था। बाद को वह गणेशशंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप प्रेस’ से प्रकाशित हुई। बिस्मिल ने अपनी इस कृति में कमाल पाशा का आदरपूर्वक जिक्र किया है। वे लिखते हैं कि गाजी मुस्तफा कमाल पाशा जिस समय तुर्की से भागे थे उस समय केवल इक्कीस युवक उनके साथ थे। कोई साजो-सामान न था, मौत का वारंट पीछे-पीछे घूम रहा था। पर समय ने ऐसा पलटा खाया कि उसी कमाल ने अपने कमाल से संसार को आश्चर्यचकित कर दिया। कमाल पाशा के प्रति बेहद आस्थावान बिस्मिल की इस आत्मरचना की तुलना पं0 बनारसीदास चतुर्वेदी ने चेकोस्लोवाकिया के शहीद फूचिक की जेल के भीतर लिखी कहानी से की थी जिसे बिस्मिल की शहादत के सोलह वर्ष बाद लिपिबद्ध किया गया था। नितांत कठिन परिस्थितियों में मौत के फंदे के सामने बैठकर उकेरी गई बिस्मिल की इस क्रांतिकथा में एक शहीद का हृदय बोलता है। उनके साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष की यही अनुगूंज कमाल पाशा तक पहुंच कर बाद को तुर्की की धरती पर एक बड़ी इबारत के रूप में दर्ज हो गई।

1936 में कोन्या से भारी संख्या में तुर्की भाग कर आए कुर्द विस्थापितों को बसाने के लिए जिस जिले को बनाया गया था,  बाद में तुर्की के राष्ट्रपति मुस्तफा कमाल पाशा ने शहीद रामप्रसाद ’बिस्मिल’ के नाम पर इसका नाम ‘बिस्मिल ज़िला’ रखा। इस जिले के अन्तर्गत इसका मुख्यालय ‘बिस्मिल शहर’ के नाम से जाना जाता है। इसकी स्थापना कमाल पाशा ने 1938 में की थी। दियारबाकिर राज्य में यह पहाड़ियों के बीच बसी एक खूबसूरत बस्ती है जो अपने आकर्शक पार्कों के लिए देश भर में प्रतिष्ठित है। दियारबाकिर का अर्थ होता है ‘बागियों का दियार’। हिन्दी में इसके विद्रोहियों का इलाका या भूखण्ड कहा जा सकता है। यह तुर्की के दक्षिणी-पूर्वी अनातोलिया क्षेत्र के पूर्व में है। इस पूरे जिले का क्षेत्रफल 1,737,28 वर्ग किलोमीटर (670.77 वर्ग मील) है। भौगोलिक दृष्टि से यह समुद्र तल से 550 मीटर ऊंचाई पर अवस्थित है। वर्ष 2012 की जनगणना के अनुसार इस जिले की कुल जनसंख्या शहरी व ग्रामीण क्षेत्र को मिलाकर 1,11,746 है। यहां के अधिकांश निवासी कुर्द ही हैं। बिस्मिल शहर की जनसंख्या 60,150 है। कुछ समय पूर्व बिस्मिल शहर के मेयर केमिले एमिनोग्लू थे जो ’पीस एण्ड डेमोक्रेटिक पार्टी’ से जुड़े रहे। बिस्मिल जिले में दो कस्बे हैं–तेपी और यूकारिसलेट जिनकी आबादी क्रमश: 4320 तथा 2091 है। इस जिले में 13 गांव भी हैं जिसमें सबसे बड़े गांव उलुतुर्क की जनसंख्या 4575 है। अन्य गांवों के नाम हैं–अरालिक, बडेमली, सेलटिकली, इलियासिक, गोकसु, कज़ांसि, कोकालर, कोसिलि, मिरज़ाबे, सिनानकोइ, तुर्कमेनहासि और उक्तेपि।

रामप्रसाद ’बिस्मिल’ का क्रांति और कलम से समान रिश्ता था। वे अपने समय में ’राम’ और ’अज्ञात’ जैसे छद्म नामों से विभिन्न पत्रिकाओं में लेख लिखा करते थे। उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखीं और छपवाईं जिनमें ’कैथराइन या स्वाधीनता की देवी’ और ’बोलशेविकों की करतूत’ मशहूर हैं। बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में कमाल पाशा के बारे में लिखा है कि गाजी मुस्तफा कमाल पाशा जिस समय तुर्की से भागे थे उस समय केवल इक्कीस युवक उनके साथ थे। कोई साजो-सामान न था, मौत का वारंट पीछे-पीछे घूम रहा था। पर समय ने ऐसा पलटा खाया कि उसी कमाल ने अपने कमाल से संसार को आश्चर्यचकित कर दिया। कमाल पाशा के प्रति बेहद आस्थावान बिस्मिल की इस आत्मरचना की तुलना पं0 बनारसीदास चतुर्वेदी ने चेकोस्लोवाकिया के शहीद फूचिक की जेल के भीतर लिखी कहानी से की थी जिसे बिस्मिल की शहादत के सोलह वर्ष बाद लिपिबद्ध किया गया था। नितांत कठिन परिस्थितियों में मौत के फंदे के सामने बैठकर उकेरी गई बिस्मिल की इस क्रांतिकथा में एक शहीद का हृदय बोलता है। उनके साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष की यही अनुगूंज कमाल पाशा तक पहुंच कर बाद को तुर्की की धरती पर एक बड़ी इबारत के रूप में दर्ज हो गई।

