पुस्तक-समीक्षा

‘महज़ आदमी’ वह जो खास नहीं, आम है

 

अनिल किशोर सहाय चुपचाप काव्य की गलियों में यात्रा करनेवाले साहित्यकार हैं। बिना शोरगुल, दिखावे के कुछ सार्थक रचते रहनेवाले शान्त कवि। लेकिन उनकी कविताएँ बोलती हैं। यह उनकी पुस्तक ‘महज़ आदमी’  से गुजरते हुए महसूस होता रहा।  कार्यक्रम अधिशासी के तौर पर देश के विविध, महत्वपूर्ण आकाशवाणी केंद्रों में कार्यरत रहे अनिल जी एक सजग लेखक भी हैं। सम्पादक भी रह चुके हैं। ‘महज़ आदमी’ संग्रह के अनेक काव्य रचनाशीलता की कसौटी पर खरे उतरते हैं। आदमी की बात शिद्दत से करते हैं।  ‘शहर में साँप’ का एक कवितांश देखें –

साँप तो शहर में भी हैं /कहीं समतल में /तो कहीं झाड़ियों में /और कहीं कंक्रीट के जंगल में /डर तो उन आस्तीनों के साँपों से है /जो हर जगह बसते हैं। 

यह कविता अपनी बात स्वयं पुरजोर तरीके से कह रही है, निःशब्द करती हुई। एक अन्य कविता में जब कवि कहता है – यह जरूरी नहीं मेरे दोस्त कि/कुछ अनोखा कर गुजरने के लिए /तुम्हें चाहिए लम्बी उम्र /और सही वक्त की तलाश में /गुजर जाए सारा महत्वपूर्ण समय तो आशावादी स्वर प्रेरणा का संचार करते हैं। मनुष्य को अपने पर सहज विश्वास जगाने की कोशिश करता है कवि – जीवन के रेगिस्तान में  /जलप्लावन और /विचारों की आँधी के साथ तुम्हें जमाने हैं /ढेर सारी दूब /नागफनियों के बीच…इस संग्रह की ऐसी ही अनेक रचनाओं में कवि का गम्भीर, चिन्तनशील, आम आदमी और इंसान के प्रति जिम्मेदार, संवेदनशील और आशावादी मन खुलता है। ये कविताएँ महज आदमी और आदमियत की बात करती हुई महत्वपूर्ण हो जाती हैं। 

‘बहनें’, ‘माँ और पिता’, ‘भाई : दो कविताएँ’ आदि रिश्तों की बानगी पेश करती हैं। यूँ तो ये कवि की व्यक्तिगत अनुभव से उपजी हैं लेकिन हमारे आस-पास ये अभिन्न रिश्ते हमारा वर्तमान, भूत, भविष्य गढ़ते रहे हैं और हमारे मन के आकाश में ऐसी जगह बनाए रखते हैं कि उन पर बातें करना न सिर्फ अच्छा लगता है, बल्कि सरसता देता है। अतः बहुत अपनी सी लगतीं कविताएँ हैं ये, सबकी बात कहती हुईं। 

‘महज़ आदमी’ संग्रह की कविताएँ भाषाई चमत्कार, जादुई यथार्थ, अतिरिक्त बिंबादि का कोई दावा किए बिना हौले से सहज-सरल आदमी की बात करती हैं। बहुत ही सहज ढंग से यथार्थ, संघर्ष की अनगिन परतें खोलतीं हैं। चिंतन से उपजीं, चिंतन को विवश करती हैं ये- जब गाँव के लड़के/ सड़क की किसी पुलिया पर बैठकर / बतिया रहे होते हैं / या लगा रहे होते हैं ठहाके / अर्थहीन बातों पर ..ठीक उसी समय घरों के भीतर/ गाँव की लड़कियाँ/ जूझ रही होती हैं अग्नि देवता से।

