डिजिटल कविता का
यत्र-तत्र

डिजिटल कविता का उभार

 

सूचना और संचार की उच्चतर तकनीक आज जिस शिखर पर पहुँच गयी है, उसमें डिजिटल कविता का आविर्भाव आकस्मिक नहीं है। सच पूछा जाए तो डिजिटल कविता आज के समय के द्वारा रची गयी और स्वयं समय की अपरिहार्य परिणति है।

उत्तर-आधुनिक युग में सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के साथ वाचिक-मुद्रित पाठ की ताक़त अपेक्षतया कमज़ोर पड़ी है। फ़िल्म, टेलिविज़न और इंटरनेट ने सूचना का एक ऐसा घटाटोप रच दिया है कि साहित्य भी उसकी ज़द में आ गया। वह वैश्विक सूचना-तंत्र का हिस्सा बन गया—ख़ास तौर पर साहित्य का वह भाग जो साइबर स्पेस में प्रकाशित है, इंटरनेट की सहायता से वैश्विक पहुँच के भीतर आ गया है। उसमे विपुल सामग्री  है। इसलिए उसे पढ़ने के लिए उपयुक्त सामग्री की छँटनी करने की ज़रूरत है। लेकिन इसके लिए  जिस चयन-दृष्टि की दरकार होती है, वह थकने-सी लगी है। इससे एक ऐसा समाज बन रहा है, जहाँ जीवन कुछ अधिक व्यस्त हो चला है, सामाजिक मेलजोल की गुंजाइश सिमट रही है और पढ़ने-लिखने का अवकाश सिकुड़ने लगा है। अपनी व्यस्तता में लोग पुस्तक पढ़ने की बजाए टेलिविज़न देखने-सुनने में अधिक सुविधा महसूस करने लगे हैं। कंप्यूटर और मोबाइल क्रांति ने अपनी चामत्कारिक उपलब्धियों और सम्मोहन का मायाजाल फैलाया तो वह मध्यवर्ग के पढ़े-लिखे लोगों की फ़ुरसत के समय को बटोर ले रहा है, जिसमें वे मनोरंजन और सूचना पाने के लिए पुस्तक या पत्रिकाएँ पढ़ा करते थे।

हिंदी में यह ‘दिनमान’, ‘धर्मयुग’,‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘पराग’, ‘नंदन’, ‘चंपक’-जैसी पत्रिकाओं के अवसान का समय था। देखते-ही-देखते पढ़ने वाला समाज अब आराम से बैठ कर देखने-सुनने की विलासिता की तरफ़ मुड़ गया। फलस्वरूप एक व्यापक दर्शक-संस्कृति बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में बनने लगी थी। इसी दौर में ज्ञानार्जन की प्रचलित आदर्शवादी धारणा बिखरने लगी, जिसमें पढ़ने-लिखने के उद्यम को ‘संस्कार’ का दर्ज़ा मिला हुआ था। अब उसे अतीत के शगल की तरह देखा जाने लगा। तकनीक के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण विभिन्न कला-रूपों और विधाओं की आत्मपूर्णता और स्वायत्तता खंडित हो रही थी। इसके चलते विभिन्न कलाओं में परस्पर आवाजाही और अंतर्निर्भरता बढ़ने लगी। एक कंपोज़िट कला के उभार की सम्भावनाएँ अपने आप बन रही थीं।  कविता भी अब अपने स्थापत्य में पूर्णतः स्वायत्त या अलग-थलग नहीं रह सकती थी। उसने दूसरी कलाओं के समीप जाने के प्रयत्न में जब वेब आर्ट को एक प्रबल  सम्भावना के रूप में चुना तो उसके पीछे तकनीकी का दबाव था। कविता अब वेब आर्ट में तब्दील होने की इसी नियति का सामना कर रही है। 

माध्यम बदलने के साथ कविता की प्रकृति और उसके  स्वरूप में भी बदलाव होना स्वाभाविक है। वाचिक से प्रिंट माध्यम में तब्दील होने के दौर में भी यह बदलाव तकनीक में बदलाव से प्रेरित था। कंप्यूटर के आगमन  के बाद पिछले कुछ दशकों में भी यही स्थिति बनी है।  कंप्यूटर ने कविता की  सौंदर्य-पद्धति को बदल दिया है। याद रखना ज़रूरी है कि  मानवीय प्रयत्न के बावजूद  डिजिटल कविता अंततः तकनीक से रची गयी कविता है। उसमें  प्रतिभा के साथ तकनीक के ज्ञान और कौशल का भी  योगदान है। इसलिए तकनीक पर नियंत्रण के साथ उसके  सौंदर्य-बोध की प्रक्रिया पर नियंत्रण भी अपने आप होने लग  जाता  है।  यहां मनुष्य की भाषा और मशीन की भाषा के बीच अद्भुत साझेदारी देखने को मिलती है। 

