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क्या प्रधानमन्त्री के सामने तालाबन्दी ही एकमात्र रास्ता था?

 

  • संजय रोकड़े

 

देश में कोरोना वायरस के संकट से बाहर निकलने के लिए जो तालाबन्दी की गई और उसके बाद जिस तरह की दिक्कतें व परेशानियाँ सामने आई उसे देख कर हम जैसे तमाम भारतीयों के मन में एक सवाल उठने लगा कि- क्या इस वायरस पर विजयी पाने का एकमात्र हल तालाबन्दी ही था। देश का अवाम इस समय कोरोना वायरस जैसे संकट से काफी जूझ रहा है। ऐसे समय में ये सवाल तकलीफ देह भी साबित हो सकता है लेकिन सवाल तो बनता है। और शायद इसीलिए पूछा भी जा रहा है।

कोरोना वायरस की विध्वंस कथा – ए. के. अरुण

हालाकि इसका जवाब बेहद सरल और आसान है – और वो है हाँ। हाँ तालाबन्दी ही इस वायरस पर काबू पाने का एकमात्र विकल्प या रास्ता था। पर तालाबन्दी के कुछ दिनों बाद ही देश भर में जिस तरह से अफरा-तफरी मची, लोग दो वक्त की रोटी को महरूम हो गए उसी के चलत दिलों-दिमाग में यह सवाल खड़ा हुआ कि क्या अचानक से पूरी तरह देश भर में तालाबन्दी किया जाना ही एकमात्र विकल्प था?Lockdown Stock Illustrations – 3,474 Lockdown Stock Illustrations ...

इस बात को लेकर मैं थोड़ा आगे बढूं इसके पहले आपको देश की भोगौलिक संरचना से अवगत करना चाहता हूँ। भारत में कुल 28 राज्य और 9 केन्द्र शासित प्रदेश है। इनमें से जम्मू कश्मीर और लद्दाख अभी-अभी नए केन्द्र शासित प्रदेश बने है। इन सबको मिलाकर देश में कुल 736 जिले हैं। जितने भी जिलों में कलेक्टर है वो केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि है। बहरहाल।Covid-19 +ve patient who violates lockdown can infect 406 people ...

अब बात यहाँ ये आती है कि इन सबका इस समय जिक्र करने की आवश्कता क्या है। असल में कोई भी लोकतांत्रिक राष्ट्र अपने संघीय ढ़ाचें से जितना सरल और सहज रूप से चल सकता है उतना वह किसी एक व्यक्ति विशेष के निर्णय या फैसले से नही। बेशक। इस अवधारणा के चलते देश के वजीरे आजम ने तालाबन्दी करने के पहले तमाम प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों और जिलों के कलेक्टरों से संपर्क कर अपने तालाबन्दी के विचार को साझा किया होगा। हालाकि कई राज्यों में गैर भाजपाई सरकारों के चलते वे उन राज्यों के सीएम से बातचीत न कर पाए हो लेकिन जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें थी वहाँ के मुख्यमंत्रियों से तो खुद या अपनी प्रशासनिक टीम के सहारे कोई संवाद स्थापित किया ही होगा, हमें विश्वास ही नही बल्कि पूर्ण भरोसा है कि, ऐसा जरूर हुआ होगा। गर ये संभव नही हो पाया होगा तो कम से कम जिलों के कलेक्टरों से तो कुछ न कुछ चर्चा जरूर हुई होगी। लेकिन यकीन मानिये ऐसा कुछ भी नही हुआ। किसी से भी कुछ भी बातचीत नही हुई।coronavirus lockdown in india: India may go for 'staggered' exit ...

बेशक ये पीएम की अपनी कोई मजबूरी रही होगी। किसी से कोई बात करने से ज्यादा प्राथमिकता उनने वायरस पर अंकुश लगाने की रणनीति को दी होगी। और होना भी यही चाहिए। लेकिन सवाल फिर खड़ा होता है कि क्या उनने तालाबन्दी देश की यथास्थिति को जाने बगैर ही करवा दी। नही ऐसा भी नही होगा। उनका अपना एक बड़ा तन्त्र होता है। उन्हें हर बात से अवगत कराने वाले अलग- अलग तरह के विषय विशेषज्ञ होते है। मेरे अनुमान से तो उनने उन सबसे सलाह मशविरा करके के ही कोई फैसला लिया गया होगा।

 कोरोना कथा – रेशमा त्रिपाठी

हाँ गर मान ले कि ये फैसला उनने अपने मन्त्रिमण्डल के तमाम नुमांइदों व विषय विशेषज्ञों से किए गए सलाह-मशविरे के बाद संतुष्ट होकर ही लिया होगा। हालाकि ऐसा था तो फिर तालाबन्दी के पहले उनके जैहन में देश भर के प्रवासियों खासकर रोज कमाने- खाने वाले कामगारों का ख्याल क्यूं नही आया। चलो मान ले उनको इनका ख्याल आया फिर उनने अपनी मशनरी के सहारे स्थानीय प्रशासन और इकाईयों को कुछ दिनों पहले ही अग्रिम नोटिस भिजवाने की कोई पहल क्यूं नही की। ताकि मजदूर वक्त रहते अपनी सुविधानुसार घर-गाँव पहुँच जाते और तालाबन्दी के बाद मचने वाली अफरा-तफरी से बच सकते।1.3 billion people. A 21-day lockdown. Can India curb the ...

