चतुर्दिक

मतदाताओं का संदेश स्पष्ट है

 

अठारहवीं लोकसभा के चुनाव में मतदाताओं ने नरेन्द्र मोदी, भाजपा और आर एस एस को मिल जुल कर रहने और सरकार चलाने का एक स्पष्ट संदेश दिया है। उसने नरेन्द्र मोदी को खारिज न कर यह शिक्षा दी है कि वे दस वर्ष से जो राजनीति कर रहे हैं, उसका त्याग करें और भाईचारे को महत्व दें। वाराणसी लोकसभा में से पहले के दो लोकसभा चुनावों (2014 और 2019) की तुलना में इस बार उनकी जीत कम मतों से हुई। मतदाताओं ने उन्हें 6 लाख 12 हजार 970 वोट दिये और कांग्रेस के अजय राय को 4 लाख 60 हजार 457 मत प्रदान किये। भाजपा के 115 सांसदों ने उनसे अधिक मतों से जीत हासिल की है। मोदी केवल वाराणसी में ही नहीं, समस्त उत्तरप्रदेश में पहले की तरह लोकप्रिय नहीं रहे हैं। उनकी लोकप्रियता में गिरावट आई है। उत्तरप्रदेश की जनता ने एक सर्वे में उनकी तुलना में राहुल गांधी को प्रधान मंत्री बनने में अधिक अंक दिये हैं। इस चुनाव में भाजपा को सबसे बड़ा झटका लगा है। उत्तर प्रदेश उसके लिए सबकुछ था। यहाँ से लोकसभा की 80 सीट है। रामजन्मभूमि आन्दोलन के कारण ही केन्द्र में भाजपा की सरकार बनी। काशी, मथुरा, अयोध्या तीनों उत्तरप्रदेश में हैं। अयोध्या में राम का भव्य मंदिर बना, प्राण प्रतिष्ठा हुई। मतदाताओं ने इस बार वहां धर्म की राजनीति को, राम और रामोन्माद को महत्व नहीं दिया। उत्तर प्रदेश में भाजपा से अधिक सीट क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टी को आई। सपा के 37 सांसद हैं और भाजपा के 33। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश से 62 सीट मिली थी। इस बार वह 29 सीट हार गयी। अयोध्या में इस बार नारा बदला- ‘ न मथुरा, न काशी/ इस बार अयोध्या से अवधेश पासी’। अवधेश पासी अनुसूचित जाति (एससी) से हैं और फैजाबाद की सीट सामान्य सीट है। भाज‌पा के जिस लल्लू सिंह ने ‘400 के पार’ के बाद संविधान बदलने की बात कही थी, उसे मतदाताओं ने हरा कर अपना सांसद अवधेश पासी को बनाया। सपा के अवधेश पासी को कुल 5 लाख 54 हजार 289 मत प्राप्त हुए और लल्लू सिंह को 4 लाख 99 हजार 722 वोट मिले। हिन्दुत्व की राजनीति के गढ़ उत्तरप्रदेश और अयोध्या में भाजपा की हार एक प्रकार से उनके लिए एक बड़ी दुर्घटना है। मतदाताओं ने सरकार बनाने के लिए भाज‌पा को बहुमत नहीं दिया। 240 सीट पर ला खड़ा किया। बहुमत से 32 संख्या कम कर मतदा‌ताओं ने भाजपा और उसके प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को सुधरने, अपनी राजनीतिक-सामाजिक कार्येशैली बदलने का भी संदेश दिया है।

