कबीर
सामयिक

धर्म, समाज और राजनीति के प्रसंग में कबीर

 

प्रसिद्ध इतिहासकारों जैसे बील, हंटर, स्मिथ, भंडारकर तथा ईश्वरी प्रसाद आदि का मानना है कि कबीर का समय सिकन्दर लोदी का शासनकाल था। इस काल में राजनीतिक कट्टरता, जातिवाद, सामाजिक परिस्थितियों में घुटन तथा हिन्दू-मुसलमान में विद्वेष था।  जनता सहमी हुई थी तथा धार्मिक मतैक्यवाद, नाथ सम्प्रदाय, सूफी धर्म, रामानन्द की भक्ति व विट्ठल की निर्गुण ब्रह्म धारा समान रूप से बलवती थी।

कबीर काल से लगभग 500-600 वर्ष बाद कोहाट दंगा (वर्तमान पाकिस्तान में), स्वतन्त्रता प्राप्ति में दंगों का मंजर, फिर गोधरा काण्ड व वर्ल्ड ट्रेड  सेण्टर ध्वस्त होने जैसी घटनाएँ क्या हमें याद दिलाती हैं कि पूर्व और आज की परिस्थितियों में महज शब्दावली का फर्क है? आज समाज की विसंगतताएँ नहीं गईं, लोगों के हृदय भाव नहीं बदले तथा जनमानस को निर्मल व निष्पक्ष बनाने वाली प्रवृत्तियों की शक्ति नहीं बढ़ी। क्या ऐसे में कबीर का याद आना प्रासंगिक है?

आज  जब समय की दहलीज पर हिंसा, पाखण्ड, भेदभाव और स्वार्थ की राजनीति नाचने लगी हो, राजनीतिक पार्टियों में धार्मिक भेदभाव को बढ़ाने में खुलकर प्रतिस्पर्धा हो और मनुष्य का जीवन न जाने किस बाजार में परिणत हो गया हो तो क्या 15वीं सदी के उस आम दार्शनिक के विचारों की आवश्यकता नहीं है जो हमें फिर से टोके, धर्म की रूढ़िवादिता पर प्रश्न करे तथा समाज में मानव मूल्य के बारे में जागरुक करे?

सर्वप्रथम हमें जानना होगा कि कबीर ने सीधे तौर पर लोकतन्त्र पर अपनी विचार प्रस्तुति नहीं दी और न ही राजनीति द्वारा प्रयोग किए जाने वाले धर्म की वस्तुनिष्ठता के सन्दर्भ  को अपने दर्शन के केन्द्र में रखा है। वस्तुतः कबीर भेदरहित समाज का उद्घोष करते हैं। इस उद्घोषणा में प्रश्न करने, साँच कहने और समाज को निर्विकार जगाने की शर्त है।

भारतीय राज्य में लोकतन्त्र  धर्म पर संवाद

स्वतन्त्रता पश्चात् भारतीय राज्य ने समाज की सांस्कृतिक, धार्मिक व पंथिक विविधता को देखते हुए पश्चिमी सिद्धान्त ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘लोकतन्त्र’ का आधिकारिक वरण किया। इस संवाद में कई ऐतिहासिक सन्दर्भ हैं। जो इस प्रकार हैं-

(i) धर्म का विचार भारत में धर्म का विचार मुख्यतः हिन्दू धर्म में सिर्फ मन्दिर से जुड़ा न होकर एक दैनिक जीवन अभ्यास है जैसे तुलसी पूजा, सूर्य नमस्कार, प्रभात फेरी और दक्षिण में दण्ड बैठक से गणेश आराधना आदि। इस प्रकार अलग-अलग सम्प्रदाय, पन्थों के अपने अलग-अलग अभ्यास हैं। यहाँ बाह्याचार प्राथमिकता नहीं है। लेकिन ये प्रक्रिया कब पहचान के लिए हिंसक व व्यवसाय बन गई, इसको समझना जरूरी है।