डिजिटल कविता के विशेषज्ञों का कहना है कि कंप्यूटर कवि और पाठक दोनों को  प्रिंट माध्यम द्वारा निर्मित वर्जना से  मुक्त करता है।  वह नए प्रयोगों के लिए अवकाश भी निर्मित करता है। मुद्रित  कविता को प्रकाशित होने के लिये जहाँ प्रिंटिंग मशीन  की ज़रूरत होती है, वहीं डिजिटल कविता अपनी निर्मिति में ही स्व प्रकाशित है।  जिस माध्यम में वह रची जाती है उसी माध्यम में प्रकाशित भी होती हैं। सिर्फ़ उसे किसी वेबसाइट, ई-पत्रिका  या  सोशल मीडिया में साझा करना होता है। लोक कविता में भी रचने और प्रकाशित होने के माध्यम में स्वाभाविक एकरूपता थी, जबकि मुद्रित माध्यम में आने के पहले कविता काग़ज़ पर क़लम से लिखी जाती है, फिर मुद्रण-प्रकाशन के लिए तैयार होती  है। डिजिटल कविता इस झंझट से मुक्त है। उसकी संचार-प्रक्रिया और सौंदर्य-प्रक्रिया साइबर माध्यम के आभासी स्पेस में घटित होती है। ज़ाहिर है, डिजिटल कविता का संचार और उसकी संवेदना का स्वरूप साइबर माध्यम की प्रकृति पर निर्भर है।

मगर जिस रूप में आज डिजिटल कविता सामने आयी है, लगता है उसका स्वरूप और विधागत रेखाएँ बिल्कुल साफ़ नहीं हैं। उसकी सीमाएँ धुँधली इसलिए भी हैं कि एक तो यह उभरता हुआ काव्यरूप है। दूसरा यह कि हाइपरटेक्स्ट और उससे संबंधित साइबर संरचनाओं, जैसे ध्वनि, चित्र, बिंब, कंप्यूटर ग्रैफिक्स आदि के एक-दूसरे के साथ घुलने-मिलने के कारण बने मिश्रित संयोजन के रूप में यह आकार ग्रहण करता है। (इधर फिल्मों में कम्प्यूटर ग्राफिक्स और चाक्षुष प्रभाव की तकनीक (वीएफएक्स दृश्य) का प्रयोग बढ़ने के साथ उसकी मदद से गतिशील फ़ैंटेसी रचने का चलन भी बढ़ा है, डिजिटल कविता में उसके प्रयोग की संभावनाएँ खुल गयी हैं।) यह संयोजन कभी-कभी इतना अप्रत्याशित होता है कि इसके साथ कविता संज्ञा का प्रयोग भी संदिग्ध जान पड़ता है। लेकिन मुद्रित कविता और डिजिटल कविता के फ़र्क़ को कुछ डिजिटल कवियों की रचनाओं को देखकर समझा जा सकता है, ख़ास तौर से डिजिटल कविता पर मुद्रित पाठ के प्रभाव को जानना दिलचस्प हो सकता है; उदाहरण के तौर पर ब्रायन किम स्टीफेन, जॉन केले, फ़िलिप बूट्स आदि डिजिटल कवियों की रचनाओं को लें। उनमें जिस तरह ध्वनियों और बिम्बों से भरे गत्यात्मक डिजिटल परिवेश की रचना की गयी है, वह मुद्रित पाठ यानी शब्दों  के रचनात्मक उपयोग से बने पाठ से भिन्न एक मुकम्मल डिजिटल पाठ है। यह कम्प्यूटर के स्क्रीन पर ही संभव है, बावजूद इस तथ्य के कि इसमें कविता के मुद्रित पाठ यानी टेक्स्ट की अहम भूमिका है।