सोलहवीं लोकसभा चुनाव (2014) के पहले भाजपा को सर्वाधिक सीट 12वीं और 13वीं लोकसभा चुनाव (1998 और 1999) में प्राप्त हुई थीं- 182। उसकी तुलना में इस बार भाजपा की सीट 58 अधिक है। दस वर्ष से मोदी का जो खौफ और माहौल था, उसे आज के चुनाव ने कम किया है। मतदाताओं ने भाजपा और मोदी को खारिज न कर उन्हें आत्मचिंतन का एक अवसर दिया है। चुनाव लड़ने वाले दलों और प्रत्याशियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में 36 दलों ने जीत हासिल की थी। 2024 की लोकसभा में 41 दलों के सांसद हैं। कुल 751 दलों ने चुनाव लड़ा था। 2009 में यह संख्यां 368, 2014 में 464, 2019 में 677 थी, इस बार 74 दल बढ़े। 2009 से अब तक दलों की संख्या में 104 फीसदी वृद्धि हुई है। भाजपा के 63 सांसद घटे हैं, पर उसका वोट प्रतिशत मात्र 68 प्रतिशत घटा है। 2024 के चुनाव की तुलना 1977 के चुनाव से करना गलत है। सी राममनोहर रेड्डी ने अपने लेख ‘एन अर्थक्वेक इन 2024, ऐज इट वाज़ इन 1997’ (द हिन्दू, 13 जून 2024) में यही किया है। इन्दिरा गांधी 1977 में चुनाव हार गयी थीं, पर नरेन्द्र मोदी वाराणसी से चुनाव नहीं हारे। 1977 में जनता पार्टी को 295 सीट मिली थी और इन्दिरा गांधी की कांग्रेस को मात्र 154। इस बार कांग्रेस को 99 सीट मिली और एन डी ए को 293। मतदाताओं ने भाजपा में विश्वास न कर एन डी ए में विश्वास किया। उसने भाजपा और उसके घटक दलों को बहुमत से 21 सीट अधिक दी। क्रिस्टोफे जैफरलॉ ने इस जनादेश को ‘शिफ्ट’ न कहकर ‘टिल्ट’ कहा है।

1977 के चुनाव में कांग्रेस को बिहार और उत्तरप्रदेश से एक भी सीट नहीं मिली थी। उस समय इन दोनों राज्यों की सांसद संख्या 139 थी। हिन्दी प्रदेश की कुल 225 सीटों में से उस समय कांग्रेस को तब मात्र 2 सीट मिली थी- मध्य प्रदेश और राजस्थान से एक-एक। बिहार, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली से 1977 में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। पिछले लोकसभा चुनाव (2019) में इन 225 सीटों में से कांग्रेस को मात्र 6 सीट मिली थी। झारखंड से 1, बिहार से 1, छत्तीसगढ़ से 2, मध्य प्रदेश और उत्तरप्रदेश से 1-1। अठारहवीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हिन्दी प्रदेश की 225 सीट में से 25 सीट मिली। हिन्दी प्रदेश भाजपा का गढ़ है। यहाँ से  100 से कम सीट प्राप्त करने पर भाजपा केन्द्र में सरकार नहीं बना सकती। 2019 में भाजपा को यहाँ से 177 सीट मिली थी और 126 सीट अन्य प्रदेशों से। इस बार हिन्दी प्रदेश में उसकी सीटों में कमी आई है। उसे 127 सीट मिली है। पहले से 50 सीट कम। कुल प्राप्त 240 सीट में इन 50 सीटों को जोड़ दें तो 290 संख्या होती है। हिन्दी प्रदेश में भाजपा को जहाँ दिल्ली, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश में सभी सीटें (कुल 45) मिली है, वहाँ उत्तरप्रदेश में उसकी 29, बिहार में 5, राजस्थान में 10, हरियाणा में 5, झारखंड में 3 सीटें घटी हैं। भाजपा को मतदाताओं ने बहुमत न देकर उसमें अविश्वास प्रकट किया है और एनडीए को बहुमत देकर उसने पुन: गठबंधन की राजनीति को महत्व दिया है। एन डी ए को 293 और इंडिया को 234 सीटें प्राप्त हुई हैं। मतदाता ने सरकार बदलने का जनादेश नहीं दिया है। उसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा को आत्मचिंतन और पुनर्विचार करने का एक अवसर दिया है।

