Post postmodernism
सामयिक

कोरोना संकट और विज्ञान की उत्तर-आधुनिकतावादी आलोचना

 

  • आलोक टण्डन

 

‘‘वैज्ञानिक मानस चिन्तन की प्रक्रिया, काम करने के ढंग, सत्य के संधान, जीवन शैली और एक स्वतन्त्र व्यक्ति के जज्बे को इंगित करता है।’’ जवाहरलाल नेहरू

वर्तमान कोरोना संकट से पूर्व के कुछ वर्षों में विज्ञान की प्रकृति, उसकी उपलब्धियों, नाकामियों और सम्भावनाओं को लेकर काफी चर्चा होती रही है। विश्व व्यापी पर्यावरणीय विनाश के पीछे कुछ लोग विज्ञान को ही कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। इसने पश्चिम में विज्ञान की उत्तर-आधुनिक आलोचना को जन्म दिया जिसके कई प्रतिनिधि हमारे देश में भी मौजूद हैं। इसने वैज्ञानिक ज्ञान के सार्वभौमिक चरित्र पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया और पाश्चात्य विज्ञानएवं भारतीय विज्ञानऐसे सांस्कृतिक भेद-युक्त विज्ञान को औचित्य प्रदान करने का प्रयत्न किया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत के गौरवशाली अतीत का महिमा मंडन करने के लिए कई तरह की अवैज्ञानिक बातों को वैज्ञानिक उपलब्धियों की श्रेणी में गिना जाने लगा।

उदाहरण के लिए पिछले कुछ वर्ष पूर्व गणेश का दूध पीना, उनके सिर का हाथी के सिर द्वारा प्रत्यारोपण होना, वेदों में वायुयान और हवाई अड्डों का होना आदि आसानी से गिनाये जा सकते हैं। बात यहाँ तक बढ़ गयी कि विश्वविद्यालयों में फलित ज्योतिष की पढ़ाई और शोधकार्य भी होने लगा। यद्यपि विश्वव्यापी कोरोना संकट से इस तरह की बेतुकी बातों में कुछ कमी आयी है किन्तु अभी भी उससे इलाज के लिये गाय के गोबर और मूत्र का प्रयोग करने की वकालत करने वालों की कमी नहीं है। फिर भी अधिसंख्य जनता यह समझने लगी है कि कोरोना का इलाज अभी किसी के पास नहीं है किन्तु इसकी चाबी विज्ञान के पास ही मिलेगी – चाहे वह दवा के रूप में हो या फिर वैक्सीन के रूप में।

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ऐसे में विज्ञान के प्रति पुनः बढ़ते विश्वास को कायम रखने के लिये यह जरूरी है कि हम पिछले दशकों में उत्तर-आधुनिकतावादियों द्वारा की गयी विज्ञान की आलोचनाओं का पुनर्परीक्षण करें और यदि आवश्यक और उचित समझें तो उसे निरस्त कर दें, जिससे विज्ञान की क्षमताओं और सम्भावनाओं का मानव हित में सही उपयोग हो सके। इसके लिये जरूरी है कि हम पहले समझें कि वैज्ञानिक ज्ञान से क्या मतलब है और उसकी उत्तर-आधुनिक आलोचना किन आधारों पर टिकी है।

यह सही है कि विज्ञान की आलोचना कई प्रकार से की जाती है जिनको किसी एक आधार में समेटना काफी मुश्किल है क्योंकि उनके पीछे कोई एक आधारभूत तर्क नहीं दिखता और कई बार ये आलोचनायें परस्पर विरोधी भी प्रतीत होती हैं। फिर भी, उनके तर्क की दिशा के पीछे हम एक सैद्धान्तिक स्कीम पाते हैं जो विज्ञान की उत्तर-आधुनिक आलोचना को आधार प्रदान करती है। संक्षेप में विज्ञान विरोधियों के तर्क निम्न हैं –

1.वैज्ञानिक उपक्रम के सभी पहलू, उसकी अन्तर्वस्तु और परिणाम स्थानीय-ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ में प्रमाणित होते हैं और अपने सन्दर्भ में ही समझे जा सकते हैं।

2.विशेष रूप से वैज्ञानिक खोज के परिणाम – प्रकृति के तथाकथित नियम, सामाजिक निर्मित के रूप में देखे जाने चाहिये। उनकी प्रामाणिकता विशेषज्ञों की राय पर उसी तरह निर्भर है, जिस तरह पोप की वैधता कार्डिनलों की परिषद पर निर्भर करती है। इस तरह वैज्ञानिक ज्ञान की सामाजिक निर्मिति उसके वस्तुनिष्ठता और सार्वभौमिकता के दावे को सीमित कर देती है।

