सामयिक

क्या लोकतन्त्र बहुमत का बन्धक?

 

 देश के सामने इस समय जो गम्भीर संकट है उसे देशवासियों को पहचानना और समझाना बेहद जरूरी है। देश के इतिहास में शायद पहली बार हुआ है कि जब सत्तारूढ़ पार्टी संसद में किसान विरोधी और मजदूर विरोधी कानून राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण विपक्ष के मत विभाजन की माँग को ठुकरा कर शोर-शराबे और हंगामे के बीच पारित करवाये हों। इसके विरोध में बीजेपी की लम्बे समय से रही सहयोगी पार्टी अकाली दल की केन्द्रीय मन्त्री सिमरत कौर ने न सिर्फ अपने मन्त्री पद से स्तीफा दिया बल्कि उनके अकाली दल ने भी सरकार और बीजेपी से नाता तोड़ लिया है। किसानों के खिलाफ पारित इन काले कानूनों के विरोध में अकाली दल सड़क पर उतर आया। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, तेलंगाना, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली या यों कहें तो कश्मीर से कन्या कुमारी तक पूरे देश में नागरिकता संशोधन कनून के विरोध की तरह देश का किसान सड़क पर हैं। इस मुद्दे पर सम्पूर्ण विपक्ष एक स्वर से सरकार के इस घ्रणित जनविरोधी कृत्य के खिलाफ एक जुट दिख रहा है। पर सी ए ए की तरह सरकार अपने फैसले से एक कदम पीछे हटने को तैयार नहीं है।

बीजेपी की वैचारिक सहयोगी पार्टी शिवसेना पहले से इनसे नाता तोड़ चुकी है। नागरिता संशोधन कानून की तरह सरकार को इन काले कानूनों को पारित कराने की क्रोनोलोजी और आडीओलोजी को पूरा देश समझ गया है वरना जिन कानूनों को देश और उसके नागरिक नहीं चाहते है उन्हें पारित कराने की हड़बड़ी में क्यों है सरकार? देश की जन -इच्छा को दर किनार कर सिर्फ और सिर्फ कार्पोरेट हित साधना ही मौजूदा केंद्र सरकार का ध्येय बन गया है। इनके लिए देश सिर्फ कार्पोरेट और उनके हित हैं। उन्हीं के कर्ज और टैक्स माफ़ होंगे और उन्हें के इशारे पर उन्हीं के हित में यह काले कानून पारित होंगे। देश की सीमाएं घिरी हुई हैं और देश अपना आर्थिक और नैतिक खोखलापन दिखा कर किसके बूते अपने दुश्मन देशों से लड़ेगा? इन हालत में सेना का भी मनोबल टूटता है क्योंकि सेना में कार्पोरेट, नेताओं और ब्यूरोक्रेट के बच्चे नहीं है वहाँ भी किसानों मजदूरों और माध्यम वर्गीय समाज के बच्चे हैं। इसीलिए आये दिन सैन्य बालों में असंतोष फूटता दीखता है जिसे निरंकुशता से दबा दिया जाता। उनका एक रैंक सामान वेतन का वादा भी जुमला बन गया है।CAA: Supreme Court sets up mediation team to speak to protestors at Shaheen Bagh

