कवि की कहानी
यत्र-तत्र

कवि की कहानी

 

तीन दशक से भी ज़्यादा समय हुआ है जब ‘पूर्वग्रह’ में प्रकाशित एक बातचीत में डॉ. नामवर सिंह का ध्यान उन कहानीकारों की ओर आकृष्ट किया गया जो मूलतः कवि हैं,  उनकी ख्याति भी मुख्यतः कवि के रूप में है, लेकिन उन्होंने महत्वपूर्ण कहानियाँ लिखी हैं। इन ‘कवि-कहानीकारों’ के महत्त्व को रेखांकित करते हुए उनके योगदान को ‘हिन्दी कहानी की दूसरी परम्परा’ के रूप में मान्य कर उनका पृथक से मूल्यांकन किये जाने का सवाल उठाया गया। प्रश्नकर्त्ता ने कवि-कहानीकारों की कहानियों में काव्यात्मक संवेदना की मौजूदगी और उसकी विशिष्ट भूमिका को पहचाने जाने पर  भी ज़ोर दिया।

जवाब में नामवर जी ने कवियों द्वारा लिखी गई कहानियों के महत्त्व को तो स्वीकार किया, लेकिन हिन्दी-कहानी के विकास में कवि-कहानीकारों की अपेक्षा ठेठ कहानीकारों के योगदान को ही निर्णायक माना। हिन्दी-कहानी की इस कथित दूसरी परम्परा को उन्होंने  ‘गौण धारा’ कहा।  

कवि-कहानीकारों की इस परम्परा में जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत, बच्चन, अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर से लेकर कुँवर नारायण, श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, विनोद कुमार शुक्ल, जितेंद्र कुमार, प्रयाग शुक्ल का उल्लेख उस बातचीत में हुआ। आज के दौर तक आएँ तो कहानी लिखने वाले कवियों की यह सूची बहुत लंबी हो सकती है। कवियों की लिखी कहानियाँ निस्संदेह उल्लेखनीय हैं, लेकिन वे सचमुच भिन्न और विशिष्ट-विलक्षण हैं, और उन्हें एक अलग परम्परा में रख कर देखा-समझा जाना आवश्यक जान पड़ता है, तो इसका समुचित परीक्षण किया जाना चाहिये।

कवियों की लिखी कहानी को अलग से रेखांकित करने के पीछे यह धारणा है कि उनमें काव्यात्मक संवेदनशीलता स्वभावतः मौजूद होती है। यह अपेक्षा एक नज़र में अवांछनीय भी नहीं जान पड़ती। कवि की प्रातिभ स्थिति से कहानी के प्रभावित होने और उसमें काव्य-तत्त्व का निवेश होने की उम्मीद सहज ही है। कवि की कहानी की विशेषता संभवतः यह मानी गयी कि उसे पढ़ते हुए पाठक, नामवर जी के शब्दों में कहें तो, ‘कविता का-सा प्रभाव’ ग्रहण करता हो, या उसमें ‘भावुकता’ या ‘सेंटिमेंटलिज़्म’ जैसा कुछ हो। इन्हीं गुणों से प्रभावित ‘भावप्रधान’ कहानियाँ पुराने दौर में लिखी भी गयी थीं, जैसा कि नामवर जी ने स्वयं लक्ष्य किया। मगर उन्होंने कुँवर नारायण-जैसे कवि की कहानियों में भावुकता की अनुपस्थिति और दूसरी ओर इससे उलट निर्मल वर्मा और रेणु जैसे ठेठ कहानीकारों की कहानियों के सघन काव्यात्मक प्रभाव का उल्लेख किया। इस तरह उन्होंने कवियों की कहानियों में काव्यात्मक संवेदना की नैसर्गिक उपस्थिति की धारणा को ख़ारिज कर दिया।

अज्ञेय शरणार्थी’