लेकिन डिजिटल प्रारूप में प्रकाशित होने वाली मुद्रित कविता को डिजिटल कविता समझना भूल होगी। डिजिटल कविता दरअसल डिजिटल माध्यम के विशिष्ट स्वभाव को आत्मसात कर उसके अर्थपूर्ण प्रयोग से निर्मित होती है। शायद इसीलिए नॉर्बर्ट बचलिटनर ने डिजिटल कविता को विशेष लक्षणों से युक्त ऐसे नवाचार के रूप में देखा है जिसे कागज पर उतार पाना संभव नहीं है। इसलिये इसे पाठ से आगे की कविता (पोएट्री बियॉन्ड टेक्स्ट) कहा गया है। यह कविता का डिजिटल पाठ है जिसके सौंदर्यात्मक पहलुओं की खोज इस नयी विधा का लक्ष्य है।

इस डिजिटल पाठ को मुद्रित पाठ की तरह इकहरे ढंग से नहीं पढ़ा जा सकता। यहाँ पाठ की अनेक तहों को एकाधिक ढंग से पढ़ने के तरीक़े ढूँढने की ज़रूरत होती है। यह साइबर माध्यम में निर्मित एक तरह का क्रममुक्त (नॉन सिक्वेंशियल) पाठ है। इसलिए डिजिटल कविता को साइबरटेक्स्ट कविता, हाइपर कविता या साइबर कविता भी कहा गया है। ध्वनि, चाक्षुष सामग्री, टेक्स्ट और हाइपरलिंक के मिले-जुले संयोजन के कारण उसमें चकाचौंध पैदा करने वाली संकर रूप-सृष्टि प्रकट होती है।

डिजिटल कविता की रचना में कम्प्यूटर-जनित परिवर्द्धित यथार्थ (ऑग्मेंटेड रियलिटी) और अभ्यारोपण (सुपरइम्पोज़िशन) का भी सहारा लिया गया है। इस प्रक्रिया में कम्प्यूटर से निर्मित छवियों को यथार्थ पर अभ्यारोपित कर एक संश्लिष्ट संरचना बनायी जाती है। इसका प्रयोग कुछ वर्ष पहले जापानी कवयित्री नी का ने किया। परिवर्द्धित यथार्थ की कविताओं के लिए स्मार्टफ़ोन पर एक ऐप डाउनलोड कर एक ख़ास लोकेशन पर जाना होता है, जहाँ ऐप को खोलने और फ़ोन कैमरा से देखने पर हवा में तैरती और भूदृश्य पर सुपरइम्पोज़ होती कविता दिखाई देती है। नी का ने मॉनिटर पोएम्स की रचना भी की है जिसमें अनेक प्रकार की इमोजी का प्रयोग किया गया है।

कम्प्यूटर तक पहुँच बढ़ने और उसमें सृजन की संभावनाओं को विकसित करने के क्रम में डिजिटल कविता के सर्जक यानी कवि और पाठक का संबंध भी बदल जाता है। इसमें अलग-अलग तरह की स्थितियाँ बनती हैं।

एक तो यह कि पाठक या प्रयोक्ता सहयोगी के रूप में पाठ से संवादरत होता है और इस प्रक्रिया में मूल पाठ से अलग होकर स्वयं एक निजी पाठ का सृजन करता है। इस रूप में वह सहयोगी कवि या उत्प्रेरित कवि बन जाता है। फलस्वरूप मूलपाठ के समानांतर एक स्वतंत्र पाठ अस्तित्व में आता है।

दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि पाठ के साथ संवाद की प्रक्रिया में कम्प्यूटर के प्रजनक व्यवहार (जनरेटिव बिहेवियर) का उपयोग कर पाठक कविता के मूलपाठ को ही बदल डाले। कविता के पाठ को इस प्रक्रिया में वह क्षणभंगुर बना देता है। इतना ही नहीं, उसके मनमाने पाठ की संभावना भी उत्पन्न करता है। ज़ाहिर है, डिजिटल कविता की यह एक कमज़ोरी भी है।

तीसरे यह कि कविता को पढ़ने की पारंपरिक यानी रैखिक विधि भंग हो जाती है। वह उसे उन्मुक्त तरीक़े से पढ़ता है जो कि हाइपरटेक्स्ट को पढ़ने का तरीक़ा है। इस प्रक्रिया में पाठ के न सिर्फ़ नये अर्थ खुलते हैं, बल्कि हर बार उसका भिन्न प्रभाव निर्मित होता है। रैखिक पाठ इतना उन्मुक्त नहीं होता।

