सामयिक

गाँधी और आज का भारत’ पर वेबिनार

 

  • रामानन्द शर्मा

 

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा डूडा के फेसबुक पेज पर इन दिनों रचनात्मक और ज्ञानवर्धक कंटेंट के साथ देश-विदेश के अपने क्षेत्रों में विद्वानों का वेबिनार करवाया जा रहा है। इसी श्रृंखला में कल महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीश शुक्ला जी ने अपना तर्कशील वक्तव्य दिया। ‘गाँधी और आज का भारत’ विषय पर बोलते हुए प्रो. रजनीश जी ने वर्तमान समय में गाँधी के विचार और दर्शन की प्रासंगिकता से सभी को अवगत कराया। उन्होंने अपने वक्तव्य के दौरान बताया कि आज के समय में गाँधी किस प्रकार प्रासंगिक हो सकते हैं! सामान्यतः यह कहा जाता है कि गाँधी नगरीकरण, औद्योगिकरण, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के खिलाफ थे। वे पश्चिमी विचारधारा के विरोधी थे। उन्होंने 1909 में रेल, अस्पताल, अदालतों का विरोध किया। वे तो यहाँ तक कहते थे कि रेलगाड़ी के कारण हमारे देश में भी महामारी फैल जाएगी।

प्रो. शुक्ला बताते हैं कि गाँधी ने हमेशा मशीनीकरण का विरोध किया। वस्तुतः गाँधी यन्त्र के खिलाफ न होकर यांत्रिकता के खिलाफ थे, मशीन के खिलाफ न होकर मशीनीकरण के खिलाफ थे। गाँधी चाहते थे कि मनुष्य यन्त्रों द्वारा निर्देशित न हो। वे यन्त्र को सहायक के रूप में देखने के पक्षधर थे।

प्रो. शुक्ला विकास के मानकों पर भी विचार करते हुए विकास की दो श्रेणियों की चर्चा करते हैं- मानवीय विकास और भौतिक विकास।

आज का भारत उपभोक्तावादी दुनिया के किसी भी देश से होड़ लेने को तैयार है, लेकिन आज वह बुरी तरह भहराया हुआ दिख रहा है। सत्तर वर्षों से हम जिस प्रकार से बेतहाशा वृद्धि के नाम पर अनियोजित शहरीकरण को बढ़ावा दे रहे थे इस महामारी के समय वह बुरी तरह ध्वस्त हो गया।

प्रो. शुक्ला आगे कहते हैं गाँधी ग्राम केन्द्रित विकास की अवधारणा की बात करते हैं। वे आत्मनिर्भर भारत बनाना चाहते थे। वे बताते हैं कि 2021 का भारत वैश्विक व्यवस्था पर आश्रित न होकर आत्मनिर्भर भारत होगा। वह लोकल के प्रति वोकल होगा एवं वह आत्मनिर्भरता स्थानीय विकास की नीतियों के आधार पर बनेगा। सरकार को विकास का मोडल समाज के अन्तिम व्यक्ति को ध्यान में रखकर बनाना होगा तब जाकर वास्तविक विकास की नीति बनेगी। गाँधी भी सम्पूर्ण राष्ट्र के उत्थान की बात करते हैं। गाँधी के समान ही डॉ. अम्बेडकर, सावरकर, लोहिया भी ऐसी ही व्यवस्था की निर्मिति की बात करते हैं।

आज आत्मनिर्भरता के खिलाफ बुद्धजीवी वैसे ही खड़ा है जैसे गाँधी के हिन्द स्वराज और ग्राम केन्द्रित अर्थव्यवस्था के खिलाफ उस समय काँग्रेस खड़ी थी। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि गुरु गोखले ने गाँधी से इस किताब ‘हिन्द स्वराज’ को किनारे रख देने को कहा था और नेहरू ने भी उसे छोड़ देने या कहें दफना देने को कहा था।