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

कवि-कहानीकारों को ठेठ कहानीकारों से अलगाने का प्रयत्न संभवतः स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के साहित्य-बोध में दिखाई देने लगा था। अज्ञेय ने यथार्थ की  बहुस्तरीयता  को रेखांकित  करते हुए ‘अंतरविषयी यथार्थ’ का आग्रह किया था। फिर कहानी रचने की प्रक्रिया में संवेदना पर बल दिये जाने का औचित्य बताते हुए  कहानी की सृजन-प्रक्रिया में कवि-दृष्टि की भूमिका की चर्चा भी उन्होंने की। उन्होंने लिखा कि ‘मेरे  लिए यह मानना असंभव हो जाता है कि कवि-दृष्टि कहानी-लेखन में बाधक होती है या कवि कवि होने के नाते ही घटिया कहानी-लेखक होता है। बल्कि यही मानना अधिक संगत दिखता है कि कहानीकार के अन्य गुणों से संपन्न व्यक्ति में कवि-दृष्टि भी होने पर वह अधिक महत्वपूर्ण कहानी-लेखक हो सकता है।’ कहानी के संदर्भ में कवि-कहानीकार की विशिष्ट भूमिका पर  शायद पहली बार ज़ोर दिया जा रहा था। लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि  कहानी में कवि-दृष्टि के महत्त्व को भी पहली बार रेखांकित किया गया था। इस बात पर बल दिया जा रहा था  कि कवि-दृष्टि का प्रयोग कर कहानीकार महत्त्वपूर्ण कहानी लिख सकता है। स्पष्ट है, कहानी-कला के निर्वाह में कवि-दृष्टि के निवेश की चर्चा करते हुए अज्ञेय की दृष्टि में अंततः कवि का पलड़ा ही भारी था।

शायद नयी कहानी के दौर में कविता की बजाए कहानी की चर्चा के ज़ोर पकड़ने के कारण अज्ञेय ने तात्कालिक वर्त्तमान, जिसे उन्होंने सामाजिक यथार्थ कहा, पर कहानी के अधिकाधिक एकाग्र होते जाने पर चिंता प्रकट करते हुए प्रतिक्रिया में टिप्पणी की थी–‘जो कहानियाँ जल्दी पुरानी नहीं होती हैं,  या जो पुरानी होकर भी नयी बनी रही हैं, अथवा नयी हो गयी हैं, उनमें रचनाकार की दृष्टि सामाजिक यथार्थ की परिधि में न बँधी  रह कर मानवीय यथार्थ पर केंद्रित रही होगी।’ आशय यह था  कि कवियों की कहानियाँ पुरानी नहीं पड़तीं, पुरानी हो कर भी नयी बनी रहती हैं, क्योंकि वे यथार्थ के प्रकट-प्रत्यक्ष बाह्य रूप, यानी सामाजिक यथार्थ की अपेक्षा मानवीय यथार्थ पर एकाग्र होती हैं, जो वस्तुतः आभ्यंतरिक स्तर पर संघटित होता है।  सामाजिक यथार्थ के बरअक़्स मानवीय यथार्थ पर ज़ोर देना  क्या किसी साहित्यिक रणनीति के तहत था, ताकि कहानीकारों के ऊपर कवि-कहानीकारों को स्थापित करने का तर्क जुटाया जा सके? यह बात इसलिये कही जा सकती है कि सामाजिक यथार्थ पर केंद्रित कहानियाँ भी मानवीय यथार्थ की अनदेखी नहीं करतीं।

नामवर सिंह

लगभग उसी दौर में नामवर सिंह ‘कहानी : नई कहानी’ की टिप्पणियाँ लिख रहे थे।  उन पर आरोप लगाया गया कि वे कविता के औज़ारों  से कहानी का मूल्यांकन कर रहे हैं। आख़िर उन्होंने भी अज्ञेय के ‘मानवीय यथार्थ’ की तर्ज़ पर  कहानी में ‘मानवीय सरोकार’ की बात की थी। कहानी के मैदान में कवि और कहानीकार के बीच की इस रस्साकशी में दोनों के बीच एक दुराव तो आ ही गया था। आगे चलकर केंद्रीय विधा  का प्रश्न जब उठाया गया, तब यह दुराव खुलकर सामने आया।  राजेंद्र यादव के कविता-विरोधी रवैये से अथवा अशोक वाजपेयी के  कहानी-विरोधी दृष्टिकोण से आखिर कौन परिचित नहीं है? ‘पूर्वग्रह’ की बातचीत में कवि-कहानीकारों की भूमिका को लेकर नामवर सिंह से पूछे गये प्रश्न को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिये।