तुर्की के बीसवीं सदी के महान क्रांतिकारी कवि नाज़िम हिकमत (1902-1963) की एक कविता ’सामराजी दीवार’ है जिसमें दीवार का रूपक उस साम्राज्यवादी वर्चस्व के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो समूची दुनिया को अपनी गिरफ्त में लिए हुए था। इसमें पश्चिमी तुर्की के तटवर्ती शहर इसमरना और बंबई के नौसैनिक विद्रोह (1946) जैसी साम्राज्यवाद-विरोधी विस्फोटक घटनाओं को जिस तरह एक सूत्र में पिरोया गया है, उसमें नाज़िम हिकमत की व्यापक विश्व-दृष्टि के साथ ही इस तथ्य की भी पुष्टि होती है कि तब हमारे देश के मुक्ति-युद्ध के घटनाक्रमों का तुर्की की साहित्य-संस्कृति पर प्रभाव पड़ रहा था। बिस्मिल और कमाल पाशा के जुड़ाव को इस नजरिए से भी देखा जाना चाहिए।

अतातुर्क कमाल पाशा के निधन (1938) पर हमारे देश की संसद (तब केन्द्रीय असेम्बली) में प्रश्नोत्तर काल के बाद भूलाभाई देसाई ने एक शोक प्रस्ताव पेश करते हुए कहा था–’यह ठीक है कि कमाल पाशा के देहावसान का भारत से कोई ताल्लुक नहीं, मगर फिर भी यह एक ऐसी घटना हो गई कि हाउस को इस संबंध में अपने विचार प्रकट करने देने चाहिए।…….कमाल अतातुर्क ने वह उत्साह दिखाया जिससे उसने टर्की को उन्नति के मार्ग में रोड़ा अटकाने वाली तमाम परम्पराओं को तोड़-फोड़ दिया। एक ही दिन में लिपि और पर्दे को चलता किया तथा मर्द व औरत में समानता पैदा कर दी। 15 साल के शासनकाल में उसने एक ऐसी व्यवस्था कायम कर दी कि उसमें कोई भी खलल पैदा नहीं कर सकता। अध्यक्ष से प्रार्थना है कि वे इस्मत पाशा तक हाउस की संवेदना पहुंचा दें।’

बिस्मिल और अतातुर्क कमाल पाशा का रिश्ता दो देशों की क्रांतिकारी चेतना का अनूठा संगम है जब इन जमीनों पर साम्राज्यवादी वर्चस्व के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष जारी थे। देखना यह होगा कि कमाल पाशा अपने मुल्क में कामयाब हुए। उन्होंने खलीफा की धार्मिक सत्ता को पूरी तरह ध्वस्त करके प्रगतिशील तुर्की का निर्माण संभव किया जबकि उनकी धरती पर बसा बिस्मिल शहर आज भी हमें अपने यहां बागियों का राज्य–दियारबाकिर बनाने का उलहना दे रहा है। क्या भारत में हम कमाल पाशा के नाम पर एक शहर नहीं बसा सकते। मैं बार-बार सोचता हूं कि क्या कमाल पाशा की तरह बिस्मिल भी साम्राज्यवाद से सन्मुख युद्ध लड़ना चाहते थे। मुकदमे के दौरान बिस्मिल की यह आकांक्षा थी कि वे किसी तरह जेल से छुड़ा लिए जाएं। क्रांतिकारी दल ने बाहर इसके लिए सघन प्रयास भी किए लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाए। विलम्ब होते देख बिस्मिल ने जेल के भीतर से एक ग़ज़ल के माध्यम से पार्टी सदस्यों को उलहना भी भेजा था–’मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या/दिल की बरबादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या।’  मजिस्टेट ने इसे इश्क का कोई कलाम समझ कर बाहर भेजने की अनुमति दे दी थी। दरअसल, बिस्मिल फांसी के फंदे में लटक कर प्राण नहीं देना चाहते थे। उनका हौसला था कि वे कैद से बाहर आकर साम्राज्यवाद से एक बार हथियारबंद संघर्ष करें। ग़ज़ल की इन पंक्तियों के माध्यम से वे बाहर सक्रिय अपने साथियों को यह संदेश देना चाहते थे कि कुछ करना है तो जल्दी करो, वरना फांसी के फंदे में लटकी उनकी लाश को तुमने छुड़ा भी लिया तो उसका क्या होगा। मैं जानता हूं कि बिस्मिल को जेल से निकाल न पाने की अपनी नाकामयाबी पर पार्टी के सदस्य तब बहुत निराश हुए थे जिनमें भगतसिंह भी एक था।