3.सबूतों के मूल्यांकन के मानदण्ड, मनुष्य के मस्तिष्क और प्रकृति में सम्बन्ध के बारे में संस्कृति की पूर्व धारणाओं पर आधारित होते हैं। ये धारणायें लिंग, जाति, नस्ल और वर्ग के साथ प्रत्येक संस्कृति में बदलती रहती है।

4.चूँकि सभी प्रकार का ज्ञान अन्ततः सामाजिक निर्मिति ही है, इसलिये वैज्ञानिक ज्ञान अपनी श्रेष्ठता का दावा नहीं कर सकता। अतः लोकतांत्रिक, प्रगतिशील उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये वैज्ञानिक ज्ञान और ज्ञान की अन्य प्रणालियों के बीच सम्बन्धों पर पुनर्विचार की जरूरत है। इस तरह जगत के बारे में ज्ञान न केवल वैज्ञानिकों के बीच वरन् वैज्ञानिकों और जनता के बीच भी संवाद के लिये प्रस्तुत हो जाता है। इसलिये विशेषज्ञों और जनता के बीच की सीमायें भी पुनः निर्धारित करने की जरूरत है।

उपरोक्त आलोचना के जवाब में विज्ञान के पक्षधरों का मत निम्न है –

1.विज्ञान के आलोचक एक प्रकार की सापेक्षतावादी ज्ञान मीमांसा के शिकार हैं, भले ही वे इससे इनकार करते हों। राजनीतिक रूप से जिम्मेदार विज्ञान को पाना कैसे सम्भव है, जबकि राजनीतिक उद्देश्यों में सार्वभौमिक एकमत का अभाव हो।

2.अपने मौलिक अर्थ में विज्ञान वस्तु जगत का सही ज्ञान प्राप्त करने की ऐसी प्रणाली है जो तर्क और अवलोकन को प्रधानता देती है। इसकी प्रमुख विशेषता इसकी आलोचनात्मक वृत्ति है जिसका मतलब ज्ञान की किसी भी स्थापना को लगातार अवलोकनों, प्रयोगों द्वारा परीक्षण करने के लिये प्रतिबद्ध होना है और उन स्थापनाओं को रद्द करते रहना है जो इन परीक्षणों से सत्यापित न हो सके। कहने का तात्पर्य यह है कि विज्ञान के क्षेत्र में कोई भी सिद्धान्त इतना निर्विवाद नहीं होता कि उस पर सन्देह न किया जा सके। इसका अर्थ यह है कि वैज्ञानिक ज्ञान कोई परम, निरपेक्ष अंतिम सत्य होने का दावा नहीं करता। अधिक प्रबल प्रमाणों के आधार पर उसमें संशोधन का स्थान सदैव बना रहता है। इसे ही वैज्ञानिक पद्धति कहा जाता है।

विज्ञान का प्रारम्भ जिज्ञासा से होता है तथा निरीक्षण, परीक्षण, तर्क, अनुमान, प्रयोग, सत्यापन, सिद्धान्त निर्माण इसके अनिवार्य तत्व हैं। आज हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि वस्तुनिष्ठ ज्ञान प्राप्त करने का सबसे भरोसेमंद तरीका वैज्ञानिक विधि ही है।

3.वैज्ञानिक ज्ञान के निर्माण में सामाजिक पहलू को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता किन्तु उसे सापेक्षतावादी सिद्ध करना भी उपयुक्त नहीं है। यह बात इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि विज्ञान की वस्तुनिष्ठता और सार्वभौमिकता को मानने न मानने के अपने राजनीतिक परिणाम होते हैं। यदि हम सांस्कृतिक प्रामाणिकता को ही सत्य के निर्धारण की कसौटी मान लेंगे तो फिर तीसरी दुनिया के भारत ऐसे देशों में इसका उपयोग राजनीति में प्रतिगामी तत्वों द्वारा आसानी से ज्ञानोदय और सेकुलरवाद की उपलब्धियों को नकारने में किया जा सकता है और हम भिन्नता का उत्सव मनाने के नाम पर सैकड़ों पिछड़ी, शोषक, वर्चस्ववादी और अन्धविश्वास पर आधारित सामाजिक रूढ़ियों और संरचनाओं के पक्ष में अपने को खड़ा पायेंगे।Science Lovers and science critic | विज्ञानप्रेमी ...

