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सूडान: गृह युद्ध के मौजूदा दौर की सालगिरह

 

गत 15 अप्रैल के दिन सूडान में चल रहे गृह युद्ध के मौजूदा दौर का एक साल पूरा हो गया। सूडान के दो सेना नायकों के बीच जारी सत्ता संघर्ष के कारण सूडान लगातार बर्बादी की ओर बढ़ता जा रहा है। दोनों सेना नायकों की निजी महत्वाकांक्षाओं की कीमत सूडान की आम जनता को चुकानी पड़ रही है।

गृह युद्ध के कारण 4.8 करोड़ जनसंख्या वाले इस देश के लगभग 86 लाख निवासी घर से बेघर हैं और शरणार्थियों का जीवन जीने को मजबूर हैं। इनमें लगभग 66 लाख लोग तो देश के ही अपेक्षाकृत शांत हिस्सों की ओर पलायन कर गए हैं। मगर लगभग बीस लाख लोगों को सूडान के पड़ोसी देशों, जैसे ईजिप्ट, इथियोपिया, दक्षिण सूडान, चाड एवं सेन्ट्रल अफ्रिकन रिपब्लिक का रुख करना पड़ा है।

पलायन के साथ साथ भुखमरी की समस्या भी मुँह बाए खड़ी है। देश की एक तिहाई आबादी इस दुर्भाग्य को झेलने के लिए विवश हो सकती हैं क्योंकि देश के अनेक हिस्सों में कृषि का काम ठप पड़ा है। गृह युद्ध से जनित खतरों और सड़‌कों के बर्बाद हो जाने के कारण इन बद‌किस्मत लोगों तक भोजन सामग्री की सहायता पहुँचा पाना भी कठिन होता जा रहा है।

बच्चों में तो कुपोषण बढ़ ही रहा है, हाल ही में मां बनने वाली महिलाओं को सही प्रकार का भोजन दे पाना और यथोचित स्वास्थ्य सेवाएँ  मुहैया कारा पाना भी एक दुष्कर कार्य बन गया है और इस कारण से महिलाओं पर मौत का साया मँडराने लगा है। युद्ध प्रभावित इलाकों में तो आम लोगों को सामान्य स्वास्थ्य सुविधाएँ भी नसीब नहीं है क्योंकि युद्ध के कारण हुई भारी तबाही के कारण अस्पतालों और सामान्य स्वास्थ्य केन्द्रों को चला पाना संभव नहीं रह गया है।

देश के अधिकांश हिस्सों में शिक्षा का भी बुरा हाल है। एक समय वह भी था जब यहाँ की शिक्षण संस्थाओं का स्तर अच्छा था और आस पास देशों के विद्यार्थी भी उनमें पढ़ने के लिए आते थे। अब बहुतेरे हिस्सों के स्कूल, कॉलेज एवं विश्वविद्यालय बंद पड़े हैं। भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं तक नई पीढ़ी की पहुँच नहीं हो पाना देश के भविष्य के लिए शुभ लक्षण नहीं है।

सूडान

देश की राजधानी खार्तूम है और इसे भी तबाही का भीषण शिकार होना पड़ा है। कभी यह नगर व्यापार और संस्कृति का केन्द्र हुआ करता था। अब यह मलबे के ढेर में बदलता जा रहा है। हाँ जल्दबाजी में जैसे तैसे बनाए जा रहे कब्रों की संख्या अवश्य बढ़ रही है।एक आकलन के अनुसार पिछले एक साल के दौरान मारे गए लोगों की संख्या 16 हजार के आसपास हो सकती है।

पिछले एक साल से लगातार एक दूसरे से जूझ रहे दोनों सेना नायकों के लिए आम नागरिकों द्वारा झेली जा रही मुसीबतों के लिए समय नहीं है। देश की बर्बादी से बेखबर से दोनों सेना नायक अपने प्रतिबंदी को नेस्तनाबूद करने में व्यस्त है।