   सीएए को लेकर जिस तरह पूरा देश उबल पड़ा था और जिसे देश की महिलाओं ने पूरे देश को शाहीनबाग में तब्दील कर दिया था आज उसी तरह किसान सड़क पर है। इस घोर संक्रमण काल में भी किसान अपनी जान की परवाह किये बगैर सरकार के खिलाफ़ सड़क पर प्रतिरोध की मशाल लिए खड़ा है। यह किसानों के जीवन मरण और अतित्व का मामला है। सरकार देश के किसानों को कार्पोरेट का गुलाम बनाना चाहती है और इन कानूनों ने बना दिया है। सरकार कार्पोरेट द्वारा उनकी जमीन हड़पने का रास्ता खोल चुकी है। अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड कर किसानों के उत्पाद बिक्रय हेतु सरकार कार्पोरेट के सुपर्द करना चाहती है। सबसे गौरतलब बात यह है कि सरकार ने इन कानूनों में कम्पनियों के खिलाफ़ अपनी समस्याओं या अपने खिलाफ होने वाले अन्याय के खिलाफ़ किसानों को न्यायलय जाने पर रोक लगा रखी है। इससे सरकार की मंशा को स्पष्ट तौर पर समझा जा सकता है। यही हाल मजदूरों के साथ भी है। यानि सस्ता श्रम और सस्ती जमीन पर कार्पोरेट ठेका खेती करेगा। किसानों से उनकी जमीन पर मन चाही फसल पैदा करने का एक लम्बी अवधि का करार करेगा। कुछ पैसा देगा कुछ उधार करेगा जिसका ज्वलन्त उदाहरण है गन्ना किसानों का बकाया सालों साल नहीं चुकता। किसान अपनी जमीन पर मजदूर हो जायेगा जिसकी मजदूरी भी कम्पनी तय करेगी। कम्पनियाँ अक्सर घाटा दिखा कर बन्द हो जाती हैं तब किसानों के भुगतान फंसेगे और वह भिखारी बन कर दर दर भटकेगा। कंपनियों के मामले में सरकार हाँथ खड़ा कर देगी और न्यायालय के दरवाजे कानून ने पहले बन्द कर रखे हैं।

     सवाल है लोकतन्त्र में बहुमत की सरकारें पहले भी रहीं हैं इनसे बड़े बहुमत की। नेहरू जी, इंदिरा जी और राजीव गाँधी के प्रचण्ड बहुमत के सामने इनके गठबन्धन का इवीएम के बूते हड़प हुआ बहुमत कुछ भी नहीं है। पर उन सरकारों ने देश पर कभी ऐसा हमला नहीं बोला। जनता सरकार को बहुमत इसलिए देती है कि सरकार सुविधा से बिना किसी बाधा के जनता और व्यापक देश हित में फैसले ले सके न कि जनता पर हमलावर हो कर देश को कार्पोरेट पूँजी का गुलाम बनाने के लिए। इसी बहुमत के बूते बैंको का राष्ट्रीयकरण और रजवाड़ों का प्रिवी पर्स खत्म किया गया था। देश को अभी तक आर्थिक मंदी से बचाया है राष्ट्रीयकृत बैंको और असंगठित क्षेत्र की अर्थव्यवस्था ने जिसमे खेती- किसानी और छोटे मझोले उद्योग शामिल हैं। बड़े उद्योग तो देश पर एन पी ए थोप कर आर्थिक बोझ ही रहे हैं। देश के सरकारी मुनाफा देने वाले औद्योगिक उपक्रमों जैसे बीएसएनएल, एचपीएल, ओएनजीसी आदि को लगातार सस्ते दामों में बेंचा जा रहा है। मोदी सरकार ने देश पर नोटबन्दी थोप कर और रिजर्व बैंक की स्वयतत्तता छीन कर बैंको को खोखला कर दिया और छोटे मझोले उद्योगों को मटियामेट कर दिया। अब उनका हमला किसानों और मजदूरों को निस्त्नाबूत करने के लिए है। इतनी जनविरोधी सरकार देश के अब तक के इतिहास में पहली बार देखने को मिली है। आज सरकार और जनता आमने-सामने है। यह देश के लोकतन्त्र की ऐतिहासिक बिडम्बना है कि दुनिया का सबसे बडे लोकतन्त्र को अपनी चुनी हुई सरकार के ख़िलाफ़ आज मैदाने जंग में दो-दो हाँथ करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। अब यह एक राष्ट्रीय बहस का मुद्दा है कि क्या देश का लोकतन्त्र बहुमत का बन्धक है? The challenge of the consolidated opposition unity

