कर्म
सिनेमा

नेपोटिज्म, बहिष्कार और ‘कर्म’ का लेखा-जोखा

 

सिनेमा प्रेमी ऑस्कर के महात्म्य से परिचित हैं हमारी भी दिली इच्छा है कि विदेशी फ़िल्मों की श्रृंखला में भारतीय फिल्म अवार्ड लाये अब तक कई भारतीय फ़िल्म बेस्ट पाँच में नामांकित हुई भले ही अंतिम पायदान पर न पहुँच सकी।पर क्या आप जानतें हैं, कि रणबीर कपूर की एक शोर्ट फिल्म ‘कर्म’ ऑस्कर के अंतर्गत छात्र अकादमी पुरस्कार के लिए नामांकित हो चुकी है? वो भी स्टूडेंट्स ऑस्कर अवार्ड 42 में 2004 में! हाँ, वह भी विजित न हो पाई,आपका नहीं पता किन्तु मेरे लिए तो यह बिलकुल नई जानकारी थी जो अच्छी फ़िल्मों की खोज के दौरान मुझे  मिली। युवाओं के प्रोत्साहन हेतु ‘ऑस्कर’ Students Academy Awards SAA यानी छात्र अकादमी पुरस्कार भी देती आ रही है। (https://www.oscars.org/saa) 1972 में स्थापित यह एक अंतरराष्ट्रीय छात्र फिल्म प्रतियोगिता है जिसमें हर साल, दुनिया भर के कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्र प्रतिस्पर्धा करते हैं, फिल्मों को एनिमेशन, वृत्तचित्र, लाइव एक्शन नैरेटिव,शोर्ट फ़िल्म और वैकल्पिक/प्रयोगात्मक श्रेणियों में आंका जाता है ताकि कॉलेज स्तर पर फिल्म निर्माण में उत्सुक, उत्कृष्टता समर्थन और प्रोत्साहन मिले। ‘छात्र अकादमी ऑस्कर 2022’ के लिए प्रतिस्पर्धा करने के लिए दुनिया भर के 614 कॉलेजों से लगभग 1,800 प्रविष्टियां मिलीं।

तो अब बात रणबीर कपूर की शोर्ट फिल्म ‘कर्म’ की, जो वास्तव में शरत सक्सेना की अधिक है, यह फिल्म एक जेलर बाप (शरत सक्सेना) और उसके अपराधी बेटे (रणबीर कपूर ) के संबंधो की विडंबना, दुविधा और द्वंद्व को मार्मिक ढंग प्रस्तुत करती है,जब एक पिता को अपने ही बेटे को फाँसी पर लटकाना उसका कर्तव्य है। इसे कई प्रसिद्ध अखबारों हेडिंग दी कि ‘रणबीर कपूर की पहली लघु फिल्म जो ऑस्कर नामांकित थी कर्म, उसे बांद्रा फिल्म समारोह में प्रदर्शित किया गया’ फ़िल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है। 2004 में बनी इस फिल्म को बी आर चोपड़ा के पोते अभय चोपड़ा ने डायरेक्ट किया था, जबकि रणबीर और अभय दोनों एकसाथ फ़िल्म छात्र थे। इस फिल्म को अब तक 727,862 मिल चुके हैं 2004 में बनी इस फिल्म को 5 मई 2021 में रिलीज किया गया जिस पर 1,100 कमेंट दिखाई दे रहे हैं। अधिकतर कमेंटस में रणबीर के फैन्स इस फिल्म में उनके अभिनय को देखकर, रणबीर कपूर को ‘मुख्य अभिनेता’ यानी हीरो इमेज से जोड़ते हुए उन्हें भविष्य में ऑस्कर मिलने की बात भी करते हैं कि उन्होंने 2004 में जिस फिल्म से अपने करियर की शुरुआत की वह ऑस्कर नॉमिनेटेड थी। जबकि मेरे सामने मुख्य प्रश्न था कि इतने दिनों तक ऑस्कर नॉमिनेटेड इस मूवी को प्रदर्शित क्यों नहीं किया गया। और दूसरा प्रश्न यह है कि 2021 में ही इस फिल्म को क्यों रिलीज किया गया?

