सामयिक

आखिर इन दिनों किस हाल में होगा दृश्य से गायब वह सर्वहारा वर्ग

 

लॉकडाउन के इस संक्रमण काल में जब कभी शहर की ओर दूध सब्जी या फल वगैरह के लिए जाता हूँ तो मुझे बहुत से लोगों की याद बरबस आने लगती है। शहर का एक समूचा दृश्य जो मेरे अवचेतन में अंकित है, वह दृश्य मेरा पीछा करने लगता है। यह दृश्य मेरे रोजमर्रा की जिन्दगी में घुला मिला है जिसके बिना जीवन अधूरा जान पड़ता है। यह महज एक दृश्य भर ही नहीं है बल्कि इस दृश्य में सर्वहारा समाज के उन सारे लोगों का जीवन शामिल है, जो सड़क पर कभी रिक्शा खींचते हुए मुझे दिख जाते हैं, कभी सेलून में बाल काटते हुए दिख जाते हैं, कभी रेहड़ी पर चाट फुल्की बेचते हुए दिख जाते हैं, कभी फुटपाथ पर जूता पालिश करते हुए दिख जाते हैं, कभी किसी बिल्डिंग पर ईंट गारे का काम करने वाले दिख जाते हैं, तो कभी पान ठेले पर पान बेचते हुए मुझे दिख जाते हैं। इनके जीवन से हम यूं ही अपने को कभी अलग नहीं कर सकते। उनकी संपृक्ति हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है।

पर ऐसा क्यों है कि इस संक्रमण कालीन समय में सोच विचार के स्तर पर हमने उन्हें अपने जीवन से असंपृक्त सा कर दिया है? इस सवाल का जवाब भले ही ढूंढने की कोशिश हम ना करें, फिर भी यह सवाल एक सवाल की तरह हमारे सामने आते जाते खड़ा हो जाता है। यह समय समाज के लिए, हम सबके लिए कितना कठिन समय बनकर उभरा है कि जीवन के बड़े हिस्से का बोझ ढोने वाला समाज का यह सर्वहारा वर्ग सड़कों से बिल्कुल अदृश्य है।

समाज को, सत्ता तंत्र को सोचने समझने की यह फुर्सत भी नहीं है कि रोजी रोटी के लिए सड़कों पर संघर्ष करने वाला समाज का यह गरीब सर्वहारा वर्ग, इस भीषण लॉकडाउन के समय सड़कों से अदृश्य होकर आखिर किस हालत में है। बिना काम धन्धे के उसके परिवार की रोजी-रोटी आखिर चल कैसे रही है? कहीं उसका परिवार महामारी के साथ-साथ भुखमरी भी तो नहीं झेल रहा है? महामारी आखिर अपने साथ भुखमरी जैसी भीषण समस्या को भी लेकर आती ही है। आखिर मनुष्य करे तो क्या करे? अगर वह महामारी से बच भी गया तो बेरोजगारी की हालत में, दिहाड़ी पर चलने वाले काम धन्धे चौपट हो जाने की हालत में तो उसे भूख से मरना ही है। पर इन सवालों को लेकर कहीं कोई बात नहीं हो रही है। महामारी ने भूखमरी के प्रश्न को पीछे छोड़ दिया है, जबकि भूखमरी का प्रश्न भी समानांतर रूप से उसी तरह खड़ा है जिस तरह महामारी का प्रश्न खड़ा है।
ये सारी बातें उस समाज के जेहन में नहीं उभर सकतीं जिसे सुविधानुसार महीने की तनख्वाह बैठे-बिठाए मिल जा रही है या जिसकी हैसियत इतनी है कि वह आराम से घर बैठकर भी सुभीते का जीवन गुजार ले रहा है।

इस प्रश्न को लेकर कभी सोचिए तो मन मस्तिष्क में यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या महामारी से उत्पन्न परिस्थितियां सत्ता और समाज को क्रूर और संवेदनहीन बना देती हैं। अगर यह सच है तो यह समाज तेजी से सामाजिक विघटन की ओर अग्रसर है जोकि समाज के लिए एक नासूर की तरह है। तमाम कठिन परिस्थितियों के बाद भी सोच विचार और संवेदना के स्तर पर इस समाज को बचाए जाने की आज बड़ी जरूरत है। समाज के सर्वहारा वर्ग को यूं ही उनके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता।

.

Show More

रमेश शर्मा

लेखक व्याख्याता और साहित्यकार हैं। सम्पर्क +917722975017, rameshbaba.2010@gmail.com
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments

Related Articles

Back to top button
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x