विज्ञान के उत्तर-आधुनिक आलोचकों और समर्थकों के उपरोक्त तर्कों के मूल्यांकन से हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि आलोचकों की इस बात में दम है कि जो संस्थायें वैज्ञानिक अनुसंधान के लिये पैसा खर्च करती हैं वे अपने हितों के अनुरूप शोध की दिशा भी तय करती हैं। इसके अलावा जिन सामाजिक समूहों का विज्ञान की संस्थाओं पर वर्चस्व होता है, वे वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग अपने हितों के लिये करते हैं। लेकिन इस आलोचना को वैज्ञानिक ज्ञान के ज्ञानमीमांसीय सत्य तक खींच ले जाने का प्रयत्न कई तरह के अन्तर्विरोधों को जन्म देता है, जो सही नहीं है। अतः हम कह सकते हैं कि वैज्ञानिक ज्ञान की सांस्कृतिक-सापेक्षतावादी आलोचना उपयुक्त नहीं है।

विज्ञान को हम पूर्वी और पश्चिमी विज्ञान में विभेदित नहीं कर सकते। यह सही है कि प्राकल्पना निर्माण की कोई एकमात्र विधि नहीं हो सकती लेकिन वैज्ञानिक ज्ञान का प्रमाण इस पर निर्भर नहीं करता कि ज्ञान प्राप्ति में किस विधि का प्रयोग किया गया है बल्कि इस बात पर निर्भर है कि उस ज्ञान को वैज्ञानिक समुदाय के स्वतन्त्र प्रेक्षकों द्वारा पूर्वकल्पना को पूर्वमान्य मानकों के आधार पर प्रामाणिक पाया गया है कि नहीं। यदि विभिन्न समुदाय अपने-अपने सन्दर्भगत मूल्यों को, इस बात की परवाह किये बिना कि वे आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान से कितनी संगतता रखते हैं, ज्ञान की कसौटी मानेंगे तो सभी लोक-परम्परायें विज्ञान का दर्जा पा जायेंगी।

फिर चेचक को माता का प्रकोप मानने के औचित्य पर सवाल नहीं उठाया जा सकेगा। इसलिये वैकल्पिक विज्ञान के समर्थकों के सामने यह चुनौती बराबर बनी हुयी है कि स्थानीय ज्ञान को कठोर, अनुभवसिद्ध परीक्षण की कसौटी पर कैसे कसें। यह बात भारतीय संदर्भ में योग के बारे में जितनी सच है, उतनी ही सच आयुर्वेद के बारे में भी है। उनकी वैज्ञानिकता का पैमाना सांस्कृतिक नहीं हो सकता।

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हमारे उपरोक्त विवेचन के आधार पर हम वैज्ञानिक ज्ञान और मिथ्या विज्ञान के भेद को स्पष्ट कर सकते हैं क्योंकि मिथ्या विज्ञान वैज्ञानिक मानदण्डों पर खरा नहीं उतरता। वह बाहरी आवरण तो विज्ञान अपनाता है – जैसे वैज्ञानिक पारिभाषिक शब्दावली, तकनीकी साधन, गणितीय गणनायें, सिद्धान्तों के संदर्भ आदि लेकिन अपने दावों को वैज्ञानिक समुदाय द्वारा स्वीकृत मानदण्डों के आधार पर प्रमाणित करने से दूर रहता है। यहाँ प्रश्न उठता है कि मिथ्या विज्ञान का जन्म कैसे होता है? इसके पीछे सोचने का एक तरीका है जिसे हमें साम्यता विचारकह सकते हैं।

इसके अन्तर्गत हम दो समान सी दिखने वाली चीजों को आपस में कार्य-कारण भाव से सम्बन्धित मान लेते हैं। साम्यता से कारणता का निष्कर्ष निकालना ही मिथ्या-विज्ञान को जन्म देता है। इसी तरह की सोंच के कारण हम लाल रंग के मंगल ग्रह को रक्तपात और लड़ाई और शुक्र ग्रह को सौन्दर्य और मातृत्व का कारण मान लेते हैं। फलित ज्योतिष व अन्य अंधविश्वासों से बचने के लिये यह जरूरी है कि हम असली और नकली विज्ञान में फर्क को जाने-समझे और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाने के लिये जन अभियान चलायें। लेकिन इसके लिये वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पहले ठीक से समझना जरूरी है।