अब बात नेपोटिज्म की,जिसे हिंदी में भाई भतीजावाद कहा जाता है जो कि पक्षपात का ही एक रूप है जिसे हम हमेशा हर क्षेत्र में देखते आयें हैं बिजनेस, राजनीति, शिक्षा या फिर मनोरंजन आदि। जब कोई सुविधा आपको सिर्फ इसलिए मिल जाती है कि आपके रिश्तेदार, आपके दोस्त आप पर भरोसा करके करते हैं, आपको मुख्य काम देते हैं तो यह नेपोटिज्म कहलाता है।पर फ़िल्मों के सन्दर्भ में आजकल यह शब्द अधिक लोकप्रिय हो चुका है जिसने बॉलीवुड के बहिष्कार नीति की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार की। ‘सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या’ केस के बाद फिल्म जगत में नेपोटिज्म पर लंबी चौड़ी बहस शुरू हो गई, स्टार-किड्स पर सीधा निशाना साधा गया कि यहाँ प्रतिभाशाली कलाकारों को अवसर नहीं दिए जाते, नेपोटिज्म के चलते अनेक योग्य,प्रतिभावान कलाकार अयोग्य घोषित कर दिए जाते हैं, नेपोटिज्म से निसृत ग्रुपिज़्म, फेवरेटिज्म ने अवार्ड्स पर भी कब्ज़ा किया हुआ है,पहले किसी स्टार किड को लांच किया जाता है फिर उन्हें नव-प्रतिभा सरीखे पुरस्कार से नवाज़ा जाता है। बेहतरीन भूमिका,सिंगर,निर्देशक आदि के लिए, आपको इसलिए भी है अवार्ड मिल जाते हैं क्योंकि आप किसी के बेटे, बेटी, भाई, गर्लफ्रेंड आदि आदि हैं, सही में जो उसका हकदार है उसे पुरस्कार नहीं मिलता क्योंकि पैमाना अधिकतर कमाई और लोकप्रियता होती है।

फिलहाल करण जौहर इस मुद्दे को लेकर सबसे ज्यादा सुर्खियों में है कि वे स्टार किड्स को ही मौका देते हैं और उन्हें प्रमोट करते हैं तो करण जौहर का भी कहना है कि ‘मैं पैसा लगाता हूं तो उसकी वापसी की गारंटी भी तो होनी चाहिए, दर्शक स्टारकिड को देखना चाहते हैं’। वास्तव में यह मुख्य चेहरे (हीरो हेरोइन) पर विश्वास करना होता है जिसे देखने दर्शक पैसा खर्च करके जाता है, सारा खेल बॉक्स ऑफिस सफलता का है, जिसके अर्थ हैं यह फिल्म ख़ास चेहरों की वजह से हिट होगी, बॉक्स ऑफिस पर पैसा कमाएंगी। उन्होंने आलिया भट्ट को लांच किया था, उस पर आलिया भट्ट का कहना है कि ‘मैं जहां पैदा हुई हूं वहां उन चीजों को कैसे कंट्रोल कर सकती हूं, अपने काम से हम नेपोटिज्म की बहस को खत्म कर सकते हैं। गंगूबाई के बाद उनकी डार्लिंग फिल्म भी खूब पसंद की गई है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा रहा कि डार्लिंग फिल्म थिएटर के लिए ही बनी थी लेकिन बहिष्कार बॉयकट के डर से उसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया जो पसंद की गई।

सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद बहिष्कार का ट्रेंड चल रहा है उसे सिर्फ नेपोटिज्म यानी भाई भतीजावाद के संदर्भ में नहीं समझा जा सकता। क्योंकि सुशांत से पूर्व भी बहुत से स्ट्रगल गुमनामी के अँधेरे में खो गये तब सोशल मीडिया भी सक्रिय नहीं था पर सुशांत के वीडियोस सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हुए और दर्शकों के बीच सुशांत के प्रति सहानुभूति का माहौल बना, तो बॉलीवुड के प्रति विद्रोह। इसी समय कोरोना ने थिएटरों का भी दम घोंट दिया कुछ जान आई तो ओटीटी ने फंदा कसा और हिंदी में डबिंग दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के सार्थक कंटेंट और जय भीम के प्रहार ने सवर्ण मुख्यधारा से ओतप्रोत बॉलीवुड पर बहिष्कार ट्रेंड को मजबूती प्रदान की। लालसिंह चड्डा से यह ट्रेंड जोर पकड़ा और ब्रह्मास्त्र के समय तो विरोधियों ने सिनेमा के बाहर खड़े होकर लोगों को चेताया कि यह फिल्म न देखें। यह फिल्म सालों से बन रही थी और हजारों करोड़ खर्चा हो चुका था,तभी सम्भवत: अपने बचाव में बॉलीवुड को यह भुला दी गई फिल्म की याद आई ताकि यह प्रचारित प्रमाणित किया जा सके कि रणबीर एक बेहतर कलाकार है जो कि वे है भी। इसे बांद्रा फिल्म फेस्टिवल में यूट्यूब पर प्रदर्शित किया गया।  

अंत में ज्यादातर कमेंट रणबीर कपूर की प्रशंसा में, उनके अभिनय को बेमिसाल बताते हुए है कि वे ‘बोर्न एक्टर’ हैं। यानी खानदानी कलाकार, एक ने तो बोल्ड कैपिटल अक्षरों में लिखा है “किसी ने सही कहा है कि कपूर खानदान में बेटे नहीं बाप पैदा होते हैं” यह ऋषि कपूर ने कहा था और यह वक्तव्य नेपोटिज्म को बढ़ावा देने वाला है जो पितृसत्ता से संचालित है क्योंकि अपनी बेटियों को वे इस क्षेत्र में नहीं आने देते। ज्यादातर यूज़र्स का विचार है,जो कलाकार अपनी पहली फिल्म से ही इतना बेहतरीन अभिनय कर रहा है कि एकैडेमी में नामांकित हो रहा है, भविष्य में बहुत अच्छा काम करने वाला है लेकिन करण जौहर या भट्ट गैंग के चंगुल से उसको बचना चाहिए,रणबीर में बॉलीवुड का बादशाह बनने की क्षमता है। अगर बहिष्कार और नेपोटिज्म से जीतना है तो रणबीर को इसी तरह की फिल्मों में आना होगा। या फिर ये कि सोशल मीडिया में स्टार किड्स के बहिष्कार की जो मुहिम चलाई जा रही है, उन्हें यह फिल्म देखनी चाहिए पर यह रणबीर के प्रति उनके फैंस का प्रेम और आकर्षण अधिक है कि रणवीर अन्य स्टार किड्स तरह नहीं है, वे जन्मजात प्रतिभाशाली अभिनेता हैं, अभिनय उनकी रगों में है, निश्चित रूप से खून उनकी एक्टिंग में दौड़ता है यानी जिस तरह से हम अपनी रूचि और सुविधा के वशीभूत एक लड़की को मनुष्य न मानकर ‘वाइफ मेटेरियल’ कह देते हैं उसी प्रकार से फिल्मी बच्चों को ‘हीरो मेटेरियल’ कहने का पूर्वाग्रह है और यह पूर्वाग्रह फिल्मी दुनिया में स्टीरियोटाइप छवियों को गढ़ता है,बनाए रखता हैं। बहुतायत में किये गये ये कमेंट संदेहास्पद भी लगते हैं जो नेपोटिज्म के पक्ष में गढ़े गए प्रतीत होते हैं।

