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सम्पूर्ण क्रान्ति सतत क्रान्ति है

 

“यह क्रान्ति है मित्रों! सम्पूर्ण क्रान्ति! जमाने की पुकार है यह। सम्पूर्ण क्रान्ति समाज और व्यक्ति को बदलने के लिए है। यह केवल मंत्रिमंडल, शासन और नेता में परिवर्तन की बात नहीं है।…दुनिया का नक्शा बदलने में ‘पावर’ (सत्ता) ‘पावरलेस’ (असमर्थ) सिद्ध हुई है। कोल्हू के बैल की तरह यह जो तन्त्र है, लोकतन्त्र की, इसी में घूमते रहेंगे, तो ‘सांपनाथ की जगह नागनाथ आया’, ऐसा होता रहेगा। इसलिए हमें ‘कैप्चर ऑफ पावर’ नहीं ,जनता द्वारा ‘कंट्रोल ऑफ पावर’ करना है।…  हमें राज्य सत्ता से अलग तीसरी शक्ति का विकास करना है।.. तिलक-दहेज, सामाजिक कुरीतियों, छुआछूत, जाति-भेद आदि के खिलाफ युवक-युवतियाँ घर-घर में विद्रोह का नारा बुलंद करें। … ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’  सतत क्रान्ति है, इस क्रान्ति में ठहराव नहीं है, विराम नहीं है, पूर्ण विराम तो हरगिज नहीं है।

पांच जून उन्नीस सौ चौहत्तर को पटना के गाँधी मैदान में “सम्पूर्ण क्रान्ति “की व्याख्या करते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने जो ऐतिहासिक उदगार व्यक्त किया था, उसका संक्षेप है यह। सम्पूर्ण क्रान्ति के उदघोष और तत्कालीन व्यवस्था में परिवर्तन के लिए जेपी की व्यथा को समझने के लिए हमें पिछली सदी के आठवें दशक की शुरुआत में अर्थात पचास वर्ष पहले जाना होगा। ..

जुलाई 1973 से ही जे पी ने ‘एवरीमेंस’ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक में लिखना शुरू किया था। देश की तत्कालीन समस्याओं का विश्लेषण करके उनके समाधान खोजने की कोशिश उनके लेखों में रहती थी। देश मे फैले भ्रष्टाचार, विशेषकर राजनीतिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने हेतु उन्होने उपाय भी सुझाए थे। चुनाव प्रणाली और मुख्य पदों पर नियुक्ति जैसे कुछ विषयों पर उन्होने तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी को पत्र भी लिखा था। लेकिन सरकार द्वारा उनके सुझाव और आग्रह पर कारवाई के मामले में उनका अनुभव निराशाजनक था। ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हेतु दिसंबर 1973 में पवनार आश्रम से जेपी ने ‘यूथ फॉर डेमोक्रेसी’ शीर्षक से युवकों का आह्वान करनेवाली अपील जारी की।

जयप्रकाश जी की अपील का देशभर के युवाओं पर गहरा असर पड़ा। कई विश्वविद्यालय के छात्र संगठनों ने उन्हें अपने यहाँ आमंत्रित किया। पटना विश्वविद्यालय के छात्रों की रैली और उत्तर प्रदेश के विद्यार्थी संगठनों के बीच उनके भाषण हुए। गुजरात के छात्रों ने नवनिर्माण समिति गठित कर आन्दोलन शुरू कर दिया। गुजरात में ‘विधान सभा भंग करो’ की माँग के सन्दर्भ में जे पी ने युवकों को सलाह दी कि “अगर नये चुनाव होते हैं तो मतदाता परिषद बनाकर लोक उम्मीदवार खड़े किए जाने चाहिए, जो किसी राजनीतिक पक्ष का नहीं हो।”

 गुजरात की सभाओं में जे पी बार-बार, हरिवंश राय बच्चन की एक प्रसिद्ध कविता की पंक्ति- “तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों का निमंत्रण”, दुहराया करते थे, जिसका बिहार आन्दोलन के समय भी कई बार प्रयोजनार्थ इस्तेमाल होता रहा। गुजरात आन्दोलन की सफलता इस में निहित थी कि पहलीबार युवाशक्ति और जनशक्ति के दवाब के कारण मंत्रिमंडल का त्यागपत्र और विधानसभा भंग जैसा एक राजनीतिक परिवर्तन हुआ। इस आन्दोलन से भी प्रेरित होकर बिहार में छात्रों ने आन्दोलन शुरू कर दिया।

