चर्चा में

शाहीनबाग, जाफराबाद और गाँधी

 

  • अजय तिवारी

 

मैं 1970 में दिल्ली आया। पचास वर्षों में ऐसा पहली बार हो रहा है कि केन्द्र की सत्ताधारी सरकार के सीधे नियंत्रण में दिल्ली को हिंसा और तबाही के रास्ते पर ठेला जा रहा है।

यह तटस्थ रहने का समय नहीं है। दोनों पक्षों को बराबर दोष देकर सच को छिपाने वाली बुद्धिमत्ता स्वयं एक स्वाँग बन गयी है। चुनाव के दिनों में बार-बार सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को पाकिस्तानी कहकर माहौल तैयार करने वाला कपिल मिश्रा नामका तथाकथित नेता जब ‘सीधी कार्रवाई’ पर उतरा तब पहले ही दिन दिल्ली जल उठी। इसलिए साफ साफ कहने की ज़रूरत है कि यह संघ की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

बेशक़, अब तक शान्तिपूर्ण ढंग से चल रहे प्रदर्शन में ऐसे कुछ लोग हैं जो माहौल गरम होने पर संयम खो दें। लेकिन यह बात उन्हें समझनी होगी कि भड़कावे की कार्रवाइयाँ होती ही हैं शान्ति भंग करने के लिए। यदि गाँधी का अनुसरण किया जाय, गुंडों के भड़कावे में न आकर शान्तिपूर्ण सत्याग्रह का तरीक़ा अपनाया जाय, तो कम से कम व्यापक जनसमुदाय की हमदर्दी जीती जा सके। यह इसलिए ज़रूरी है कि लगातार प्रचार के माध्यम से पिछले तीन दशकों में इतना ज़हर लोगों के दिमाग़ में भर दिया गया है कि मुसलमानों की शान्तिपूर्ण कार्रवाइयों को भी नफ़रत भड़काने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका उदाहरण कल दिल्ली में देखा गया। शाहीनबाग के ख़िलाफ़ प्रचार की परिणति जाफराबाद है।Image result for जाफराबाद और गाँधी

जो घटनाएँ हो रही हैं, वे साफ़ करती हैं कि देश को गृहयुद्ध की ओर ढकेला जा रहा है। आज की स्थिति 1946-47 से अधिक ख़तरनाक है। तब जिन्ना और सावरकर, मुस्लिम लीग और आरएसएस-हिन्दू महासभा के मुक़ाबले आज़ाद हिंद फ़ौज के सिपाही, गाँधी-नेहरू के अनुयायी, अरुणा आसफ़ अली-जयप्रकाश नारायण के कॉंग्रेस समाजवादी, कम्युनिस्ट और बाग़ी नौसैनिक वग़ैरह बहुत सी शक्तियाँ थीं जो अंग्रेज़ों द्वारा नियंत्रित सांप्रदायिक हिंसा के ख़िलाफ़ जनता को एकजुट करने का काम कर रहे थे। एक ओर विभाजन को बढ़ाने वाली ताक़तें अंग्रेज़ी शासन की छत्रछाया में काम कर रही थीं, दूसरी ओर देश की बचाने वाली ताक़तें अपना देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य निभा रही थीं।

लेकिन आज ऐसी शक्तियाँ बेहद कमजोर हैं। जो हैं भी, वे बिखरी हुई हैं, हताश हैं, निष्क्रिय हैं। जनता पर उनकी पकड़ कमज़ोर है लेकिन दूसरी तरफ़ अनियंत्रित सत्ता के पूरे नियंत्रण में सांप्रदायिक तनाव भड़काया जा रहा है। सत्ताधारी दल के नेता सांप्रदायिक दंगों का नेतृत्व कर रहे हैं। कितने भाजपा नेता लगातार नफ़रत से भरी बातें सार्वजनिक रूप में कहते आये हैं, इसकी गिनती असंभव है। कोई बड़ा भाजपाई नेता ऐसा नहीं जिसने ‘हेट स्पीच’ (घृणा वक्तव्य या घिनौना बयान) न दिया हो। इस माहौल में अपने ग़ुस्से पर क़ाबू रखना और भड़काने की तरकीब को निरस्त करना आन्दोलनकारियों का कर्तव्य है।

कोई आन्दोलन जनसमर्थन के बिना सफल नहीं हो सकता। जनसमर्थन पाने के लिए बहुत धैर्य और संयम की ज़रूरत है। यह बात समझनी होगी। शाहीनबाग को पाकिस्तान बताने वाले जानबूझकर यह नहीं कहते कि वहाँ सिखों का व्यापक समर्थन मिला है, संघ से प्रभावित हिन्दुओं को छोड़कर बाक़ी हिन्दुओं का भी काफ़ी हद तक समर्थन मिला है। लेकिन उकसावे में आकर आन्दोलनकारियों की एक गलती भी बड़ा नुक़सान पहुँचा सकती है। शायद इसीलिए गाँधी जी सत्याग्रहियों की तरफ़ से हिंसा की एक भी कार्रवाई को सहन नहीं करते थे।Image result for जाफराबाद और गाँधी

यह बात इसलिए कहना ज़रूरी है कि कल जाफराबाद के उपद्रव में खुला हमला संघ और भाजपा के गुंडों ने किया जिन्हें पुलिस और प्रशासन का संरक्षण प्राप्त था लेकिन जवाब में कुछ मुस्लिम युवकों ने पिस्तौल चलायी। यह हरगिज़ नहीं होना चाहिए था। इसे हिन्दू-मुस्लिम मुद्दा न बनने देना आन्दोलनकारियों की ज़िम्मेदारी है। नागरिकता क़ानून सरकार की ओर से मुस्लिम विरोधी कार्रवाई ज़रूर है लेकिन वह ज़्यादा बड़ी संख्या में हिन्दुओं को नुक़सान पहुँचाएगा, यह आसाम ने दिखा दिया है। इसलिए सीए्ए विरोधियों के साथ सत्य की ताक़त है। उन्हें न क्रोध की ज़रूरत है, न बदले की। आपका संयम और सत्याग्रह इस सरकार को पागल कर देगा। इसीका लक्षण है कल का हमला। लेकिन इस हमले का सामना जवाबी हमले से करना आत्मघात है, यह समझाने वाला आन्दोलनकारियों के पास शायद कोई नहीं है। इसलिए उन्हें एक गाँधी की बेहद ज़रूरत है।

मैं कल के उपद्रव में मारे गये सिपाही के लिए दुखी हूँ। वह निरपराध था। सत्याग्रही किसी निरपराध को नुक़सान नहीं पहुँचाता। सरकार और उसके लोग तो यही चाहेंगे कि आप गलती करें। जैसे, पूरे संघर्ष को हिन्दू-मुसलमान का रूप लेने दें; निरपराध लोगों को हिंसा का शिकार बनाएँ; सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ करें; ग़ुस्से में ऐसे बयान दें या नारे लगाने की अनुमति दें जिन्हें देशद्रोह बताया जा सकता है; वग़ैरह। इस तरह की ग़लतियों से बचने की ज़िम्मेदारी आन्दोलन कर्मियों की है।

बड़े लक्ष्य के लिए संघर्ष बड़े दिल और बड़े दिमाग़ से ही हो सकता है।

लेखक हिन्दी के प्रसिद्द आलोचक हैं|

सम्पर्क- +919717170693, tiwari.ajay.du@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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