तमाम मतभेदों के बाद गाँधी ने 1934 में काँग्रेस छोड़ दिया था जबकि काँग्रेस ने गाँधी को नही छोड़ा था। गाँधी ने 1934 के बाद काँग्रेस की सदस्यता नहीं स्वीकार की।

प्रो. साहब ने बताया कि किस प्रकार गाँधी ने काँग्रेस पार्टी में इस्तीफा देने के पश्चात रचनात्मक कार्य को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। समाज की रचनात्मक शक्ति को जगाते हुए वे मनुष्य की बेहतरी के लिए आजीवन प्रयत्नशील रहे।

आचार्य शुक्ल कहते हैं कि हिन्द स्वराज ही रामराज्य है और रामराज्य ही धर्मराज्य।

उनका कहना है कि दुनिया में केवल गाँधी का रास्ता ही एकमात्र ऐसा है जिसमें किसी का शोषण नहीं है जिसमें सबके लिये शांतिपूर्ण और गरिमामयी जीवन की सम्भावनाएँ हैं।

गाँधी सत्य, शील, मर्यादा को उपकरण बनाकर दुनिया की सबसे ताकतवर यूरोपीय सभ्यता से टकराते हैं और अल्बर्ट आइंस्टीन के शब्दों में उससे ‘बेहतर’ होकर दिखाते हैं। प्रो. शुक्ला कहते हैं आज के भारत में बेहतरी की सम्भावनाएँ जीवित हैं। वह ग्रामीण समाज जिन्दा है, जरूरतों तक सीमित रहने वाली मनुष्य की वृत्ति जिन्दा है। प्रो. शुक्ला जी ने गाँधी के आप्त वाक्य को दोहराते हुए कहा कि ‘अन्त्योदय’ के रास्ते ही सर्वोदय आएगा’। समाज के अन्तिम व्यक्ति को ध्यान में रखकर जिस व्यवस्था का निर्माण होगा, वह विकेंद्रीकरण की व्यवस्था होगी जिसमें स्थानीय जरूरतों के हिसाब से उत्पादन भी होगा, उपभोग भी होगा। इस प्रकार की सभ्यता की निर्मिति गाँधीवादी दृष्टिकोण द्वारा ही सम्भव है। यह दृष्टिकोण भारत के साथ सम्पूर्ण दुनिया को बेहतर बनाने के लिए उपयोगी हो सकता है।

कार्यक्रम समापन के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा शशि शर्मा कहती है कि ‘बापू से और भी ज्यादा प्यार हो गया’ और डूडा के फाउंडर रामानन्द शर्मा जी अपनी टिप्पणी देते हुए कहते हैं कि गाँधी की प्रासंगिकता इसलिये भी पूरे विश्व में अनोखी है क्योंकि जब पूरा विश्व हिंसा और युद्ध की बात कर रहा था तब केवल गाँधी ही अहिंसा और सत्याग्रह की बात कर रहे थे और अपने उसी मूल्य के आधार पर आन्दोलनों की नींव रखते हैं।

वे आगे कहते हैं आज गाँधी के वो शब्द याद आ रहे हैं जो उन्होंने भारत और भारतीयता पर कहा था कि ”हिंदुस्तान हर उस इंसान का है जो यहाँ पैदा हुआ और यहाँ पला-बढ़ा। जिसके पास कोई देश नहीं, जो किसी देश को अपना नहीं कह सकता उसका भी इसलिए भारत पासरी, बेनी इसराइली, भारतीय ईसाई सबका है। स्वाधीन भारत हिन्दूराज नहीं, भारतीय राज होगा जो किसी धर्म, सम्प्रदाय या वर्ग विशेष के बहुसंख्यक होने पर आधारित नहीं होगा, बल्कि किसी भी धार्मिक भेदभाव के बिना सभी लोगों के प्रतिनिधियों पर आधारित होगा।”

ramanand sharma

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के सूचना विज्ञान के छात्र और डिबेटिंग एसोसिएशन के संस्थापक हैं।

सम्पर्क- +91 8512071938

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी
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