बिहार के छात्र नेताओं ने सरकार को अपनी कई माँगों की सूची दी, जिनमें प्रमुख माँगें थीं- ‘भ्रष्टाचार दूर करो’, बेकारी दूर करो’, ‘मंहगाई दूर करो’ ‘शिक्षा में आमूल परिवर्तन करो’। 18 मार्च 1974 को पूरे बिहार से हज़ारों की संख्या में छात्र पटना पहुंचे। विधानसभा के सामने सत्याग्रह कर रहे इन छात्रों पर पुलिस ने अंधाधुंध लठियाँ चलाईं और गोलियाँ दागीं। दूसरी तरफ पटना में जगह-जगह आगजनी और लूटपाट मची। अंग्रेजी दैनिक ‘सर्चलाईट’ का दफ्तर घंटों जलता रहा। छात्रों को बदनाम करने के लिए तत्कालीन सरकार के उपद्रवी तत्वों (इंदिरा ब्रिगेड सहित) ने यह सब किया था। उस दिन पटना में सरकार नाम की कोई चीज नहीं थी। बिहार के छात्र नेताओं ने कभी ऐसी कल्पना नहीं की थी कि सरकार 18 मार्च 1974 के आन्दोलन का पटना और पूरे राज्य में ऐसा दमन करेगी, फलतः न सिर्फ छात्र समुदाय वरन गाँव-गाँव में फैले युवकों और उनके परिजनों की सहानुभूति भी आन्दोलन से जुड़ गयी। सरकार की दमनकारी नीति से विचलित होकर तथा छात्र नेताओं के लगातार आग्रह पर जे पी ने आठ अप्रैल को पटना में एक मौन जुलूस का नेतृत्व किया और 1974 के छात्र आन्दोलन ने एक नया स्वरूप और व्यापकता के नये अध्याय की दिशा में कदम बढ़ाया।

  आज 1974 आन्दोलन के पचास वर्ष पूरे हो चुके हैं। अभी हमने स्वतन्त्रता की 75 वीं वर्षगांठ भी मनाई। लेकिन स्थिति वही है जो पहले थी। 1974 आदोलन की आंशिक विजय 1977 में हुई, लेकिन उसके बाद हम नया बिहार या नया भारत नहीं बना सके। क्रान्ति अधूरी रह गई। यह भी कहा जाता है कि 74 आन्दोलन सम्पूर्ण क्रान्ति का नहीं बल्कि लोकतन्त्र के बचाव का आन्दोलन था। जे पी ने कई बार कहा था कि -“हर क्रान्ति अपनी किताब खुद लिखती है और सम्पूर्ण क्रान्ति भी खुद अपनी किताब लिखेगी”।

लेकिन जे पी के निजी सचिव दिवंगत सच्चिदानंद जी ने लिखा है कि-“उनके दिमाग में सम्पूर्ण क्रान्ति की स्पष्ट कल्पना थी और इसीलिए उन्होने छात्र आन्दोलन का नेतृत्व स्वीकार किया था। जब आन्दोलन को गांव-गाँव से सहानुभूति और समर्थन मिलना शुरू हुआ तब उन्होने महसूस किया कि आन्दोलन को सम्पूर्ण क्रान्ति की दिशा में मोड़ने का समय आ गया है इसलिए संत बिनोवा द्वारा खींची गई भूदान आन्दोलन की लक्ष्मण रेखा लांघकर वे छात्रों दवारा शुरू किये गए आन्दोलन में कूद पड़े।…जे पी के दिमाग में क्रान्ति की जो कल्पना थी, उसको सत्ता की रचना में, संपत्ति के संबंधों में, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में बदलाव किए बिना साकार नहीं किया जा सकता।..जे पी कहते थे-‘बिहार आन्दोलन का लक्ष्य केवल शासन परिवर्तन करना नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण क्रान्ति करना है। शासन परिवर्तन के बाद भी आन्दोलन जारी रहेगा।”

आदोलन के दौरान सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कुछ ठोस कदम भी उठाए गये थे, जैसे गाँव गाँव में जनता सरकार (विकेन्द्रित लोकतन्त्र के निर्माण की दिशा में), जनेऊ तोड़ो अभियान, दहेज प्रथा का विरोध, अन्तर्जातीय विवाह आदि। बोध गया मठ के जमीन के पुनर्वितरण के लिए छेड़े गये सत्याग्रह में आर्थिक क्रान्ति के बीज मौजूद थे। निकम्मे जन प्रतिनिधियों की वापसी का अधिकार की माँग- लोक सत्ता की प्रधानता स्थापित करने के लिए थी।