सुदीप्त कविराज व अमर्त्य सेन के लेखों से ज्ञात है कि प्राचीन भारत में धर्म उदाहरणतः हिन्दू धर्म कोई धर्म न होकर अलग-अलग मतों, आस्थाओं व विचारधाराओं का पुंज था। इनकी आस्था पद्धति भिन्न थी। प्राचीन भारत में अशोक व अकबर जैसे सम्राटों ने अलग-अलग धर्म, मत-सम्प्रदायों को एक ऐसी जगह, संवाद एजेंसी दी जहाँ वे अपने मतों को सामने रखे, अभ्यास करे व गर्व कर सके। लेकिन आधुनिक राज्य में धर्मनिरपेक्षता का सिद्धान्त तो राज्य और धर्म को ‘बराबर दूरी के सिद्धान्त’ पर रखता है। तब प्रश्न उठता है कि समाज में से धर्म के अस्तित्व का सच्चा भावार्थ कैसे समाप्त हो गया?

(ii) धर्म की राजनीति पर विचार किसी समाज या राज्य में सभी धर्मों-सम्प्रदायों को बराबर दर्जा न मिलने तथा उनके अभ्यास व संवाद को खत्म करने पर या तो वे मरणासन्न अवस्था में होते हैं या किसी बलशाली सम्प्रदाय द्वारा सम्मिलित कर लिये जाते हैं। फिर मानने वालों की आस्था किसी नाममात्र पहचान जैसे मन्दिर, मूर्ति में सिमटकर रह जाती है। उदाहरणतः वे ‘राम’ के भाव को न समझकर राम के नाम पर हिंसा, कत्ल करने पर उतारु हो जाते हैं। इस प्रकार भावना की विचारात्मक छवि को राजनीतिकृत किया जाता है। साथ ही, नवउदारवाद युग का पूँजीवाद धर्म के ‘सादा जीवन-उच्च विचार’ के मूल्य को हटाकर चकाचौंध व भोगविलास का जीवन परोसकर धर्म को महत्त्वहीन बना देता है।

(iii) धर्म पर जाति का विचार भारतीय समाज में धर्म का विचार और अभ्यास मुख्यतःजाति के तौर पर प्रचलन में है। हर जाति के हिसाब से वह धर्म को वरण करता है उदाहरणस्वरूप जहाँ ब्राह्मण को वेदपाठ का हक, वहीं शूद्र को सुनने तक पर सजा का प्रावधान। क्या लोकतन्त्र की प्रक्रिया में रजनी कोठारी का लेख ‘जातियों का राजनीतिकरण’ कोई सदेश नहीं देता? यहाँ यह प्रश्न जरूरी है कि छोटे-छोटे सम्प्रदाय, जातिगत आस्था प्रचलन और धार्मिक पद्धतियों का प्रचलन कहाँ गया? क्या वह बलशाली हिन्दू धर्म की एकछत्र परम्परा के तले जबरन विलीन करा लिया गया या भारत अब विविध धर्म संस्कृति के स्वरूप को वहन करने लायक नहीं रहा?

धर्म लोकतन्त्र बहस में कबीर सन्दर्भ

जैसा कि ऊपर वर्णित है कि लोकतन्त्र और पूँजीवाद ने जहाँ एक तरफ धर्म को जगह नहीं दी, वहीं दूसरी तरफ स्वायत्त बलशाली धर्मों ने छोटे-छोटे सम्प्रदाय की आस्थाओं को कमजोर कर दिया। यही घटना कबीर दर्शन की आस्था के साथ हुई, क्योंकि कबीर के वास्तविक विचारों के सन्निकट विशेष लोगों को मतलब ही न था कि कबीरपन्थ क्यों और कैसे बन गया और न जाने कैसे ये सत्ता/शक्ति के प्रभावस्वरूप बड़े धर्मों से जुड़ गया और कबीर के दर्शन को धुँधला कर दिया ।