     यह राजनीतिक ठगई और जनता के विश्वास और भरोसे के साथ डंके की चोट पर छल करने की पराकाष्ठा का बेशर्म नमूना है। जब सारा विपक्ष एक जुट होकर इ वी एम पर सवाल खड़ा कर रही है और बैलट पेपर से चुनाव की माँग कर रही है तो सरकार को बैलट चुनाव कराने में क्या परेशानी है जबकि दुनिया के अधिकाँश विकसित देशों में बैलट से ही चुनाव करवाये जाते हैं उसकी वजह है इ वी एम में हैकिंग के जरिये या थोक में मशीनों की हेराफेरी कर वोट ट्रान्सफर की संभावना। अब तो सुप्रीम कोर्ट भी सरकारी पिंजड़े का तोता बन गया है जो राफेल घोटाला हो या इ वी एम का प्रकरण सब पर सरकार के फैसले पर मोहर लगा देती है। पर देश तो सुर्प्रीमकोर्ट, चुनाव आयोग और संसद से भी ऊपर। अगर ये सब मिल कर देश को बेंच दें तो क्या देश चुप बैठा रहेगा? इससे सरकार की नियत साफ जाहिर हो जाती है इवीएम के दुरपयोग करने की। इस समय देश में ऐसी राजनीतिक प्रव्रत्तियाँ पनप रहीं हैं जो लोकतन्त्र के नाम पर एकाधिकारवाद और तनाशाही को पोषित कर रहीं हैं। बीजेपी सरकार को किसी भी तरह की असहमति या विरोध बरदाश्त नहीं है। उन्हें अपने गैरबाजिब फैसलों पर भी सवाल खड़ा करना पसन्द नहीं है। बहुमत का अहंकार हर पल उनके सिर चढ़ कर बोलता है। जो घोटालों का विरोध करके आये थे सबसे बड़े घोटालेबाज निकले। उन्हें अपने अरबों-खरबों की लागत के कार्पोरेट प्रायोजित हाईटेक प्रोपोगंडा पर इतना गुमान है कि जनता का महत्व उनके लिए अब घास-फूस जितना ही है।

जनता परेशान है कि ये तो घोर ठग और बेईमान निकले। हर फैसला जनता के हितों के खिलाफ बहुराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कार्पोरेट घरानों के हित में। देश की प्राक्रतिक सम्पदा, किसानों की बहुमूल्य जमीन और मजदूरों के श्रम को सस्ता से सस्ता बेचने पर अमादा है। हमारे बडबोले और झूठ बोलने वाले जुमलेबाज प्रधानमन्त्री को देश का सारा हित कार्पोरेट पूँजी हित में ही दिखाई देता है। क्योंकि कारपोरेट पूँजी ही धनबल और इवीएम बल पर उन्हें सत्ता में लायी है। उस पर जनता को मुंह चिढाते निरा झूठ और फरेब से भरे सरकारी विज्ञापन टीवी, होर्डिंग और अखबारों में जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे की खुलेआम होली जलती जनता देखती कितनी लाचार महसूस करती है। विगत 06 सालों में मोदी सरकार की निरंकुश तानाशाही में देश का चौतरफ़ा नुक्सान हुआ है। औद्योगिक उत्पादन, निर्यात, जीडीपी में लगातार गिरावट हुई है और जीडीपी-23 फ़ीसदी तक गिर गयी जो एक ऐतिहासिक रिकार्ड है। बेरोजगरी, देशी-विदेशी कर्ज,गरीबी, किसान मजदूरों की बदहाली और शिक्षा की बदहाली में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है। बलात्कार की घटनाओं की तो जैसे बाढ़ आगयी हो जिसमें कई बार सरकार अपनी पार्टी के बलात्कारी सांसद, विधायक, कार्यकर्त्ता के बचाव में साफ़ खड़ी दिखती है रही है। हाथरस का बलात्कार काण्ड एक इसका ज्वलंत उदाहरण है। मौजूदा निजाम को लोकतन्त्र और उसके मूल्यों से इतनी नफ़रत है कि रिजर्व बैंक, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, सीबीआई को पिंजड़े का तोता बना छोड़ा है।लोकतंत्र में बहुमत का महत्व एवं सबके विकास सबके साथ और सबके विश्वास पर विशेष - स्वतंत्र प्रभात