इस संबंध में प्रसिद्ध सर्वोदयी नेता डॉ. रामजी सिंह का विश्लेषण गौर करने लायक है-“सम्पूर्ण क्रान्ति की कई एक विफलताओं की चर्चा करते समय हम यह भूल जाते हैं कि इसके परिपाक और पूर्व तैयारी के लिए अत्यन्त कम समय मिला था। गाँधी जी जैसे महान नेता और कांग्रेस जैसी शक्तिशाली और आजादी की लड़ाई लड़ने वालों को आधी शताब्दी का प्रशिक्षण मिला था। जब उनके अनुयायी इतने गाँधीविमुख और भ्रष्ट हो गये तो इन नौजवानों को मात्र डेढ़ साल के आन्दोलन के प्रशिक्षण से कितना सुधारा जा सकता था, अतः इनसे अधिक उम्मीद करना ही अन्यायपूर्ण होगा। फिर जेपी भी डायलिसिस के शिकार हो गये। उन्हें चुनाव की चुनौती को प्रचलित राजनीतिक दलों के आधार पर स्वीकार करना पड़ा, जो स्वयं काफी भ्रष्ट थे। काश! जे पी चलने लायक भी होते तो आन्दोलन के गर्भ से निकले निष्ठावान लोगों की स्वतन्त्र क्रान्तिकारी आदर्श संगठन बनाते,तब जनता सरकार के जन्म से ही घटकवाद का शनिचरा ग्रह वहां प्रवेश नहीं करता और दिशाहीनता भी नहीं होती।”

आज 1974 आन्दोलन के पचास साल और जेपी को अमरत्व प्राप्त हुए पैंतालीस साल बीत गए हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद इतना व्यापक, एक राष्ट्र की राजनीति में ज्वालामुखी लानेवाला कोई दूसरा आन्दोलन नहीं हुआ। अगर जेपी का मार्गदर्शन नहीं मिलता तो वह आदोलन हिंसा और प्रतिहिंसा की मरूभूमि में विलीन हो गया होता। राष्ट्र नक्सलवाद के हिंसक स्वरूप को अस्वीकार कर चुका था और भूदान-ग्रामदान आन्दोलन में ठहराव आ चुका था। ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण क्रान्ति गाँधी की अहिंसा और लोकशक्ति का पुनर्जन्म था। देशव्यापी जन आन्दोलन को छात्र संघर्ष समिति, जन संघर्ष समिति, महिला संघर्ष समिति,छात्र युवा संघर्ष वाहिनी, लोकतांत्रिक रचनाकर मंच तथा संघर्ष समाचार (अखबार) आदि दवारा व्यापकता मिली थी। आज जब हम आन्दोलन पर गंभीरता से विचार करते हैं तो सर्वाधिक आहत करनेवाली बात राजनीतिक भ्रष्टाचार नजर आती है।भारतीयों के सामाजिक स्तर में बदलाव आया है लेकिन किसानों और गरीबों की समस्याएं बरकरार हैं। राजनीति का स्तर निम्नतम है। इससे 1974 आन्दोलन की सार्थकता और बलवती होती है। 1974 आन्दोलन ने न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश को एक दलीय तानाशाही से बचा लिया था। इसने भारत में लोकतन्त्र पर प्रहार करनेवालों को गंभीर चेतावनी दी है। इतिहास साक्षी है कि प्रायः हर बड़ी क्रान्ति एक प्रतिक्रान्ति को जन्म देती है। लेकिन सम्पूर्ण क्रान्ति से किसी प्रति क्रान्ति का जन्म नहीं हुआ। आज केन्द्र तथा कई राज्य सरकारों में 1974 आन्दोलन के गर्भ से उत्पन्न नेता पदारूढ़ हैं लेकिन चेहरा बदलने के सिवा और बदला क्या है? सोचना तो पड़ेगा ही, सपने तो देखने ही होंगे

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अनिल किशोर सहाय

लेखक कवि और विचारक हैं तथा आकाशवाणी में वरिष्ठ प्रसारण कर्मी रहे हैं। सम्पर्क +919709869180, anilkishoresahay@gmail.com
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