तात्पर्य यह कि डिजिटल कविता में यूँ तो कवि द्वारा प्रस्तुत या प्रस्तावित पाठ (बना-बनाया और अंतिम पाठ) जान पड़ता है, लेकिन कम्प्यूटर के प्रजननात्मक व्यवहार के चलते पाठक या भावक उसे बदल कर एक भिन्न कविता में तब्दील करने में सक्षम है। इस दृष्टि से देखें तो डिजिटल कविता के कवि की संप्रभुता सदैव ख़तरे में होती है, पाठक उसे कभी भी भंग कर सकता है। यहाँ पाठक की कल्पना को मुक्त होने का स्वतंत्र अवकाश अपने आप मिल जाता है।

यह एक नयी स्थिति है। इसकी सम्भावना वाचिक और मुद्रित कविता में भी किसी हद तक थी। लेकिन श्रोता या दर्शक ने पाठ के प्रति सम्मान के चलते प्रायः उसका उसका उपयोग नहीं किया। वाचिक और लोक कविता में तो श्रोता को पाठ बदल देने की स्वाभाविक छूट मिली हुई थी; हालाँकि मूल पाठ से अधिक विचलन की गुंजाइश वहाँ नहीं थी। लोक कविता का रचनाकार अनाम था। वाचक उसके पाठ की प्रक्रिया में अपनी ओर से कुछ जोड़ दिया करता था। इस तरह वह लोक कविता का प्रसारक और अनाम सर्जक भी था, यद्यपि सर्जक के रूप में उसकी भूमिका सीमित थी। मगर तकनीक पर अधिकार के चलते डिजिटल कविता का भावक अधिक सजग और सक्षम है। पाठ को बदल देना उसके लिए अपेक्षाकृत आसान है। वह कवि की सम्प्रभुता को सीधे चुनौती देने की स्थिति में होता है। इस तरह वह कवि का स्थानापन्न या स्वयं कवि बन जाए तो आश्चर्य नहीं।

डिजिटल कविता में भाषा नये तरीक़े से इस्तेमाल होती है। उसकी दिखावट (एपियरेंस) भी मायने रखती है। उसमें प्रयुक्त अक्षर और शब्द का संयोजन और उसका सौंदर्यात्मक प्रभाव उसके नियत अर्थ की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण हो उठता है और अंततः कविता के अर्थ-निर्धारण में  भी भूमिका निभाता है। पाठक इसमें स्वचालित लेखन और मुक्त आसंग (फ्री एसोसिएशन) की पद्धति से भी अर्थ ग्रहण करता है। तात्पर्य यह कि डिजिटल कविता में अर्थ और अभिप्राय लिखित या वाचिक पाठ पर पूरी तरह निर्भर नहीं करता, बल्कि पाठक के आसंग से निर्मित होता है। यानी पाठक स्वयं अर्थ का सृजन करता है। स्पष्ट है कि डिजिटल कविता के काव्यशास्त्र की जड़ें आधुनिक युग के आरंभ में उभरे कला-आंदोलनों जैसे दादावाद, आधुनिकवाद आदि में हैं, जहाँ सायास अतार्किकता, बिखराव, असंगति, स्वतः प्रवाह, कोलाज संयोजन, खिलंदड़ापन और प्रचलित साहित्यिक धारा के प्रति द्रोहभाव आदि को कलात्मक मूल्य के तौर पर मान्यता मिली थी। आगे चल कर उत्तर-आधुनिक विचार पर भी इन सबका असर देखा जा सकता है। इसलिये उत्तर-आधुनिक उपकरणों से डिजिटल कविता को बेहतर समझा जा सकता है जो कि स्वभावतः उसका आलोचनात्मक आधार भी विकसित करते हैं।

वस्तुतः डिजिटल कविता का लक्ष्य और उद्देश्य मानक कविता के लक्ष्य और उद्देश्य से भिन्न नहीं है। अंतर सिर्फ़ उसकी क्रियाविधि और रूप-शिल्प का है। यहाँ पारम्परिक रूप-शिल्प नाकाफ़ी है। कविता अपनी प्रस्तुति में पारम्परिक काव्योपकरणों के प्रयोग से परे हो जाती है। उसमे रूप को निर्धारित करने वाले प्रचलित उपकरणों अर्थात अक्षर, शब्द, वाक्यांश, वाक्य, अंतराल और छंद की अनिवार्यता समाप्त हो जाती है। लेकिन नए काव्योपकरणों की खोज और उनके प्रयोग से उसके रूपाकार में ही नहीं, आशंसन (एप्रिसिएशन) और सौंदर्य-ग्रहण की पद्धति में आमूलचूल बदलाव हो जाता है।

