चर्चा मेंदेश

जिन्दगी की चाह का खत्म हो जाना…

इच्छामृत्यु की मांग करना, जिंदगी की चाह का खत्म हो जाना है। जबकि जिंदगी अपने मूल रूप में मृत्यु का इंतजार ही है, परन्तु अपनी इच्छा से मरना अपने मूल रूप में जिंदगी से हारना है। इच्छामृत्यु पर हमारे समाज में एक गहरा विवाद उत्पन्न हो चुका था, जब सर्वोच्च न्यायलय ने इस पर खुली बहस का आमंत्रण दिया था।

जो लोग इच्छामृत्यु को मानने वाले हैं, उनका कहना है कि जब जीवन जीने लायक न रह जाए, तो फिर जीवित रहने का क्या फायदा ? कुछ का कहना है कि रोग से पीड़ित व्यक्ति जो बिलकुल असहाय हो जाये और उसका जीवन नीरस हो चुका हो तो ऐसे व्यक्ति के इच्छामृत्यु के निर्णय को स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन प्रश्न यह है कि यह कौन तय करेगा की वह व्यक्ति अचेत अवस्था में है? वह स्वयं? या फिर कोई और?

बहुत से ऐसे देश हैं जिन्होंने अपने राष्ट्र में इच्छामृत्यु को संवैधानिक तौर पर मान्यता दे रखी है उनमें अमेरिका, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, बेल्जियम आदि हैं। इन देशों ने इच्छामृत्यु को प्रायः दो श्रेणियों में बांट रखा हैः सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु। सक्रिय इच्छामृत्यु यानि ऐसी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति जो स्वस्थ न हो सकने की स्थिति में हो उसे उसकी इच्छा से मृत्यु दे दी जाती है। अमेरिका को छोड़कर स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड व बेल्जियम आदि देश इसे मान्यता देते हैं। इच्छामृत्यु की दूसरी श्रेणी यानि निष्क्रिय इच्छामृत्यु में ऐसे व्यक्ति शामिल हैं, जो केवल जीवन रक्षक प्रणाली द्वारा अचेत अवस्था में जीवित रहते हैं। इच्छामृत्यु के इस श्रेणी को अमेरिका ने भी मान्यता दिया है।

निश्चय ही हमारे देश में भी शांतिपूर्ण मृत्यु का अधिकार ऐसे व्यक्तियों को मिलना ही चाहिए जो अपने जीवन से नीरस होकर अचेत अवस्था में जीवित हैं, परन्तु सर्वोच्च्य न्यायलय के मतानुसार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत भारत के प्रत्यक नागरिक को जीवनाधिकारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी है। इसमें किसी भी दशा में मृत्यु के अधिकार को शामिल नही किया जा सकता है.

मनुष्य का अपनी इच्छा से मृत्यु व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में शामिल होना चाहिए। भारत में पुनः एक बार इच्छामृत्यु के वैधता-अवैधता का प्रश्न खड़ा हुआ था, जब सर्वोच्च न्यायालय ने सभी प्रान्तों को इस पर खुली बहस का आमंत्रण दिया। मनुष्य को अपनी इच्छा से मरने का अधिकार है या नहीं? यह एक संवैधानिक विषय बन कर रह गया था।

इसे संवैधानिक विषय के दायरे से निकाल कर धार्मिक विषय के रूप में देखा जाये तो, भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और हर धर्म के अपने-अपने नियम परिचायक ग्रन्थ है मजबूरी और मानवता की दुविधा में उलझी इच्छामृत्यु का प्राचीन ग्रंथों में केवल महाभारत में उल्लेख मिलता है। घायल अवस्था में पड़े भीष्म पितामह तभी प्राणों का त्याग करते हैं जब सूर्य दक्षिण से उत्तरायण में आ जाते हैं, लेकिन तब उन्हें प्राण त्यागने के लिए किसी संवैधानिक नियमावली, संसद और न्यायालय के अनुमति की जरुरत नहीं थी।

हर काम सही होने के लिए जरुरी है उससे जुड़ी हर प्रक्रिया का सही और ठीक से पूरा होना। इसी तरह अपनी इच्छा से मरने के लिए जरुरी है अपने शरीर का पूरी तरह से अचेत हो जाना। तब ऐसी स्थिति में इच्छामृत्यु के प्रस्ताव को स्वीकार किया जाना चाहिए और ऐसा ही हुआ। वर्षों से चली आ रही बहस अब अंतिम मुकाम पर पहुँच गयी, 9 मार्च 2018 मृत्यु के लिए नव नियम को जन्म देने वाला ऐतिहासिक दिन बन गया. इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को इजाजत दे दी। कोर्ट ने कहा कि मनुष्य को गरिमा के साथ मरने का अधिकार है। आखिर यह फैसला कानून और नैतिकता के बीच कई वर्षों की कशमकश के बाद आया पर उनलोगों के लिए यह नव जीवन लेकर आया जो लोग अपनी जिन्दगी से हार कर अचेत अवस्था में इस फैसले के सामान मृत्यु शैय्या में वर्षों से पड़े थे।

 

जन्म का पल्लू पकड़ साथ चली आती हो,

धुप पर जीवन की, बन साया मंडराती हो.

मृत्यु तुम जीवन के साथ ही आती हो,

कभी असमय ही मृत्यु से इच्छामृत्यु का नाम पाती हो.

ऊब कर कष्टों से कभी चाहें भी तुमको बुलाएँ भी.

तो संवैधानिक नियमावली की बेड़ियों में जकड़ जाती हो…

 

वर्षा दुबे

 

 

Show More

सबलोग

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments

Related Articles

Back to top button
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x