अब बात फ़िल्म की,फिल्म एक पिता की विवशता (यानी शरत सक्सेना) उसके अंतर्द्वंद्व और मार्मिक मोनोलाग से शुरू होकर उस पिता के अपने कर्मों के फैसले के मोनोलोग पर खत्म होती है। जब हम शरत सक्सेना के अभिनय कौशल पर मुख्य दृष्टि के रूप में डालते हैं तो आपका उनके स्वाभाविक अभिनय पर मंत्रमुग्ध हो ना लाजमी है यह उनके सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में से एक है। एक जेलर पिता के रूप में उनका द्वन्द्व रोमांचित करने के साथ-साथ विचारोत्तेजक भी है जहां आप यह सोचने पर विवश होते हैं कि ‘चाहे तो फांसी के रूप में किसी को मृत्युदंड दें अथवा खुद किसी को मारा जाए दोनों में क्या अंतर है दोनों ही जगह हमारी संवेदनाएं मृतप्राय होती हैं’। इस दृश्य में वे लाजवाब है उनकी उपस्थिति में यह फिल्म बहुत बेहतर बन पाई। कब हमारी आंखों में आंसू क्यों बह निकलते हैं पता ही नहीं चलता, हर इंसान संवेदनशील होता है और इसी संवेदना को उद्वेलित करना ही कला, साहित्य,फिल्म का काम होता है। फिल्म में पिता अपने पुत्र के प्रति प्रेम और कर्तव्य के प्रति अनुशासन से बंधा है कुछेक संवाद और दृश्य पिता और पुत्र के संबंधों को अत्यंत मार्मिक और संवेदनशीलता से प्रस्तुत करतें है जिसमें शरत सक्सेना के साथ-साथ रणबीर सिंह दोनों का ही असाधारण अभिनय दिल को छू लेने वाला है।

फिल्म की कहानी इंसानियत की बात करती है कि मौत की सजा कोई विकल्प नहीं। 25 साल से लगातार फांसी की सजा के लिए जेलर पर जब अपने बेटे को फांसी देने की बात आती है तो वह हार जाता है।एक पिता की भावनाओं को भीतर तक महसूस कर पाते हैं जिसकी विवशता हमें भीतर तक रुला देती है। एक दृश्य में जब प्रेम-स्नेह से वशीभूत जब विवश पिता जेलर कर्तव्य भूल कर उसके पास जाता है, तो उस समय रणबीर पर कोई लाइट नहीं उस पर अंधकार में छाया हुआ है,जो निराशा का प्रतीक है फिर उसका पिता उसको बंदूक देता है कि तुम भाग जाओ तो अचानक उस रोशनी आती है तब वह ‘अब मुझे किसी बात का डर नहीं लग रहा क्योंकि अब मुझे मेरे पिता मिल गए हैं’। इसी तरह अंत में जब है पानी मांगता है तो कहीं ना कहीं पानी जीवन का प्रतीक है, वह जीना चाहता है और वह पिता के हाथों पानी पीता है,  पिता के जिस प्रेम से वह अब तक वंचित था वह से मिल गया था। फिल्म का नाम कर्म क्यों रखा अंतिम मोनोलोग से समझ आता है अपने ही बेटे को फाँसी देने का बाद उसे लगता है ये मेरे कर्मों का फल है शायद ‘आज पहली बार मैंने जाना किसी की जान लेना क्या होता है पहली बार एहसास हुआ किसी की जान जाने पर किसी की जान पर क्या गुजरती है पिछले 25 सालों से जैसे अपनी ड्यूटी समझकर मैं काम करता रहा, क्या वह सच मुझे ड्यूटी थी! किसी की उसकी जिंदगी छीन लेना ड्यूटी कैसे हो सकती है? किसी की जान लेने का अधिकार किसने दिया? यही सब तो एक कातिल भी करता है, फिर मुझ में और कातिल में फर्क रह गया?’