    हमारे देश का लोकतन्त्र आज घोर अलोकतांत्रिक दौर से गुजर रहा है। हाल में जारी हुई इक्नोमिस्ट इन्टेलिजेंट यूनिट्स के अध्ययन के अनुसार वैश्विक लोकतन्त्र सूचकांक 2020 (ग्लोबल डेमोक्रेसी इंडेक्स 2020) के अनुसार भारत दस स्थान नीचे गिर कर 51 वे स्थान पर पहुँच गया है। इसमें अभिव्यक्ति की आजादी, चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता,नीति निर्धारण, सामाजिक सुरक्षा, बेरोजगारी में सुधार, आर्थिक बदहाली, जीवन की गरिमा और गुणवत्ता जैसे मुद्दों पर सर्वेक्षण कर दुनिया के 165 देशों की रिपोर्ट तैयार की गयी है। शीर्ष दस देशों में नार्वे, स्वीडन, आइसलैंड, न्यूजीलैंड, कनाडा, डेनमार्क,नीदरलैंड,फ़िनलैंड,आदि शामिल है। भूटान,नेपाल और बांगलादेश की स्थिति भारत से बेहतर है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की ग्लोबल हैपीनेस इंडेक्स -2020 यानि वैश्विक खुशहाली सूचकांक-2020 भी जारी हो चुका है जिसमे भारत की स्थिति 156 देशों में 144 नम्बर पर है और पाकिस्तान 66 नम्बर पर है। 2014 के बाद यह गिरावट लगातार देखी गयी है। फ़िनलैंड दुनिया का सबसे खुशहाल देश है इसके बाद डेनमार्क, स्विटजरलैंड, नार्वे, आइसलैंड, स्वीडन, नीदरलैंड जैसे देश हैं। यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र संघ जारी करता है जिसका अध्ययन आधार होता है सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संतुलन, सामाजिक एवं पारिवारिक शान्ति, जीवन की गुणवत्ता, आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा-स्वास्थ्य की स्थिति, स्वच्छ पारदर्शी एवं जबाबदेह प्रशासन जैसे मुद्दे।

  राजनीति विज्ञान लोकतन्त्र को जन-इच्छा के प्रतिनिधित्व और जनाकांक्षाओं के अनुरूप राज्य व्यवस्था को परिभाषित करता है। पर मतदाता तो बटन दबाने के बाद पाँच साल के लिए सरकार का बंधुआ हो जाता है। जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि जिसे जनता की इच्छा के प्रतिनिधित्व के लिए चुना जाता है, वह संसद और विधान सभा में जनाकांक्षाओं के परे अपने राजनीतिक और निजी हित के लिए काम करना शुरू कर देते हैं और फिर जनता के बीच जाते है बड़े-बड़े काफिले के साथ बड़ी–बड़ी गाड़ियों में जनता पर अपनी दबंगई और रौब झाड़ने। मौजूदा राजनैतिक ढांचा और परिद्रश्य घोर जन विरोधी और अलोकतांत्रिक है जो एक तरह के राजनैतिक सामन्तवाद को पोषित करता है। दुखद आश्चर्य है कि कोई राजनैतिक दल और राजनेता इस राजनैतिक संकट पर सोचने और बहस करने को तैयार नहीं है और न ही उनकी ऐसी चिन्ताएँ ही हैं। उसकी बजह है कि नेताओं के लिए यह लोकतन्त्र स्वर्ग है जहाँ लूट-खसूट और मनमानी करने का लोकतन्त्र है पर जनता के लिए घोर जहन्नुम जहाँ वह रोज तिल तिल मरती है। डॉ. आंबेडकर ने क्यों आर्टिकल-370 का ड्राफ्ट बनाने से किया था इनकार

   डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सौंपते वक्त लोकतन्त्र के लिए खतरे से सम्बन्धित जो चिन्ताएं व्यक्त की थीं जो आज फलीभूत हो रहीं हैं। डॉ. अम्बेडकर ने आगाह करते हुए कहा था कि जिस दिन वोट देश से बड़ा हो जायेगा उस दिन देश और लोकतन्त्र दोनों को बचाना मुश्किल होगा। आज वही परिघटित हो रहा है। कुछ अपवादों को छोड़ कर देश के किसी भी राजनैतिक दल में आंतरिक लोकतन्त्र नहीं है पर वे लोकतन्त्र की दुहाई देते नहीं थकते। देश में सम्वैधानिक नैतिकता लगभग तिरोहित हो चुकी है। आज हर राजनीतिक दल की एक ही चिन्ता है सत्ता और उसके लिए जोड़-तोड़ और किसी भी हद तक गिर कर उसे हासिल करने का लालच। उदितराज, अठावले पासवान जैसे अनगिनत उदहारण हमारे सामने हैं। आज प्रचण्ड बहुमत को लेकर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जिस तरह अहंकार में चूर हैं उसे लेकर सोचना पड़ेगा कि बहुमत की सरकार जनता के लिए किस तरह परेशानी का सबब बनती जाती हैं और जनता को भी अब सोचना पड़ेगा कि वह भविष्य में बहुमत की सरकार चुने या न चुने। मजबूत सरकारें निरंकुश हो कर जो व्यहवार कर रहीं वह निहायत अलोकतांत्रिक और मनमानी भरा है। जो बहुमत में हैं उन्हें मनमानी करने का संवैधानिक अधिकार है यह संविधान की नैतिकता और उसकी मूल भावना के खिलाफ़ है।

  अच्छे दिनों का आश्वासन देने वाली सरकार ने किसानों के काम आने वाले खाद-बीज की सब्सिडी में 10 फीसदी की कटौती की है। न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत मूल्य से बहुत कम है। भाजपा ने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने की बात अपने घोषणा पत्र में कही थी पर उससे भी मुकर गयी। सेवा कर बढ़ा कर महगाई को असमान की ऊंचाई पर पहुंचा दिया। मोदी ज़ी की सरकार न्यूनतम सरकार अधिकतम शोषण की नीति अपना रही है। बेशक उपयोगिता खो चुके पुराने नियम-कानूनों में बदलाव होना चाहिए पर जो कानून गरीबों को संरक्षण प्रदान करते हैं उनमें बदलाव का कोई औचित्य नहीं है। सरकार ट्रेड यूनियन कानून 1926, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, ठेका मजदूर अधिनियम 1970 में बदलाव और संशोधन कार्पोरेट के पक्ष में करने की तैयारी कर चुकी है। उनकी राय में ये कानून विकास में बाधा बनते है। मोदी ज़ी की पूरी मंशा देश में निर्बाध और निर्द्द्वंद कम्पनी राज (कार्पोरेट शासन) स्थापित करना है। एक कम्पनी राज को उखाड़ फेंकने में देश को दो सौ साल लगे थे और देश को अनगिनत कुर्बानियाँ देनी पड़ी थीं। बदले कानून के तहत कर्मचारियों की संख्या 300 तक होगी वह कम्पनी किसी भी कर्मचारी को कभी भी निकाल सकेगी सरकार कार्पोरेट हित में न्यूनतम वेतन कानून को भी ढीला कर चुकी है। कानून के बदलाव सबसे अधिक असर ट्रेड यूनियन पर पडा व है जिसमें श्रमिक संगठन कमजोर पड़ेगे और श्रमिक अधिकार सीमित होंगे।श्रम कानूनों में बदलाव के खिलाफ श्रमिक मंच का धरना - Bihar Katihar Local News