लेकिन डिजिटल कविता हिंदी में देर-सबेर आयेगी। तकनीक के प्रभाव को दीर्घकाल तक रोका नहीं जा सकता। डिजिटल कविता के अभ्यासियों की सँख्या अभी बहुत कम है। सचाई यह है कि समय के साथ तकनीक अपने प्रयोक्ता स्वयं पैदा करती है। काग़ज़ पर लिखी-छपी कविता से अलग डिजिटल कविता एक स्वतंत्र विधा के रूप में आकार लेने को आतुर है।

डिजिटल कविताएँ कविता रचने कीअनूठी विधि का परिणाम हैं।  उसका अस्तित्व में आना यह प्रदर्शित करता है कि तकनीक पर आधारित जो नया समाज आज बन रहा है, जिसे एल्विन टॉफ्लर ने टेक्नेट्रॉनिक समाज कहा है, उसके सांस्कृतिक परिसर में  डिजिटल दाख़िल हो चुका है और चीज़ों को नए रूप में ढालने लगा है। वह उसमें इस तरह से व्याप्त होता जा रहा है जिसकी हमने अब तक कल्पना नहीं की थी। अगर मानवीय यथार्थ अपने ई-संस्करण में प्रकट होने को विवश है तो ई-कविता के लिए अलग से क़ैफ़ियत की ज़रूरत नहीं है। यह तकनीकी-युग की सृजनात्मकता की एक स्वाभाविक दिशा है जिसमें मनुष्य-समाज अपनी संवेदनाओं और सृजनात्मक ऊर्जा को अनुकूलित कर रहा है। अब यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि मनुष्य की नियति डिजिटल में स्थानांतरित होने जा रही है। समस्त मानवीय कार्यकलाप धीरे-धीरे डिजिटल के मायालोक में—एक आभासी स्पेस में घटित होने के लिए विवश हैं। इसी आभासी स्पेस में आज का यथार्थ वास करता है। अचरज नहीं होगा अगर आने वाली पीढियाँ मुद्रित-वाचिक कविता की बजाए डिजिटल कविता को सहज रूप में अपना ले। यह इस बात से भी स्पष्ट है कि नयी पीढ़ी मुद्रित पुस्तक पढ़ने की बजाए ई-पुस्तक पढ़ने में अधिक सहज है।

इसका यह अर्थ नहीं कि भविष्य में वाचिक-मुद्रित कविता का चलन समाप्त हो जाएगा। सच कहा जाए तो डिजिटल कविता उसके लिए चुनौती भी नहीं है। कभी रेडियो और बाद में टेलीविज़न के आगमन के साथ पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों का पठन-पाठन प्रभावित होने कीआशंका व्यक्त की गयी थी। इन माध्यमों की संक्रामक लोकप्रियता को देखते हुए ऐसा लगता भी था। लेकिन यह सही साबित नहीं हुई। इसलिए डिजिटल कविता को प्रचलित माध्यमों के समक्ष अस्तित्व की चुनौती के रूप में देखना सही नहीं होगा। तमाम संकटों के बावजूद लोक कविता अगर आज भी जीवित है तो कोई कारण नहीं कि डिजिटल युग में वह मिट जाएगी। यही बात मुद्रित कविता के लिए भी कही जा सकती है।  कहना न होगा कि डिजिटल के साथ मुद्रित और वाचिक माध्यमों का सह-अस्तित्व आने वाले समय में भी जारी रहेगा। बेशक साइबर-संस्कृति  मज़बूत होगी और कविता उसके साथ ज़रूरी तालमेल बिठा लेगी

.

कमेंट बॉक्स में इस लेख पर आप राय अवश्य दें। आप हमारे महत्वपूर्ण पाठक हैं। आप की राय हमारे लिए मायने रखती है। आप शेयर करेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।

लेखक साहित्य-संस्कृति से सम्बन्धित विभिन्न विषयों पर पिछले 25 वर्षों से लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क +919981064205, jaiprakash.shabdsetu@gmail.com

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments


डोनेट करें

जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
sablog.in



विज्ञापन

sablog.in






0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x