पुस्तक के शीर्षक से ही इंसानियत के पक्ष में खड़ी रचनाओं का आभास होता है। ‘गरीबी’,’ बंद मुट्ठी’, ‘तत्पर’, ‘सूनी सड़क पर औरतें’, ‘ज़मीन’ आदि कविताओं में यह महज आदमी सहज ही नज़र आ जाता है। पहली ही कविता ‘ आदमी की लड़ाई ‘ प्रतिरोध का स्वर रचती है। लड़ाई में साथ देती है। कविता शुरू होती है इन स्वरों के साथ – मैं वर्षों से सोच रहा था कि आदमी/अगर अपनी लड़ाई शुरू करना चाहे /तो कहाँ से शुरू करे और कविता का अंत इस दृढ़ता के साथ होता है – नहीं , आदमी अपनी लड़ाई जरूर शुरू करे

कवि अनिल जी जयप्रकाश नारायण जी के आन्दोलन में मात्र एक द्रष्टा की तरह शामिल नहीं रहे हैं। उन्होंने बिहार के बहुचर्चित जे. पी. आन्दोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। उसकी याद स्वाभाविक रूप से कविता में उतर आई है – मैं था चश्मदीद गवाह/ घटना मेरे सामने घटी थी/ एक बूढ़ा आदमी तानाशाही की लाठी खाकर / गिर पड़ा था बीच सड़क पर। ‘ चार नवम्बर उन्नीस सौ चौहत्तर’ आह्वान करती हुई लम्बी कविता है। इस लम्बे काव्य में जे. पी. आंदोलन में क्रांति की तपिश, छात्रों की उपस्थिति और जयप्रकाश नारायण को प्रत्यक्ष महसूस किया जा सकता है –बहत्तर बरस का वह बूढ़ा जोश से भरा था  /जिसकी थाती थे वे असंख्य नौजवान /जो लगा रहे थे नारे…जे. पी. आंदोलन के समय सक्रिय भागीदारी ने एक बेहतरीन कवि की कलम को और धार दी है। इसी के साथ , ‘तुम जगो’, ‘इरादा अपना’ ‘अपना- अपना नसीब’ जैसी यथार्थ की जमीन पर उगीं रचनाएँ सोचने को विवश करती हैं। 

अपने कथ्य में बेजोड़ कविताई तनाव, उपेक्षा का दण्ड झेलते मनुष्य के पक्ष में खड़ी होकर मनुष्यता को स्थापित करने की जद्दोजहद से लगातार जूझती है। कितनी आसानी से आम आदमी की तकलीफदेह स्थिति, संघर्ष को मुकम्मल स्वर देती रचना है ‘वह एक क्षण’- आदमी हर क्षण टूटता हुआ जीता है /और यह भी कि  /आदमी जब ठहाके लगाता है /एक साजिश करता है

विविधता इस संग्रह की खासियत है। चाहे प्रकृति की बात कहती ‘नेतरहाट जाते हुए’, ‘सूरज’  हो, ‘वसंत आया है’, ‘सुखद संध्या’  या फिर  ‘तुम’। बड़े ही कोमल बिम्ब से सूरज की उपस्थिति दर्ज करता है कवि- मुँह अंधेरे लाल मुँह वाला / एक शिशु जागा / दैहिक ताप और ऊर्जा से भरा / अँधेरा छंटा और प्रकाश बिखरा ।  आशावादी स्वर भी बहुत मुखर है यहाँ। कोलाज सा रचा है विभिन्न आस्वादवाली कविताओं का। जीवन के कई रंग एक साथ बोल रहे हैं।  

मनोरंजन, जुगुप्सा, श्रृंगार आदि की उपस्थिति यहाँ नहीं मिलेगी। यहाँ मिलेगी जीवंत जीवन की तस्वीर। विविध रंगों का कोलाज मन को बाँधने में सक्षम। 59 जनपक्षधर, समाजोन्मुख और विविधवर्णी कविताओं से सजी पुस्तक पठनीय है। छपाई-सफाई बढ़िया, प्रिंट की अशुद्धियों से मुक्त। प्रसिद्ध  कलाकार गौतम सेनगुप्त रचित सुन्दर आवरण विषयानुकूल। 

किताब : महज़ आदमी 
विधा  :  काव्य 
कवि : अनिल किशोर सहाय 
प्रकाशक :  विकल्प प्रकाशन 
मूल्य : 250 /-

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लेखिका उपन्यासकार, कहानीकार, लघुकथाकार एवं कवयित्री हैं। सम्पर्क +919431701893, anitarashmi2@gmail.com

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