सरकार बनाने के पहले जितनी अटकलें लगायी जा रही थीं, उन सब पर पूर्ण विराम लग चुका है। न तो भाजपा में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने को लेकर बगावत का नहीं कोई स्वर उठा और न आर एस एस ने उनके बदले नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान को प्रधानमंत्री बनाने में कोई दिलचस्पी ली। नरेन्द्र मोदी ने पिछले दस वर्ष में आर एस एस के लगभग सभी एजेंडे को पूरा किया है। कश्मीर से 370 हटा, एक राज्य को दो केन्द्रशासित प्रदेशों में विभाजित किया गया, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हुआ और मुसलमानों को एक प्रकार से दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया, उनमें भय उत्पन्न किया गया। मोदी के पहले ‘लिंचिंग’ और ‘बुलडोजर’ शब्द कहाँ थे? लोकतंत्र और संविधान में आर एस एस की आस्था नहीं रही है। प्रधानमंत्री की भी नहीं रही है। उनके समय में सभी लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएं अपनी स्वायत्ता खो बैठी है। भाजपा को जिन 14 दलों के 53 सांसदों ने समर्थन देकर एन डी ए की सरकार गठित की है, उन दलों का मोदी पर कोई दबाव नहीं रहा है। कहने को यह गठबंधन की सरकार है, एन डी ए की सरकार है पर हकीकत यह है कि पहले की तरह ही यह नरेन्द्र मोदी की सरकार है। पहले वे जो चाहते थे, वही होता था। अब भी वे जो चाहते हैं, वही हो रहा है। इस सरकार में सब कुछ फिलहाल पूर्ववत है। अमित शाह गृह मंत्री हैं, राजनाथ सिंह रक्षा मंत्री, नितिन गडकरी सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री हैं, निर्मला सीतारमण वित्त मंत्री और एस जयशंकर विदेश मंत्री हैं। कहीं कुछ भी नहीं बदला है। घटक और सहयोगी दलों के पास कोई बड़ा मंत्रालय नहीं है। 2024 में सब कुछ यथावत है। अंतर मात्र यह है कि यह सरकार भाजपा की न होकर, गठबंधन की, एन डी ए की सरकार है। मोदी के विरोध में न तो पार्टी के भीतर से और न घटक दलों की ओर से विरोधी स्वरों के उठने की कोई संभावना है। 14 दलों के जिन सांसदों का समर्थन है, उनमें  बिहार के तीन दल (जद‌यू, लोजपा, रामविलास और हम), आंध्र प्रदेश के 2 दल (तेलुगू देशम पार्टी और जनसेना पार्टी) कर्नाटक का एक दल (जनता दल सेकुलर), हरियाणा का एक दल (राष्ट्रीय लोक दल), महाराष्ट्र के दो दल (शिवसेना शिंदे और राकोपा अजित पवार), उत्तर प्रदेश का एक (अपना दल, सोनेलाल), असम के दो दल (असम गण परिषद और यूपीपी लिबरल), झारखंड का एक दल (आजसू) और सिक्किम का एक दल (सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा) है। इन दलों में से कई दलों के सांसदों को मंत्रिमंडल में जगह मिल चुकी है।