लेकिन कवि और कहानीकार के बीच कहानी के मैदान में उत्पन्न तनाव का एक और स्रोत हिन्दी-कहानी के वयस्क होने के दौर में लोकप्रिय हुई यथार्थ और रोमांस यानी वस्तुवादी और भाववादी कथा-धारा के द्विभाजन की धारणा में भी निहित है। अज्ञेय की दलील का संकेत सम्भवतः यह भी है कि भाववादी कथा-धारा के कहानीकारों के यहाँ मानवीय संवेदना का स्रोत दरअसल कवि-दृष्टि की कुदाल के प्रहार से खुलता है।

उस बातचीत  में नामवर सिंह ने  हिन्दी-कहानी के आरंभिक दौर में प्रेमचंद स्कूल और प्रसाद स्कूल का उचित ही उल्लेख किया। संभवतः बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध की कहानी के विकास  को समझने के प्रयत्न में यथार्थवाद और रोमांसवाद अथवा वस्तुपरक और भावपरक जैसे सतही और कामचलाऊ वर्गीकरण का प्रयोग किया गया और  इसके चलते जो द्वैत खड़ा हुआ, उससे प्रेमचंद स्कूल और प्रसाद स्कूल  की संकल्पना सामने आयी। कवि-कहानीकार की धारणा के मूल में कहीं-न-कहीं  यह  द्वैत भी है जो आगे चलकर हिन्दी-कहानी को समझने की पद्धति में बद्धमूल हो गया। इसके चलते कथाकार प्रेमचंद की कहानी यथार्थ पर आधारित बतायी गयी और कवि जयशंकर प्रसाद की कहानियों के बारे में मान लिया गया कि वे भावप्रधान कहानियाँ हैं। आरंभ में ही उपजी हिन्दी-कहानी की दो धाराओं की यह  धारणा शीघ्र ही रूढ़ हो गयी। प्रेमचंद और प्रसाद  की कथाभूमि के अंतर के आधार पर दो भिन्न कहानी-परम्पराओं के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें देखना एक आसान रास्ता था।

इससे यह सुविधाजनक सरलीकरण चल निकला कि ठेठ कहानीकार की कहानी यथार्थ से संपृक्त होती है और कवि-कहानीकार की कहानी में रोमांटिक भावुकता होती है। अचरज नहीं कि इसी सरलीकरण के असर से जयशंकर प्रसाद के बाद के कवि-कहानीकारों की कहानियों में काव्यात्मकता की निःशंक उपस्थिति की कल्पना करना आसान हो गया। इसी के चलते कवि-कहानीकार को एक पृथक कोटि में वर्गीकृत करने और उन्हें एक भिन्न परम्परा में रख कर देखने की सहूलियत भी बन गयी।

दरअसल कहानी की विषयवस्तु के आधार पर निर्मित कहानी की दो धाराओं की इस धारणा में उसके शिल्प, उसकी संरचना  और कलात्मकता को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया गया। (वस्तुतः हिन्दी में कहानी-सम्बन्धी विमर्श में अक़्सर उसके संरचनात्मक पहलू की उपेक्षा होती आयी है। यह देखने की कोशिश नहीं हुई कि प्रेमचंद की वस्तुप्रधान कहानियों से प्रसाद की भावप्रधान कहानियाँ संरचना और कथात्मक अन्विति की दृष्टि से किस तरह अलग हैं।) सिर्फ़ कहानी के कथ्य, और उसमें भी उसके सतही प्रभाव जिसे अध्यापकीय शैली में भावपक्ष कह दिया जाता है, के आधार पर निर्मित यह द्वैत भ्रामक है।