तो क्या बिस्मिल जिस मार्ग पर जाना चाहते थे वह कमाल पाशा का था अथवा उनके भीतर कमाल पाशा बनने की संभावनाएं थीं? यद्यपि फांसी के फंदे तक पहुंचने के अंतिम कुछ क्षणों में उन्हें तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के बीच क्रांतिकारी आंदोलन की सफलता में भी संदेह होने लग गया था। क्रांति कर्म के लिए जिस तरह के सहयोग की अपेक्षा उन्होंने अपने समय में नौजवानों से की थी, वह किसी भांति पूरी नहीं हुई। उत्तर भारत में क्रांतिकारी संगठन के ढांचे को मजबूती से खड़ा करने के लिए उन्होंने बहुत श्रम और शक्ति व्यय की। पर वे बार-बार निराश हुए। ऐसे में उन्हें जनता को शिक्षित बनाने की जरूरत शिद्दत से महसूस होती रही। वे मानने लग गए थे कि शायद शिक्षा के अभाव में उनके क्रांतिकारी प्रयासों को पर्याप्त स्पेस नहीं मिल सका। अपनी इसी सोच के चलते उन्होंने अंत में कहा भी था कि नवयवुकों को मेरा अंतिम संदेश यही है कि वे रिवाल्वर या पिस्तौल को अपने पास रखने की इच्छा को त्याग कर सच्चे देशसेवक बनें। पूर्ण स्वाधीनता उनका ध्येय हो और वे वास्तविक साम्यवादी बनने का प्रयत्न करते रहें।

बावजूद इसके बिस्मिल धर्म के मामले में कमाल पाशा के निकट नहीं दिखाई पड़ते हैं। यद्यपि धर्म के प्रश्न पर वे एक क्रांतिकारी की तरह चीजों का अतिक्रमण करते तो नजर आ़ते हैं पर तथ्य यह भी है कि उन्हें अपने विचारों और योजनाओं को अमली जामा पहनाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला और वे जल्दी ही फांसी के फंदे में झुला दिए गए। बिस्मिल और अशफ़ाक़उल्ला की क्रांतिकारी चेतना का विकास आगे चलकर भगतसिंह के समय में बहुत विकसित और पैना होकर सामने आता है जहां समाजवाद के बड़े लक्ष्य को तय करने के साथ ही धर्म की बेड़ियां भी तेजी से टूटती दिखाई पड़ती हैं। देखा जाए तो क्रांतिकारी संग्राम की उस विचार-भूमि का वास्तविक निर्माण बिस्मिल और उनके क्रांतिकारी दल ’हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ’ के जरिए ही सम्पन्न हुआ था जिस पर चन्द्रशेखर आज़ाद के सेनापतित्व और भगतसिंह के बौद्धिक नेतृत्व ने आगे चलकर संघर्ष और चेतना की नई इमारत खड़ी की और उसकी अनुगूंज हमें 1946 की नौसेना की बगावत तक बहुत स्पष्ट दिखाई पड़ती है।

मेरे लिए कमाल पाशा का अर्थ एक खालिस धर्मनिरपेक्ष सत्ता से है जो सब तरह के धार्मिक बंधनों से मुक्त हो। तुर्की में एक मुस्लिम शासक ने अपनी क्रांतिकारी भूमिका से सर्वथा नई इबारत रच दी जो दूसरे किसी के लिए फिर संभव नहीं हो पाई। यहां तक कि दुनिया भर में धर्म के मसले पर कम्युनिस्ट सत्ताएं भी प्रायः लुंज-पुंज और भीतरी तौर पर ढुलमुल ही बनी रहीं। कमाल पाशा ने अपने कृतित्व से हमारे देश के काकोरी काण्ड के एक क्रांतिकारी सैनिक और नेतृत्वकर्त्ता को बेहद प्रभावित किया और वे खुद उसके प्रभामण्डल की छाया तले तुर्की की धरती पर ’बिस्मिल शहर’ का निर्माण संभव कर पाए। आज जिस तरह तुर्की के भूगोल में बागियों का एक राज्य भारतीय क्रांतिकारी के नाम पर सुनहरे हरूफों में दर्ज है, ठीक वैसा कोई उद्यम हमें कमाल पाशा के क्रांतिकारी कर्म को सम्मान देने के लिए अपनी ज़मीन पर नहीं कर पाए। कमाल पाशा हमारे लिए एक क्रांतिकारी आदर्श की तरह हैं जिन्होंने अपने मुल्क में रामप्रसाद बिस्मिल की शहादत की रोशनी जला दी। यह एक तरह से बिस्मिल की क्रांतिकारी चेतना का विस्तार भी है

.

कमेंट बॉक्स में इस लेख पर आप राय अवश्य दें। आप हमारे महत्वपूर्ण पाठक हैं। आप की राय हमारे लिए मायने रखती है। आप शेयर करेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।
Show More

सुधीर विद्यार्थी

लेखक क्रन्तिकारी इतिहास के अन्वेषक व विश्लेषक हैं। सम्पर्क +919760875491, vidyarthisandarsh@gmail.com
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x