अठारहवीं लोकसभा के मतदान का प्रतिशत सत्रहवीं लोकस‌भा चुनाव के मतदान से कम रहा है। यह मतदान 1.61 प्रतिशत कम है। 65.79 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया। भाजपा को 36.56 प्रतिशत और कांग्रेस को 21.19 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं। भाजपा और काँग्रेस में मत प्रतिशत जितना अधिक है, उतना दो गठबंधनों के बीच नहीं है। एन डी ए को 42.5 प्रतिशत और इंडिया अलायंस को 40.6 प्रतिशत मत मिले हैं। भाजपा को कुल 23 करोड़ 59 लाख 73 हजार 935 वोट मिले और कांग्रेस को 13 करोड़ 67 लाख 59 हजार 64 वोट प्राप्त हुए। अब भी प्रतिशत और संख्या दोनों ही दृष्टियों से भाजपा और कांग्रेस में बहुत अधिक अंतर है। कांग्रेस से 141 सांसद अधिक हैं भाजपा के। एन डी ए को बहुमत 272 से 21 सीट अधिक मिली है, जो ‘इंडिया’ की कुल सीट (234) से 59 अधिक है। 2019 की तुलना में दक्षिण में भाजपा का जनाधार बढ़ा है। वह पहले की तरह कर्नाटक में ही सीमित नहीं है। तमिलनाडु में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली, पर 2019 में वहां जो वोट प्रतिशत 3.62 था, वह तीन गुणा बढ़कर 11.24 हो गया है। तमिलनाडु में 9 सीटों पर वह दूसरे स्थान पर और 13 सीटों पर तीसरे स्थान पर रही है। सत्ताधारी द्रमुक और प्रमुख विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक के बाद भाजपा तमिलनाडु में अब तीसरे स्थान पर है। वोट प्रतिशत कांग्रेस का वहां भाजपा से कम है। केरल में पहली बार भाजपा लोकसभा की एक सीट त्रिशूर से जीती है। वहां भाजपा के सुरेश गोपी ने भाकपा के वी. एस. सुनील कुमार को लगभग 75 हजार मतों से हराया है। 2019 में केरल में भाजपा का वोट प्रतिशत 12.99 था, जो अब बढ़कर 16.68 हो गया है। तेलंगाना में भाजपा का वोट प्रतिशत काफी बढ़ा है। पिछले चुनाव में वह 19.65 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 35.08 प्रतिशत हो चुका है। तेलंगाना में भाजपा के 4 सांसद थे, जो अब बढ़कर 8 हो गये हैं। वहां की कुल 17 सीटों में से भाजपा 7 सीटों पर दूसरे स्थान पर और 1 सीट पर तीसरे स्थान पर है। दक्षिण में भाजपा ने कर्नाटक से अपना मार्ग बढ़ाया। कर्नाटक में उसकी कई बार सरकार रही है। कर्नाटक में पहले उसके 25 सांसद थे। इस बार मात्र 17 है। वहां 8 सीट का नुकसान हुआ। 7 सीटों पर वह यहां दूसरे स्थान पर और 1 सीट पर तीसरे स्थान पर रही है। सीटें घटी पर वोट प्रतिशत 45.53 से बढ़कर 46.06 प्रतिशत हो गया है। आंध्र प्रदेश में भाजपा को 2019 के चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी। इस बार आंध्र प्रदेश से भाजपा के 2 सांसद हैं। कांग्रेस का न वहां से एक भी सांसद और न विधायक है। पांच साल पहले आंध्र प्रदेश में भाजपा का एक प्रतिशत भी वोट नहीं था, इस बार उसके वोट प्रतिशत में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है- दस गुणा से अधिक। अब भाजपा का आंध्र प्रदेश में 11.28 प्रतिशत वोट है। पिछले चुनाव में दक्षिण में भाजपा को तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश से एक भी सीट नहीं मिली थी- दक्षिण में उसके 29 सांसद थे- कर्नाटक से 25 और तेलंगाना से 4। अब दक्षिण में उसके कुल सांसद 29 ही हैं- केरल से एक, कर्नाटक से 17, आंध्र प्रदेश से 3 और तेलंगाना से 8। सीट संख्या में वृद्धि न हुई है, पर वोट प्रतिशत सभी राज्यों में बढ़ा है।