अब वह जिज्ञासा कि फिल्म 2004 में स्टूडेंट अकादमी पुरस्कार (ऑस्कर) नॉमिनेटेड हुई थी तो सांवरिया से प्रदर्शन के पूर्व 2007 में इस पर कभी कोई बात क्यों न हुई, मुझे इसकी जानकारी  नहीं, संभवत: 2007 में जब उन्हें लॉन्च किया गया कोई भी बड़ा निर्देशक ही उनको लॉन्च करता और वह नहीं चाहता कि उनकी भव्य फ़िल्म का हीरो किसी भी प्रयोगात्मक शॉर्ट फिल्म का हिस्सा रहा है फिर ‘फ्रेश फेस’ का क्रेज़ भी खत्म हो जाता है,करोड़ो बजट की फ़िल्म को अंडर एस्टीमेट किया जा सकता था। और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण तथ्य कि यह फिल्म रणबीर कपूर से ज्यादा शरत सक्सेना की थी सारी लोकप्रियता उनकी झोली में जा सकती थी और रणबीर की पहचान सेकंड्री हो जाती क्योंकि तब उन्हें कोई नहीं जानता था,और यहीं हमें बॉलीवुड का भेदभाव नजर आ जाता है,जो एक चरित्र कलाकार के पूर्वाग्रहों से निकल कर उन्हें मुख्य कलाकार के रूप में कभी प्रतिष्ठित नहीं करता। मैं गूगल पर शरत से सम्बन्धित ख़बरों व विकिपेडिया आदि में खोज कर रही थी कि शायद इस फिल्म का जिक्र आ जाए पर नहीं मिला। खैर,कभी प्रिंट मीडिया में शरत सक्सेना ने इस फिल्म का और ऑस्कर का जिक्र किया हो नहीं मालूम। कमेंट्स में भी शरत के अभिनय की गहराई और तीव्रता पर कुछ गिनती का लिखा हुआ था जबकि वे प्रशंसा के सबसे पहले हकदार हैं इसलिए भी नेपोटिज्म पर बात करना जरूरी लगता है दूसरे हीरो या नायक के साथ सह-कलाकार शब्द का प्रयोग उनकी भूमिका को कमतर कर देता है और इस तरह से उन्हें हमेशा गौण भूमिका के रूप में काम करके संतुष्ट रहना पड़ता है, आर्थिक विवशताओं के चलते इस तरह के शानदार कलाकारों का सर्वश्रेष्ठ कहीं दब जाता है,अपनी अलग पहचान बनाने के लिए उनकी उम्र गुज़र जाती है। इसी तरह नए नवयुवक युवतियाँ सितारा बनने का सुनहरा सपना लिए आते हैं लेकिन वे अपने शोषण को चुपचाप सहते हैं कि कभी तो उनका भाग्य जरूर चमकेगा , विडम्बना है कि असफल होने पर वे अपने घरों को वापस नहीं लौटते कि उन्हें हँसी का पात्र बना दिया जाएगा।

अगर रणबीर कपूर की बात है तो जिस प्रकार एक दुकानदार अपने बेटे को गल्ले पर बैठता है, अलग से उसे कोई ट्रेनिंग नहीं देता वह खुद ही सीख लेता है, उसका अर्जित ज्ञान होता है फ़िल्मी दुनिया के बच्चे भी इसी तरह से सब कुछ खुद-ब-खुद सीख लेते हैं उनको अलग से कोई ट्रेनिंग की जरूरत नहीं होती और इसमें कुछ गलत भी नहीं लेकिन अफ़सोस तब होता है जब नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा जैसे उच्चतम संस्थानों से आये नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी, इरफ़ान खान जैसे अनगिनत कलाकारों को स्ट्रगल करना पड़ता है जिनमें कुछ ही सफल हो पातें हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शरत जैसे मंझे हुए अनुभवी कलाकार के साथ पहली ही फिल्म में रणबीर ने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है जो उन्हें आत्मविश्वास के साथ अपनी फिल्मी पृष्ठभूमि यानी से मिला है जिसमें एक चुनौती भी होती है जो किसी प्रेशर से कम नहीं होती।

फ़िल्म एक फाँसी संवेदनशील सामाजिक मुद्दे को उठाती है और सभी ने विषय के साथ न्याय भी किया है मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाली फ़िल्म की थीम और कंटेंट पर यदि कोई सामान्य बॉलीवुड की फिल्म बनाई जाती तो हमें 26 मिनट के के बजाय दो ढाई घंटे का बकवास मसाला झेलना पड़ता, जिसमें जबरदस्ती के दृश्य के साथ नायिका भी होती गीतों की अनिवार्यता भी बड़ी आसानी से डाली जाती। इसलिए तो मुझे लगता है कि स्टार किड्स या अन्य नायकों को भी इस तरह की शॉर्ट फिल्म्स से शुरुआत करनी चाहिए और इसे ऐसे वर्कशॉप की तरह मानना चाहिए ताकि उनकी अभिनय में निखार और अच्छे कंटेंट की रूचि में भी परिष्कार हो एक अच्छी फिल्म बनाने की समझ विकसित हो और इतिहास गवाह है कि अच्छी फ़िल्में फ्लॉप होने के बाद भी हमेशा याद की जाती है।ऐसी फ्लॉप लेकिन अच्छी फिल्मों पर फिर कभी

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लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com

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