सच तो यह है कि जयशंकर प्रसाद की तरह कथित भावप्रधान कहानी उनके बाद किसी कवि ने नहीं, द्विजेंद्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’ जैसे गद्यकार ने लिखी। नामवर सिंह ने ‘कहानी : नयी कहानी’ में निर्गुण की कहानी ‘एक शिल्पहीन कहानी’ और विष्णु प्रभाकर की कहानी ‘धरती अब भी घूम रही है’ की भावुकता का निर्मम विश्लेषण किया है। इस सिलसिले में उन्होंने एक महत्त्वपूर्ण बात कही है कि भावुकता और भावप्रवणता में अंतर किया जाना चाहिये। ज़ाहिर है, भावुकता से अवास्तविक और यत्नपूर्वक गढ़ी गयी कहानियाँ जन्म लेती हैं। इस दृष्टि से देखें तो जयशंकर प्रसाद की कहानियों में भावुकता नहीं, भावप्रवणता मिलती है। इतिहास या अतीत के ज्ञात-अज्ञात प्रसंगों पर निर्भर होते हुए वे कथा के आंतरिक तर्क का अतिक्रमण नहीं करतीं। प्रसाद की कहानियाँ यदि इतिहास या अतीत में आश्रय लेती हैं, या प्रेमचंद की कहानियाँ यथार्थ के बीहड़ में घुस पड़ती हैं तो जैनेन्द्र-इलाचन्द्र जोशी, और अज्ञेय की कहानियाँ इतिहास के बगल से उसे छुए बगैर गुज़र कर व्यक्ति के मनोलोक में शरण पाती हैं।। ज़ाहिर है,  यथार्थ के दायरे का उल्लंघन करते हुए, वे स्वायत्त भावलोक की खोज करने की बजाए, अंतश्चेतना के गुह्य प्रदेश में दाख़िल होने और उसमें गहरे पैठने का जतन करती हैं। इस रूप में वे प्रसाद की लीक पर चलने की बजाए अपनी स्वतंत्र राह लेती हैं। इसलिए उन्हें प्रसाद की परम्परा का अनुगामी समझना उचित न होगा। कहने का अर्थ यह कि प्रेमचंद की यथार्थवादी प्रवृत्ति के समानांतर जैनेंद्र-इलाचंद्र जोशी-अज्ञेय की अंतश्चेतन-उन्मुख कहानियों की कथित धारा भी प्रवाहमान रही है।  यथार्थ के घट्यमान रूप अर्थात प्रत्यक्ष यथार्थ को कहानी का मानक यथार्थ समझ लिए जाने की धारणा का वे प्रत्याख्यान करती हैं। 

जयशंकर प्रसाद

 वस्तुतः स्वयं जयशंकर प्रसाद की कहानियों को भी निरी भावप्रधान कहानियाँ नहीं कहा जा सकता। क्या ‘गुंडा’ कहानी के नन्हकूसिंह के साहस, पराक्रम, नैतिक बल, उसके हृदय में सुगबुगाते प्रेम की अग्नि और उसके उत्सर्ग को महज़ भावप्रधान विशेषण की संकीर्ण परिधि में समेटा जा सकता है? क्या प्रेमचंद की ‘रानी सारंधा’ और ‘शाप’-जैसी कहानियों का स्वर प्रसाद की कथित भावप्रधान कहानियों से बहुत अलग है? अगर इन कहानियों के भावबोध  में समानता है तो फिर प्रसाद की कहानियों के संदर्भ में अलग से किस काव्यात्मक संवेदना की बात की जाए?

मगर इसका यह अर्थ क़तई नहीं है कि प्रेमचंद और प्रसाद की कहानियों में कोई भेद नहीं है। सहज ही देखा जा सकता है कि प्रेमचंद की नज़र ऐतिहासिक वर्त्तमान या प्रायः अपने समकालीन यथार्थ पर एकाग्र थी। वहीं प्रसाद की कहानियों में अक्सर ऐतिहासिक अतीत के आख्यान हैं। कहानी में चित्रित ठेठ वर्त्तमान पाठक के बिल्कुल सम्मुख या निकट होता है। कहानी में रचा गया ऐतिहासिक अतीत अपेक्षाकृत कुछ दूर स्थित जान पड़ता है। इसमें संदेह नहीं कि कथात्मक यथार्थ की प्रकृति किसी हद तक उससे पाठक की निकटता या दूरी से भी तय होती है। पाठक प्रत्यक्ष या निकटस्थ वास्तविकता से अधिक तादात्म्य अनुभव करता है, बनिस्बत बीते समय के यथार्थ से। मगर कहानी के यथार्थ से इस कालगत दूरी को ध्यान में रख कर क्या यह निर्णय करना उचित होगा कि जो निकट है, वह यथार्थ है और जो दूर है, वह रोमांस? (अज्ञेय की नज़र में तो जो निकट है, वह कम टिकाऊ होता है।) इसकी बजाय यह देखना क्या ज़्यादा सही नहीं होगा कि अपनी निर्मिति की प्रक्रिया में कहानी किस तरह से कथा के मर्म को उघारती है? (पाठक कुछ जानने से ज़्यादा संवेदित और आनंदित होने के लिये कहानी पढ़ता है।) महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि कहानी गढ़ने की इस प्रक्रिया में साझेदार होकर पाठक उस बिंदु तक किस तरह पहुँचता है जिसे कहानीकार ने अपनी ‘प्रतिभा’, ‘जीवन-दृष्टि’ और ‘कवि-दृष्टि’ के विनियोग से अर्जित किया है। इसमें भी ‘कवि-दृष्टि’ की भूमिका कहानी की निर्मिति में महत्त्वपूर्ण होती है। मैं सोच-समझ कर ‘कवि-दृष्टि’ शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ। यह ठीक उसी अर्थ में नहीं है, जिस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग अज्ञेय ने किया है।  मेरी समझ में कहानी का मूल रसायन यह कवि-दृष्टि है जो जीवन के विडम्बनात्मक क्षण का सृजन करती है, और जिसके बल पर कहानी अपनी कथात्मक परिणति हासिल करती है। कवि-दृष्टि के बिना कहानी सम्भव नहीं होती। यानी प्रत्येक कहानीकार कवि-दृष्टि का इस्तेमाल कर कहानी गढ़ता है, वह कवि-कहानीकार हो या ठेठ कहानीकार।