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मूलभूत विज्ञान के उपर्युक्त अर्थ में, केवल उसी के आधार पर जब किसी विषय या समस्या के बारे में कोई मत निर्धारित किया जाता है तो उस अनुभवमूलक और तर्कयुक्त मनोवृत्ति को वैज्ञानिक दृष्टिकोण की संज्ञा दी जाती है। उसके परिणामस्वरूप प्रत्येक प्राकृतिक और सामाजिक घटना की व्याख्या कार्यकारण नियम के अनुसार वैज्ञानिक विधि द्वारा ही की जाती है। इसमें किसी प्रकार के अलौकिक तत्व का कोई स्थान नहीं है और यही बात उसे धार्मिक दृष्टिकोण से पृथक करती है। उदाहरण के लिये जब कोई चिकित्सक किसी रोग का इलाज करता है तो रोग के पीछे कार्यरत प्राकृतिक कारणों की जाँच व उनको दूर करने का उपाय करता है, न कि किसी दैवी शक्ति की प्रार्थना या उपासना। वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कतिपय विशेषतायें निम्न हैं –

1.किसी अधिकारिक व्यक्ति या ग्रन्थ में लिखे हुये को सच मानने से तब तक इनकार करना, जब तक प्रत्यक्ष प्रमाण और निरीक्षण से उसकी पुष्टि न हो जाय।

2.विश्व का चक्र विशेष नियमों से चलता है। इसका पता हमें प्रयोग, अनुमान और पड़ताल से ही चलता है। विश्व स्वयंभू है, इसके लिये किसी ईश्वर की आवश्यकता नहीं है।

3.ज्ञान को प्रमाणित करने के लिये जो प्रयोग किया जाता है, वह वैज्ञानिक के नियंत्रण में होता है, किसी अज्ञात शक्ति पर निर्भर नहीं होता। अपवाद मिलने पर सिद्धान्त भरभराकर गिर जाता है।

4.विज्ञान वस्तुनिष्ठ होता है, व्यक्तिनिष्ठ नहीं। उसका सत्य वैश्विक होता है। योरोप में खोजा गया न्यूटन का नियम नई दिल्ली में भी उतना ही सच है। संस्कृतियाँ भिन्न हो सकती हैं विज्ञान नहीं।Vaigyanik Drushtikon

वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना प्रत्येक भारतीय नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य तो है किन्तु वैज्ञानिक दृष्टिकोण की समझ को लेकर भ्रम की स्थिति है। अधिकांश लोग भौतिक सुख-सुविधाओं के लिये अत्याधुनिक तकनीक के प्रयोग को ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाये जाने की कसौटी समझते हैं। इसी से ढेरों अन्धविश्वासों के साथ उपभोक्तावादी जीवनशैली का पाखण्ड पनपता है। लोग यह भूल जाते हैं कि वस्तु जगत का वैज्ञानिक रीति से प्राप्त किया गया ज्ञान ही भौतिक सुखों के लिये आवश्यक उपभोक्ता उपकरणों के अन्वेषण का मार्ग प्रशस्त करता है।

कई बार विज्ञान से जुड़ी बहस में परमाणु हथियारों का निर्माण, व्यापक पर्यावरण संकट, सामाजिक बिखराव, नैतिक शून्यता और मूल्य-संकट को विज्ञान के खाते में डालकर उसकी आलोचना की जाती है। तब शायद हम भूल जाते हैं कि पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन को सुखी और सुरक्षित बनाने में विज्ञान एक वरदान भी साबित हुआ है। सभी के लिये पर्याप्त अनाज, अनेक जानलेवा बीमारियों पर काबू, आवागमन के साधन, मनोरंजन का अद्भुत पिटारा भी उसी की देन है। वैज्ञानिक पद्धति एवं दृष्टिकोण हमें वस्तु जगत के रहस्यों का ज्ञान उपलब्ध कराती है, अब यह हमारे विवेक पर निर्भर है कि हम उस ज्ञान का उपयोग किस तरह करते हैं।

मूलभूत विज्ञान एक है किन्तु उस पर आधारित प्रोद्योगिकी भिन्न-भिन्न हो सकती है। वर्तमान वैश्विक पूंजीवाद के अन्तर्गत न्यस्त स्वार्थों द्वारा विज्ञान-आधारित प्रोद्योगिकी का उपयोग जिन मानव विरोधी उद्देश्यों द्वारा किया जा रहा है, उसके लिये मूलभूत विज्ञान को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उद्देश्य प्रकृति के विरुद्ध युद्ध जीतना नहीं बल्कि प्रकृति के नियमों की जानकारी है। उसका उपयोग मनुष्य के हित के साथ जोड़कर प्रकृति के साथ सहजीवन भी विकसित किया जा सकता है।

alok tandon

लेखक सामाजिक दर्शन के गम्भीर अध्येता हैं।

सम्पर्क- +919450856180, dralokboi@yahoo.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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