नये कानून के अनुसार श्रमिक संगठन बनाने के लिए कम से कम 100 कर्मचारियों की जरूरत होगी जबकि पुराने कानून में मात्र सात कर्मचारी श्रमिक संगठन बना सकते थे। श्रम सुधार की आड़ में श्रम कानूनों को मजदूरों के विरुध्द अमली जामा पहनाने की निरंकुश मुहीम है। अब तक श्रमिक कानून को ध्यान में रख कर दो श्रमिक आयोग देश में बने एक 1966 में और दूसरा भूमण्डलीकरण और उदारीकरण के सन्दर्भ में 1999 में। 1999 में बने वर्मा आयोग की सिफरिसें श्रमिकों के खिलाफ़ पूँजीपतियों के हित में हैं जो छटनी और तालाबन्दी का अधिकार पूँजीपतियों को सौंपती है। मोदी ज़ी और उनकी सरकार मेक इन इण्डिया के लिए श्रमिकों के हितों को दांव पर लगाने पर आमादा है और बहुमत की ताकत पर ही उनके ये मनसूबे पूरे होते दिखाई देते हैं। अब बहुमत के खतरे भी इस देश को उठाने होंगे जिसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तनाशाही की साफ झलक भी होगी। इसीलिए डॉ. अम्बेडकर विकास के पूरे एजेन्डे को संवैधानिक कानून के दायरे में लाने की बात कही थी ताकि कोई बहुमत की सरकार इसमें हेरफेर न कर सके। पर हमारे सामन्ती सोच के संविधान निर्माताओं ने उसे नहीं स्वीकार किया। उनके दस्तावेज “राज्य और अल्पसंख्यक” में इसका साफ उल्लेख है। वे बैंको, उद्योगों, कृषि, भूमि, शिक्षा, स्वास्थ्य के राष्ट्रीकरण की प्रस्ताव संविधान सभा में रख चुके थे पर उसे स्वीकार नहीं किया गया। देश के लोकतन्त्र और संसदीय राजनीति के निकम्मेपन और खोखलेपन के खिलाफ देश में “इन्डिया अंगेंस्ट करप्सन” जैसा देश व्यापी आन्दोलन अन्ना हजारे के नेतृत्व में खड़ा हुआ जिसने संसदीय राजनीति की निष्फलता पर सवाल उठाये और संसद के बाहर देश की जनता की आवाज को देश की वास्तविक आवाज के रूप में स्थापित करने में सफल हुआ। जनलोकपाल इसी आन्दोलन की कोख की उपज है जो परिस्थितियाँ बदलते ही राजनीति की भेँट चढ़ गया। केजरीवाल और उनकी कोट्री ने अपने राजनैतिक हितों में इसे कैसे भुनाया और राजनीति का चेहरा बदलने वाले कितने रँगे श्यार साबित हुए यह एक अलग शर्मनाक परिघटना है। ऐसा ही जे पी आन्दोलन के साथ भी हुआ।  मौजूदा परिद्रश्य से तो लगता है कि किसी भी राजनैतिक दल को बहुमत देना भी घातक सिध्द होगा।

सवाल है कि इस लाचारी का हल क्या है? सांसदों और राजनीतिक पार्टियों के व्यवहार, आचरण और कार्यकलापों को चुनाव आयोग के अधीन रखा जाय। सरकार में राजनेताओं को हटा कर विशेषज्ञों को रखा जाय पूरी जबाबदेही के साथ। लोकसभा का कार्यकाल दो या तीन साल रखा जाय ताकि जनता के सामने सराकर अच्छे परिणाम लाने के लिए तेजी से काम करे। चुनाव सरकारी खर्चे पर हों। चुनाव घोषित होने के पहले चुनावी दौरे सभाएं गैर क़ानूनी घोषित किये जाएँ। सांसदों और विधायकों की सुवधाएँ और वेतन कम कियें जाँय। देश के दीर्घकालीन विकास एजेन्डे को कानून बना कर उसकी मूल भावना और ढांचा तैयार किया जाय ताकि मोदी सरकार की तरह कार्पोरेट के हित में इसे बदला न जा सके और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सके। संविधान की मूल भावना सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक न्याय हासिल करने के उपाय खोजते हुए वैकलपिक राजनीति की संरचना की देशव्यापी बहस और जनान्दोलन की जरूरत आज समय का तकाजा है। जैसे गोरों को भगाने के लिए जरुरत थी। वरना हम सब जो वास्तविक देश हैं बहुमत सरकारों के बँधुआ हो कर रह जायेंगे और मोदी का कम्पनी राज देश में कायम होने से रोका नहीं जा सकेगा।

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लेखक सहायक निदेशक (सूचना) उ.प्र. के पद से सेवानिवृत हैं एवं स्वतन्त्र लेखन करते हैं। सम्पर्क +919415568836, bhagwanswaroopktr7@gmail.com

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