तात्पर्य यह है कि कवि-दृष्टि पर उन्हीं कथाकारों का एकाधिकार नहीं है जो कवि भी हैं। ऐसा नहीं कि कवि होने के नाते उनकी संवेदनात्मक बुनावट और मनोनिर्मिति में कुछ ऐसा गुण विन्यस्त है जो कहानीकारों में नहीं होता? कहानी लिखते हुए लेखक कहानीकार की भूमिका में होता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि उस वक़्त कवि की भूमिका को भूलकर ही वह कहानीकार हो सकता है। कोई भी लेखक कहानी लिखते हुए  भिन्न-भिन्न पद्धति और उपकरणों का प्रयोग कर सकता है, लेकिन जिस तापमान पर कहानी ढलती है, वहाँ तक कहानी की प्रक्रिया को पहुँचाने के बाद एक ख़ास तरह के रसायन का परिपाक ज़रूरी होता है। यह रसायन कवि-दृष्टि  मुहैया कराती है। यह ठीक है कि ‘कामायनी’ केवल कवि जयशंकर प्रसाद ही लिख सकते थे या ‘अंधेरे में’ के रचनाकार सिर्फ़ कवि मुक्तिबोध हो सकते थे। लेकिन क्या कवि होने के कारण ही प्रसाद ‘गुंडा’ और ‘आकाशदीप’ लिख सके या मुक्तिबोध ‘समझौता’, ‘क्लॉड ईथरली’ और ‘पक्षी और दीमक’ लिख सके? इन कहानियों को कहानी की विधागत काया मिल सकी तो इसलिये कि इनकी निर्मिति में कवि-दृष्टि उस बिंदु पर एकाग्र हो सकी, जहाँ कहानी के कथ्य की रगड़ से उपजी संवेदना  की चिंगारी सहसा चामत्कारिक तरीक़े से प्रकट हुई। यह ‘एक क्षण का चित्र’ (अज्ञेय) होता है जो कहानी बन जाता है। ‘गुंडा’ कहानी में पाठक क्या उस क्षण की कौंध को भूल सकेगा जब पन्ना और उसके पुत्र राजा चैतसिंह की रक्षा के लिये सारे संकट पार कर शिवालय पहुँचे नन्हकूसिंह और पन्ना की ‘चारों आँखें मिलीं जिनमें जन्म-जन्म का विश्वास ज्योति की तरह जल रहा था।’ यह कहानी का मर्मबिन्दु है जो पाठक की संवेदना को बरबस छू लेता है। यह वही क्षण है जो एक दूसरी कहानी में वैसी ही मार्मिकता के साथ उभर आता है। ‘उसने कहा था’ कहानी में सूबेदारनी अमृतसर की गली में तांगेवाले के घोड़े से बचाने वाले लहनासिंह से अपने पति और पुत्र की हिफ़ाज़त का भरोसा माँगती है। उस क्षण क्या लहनासिंह सूबेदारनी की आँखों में ज्योति की तरह जलते उसी विश्वास की आँच में पिघल नही गया था? नन्हकूसिंह और और लहनासिंह के भीतर सिपचती एक ही आँच थी जो दोनों नायकों के हृदय में कर्त्तव्य-बोध के रूप में उनके उत्सर्ग तक विद्यमान रही। ‘गुंडा’ कहानी एक कवि की रचना है लेकिन ‘उसने कहा था’ के लेखक चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ कवि नहीं थे, हालाँकि दोनों ने अपनी कहानियों में एक ही मर्म को छुआ था। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह  कवि-दृष्टि की कीमियागिरी से सम्भव हुआ था, जिसे अर्जित करने के लिये कवि होना अनिवार्य नहीं है। उल्लेखनीय है कि ‘उसने कहा था’ की रचना 1915 में हुई थी, जबकि ‘गुंडा’ उसके 21 साल बाद 1936 में लिखी गयी थी। यानी कहानी के मर्म तक पहुँचने की जिस विधि का प्रयोग कहानीकार गुलेरी ने पहले किया था, बाद में उसे ही अमल में लाकर कवि जयशंकर प्रसाद ने कहानी लिखी।