तमिलनाडु, पंजाब, मणिपुर, मेघालय से भाजपा का कोई सांसद नहीं है, कांग्रेस का मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश से एक भी सांसद नहीं है। झारखंड से उसके 2, बिहार से 3, उत्तर प्रदेश से 6, राजस्थान से 8, हरियाणा से 5 और ओडिशा से मात्र 1 सांसद हैं। भाजपा को ओडिशा से पहले 8 सांसद थे, अब 20 हैं। ओडिशा में अब भाजपा की सरकार भी है। कांग्रेस और इंडिया को अभी काफी सोच-समझ कर यात्रा करनी है। मोदी का कांग्रेस-मुक्त ( और विपक्ष मुक्त भी) का नारा मतदाताओं ने अस्वीकारा है। मतदाताओं का एकतंत्र और अधिनायकतंत्र में विश्वास नहीं है। वह लोकतंत्र में विश्वास करता है। भारत की सामान्य जनता अपने आचरण और व्यवहार में, अपने स्वभाव में लोकतांत्रिक है। वह गैर अथवा अलोकतांत्रिक रवैये में विश्वास नहीं करती। उसे लोकशाही पसंद है, न कि मोदीशाही या हिटलर या तानाशाही। मोदी प्रधानमंत्री हैं और अमित शाह गृह मंत्री हैं। क्या यह संभव है कि नरेन्द्र मोदी जनादेश के अर्थ और मर्म को समझ कर अपनी कार्य-पद्धति में किसी प्रकार का बदलाव करेंगे? 2001 से अब तक का जो इतिहास है, उसमें दूर-दूर तक कहीं ऐसी कोई संभावना नहीं दिखाई देती। जिन्हें यह उम्मीद है कि चन्द्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार उनपर दबाव डालकर अपने मनोनुकूल लोकसभा का अध्यक्ष बनाएंगे, वह गलत है। लोकसभा का अध्यक्ष वही होगा, जिसे मोदी चाहेंगे। उन्होंने जिसे चाहा मंत्री बनाया। विभाग भी किसी दूसरे के दबाव पर नहीं दिया। मोदी दबाव की राजनीति बर्दाश्त नहीं करते। लोकसभा का अध्यक्ष भाजपा का ही होगा- वे ओम बिरला ही, पहले की तरह हो सकते हैं या अधिक संभावना आंध्र प्रदेश राज्य की भाजपा अध्यक्ष पैंसठ वर्षीय दग्गुबाती पुरंदेश्वरी के होने की है, जो एन टी रामाराव की पुत्री एवं चंद्रबाबू नायडू की पत्नी की बहन हैं। राजमुंदरी लोकसभा से वे भाजपा की सांसद हैं। उनके नाम के प्रस्ताव पर चंद्रबाबू नायडू को भी शायद ही आपत्ति हो। भाजपा के लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा के सहयोगी दलों के पास फिर शायद ही कुछ बचेगा। सरकार मात्र कहने के लिए गठबंधन की होगी, पर हकीकत में वह मोदी की ही सरकार होगी। मोदी है, सब मुमकिन है। फिर मोदी की गारंटी भी रहेगी।

लोकसभा में भाजपा के 240, कांग्रेस के 99, सपा के 37, तृणमूल कांग्रेस के 29, द्रमुक के 22, तेदेपा के 16 और जदयू के 12 सांसद हैं। शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के 9, राकोपा (शरद पवार) के 8, शिवसेना (शिंदे) के 7, लोजपा के 5, राजद, वाई एस आर और माकपा के 4-4 सांसद हैं। तीन दलों (आई यू एम एल, आप और झामुमो) के तीन-तीन सांसद हैं। सात दलों (जनसेना पार्टी, भाकपा, भाकपा माले, जनता दल सेकुलर, वी सी के (विदुथलाई चिरुथिगल काची), राष्ट्रीय लोकदल और नेशनल कॉन्फ्रेंस) के दो-दो सांसद हैं। संसद में ऐसे 17 दल (यू पी पी लिबरल, अगप, हम, के ई सी, आर एस पी, एन सी पी अजित, वी ओ टी पी, जेड पी एम, शिरोमणि अकाली दल, राष्ट्रीय लोक पार्टी, भारतीय आदिवासी पार्टी, एस के एम, एम डी एम के, आजाद समाज पार्टी कांशीराम, अपना दल सोनेलाल, आजसू और ए आई एम आई एम) हैं, जिनके सांसद केवल एक हैं। इन 41 दलों के अलावा अठारहवीं लोकसभा में 7 निर्दलीय सांसद हैं। बिहार से पप्पू यादव, तिहाड़ जेल में बंद जम्मू-कश्मीर के बारामूला संसदीय क्षेत्र से पूर्व मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्ला को हराने वाले शेख अब्दुल राशिद उर्फ इंजीनियर राशिद, महाराष्ट्र के संगली सीट से पूर्व मुख्य मंत्री वसंत दादा पाटील के पौत्र विशाल पाटील, लद्दाख से मोहम्मद हनीफ, दमन दीव से पटेल उमेश भाई बाबू भाई और पंजाब के फरीदकोट से इंदिरा गांदी के हत्यारे बेअंत सिंह के बेटे सरबजीत सिंह खालसा और खडूर साहिब से अमृतपाल सिंह। अमृतपाल सिंह को कट्टरपंथी, खालिस्तानी समर्थक और अलगाव वादी कहा जाता है। दो निर्दलीय सांसदों- इंजीनियर राशिद और सरबजीत सिंह ने जेल में रहकर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।