खैर। वक्त रहते अपनी मशनीरी के नुमांइदों के साथ संयोजन नही बन तो क्या, फिर भी उनको अपनी सरकार के उन सभी कदमों और योजनाओं के बारे में घोषणा नहीं कर देनी चाहिए थी जिसके तहत तालाबन्दी के दौरान दिहाड़ी मजदूरों की रोजाना की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में काम होता है।

लॉक डाउन

बेशक यहाँ कोई भी ये तर्क दे सकता है कि अगर लोगों को उनके घरों तक जाने की इजाजत दी जाती तो तालाबन्दी का मकसद ही खत्म हो जाता। क्योंकि ऐसा होने पर लोगों में जल्द से जल्द घर-गाँव पहुँचने की होड़ मचती। हर कोई सबसे पहले अपने गाँव पहुँचने को लालायित रहता। अपने घर जाने की जल्दीबाजी में वे भीड़ भरी बसों- ट्रेनों में सफर करते। लेकिन सम्पूर्ण तालबन्दी के एलान के बाद हमने जो देखा वो क्या इससे भी बुरा नही था। लाखों-लाख गरीब अपने गाँव के लिए वाहन मिलने की उम्मीद में पैदल ही चल पड़े। वाहन नही मिले तो पानी की टंकियों और दूध के वाहनों में बैठ कर दूरी तय करने लगे। जिनको ये भी नसीब न हुआ वे पैदल ही पैदल मंजिल की ओर बढ़ते रहे। अगर तालाबन्दी के पहले सरकार इन प्रवासी मजदूरों के लिए शहर में ही कुछ रहने खाने की व्यवस्था कर देती तो शायद वे घर जाने को इतने लालायित और हैरान-परेशान नही होते। स्थिति भी इतनी गंभीर व खराब न होती।Chaos and hunger amid India coronavirus lockdown | India News | Al ...

सवाल फिर खड़ा होता है कि तालाबन्दी के बाद इन मजदूरों व कामगारों में अपने गाँव जाने की हडबडी में जो अफरा-तफरी की स्थिति बनी आखिर उसका जिम्मेदार कौन है। इस बात से कोई नकार नही सकता है कि सडक़ पर हजारों- लाखों बेघर मजदूरों की मौजूदगी से देश भर में एक असहज स्थिति पैदा हो गई। प्रशासन को भी इसे संभालने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। और इन स्थितियों को पैदा करने में अलग-अलग तरह की अफवाहों ने भी खासी भूमिका निभाई।

इसमें कोई दो राय नही है कि तालाबन्दी का उदे्दश्य लोगों की जिन्दगी बचना ही है। फिर भी सरकार को कम से कम इतना तो सोचना चाहिए था कि आखिर कितने मजदूर इस तालाबन्दी को लेकर मानसिक रूप से तैयार होगें। आज देश में दिहाड़ी मजदूरों की भरमार है। ये ऐसे मजदूर है जो रोज कामते है और रोज चूल्हा जलाते है। इनकी आमदनी का साधन हर दिन की मजदूरी ही होती है।Good initiative Tiffin scheme to start wage employment in ...
एक सामाजिक संस्थान है। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस)का अध्ययन बताता है कि आज भी बड़े शहरों में कमाने- खाने वाली आबादी में से 29 फीसदी दिहाड़ी मजदूरों की है। जबकि उपनगरीय इलाकों में इनकी आबादी 36 फीसदी है। गांवों में ये आंकड़ा 47 प्रतिशत है जिनमें ज्यादातर खेतिहर मजदूर है। दिल्ली की बात करें तो यहाँ की कमाने वाली आबादी में दिहाड़ी मजदूरों का आंकड़ा 27 फीसदी है। यकीन मानिये दिल्ली की दो करोड़ की आबादी में यह आंकड़ा कम नही होता है। बताते चले कि भारत में घर खर्च के बाद बचत करने की संभावना नगण्य हो जाती है। इस देश में ऐसे लोग आबादी का 15 फीसद है। जबकि 32 फीसदी भारतीय ठीक ठाक कमा कर घर का खर्च उठाने में तो समर्थ हैं लेकिन वे बचत करने में समर्थ नही।We Can't Afford A Lockdown Beyond 3 Weeks; Health Pandemic Can't ...

