सामयिक

उम्मीद की लालटेन

 

महामारी का यह समय मानसिक उलझनों में आदमी को इस कदर झोंक चुका है कि चाहकर भी हम उन उलझनों से बाहर नहीं आ सकते। हर दिन कोई न कोई अशुभ समाचार सुनने को हम अभिशप्त हैं। दिन भर में कम से पाँच सात ऎसी दुखद खबरें हमें मिलती हैं कि उन खबरों से हमारा खुद का जीवन अस्त व्यस्त होने लगता है। सोचिये कभी कि इन खबरों से जो परिवार सीधे संलग्न हैं उन पर क्या बीत रही होगी। उनका जीवन कितना अस्त व्यस्त होता होगा।

हम मनुष्य हैं इसलिए ऎसी घटनाओं से खुद को संलग्न करते हुए उससे उपजी पीड़ा को सहज ही महसूस कर सकते हैं। यद्यपि इस संक्रमणकालीन समय ने परपीड़ा को महसूस कर पाने के मनुष्य के उस मानवीय गुण पर ही गहरा आघात किया है, ऐसे में आपसी सम्बन्धों के सामाजिक ताने बाने का भूगोल ही छिन्न भिन्न हो गया है। ‘घर पर रहें और सुरक्षित रहें’ जैसे वाक्यांश की गूँज को इस कदर हमारे दिलों दिमाग में ठूंस दिया गया है कि हमने हर किसी से दूरी बना लेने को अपने सुरक्षित होने का सूत्र वाक्य मान लिया है। जब हम किसी चीज को मान लेते हैं तो उसके अनुसार आचरण भी करते हैं भले ही वह मानव रोधी आचरण ही क्यों न हो।

 महामारी जब जीवित बचे रहने की चुनौती बनकर आती है तो मनुष्य को सबसे पहले स्वार्थी और मानव रोधी आचरण हेतु उकसाती है। समाज का ताना बाना ध्वस्त होने लगता है। मनुष्य केवल और केवल अपने बारे में ही सोचने लगता है। काम-धन्धे सब स्थगित हो जाने से आर्थिक समस्याएं आती हैं जिसके कारण छोटे बड़े अपराध भी होने लगते हैं। जब अपने आप में मनुष्य केन्द्रित होने लगता है तब वह कई तरह का विपरीत आचरण करता हुआ सामने आता है। मेरा अपना खुद का अनुभव है कि किसी कॉलोनी या मोहल्ले में किसी  परिवार का सदस्य जब वायरस से संक्रमित होता है तो वह परिवार पूरे कॉलोनी की नजर में अपराधी बन जाता है।

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उस परिवार के प्रति लोगों के व्यवहार में एकाएक अमानवीयता घर करने लगती है जैसे कि वह परिवार लोगों के जीवन के लिए खतरा बन कर उभरा है। सोचिये कि जो परिवार किसी महामारी की चपेट में हो उसका अपना दुःख और उसके सदस्यों की मानसिक अवस्थाएं कैसी होती होंगी? ऎसी स्थिति में उसके आसपास के लोगों का अमानवीय व्यवहार उस परिवार के मनोबल को भीतर से और तोड़ने लगता है। विपत्ति के समय सहायता देने के बजाय उसे तकलीफें पहुंचाने का यह अमानवीय आचरण इस महामारी का सबसे स्याह पक्ष है।

आम लोगों को सरकार या तन्त्र से जो उम्मीदें होती हैं उसके पूरे होने की गुंजाईश तो क्षीण है पर लोगों के आपसी सहयोग की गुंजाईश का समाज में बचे रहना हम सबके लिए कितना जरूरी है। यही तो उम्मीद की वह लालटेन है जिसके उजाले से अँधेरे समय के रास्तों को हम पार करते आये हैं। उम्मीद की इस लालटेन को ही हमने अगर बुझा दिया तो रास्ते तो यूं ही कठिन हो जायेंगे। इस कठिन समय में जाति धर्म भूल कर कईयों ने तन मन धन से त्याग की बहुत सी मिशालें दी हैं जो हमारे भीतर की उस उम्मीद को आशान्वित करता है।

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इस महामारी में चिकित्सकों ने जो योगदान दिया है वह तो अतुलनीय है पर कईयों ने इस आपदा को एक अवसर की तरह मानकर इसे अर्थोपार्जन का टूल भी मान लिया है, ऐसे समय में जब कि लोग भारी आर्थिक तंगियों से गुजर रहे हैं, उन्हें चाहिए कि वे बिना किसी आर्थिक अपेक्षा के टेलीकांफ्रेंसिंग के जरिये ही सही, पीड़ितों का मार्गदर्शन कर समाज में अपनी सार्थक उपयोगिता को साबित कर सकते हैं। अर्थ कमाने के अवसर तो मनुष्य के जीवन में हमेशा आते हैं पर सेवा के अवसर बहुत कम मिलते हैं|

इसलिए भी हर अवसर को उसी रूप में न लिया जाए बल्कि किसी अवसर को सेवा का रूप भी मिले। महामारी आपदा को अवसर में बदलने की अनगिनत घटनाएँ भी साथ लाती है, ऐसा हम कई जगह देख भी रहे हैं। खुद तन्त्र ही इसका एक बड़ा उदाहरण है, पर जो मनुष्य होने की तरह सोचते हैं वे इन धारणाओं को अपने आचरण से ध्वस्त कर सकते हैं। ऐसे लोग ही कठिन समय में उम्मीद की लालटेन की रोशनी से समाज को रास्ता दिखाते हैं।

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लेखक व्याख्याता और साहित्यकार हैं। सम्पर्क +917722975017, rameshbaba.2010@gmail.com

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