 ओडिशा में मुख्यमंत्री चुनने के लिए भाजपा विधायक दलों की बैठक हुई, पर लोकसभा में प्रधानमंत्री के चयन के लिए भाजपा संसदीय दल की कोई स्वतंत्र बैठक नहीं हुई। 7 जून को एन डी ए संसदीय दल की संविधान सदन में, सेंट्रल हॉल में बैठक हुई और भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने एन डी ए की विकास यात्रा बताई। यह भी कहा कि दस साल पहले उदासीन भारत था। दस साल बाद आकांक्षी भारत बना, जो विकसित भारत का संकल्प लेकर बढ़ रहा है। नरेन्द्र मोदी के स्वागत में उन्होंने दिनकर की रश्मिरथी की पंक्तियां सुनाई। ‘किंग-मेकर’, ‘किंग-मेकर’ की जो चर्चा चलाई जा रही थी, उसमें से एक ‘किंग मेकर’ भावी ‘किंग’ के चरणों तक झुका। राजनाथ सिंह ने नरेन्द्र मोदी का नाम सारे पदों के लिए उपयुक्त और सर्वोपरि बताया। उनकी कार्यक्षमता, कार्यकुशलता, दूरदर्शिता की प्रशंसा की। उन्हें जन कल्याणकारी और संवेद‌नशील बताया। गठबंधन को उन्होंने बाध्यता, न कहकर प्रतिबद्धता कहा। नरेन्द्र मोदी के दस वर्षों के नेतृत्व की उन्होंने जमकर प्रशंसा की। उनके द्वारा नाम प्रस्तावित किये जाने के बाद मोदी- मोदी के नारे लगे। राजनाथ सिंह के अनुसार देश की 140 करोड़ जनता का मन है कि देश का नेतृत्व मोदी करें। ‘इंडिया’ गठबंधन को जिन मतदाताओं ने अपना मत दिया, क्या उनकी भी यही आकांक्षा थी? राजनाथ सिंह के प्रस्ताव का अमित शाह और नितिन गडकरी ने समर्थन-अनुमोदन किया। नायडू ने गर्व के साथ नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाये जाने के प्रस्ताव को अनुमोदन किया। उन्होंने सबका साथ, सबका विकास की बात की, सबका विश्वास का उल्लेख नहीं किया। ‘किंग मेकर’ गौण थे। वे ‘किंग’ की प्रशंसा कर रहे थे। अवसर वैसा ही था। नीतीश कुमार ने मोदी द्वारा देश की की गयी सेवा की प्रशंसा की। कई सहयोगी दलों के सांसदों ने नरेन्द्र मोदी में अपना विश्वास प्रकट कर, उन्हें अपना समर्थन दिया।