तात्पर्य यह है कि कोई भी कहानीकार अगर कहानी लिखता है तो उसे कवि-दृष्टि की आवश्यकता होती है जो उसके कवि होने से नहीं तय होती, बल्कि स्वयं कहानी की स्मृति में अवशिष्ट रूप में मौजूद होती है। बस, उसका आह्वान करने की, उसे जगाने की ज़रूरत होती है।

वस्तुतः हिन्दी में प्रचलित कवि-कहानीकार शब्द एक ऐसे लेखक के बारे में सूचित करता है जो कविता और कहानी दोनों विधाओं में समान दक्षता से रचना करता है। लेकिन आधुनिक कवि-कहानीकार कविता और कहानी अलग-अलग समय में  लिख रहा होता है। एक समय में वह एक ही विधा में सक्रिय होता है, एक ही समय में दोनों विधाओं को एकमेक कर नहीं। कभी आख्यानात्मक काव्य में कविता और कहानी एक साथ लिखी जाती थी। लेकिन आख्यानक काव्य का युग बीत चुका है। आख्यानात्मक काव्य की रचना यूँ तो कवि के बूते का काम है लेकिन उसमें जितनी कविता होती है, उतनी ही कथा भी होती है। एक ही कृति में कविता और कथा की ऐसी विधागत एकात्मता प्रबंध-काव्य में संभव है। इस तर्क से सूर या तुलसी-जैसे संत कवियों को कवि-कथाकार कहना ग़लत नहीं होगा, हालाँकि वे कवि ही कहे जाते हैं, और उनके समय में कविता और कथा के बीच विच्छेद भी नहीं हुआ था। दरअसल मध्यकाल की आख्यानात्मक कविता में कवि और कथाकार के पार्थक्य की अवधारणा ही नहीं थी। कविता और कथा दोनों एक-दूसरे में समाहित और परस्पर एक थे। कालांतर में आधुनिकता के प्रहार ने मनुष्य की चेतना को ही नहीं, उसके भीतर अवस्थित संपूर्णता के बोध को भी खण्डित कर दिया। साहित्य की चेतना भी इस प्रहार से निरापद न रह सकी। वह भी खण्डित हो उठी। इस तरह कविता और आख्यान के अभेद की सदियों पुरानी परम्परा जब विच्छिन्न हुई तो वह एकाधिक विधाओं में पुनर्संघटित होने लगी। कहानी की गल्प-काया में गठित होने के बाद आख्यान की तार्किक परिणति यथार्थवाद के आधुनिक मुहावरे में हुई। लेकिन कहानी की नवजात काया में कविता के आदिम गुणसूत्र मौजूद थे। कवि-दृष्टि वही गुणसूत्र है जो कहानी को, आधुनिक आख्यान की तार्किक नियति को, कथात्मक परिणति की ओर मोड़ देती है। अगर यह गुणसूत्र न होता तो शायद कहानी इस देहकल्प में नहीं लिखी जाती, तब शायद वह कोरा वृत्तांत बन कर रह जाती। इसलिये मुझे लगता है कि कवि-दृष्टि कहानी विधा का प्राणतत्त्व है, उसके बिना कोई कहानी संभव नहीं होती

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लेखक साहित्य-संस्कृति से सम्बन्धित विभिन्न विषयों पर पिछले 25 वर्षों से लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क +919981064205, jaiprakash.shabdsetu@gmail.com

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