इन दोनों सेनानायकों में एक हैं अब्दुल फतह अल बुरहान जो सेना के प्रधान तो हैं ही, देश के तानाशाह भी हैं। दूसरे हैं मोहम्मद हमदान दगालो, जो एक अर्थ सैन्य संगठन रैपिड सपोर्ट फोर्स के प्रधान हैं। इन्हें हेमेती के संक्षिप्त नाम से भी जाना जाता है। हेमेती असल में एक पेशेवर अपराधी जैसे ही हैं और इनका अर्द्ध सैनिक संगठन किसी माफिया गिरोह के समान है। इस गिरोह द्वारा किए जाने वाले मानवता विरोधी अपराधों की सूची अत्यंत लंबी है और इसमें सामूहिक हत्याएं और सामूहिक बलात्कार शामिल हैं। इस गिरोह ने तो खासकर दारफर के इलाके में गाँव के गाँव उजाड़े हैं। आतंक के बूते पर हेमेती ने देश की बहुत सारी सोने की खानों पर कब्जा जमा लिया है और देश के सबसे बड़े सोने के व्यापारी के रूप में जाने जाते हैं।

2017 में सूडान ने सोने का जितना निर्यात किया था उसका चालीस प्रतिशत हेमेती की सोने की खदानों से था। सोने के व्यापार के कारण हेमेती देश के सबसे धनी लोगों में हैं और अपने धन के इस्तेमाल से उन्होंने अपने अर्ध सैनिक संगठन को सूडानी सेना से भी अधिक ताकतवर बना लिया है। ऐसा माना जाता है कि ये अपना धन संयुक्त अरब अमीरात में रखते हैं जिसका इस्तेमाल हथियारों की खरीद में होता है। जानकारों के अनुसार हेमेती के संगठन को हथियार निर्यात करने वालों में अमीरात का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अमीरात से हेमेती के रिश्ते अत्यंत मधुर और गहरे हैं। हेमेती ने यमन में युद्ध के लिए अपने हजारों सैनिक भेजे और इसके एवज में अमीरात ने हेमेती को एक बड़ी रकम का भुगतान किया।

अपनी आर्थिक और सैनिक ताकत के कारण हेमेती में राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं भी बढ़ीं और यह बुरहान से उनके टकराव का कारण है। बुरहान चाहते हैं कि सूडान की अपनी एक ही सेना हो और हेमेती अपनी सेना का सूडानी सेना में विलय कर दें। हेमेती को यह स्वीकार्य नहीं है। वे देश की सर्वोच्च सत्ता अपने हाथ में लेना चाहते हैं। और इसके लिए विश्वासपात्र सैन्य बल आवश्यक है।

सूडान में चल रहे मौजूदा गृह युद्ध के संदर्भ में इस देश के डारफर क्षेत्र की चर्चा आवश्यक लगती है। लगभग नब्बे लाख आबादी वाले इस इलाके में अस्सी जनजातियाँ रहती हैं। इन जनजातियों में से अधिकांश गैर अरबी मूल की हैं। अरबी मूल की जनजातियां भी हैं लेकिन उनकी संख्या कम है। इलाके का मुख्य धर्म इस्लाम है। मगर सूडान में मुसलमान होना ही काफी नहीं है। देश की सत्ता अरबी मूल के लोगों के हाथों में है और इसीलिए डारफर क्षेत्र के निवासियों की हमेशा से ही शिकायत रही है कि उनके साथ भेदभाव बरता जाता है। 2003 में इस शिकायत ने केन्द्रीय सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का रूप ले लिया। इस विद्रोह को जिस बेरहमी से दबाया गया उसमें अरबी लोगों के मन में अन्य मुस्लिम जनजातियों के प्रति घृणा ने नग्न नर्तन किया। परिणामतः तीन लाख डारफर निवासियों की जानें गई और चार लाख लोग पड़ोसी देश चाड में शरणार्थी बने।