जाने क्यूं मोदी सरकार ने तालाबन्दी के पूर्व इतनी बड़ी बेबस आबादी और उनकी परेशानियों को नजर अंदाज कर दिया। क्यूं ये भी नही सोचा कि तालाबन्दी के चलते इनको कोई तिहाड़ी मजदूरी भी नही मिलेगी और ऐसे में ज्यादातर मजदूरों की जेबें खाली हो जाएगी और वे भूखों मरने को मजबूर होगें। सबने देखा कि तालाबन्दी के चलते मजदूरों के हाथ और जेबें खाली थी। ऐसे में ये मजदूर अपने घर-गाँव नही जाते तो और क्या करते। कब तक शहरों में बेघर जिन्दगी बसर कर भूखों मरते। वैसे भी दुख-तकलीफ के समय हर भारतीय, खासकर गरीब व मध्यमवर्गीय परिवार अपने घर-गाँव को ही तवज्जों देता है। शायद इसीलिए देश भर से तमाम मजदूर अपने- अपने वतन, घर-गाँव की चाह में जो जहाँ था जैसे था वहाँ से वैसे ही पैदल चल पड़ा। हालाकि उसकी बदहाली को देखते हुए तमाम राज्य सरकारों व केंद्र सरकार ने उसकी मदद की बात की लेकिन जमीनी स्तर पर उसके साथ क्या बरताव हुआ वह हम सबने अच्छे से देखा। एक तरफ जहाँ उसके सिर पर जिन्दगी की पोटली का वजन था वहीं दूसरी तरफ सरकारों के आश्वासन और झुटे वादों का बोझ। हमने देखा कि तमाम वादों और आश्वासनों के बावजूद बड़ी संख्या में गरीब मजदूर अपने सिर पर पोटली धरे घर- गाँव की उम्मीद में मंजिल की तरफ बढ़े जा रहा था। वह कहीं भी रूकना नही चाह रहा था। क्योंकि व्यवस्था और जिम्मेदारों ने उसे छलने के सिवाय कुछ और किया ही नही। इतनी भी उम्मीद नही बंधवाई की मुसीबत के क्षण हम सब उसके साथ है। घरों की ओर भागते- दौडते मजदूर के दिलों-दिमाग में तालाबन्दी की अनिश्चितता को लेकर अलग तरह की ही एक शंका थी।Covid-19: Bhopal, Kanpur tighten lockdown; only milk, meds, media ...

अब हम थोड़ा तालाबन्दी के संदर्भ में जान लेते है। ये क्यूं लगाई गई और इसको लगाना कितना जरूरी था। तालाबन्दी का सबसे बड़ा मकसद लोगों के बीच की दूरी को कम कर कोविड़-19 वायरस के एक-दूसरे के माध्यम से एक दूसरे में प्रवेश नही होने देना था। लेकिन प्रश्र तो ये है कि भारत के नागरिक सोशल डिस्टेंसिंग की गंभीरता के बारे में जानते कितना है। क्या सोशल डिस्टेंसिंग को लागू करने से पहले सरकार के दिमाग में यह भी नही आया कि इसकी बिना कोई शिक्षा दिए या पूर्व तैयारी किए कितना सफल होगा।

भारत की पीठ पर बौद्धिक बोझ – वैभव सिंह

क्या वजीरे आजम को किसी अफसर ने साल 2011 की जनगणना के उन चिन्ताजनक आंकड़ों से भी अवगत नही कराया होगा जो हमारे घरों में रहने की भयावहता को उजागर करते है। अब मैं एक बार फिर आपको आंकड़ों की दुनिया में ले चलता हूँ। साल 2011 की जनगणना के आंकड़े स्पष्ट बताते हैं कि भारत में 37 फीसदी से अधिक आबादी एक कमरे के मकान में रहने को मजबूर है जबकि 32 फीसदी भारतीय दो कमरों के घर में जिन्दगी बसर करते है। हमारा असली सच यह भी नही है। हमारा सच तो यह है कि देश की एक बड़ी आबादी अब भी झुग्गी- झोपडिय़ों में ही जिन्दगी तमाम कर रही है। इनमें औसतन 5-6 लोगों वाले मध्य और निम्न आय वर्ग के परिवार बसते है। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग की बात कागजों में ही की जा सकती है। इसे तकनीकी रूप से व्यवहारिकता के धरातल पर उतारना संभव ही नहीं है।Lockdown has made neighbourhoods increasingly insecure in ...

साल 2011 की जनगणना के आंकड़े यह भी बताते है कि भारत में चार फीसदी लोग ऐसे भी हैं जो बेघर है। जिनके सिर पर कोई छत नही है। ऐसी स्थिति में जब लोगों से घरों के अन्दर रहने को कहा जा रहा है, ऐसे में इन बेघरों के सामने एक ही सवाल है खड़ा होता है कि आखिर वे अपना सिर छूपाने के लिए एक अदनी सी छत कहाँ से लाए। ये कुछ ऐसे सवाल है जिनका जवाब दिया जाना इतना आसान नही है।

लेखक पत्रकारिता जगत से सरोकार रखने वाली पत्रिका मीडिय़ा रिलेशन का संपादन करते है और सम-सामयिक मुद्दों पर कलम भी चलाते है।

सम्पर्क- +919827277518, mediarelation1@gmail.com .

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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