सर्वप्रथम अगर हम लोकतन्त्र  की जड़ों में कबीर सन्दर्भ खोजें तो कबीर यही कहते मिलते हैं कि “मेरी मुक्ति सिर्फ मेरी मुक्ति न होकर मानवता, समाज और प्रकृति की मुक्ति भी है।” उनका जोर यह होता कि “जब मैंने अपने को खोया, तब मैंने खुद को पाया है।”कबीर की समझ वैसी नहीं है जिसमें सिर्फ व्यक्ति ही तत्त्वमीमांसा का प्राथमिक साधन है बल्कि यह सोच है कि व्यक्ति से ही समाज बनता है। कबीर न तो व्यक्ति को और न ही समुदायवाद को प्राथमिकता देते हैं। कबीर मानते हैं कि ‘मैं’ और ‘समाज’ आपस में गुथे हुए है। वैसे तो दोनों ही अस्तित्ववान नहीं है बस संवाद की प्रक्रिया में दोनों का उदय होता है। इसलिए कबीर कबीर हैं।जाहिर है कबीर का समाज वह समाज नहीं जिसकी कल्पना ब्राह्मणवादी, जातिवादी और व्यक्तिवादियों ने की। वस्तुतः कबीर  ढाँचा तोड़ने वाले हैं।आलोचनात्मक चेतना और विद्रोह उनका केन्द्र है। यही कबीर का लोकतन्त्र है।

देखा जाए तो बहुत सारे शक्तिशाली धर्म व सम्प्रदाय कबीर को अपना बता रहे हैं, उनको पन्थ, मठ में स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन कबीर ढाँचों की सीमाओं में रहने वाले दार्शनिक नहीं है। जैसे, कबीर हिन्दू-मुस्लिम में समन्वय के बजाय दोनों के बाह्याचार व कुरीतियों का खंडन करते हैं –पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहाड़,ताते यह चाकी भली पीस खाय संसार।काकर पाथर जोरि के मस्जिद लई बनाय,ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय। साथ ही हिन्दू-मुस्लिम जनता के धर्म व जाति, कर्मकाण्ड में  फँसे होने पर कबीर कहते हैं –चलती चक्की देखकर, दिया कबीरा रोय। दो पाटन के बीच में, साबुत बचा कोय।। जहाँ एक तरफ कबीर में उनकी पहचान भी है –हम बासी उस देस के जहां जाति बरन कुल नाहि।वहीं दूसरी तरफ ‘कहत कबीर सुनो भई साधो’ में किसी धर्म, सम्प्रदाय, पन्थ या मतवाद का आग्रह भी नहीं है।उनकी भक्ति भी समाज के लिए मिसाल है –जहांजहां डोलै सोई परिकरमा, जो कुछ करौ सो सेवा। जब सोवौ तो करौ दंडवत, पूजौ और देवा।।

तो इस प्रकार कबीर ने आलोचना एवं प्रश्न करके अनुभवजनित सत्य से जनमानस के उस लोकधर्म की पैरवी की जो मनुष्य के भीतर के अनाचार को समाप्त करे। उन्होंने उस लोक संवेदना को चुना है जहाँ जनता सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पीड़ाओं से ग्रसित है।

निष्कर्ष

वर्तमान समाज को हम भलीभांति जानते हैं कि यहाँ विभिन्न आस्था व धर्मों के निवासी रहते हैं। पर राजनीतिक पार्टियों के लिए धार्मिक समूह अब वोट बन गए हैं।धार्मिक आस्थाओं पर राजनीति होने से मनुष्यता का भाव घट गया है। इंसान और समुदाय अब पहचान व आर्थिक प्रभुत्व बल पाना चाहते हैं। लेकिन यह संघर्ष/प्रतिस्पर्धा बिना किसी अनुभवी दार्शनिक के बगैर रुकेगा नहीं। इसलिए आज कबीर होते तो राजनीति द्वारा बनाए गए धार्मिक कीचड़ से सभी को निकालकर मानवभाव निष्काम कर्म की सलाह देते। वह पहचान के संघर्ष के बजाय भेदभाव मिटाने और मन साफ करने की राह सुझाते।

आज कई राजनेताओं द्वारा कबीर के अनुसरण का ढोंग रचा जा रहा है ताकि वे धर्म व वोट के बीच सम्बन्ध का प्रभाव प्राप्त कर सकें। हमें ऐसे अतिवादियों से कबीर को अलग करना है। क्योंकि कबीर किसी ढाँचे का दार्शनिक नहीं है। कबीर का धर्म मुक्तिकामी धर्म है जिसमें इंसान की कल्पना सम्बद्ध है। यह असल में लोक तन्त्र का प्रचारक है

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लेखक  जेएनयू में पीएच.डी. शोधछात्र हैं। सम्पर्क  +919728284784, shivhari222@gmail.com

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