विद्रोह तो तात्कालिक रूप से दब गया मगर भेद‌भाव की शिकायतें बनी रहीं। फलतः डारफर में गैर अरबी जनजातियों तथा सरकार के बीच छिटपुट संघर्षों का सिलसिला चलता रहा। पिछले साल से शुरु हुए गृह‌युद्ध के बाद से डारफर निवासियों पर अत्याचार बढ़ गए हैं। उन पर अत्याचार करने वालों में दोनों ही पक्ष शामिल है। बुरहान और हेमेती, दोनों ही अरबी मूल के हैं। डारफर की विभिन्न जातियाँ दोनों की ही नज़रों में सन्देह के घेरे में रहती हैं। दोनों ही को लगता है कि यहाँ की जनजातियाँ शायद दूसरे पक्ष से मिली हुई हैं। हेमेती स्वयं डारफर इलाके से आते हैं और उनकी कतिपय गैर अरबी जनजातियों से जाति दुश्मनियां भी हैं।

डारफर में गहराता संकट धीरे-धीरे विद्रोह का रूप ले सकता है। चूंकि डारफर की सीमा चाड से मिलती है अतः डारफर की गैर अरबी जनजातियाँ चाड के सीमावर्ती इलाकों में भी फैली हुई हैं। स्वाभाविक रूप से चाड के इन इलाकों में रहने वाली आबादी में डारफर के अपने भाइयों के प्रति गहरी सहानुभूति है। यह सहानुभूति अगर सशस्त्र समर्थन का रूप लेकर डारफर में आशंकित विद्रोह का साथ देती हैं तो सूडान के गृह युद्ध का दायरा फैल सकता है और चाड को अपनी गिरफ्त में ले सकता है।

सूडान के संकट का समाधान ढूंढ़ने में किसी भी देश की बहुत दिलचस्पी नहीं लगती। वहाँ की जनता दोनों सेना नायकों में से किसी को भी पसंद नहीं करती और देश में सही अर्थों में लोकतंत्र चाहती है। मगर मौजूदा घटनाक्रम लोकतंत्र की मंजिल से काफी दूर प्रतीत होता है। मध्यपूर्व की क्षेत्रीय शक्तियाँ इस रास्ते में रोड़ों की तरह हैं। ये शक्तियाँ अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से दोनों सेना-नायकों में से किसी एक का या आवश्यकतानुसार दोनों का ही समर्थन करती हैं। ईजिप्ट, संयुक्त अरब अमीरात और सउदी अरब में लोकतंत्र नहीं है और वह नहीं चाहते कि अरब शासित कोई देश लोकतांत्रिक बन जाए। इसे वे अपने लिए खतरनाक मानते हैं।

रूस इस चक्कर में है कि वह लाल सागर में सूडान बंद‌रगाह पर एक नौसैनिक अड्डा बना ले। इसीलिए वह बुरहान का समर्थन करता है। इसराइल भी लाल सागर इलाके में अपना प्रभाव चाहता है और गुप्त रूप से दोनों ही सेना नायकों के साथ संपर्क में रहता है। ऐसे में सूडान में लोकतंत्र एक हसीन सपने की तरह ही है।

इस गृहयुद्ध का परिणाम कुछ भी हो सकता है। हो सकता है कि एक पक्ष विजयी हो और दूसरा पक्ष मारा जाए या अन्यत्र शरण ले। यह भी हो सकता है कि अंततः दोनों सेना नायक सूडान को दो टुकड़ों में विभाजित कर आपस में बटवारा कर लें। जन विद्रोह की संभावना सूडान के निवासियों की दयनीय दशा और बाहरी समर्थन के अभाव के कारण फिलहाल संभव नहीं लगती। अंत में क्या होगा यह भविष्य के गर्भ में है लेकिन हम सूडान के आम लोगों के लिए प्रार्थना तो कर ही सकते हैं

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धीरंजन मालवे

लेखक प्रसिद्द मीडियाकर्मी हैं। सम्पर्क +919810463338, dhiranjan@gmail.com
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