मंत्रियों ने अपने कार्य-भार संभाल लिये हैं। इस सरकार में 30 कैबिनेट मंत्री, 5 स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री और 36 राज्यमंत्री है। 2014 और 2019 के मंत्रिमण्डल से यह बड़ा है। इनमें सात महिला मंत्री हैं। उत्तर प्रदेश से सर्वाधिक 11 मंत्री हैं। प्रधानमंत्री सहित 61 मंत्री भाजपा के हैं और 11 अन्य दलों के। नरेन्द्र मोदी ने सर झुका कर संविधान को प्रणाम किया है और विरोधी दलों ने बार-बार लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की बात कही है। पिछले दस वर्ष तक सर संघ चालक ने कभी वैसी टिप्पणी नहीं की, जैसी अब की है। चुनाव परिणामों ने मोदी और भाजपा को ही नहीं, आर एस एस को भी सकते में डाला है। भाजपा के बहुमत प्राप्त न करने से कहीं अधिक अयोध्या में भाजपा की हार और उत्तर प्रदेश में सपा की तुलना में भाजपा को कम वोटों की प्राप्ति आर एस एस के लिए अधिक चिंता का विषय है। कांग्रेस को मध्यप्रदेश, दिल्ली, उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश में एक भी सीट न जीत पाने की जितनी चिंता होगी, उससे सैकड़ों गुना आर एस एस को उत्तर प्रदेश के जनादेश को लेकर है क्योंकि यही उसका आधार क्षेत्र है। यहीं काशी, मथुरा और अयोध्या है। यहाँ की जनता धर्मोन्माद से दूर होकर महँगाई, बेरोजगारी और भाईचारे की बात करे, यह उन शक्तियों को कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती है, जिनका धर्म के आधार पर विभाजन में विश्वास है। संभव है, उत्तर प्रदेश से कोई नई लहर उठे, इसलिए नरेन्द्र मोदी का नाम लिए बिना आलोचना करना संघ को जरूरी लगा। मोहन भागवत ने अभी अपने भाषण में कहा है कि वास्तविक सेवक मर्यादा से चलता है, वास्तविक सेवक में अहंकार नहीं होता। उन्होंने विपक्ष को विरोधी नहीं कहा। उनके भाषण से यह समझा जा रहा है कि वे मोदी से नाराज हैं। दस वर्ष तक वे क्यों नाराज नहीं हुए। चुनाव परिणाम के बाद की उनकी नाराजगी का विशेष अर्थ है कि हिन्दी भाषी जनता संघ के संबंध में सकारात्मक धारणा रखे, सोचे कि सर संघ चालक कितनी सही और अच्छी बातें कह रहे हैं। क्या भागवत के कथन का नरेन्द्र मोदी पर कोई प्रभाव पड़ेगा? इंडियन एक्सप्रेस के एक इंटरव्यू में भाजपा अध्यक्ष जगत प्रसाद नड्डा ने बहुत सोच-समझ कर भाजपा को अब संघ की जरूरत न रहने की बात कही थी। यह भ्रम फैलाया जाता है कि संघ और मोदी में विरोध है। चुनाव के बाद की ‘चर्चित-चर्वण’ से सर संघ चालक को एतराज है। दस वर्ष में उन्होंने आज जैसा क्यों कुछ नहीं कहा? मणिपुर के लिए वे एक वर्ष बाद इतने चिंतित क्यों दिखाई दे रहे हैं?

राज‌नीति की अब कई परतें हैं। चुनाव-संबंधी सभी चर्चाओं में ही नहीं, विश्लेषणों में भी कॉरपोरेट का, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कायम रहने, लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता आदि की बातें कम हुई हैं। सवाल यह है कि गठबंधन की सरकार बन जाने के बाद नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली बद‌लेगी या पूर्ववत रहेगी? क्या अन्य दलों में तोड़-फोड़ नहीं होगी? क्या सहयोगी दलों से राय-विचार लिया जाएगा? किंगमेकर बाद के दिनों में क्या करेंगे? क्या भाजपा के भीतर सचमुच कोई असं‌तोष होगा? फिलहाल ऐसा कुछ नहीं दीखता। नरेन्द्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद, उनके तीसरे कार्यकाल के आरंभ में अरुन्धति रॉय पर लगभग चौदह वर्ष पहले कश्मीर पर दिए गए उनके बयान पर दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने यू ए पी ए (गैर कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम) की धारा 45 (1) के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है। 2010 का मामला नरेन्द्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के आरंभ में खोला जा रहा है। अरुन्धति रॉय पर यू ए पी ए के तहत, जिसमें जमानत भी नहीं मिलती, मुकदमा चलाने की इजाजत देना क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ नहीं जाता? क्या अरुन्धति रॉय ने अपने भाषण से देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाया? यह एक संदेश भी है कि हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है।

मतदाता अपने मतों से शासकों को सीख देता है, उन्हें आत्मचिंतन एवं आत्ममंथन के लिए विवश करता है। सहयोगी दल शायद ही नरेन्द्र मोदी पर सही कार्यों के लिए दबाव बनाये। दबाव जनता बनाती है, विरोधी दल बनाते हैं और यह कार्य केवल संसद में नहीं होता, संसद के बाहर होता है, जहाँ जनता रहती है

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रविभूषण

लेखक जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं। सम्पर्क +919431103960, ravibhushan1408@gmail.com
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