उत्तरप्रदेश

मोहभंग तक जा पहुँची अयोध्या

 

भाजपा समर्थक कह रहे हैं कि अयोध्यावासी न भगवान राम के हुए, न ही उनकी पाँच सौ साल की प्रतीक्षा खत्म कराने वालों के। इसके मुकाबले उन्हें भाजपा का यह कुसूर छोटा लगता है कि वह अयोध्या की नहीं हुई। भगवान राम की भी नहीं।

ये भाजपाई भगवान राम की त्रेतायुगीन प्रजा को भी नहीं बख्श रहे और अयोध्यावासियों की उससे तुलना करते हुए यह भी नहीं छिपा पा रहे कि उनका अयोध्यावासियों को अनन्तकाल तक प्रजा ही बनाये रखने का मंसूबा है, नागरिक बनने देना कतई गवारा नहीं। 

गवारा होता तो उनके द्वारा नागरिक के तौर पर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करके सुनाए गये फैसले को ससम्मान सिर आँखों पर लेते और ऐसी स्थिति न पैदा करते, जिससे लगे कि अभी वे जनादेश का सम्मान करना ही नहीं सीख पाये हैं। इसीलिए जब तक अयोध्या उनकी जमात के चुनावी लाभ बढ़ाने के काम आती रही, तब तक वे उसके और उसके निवासियों के गुण गाते व उसके कण-कण को पवित्र बताते रहे। लेकिन जैसे ही उसने इस लाभ के लिए इस्तेमाल होने से मना किया, उनके निकट वह अवगुणों की खान हो गयी ओर उसके निवासी खल! 

लेकिन आज नहीं तो कल, भाजपा को जब भी होश आए, उसे इस सवाल की पड़ताल करनी ही होगी कि अयोध्यावासी उसकी किन कारस्तानियों से मोहभंग के शिकार हुए और किन को नाकाबिल-ए-माफी मानकर उसे यह सजा सुनायी है? उसके ही शब्दों में कहें तो जिन भगवान राम के मन्दिर के निर्माण के मुद्दे ने उसे उसके दो लोकसभा सीटों वाले पतझड़ से ‘दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी’ के बसन्त तक पहुँचाया और अवसर मिला तो जिनकी नगरी को ‘भव्य’ व ‘दिव्य’ बनाने में उसने कुछ भी उठा नहीं रखा, उसके निवासियों ने क्यों इस बार उसे लोकसभा में अपना प्रतिनिधित्व करने लायक भी नहीं समझा? 

इस लिहाज से देखें तो 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्री बनने और 2019 में आक्रामक होकर विवादास्पद अधूरे एजेंडे को पूरा करने की ओर बढ़ने के बाद से भाजपा व अयोध्या का साथ ‘केर-बेर का संग’ हो गया था। न अयोध्या भाजपा के आक्रामक हिन्दुत्व के साथ कदमताल कर पा रही थी, न ही भाजपा को फुरसत थी कि वह अयोध्या के मर्यादाहीनताविरोधी सरल स्वभाव को ठीक से समझे। 

उसने तो यह भी नहीं समझा कि अयोध्या को हमेशा अपना समतल तलाशते रहने की आदत है और अहंकार व अतियाँ किसी भी तरह की और किसी की भी क्यों न हो, न वह उन्हें स्वीकार करती है, न ही उनके सामने सिर झुकाती है। हाँ, वह उनसे सीधे भिड़ती भी नहीं, लेकिन पहला मौका हाथ आते ही हिसाब-किताब बराबर कर उन्हें चलता कर देती है। भाजपा के अहंकारों व ‘अतियों’ के साथ भी अन्ततः उसने यही किया है। क्या करती, जब भाजपा ने अपनी राजनीतिक हितसाधना के लिए न सिर्फ उसकी छाती पर मूंग दलने बल्कि उसके राम तक की अवमानना करने का रास्ता चुन लिया। वह बार बार राम का नाम रटती और उसका राजनीतिक लाभ तो उठाती रही लेकिन कभी अपने गिरेबान में झांक कर यह देखना गवारा नहीं किया कि इस क्रम में वह उनके गुणों, मूल्यों और मर्यादाओं की सर्वथा विलोम बन गयी है।

फिर तो सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से बन रहे राम के मन्दिर तक को उसने सबका बनाने के बजाय अपना और अपने लोगों का प्रोजेक्ट बना डाला और इस प्रोजेक्ट के सिलसिले में उसके लोग भूमि की खरीद-बिक्री में घोटालों के आरोपों से घिरने लगे। 

अयोध्या राम मंदिर

हद तो तब हो गयी जब मन्दिर निर्माण करा रहे ट्रस्ट के महासचिव चम्पत राय ने ‘सबके राम’ की परम्परा के विपरीत कह दिया कि वह शैवों, शाक्तों व संन्यासियों का है ही नहीं। फिर प्रधानमन्त्री के हाथों रामलला की प्राणप्रतिष्ठा को मात्र उनका ही इवेंट बना दिया गया और सुरक्षा के नाम पर अयोध्यावासियों से कह दिया गया कि वे उसे अपने घरों में बैठकर टीवी पर देखें या फिर दूसरे मन्दिरों में एकत्र होकर भजन-कीर्तन करें। फिर तो रामलला का ‘वीवीआईपी दर्शन’ भी भ्रष्टाचार और अवैध धनउगाही जैसे कृत्यों से भी नहीं बच पाया। 

अनन्तर, भाजपा ‘जो राम को लाये हैं, हम उनको लायेंगे’ का अहमन्यताभरा नारा लगवाने लगी और कई पोस्टरों में रामलला प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की उंगली पकड़कर अपने मन्दिर की ओर जाते दिखाई देने लगे। इसे लेकर उठने वाले एतराजों की उसने रामद्रोहियों की करतूत बताकर छुट्टी कर दी। एक लोकगायिका का इस सवाल कि ‘जो सबको लाये हैं, तुम उनको लाओगे, ईश्वर से डरो साहेब!’ वाला वीडियो वायरल हो गया तो भी वह नहीं ही चेती। दूसरी ओर चुनावी लाभ के लिए प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी नया चोला धारण कर विभिन्न कर्मकाण्डों में धर्माचार्यों की भूमिका निभाते हुए भी अपनी भाषा को असंयमित व अभद्र होने से नहीं बचा पाये। इस सिलसिले में उनसे धर्मनिरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्य की कौन कहे, अयोध्या की सर्वधर्म समभाव की पुरानी परम्परा की रक्षा भी सम्भव नहीं हुई। 

इसलिए चुनाव सभाओं में मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ ने बारम्बार कहना आरम्भ किया कि लड़ाई रामभक्तों व रामद्रोहियों के बीच है और प्रधानमन्त्री नुककड़ नेताओं के स्तर पर उतर कर कहने लगे कि कॉंग्रेस सत्ता में आई तो राममन्दिर पर फिर से बाबरी ताला लगा देगी तो मतदाताओं ने चिढ़कर भाजपा से न सिर्फ फैजाबाद बल्कि अयोध्या मंडल और उसके आसपास की प्रायः सारी लोकसभा सीटें भी छीन लीं। 

चुनाव नतीजों के बाद अयोध्या में कई लोग कहते दिखे कि भाजपा को यह सजा जरूरी थी क्योंकि उसने मान लिया था कि ‘हिन्दुत्व’ के नाम पर कितनी भी मनमानियाँ करती रहे, अयोध्या के मतदाता उसे छोड़कर कहीं जाएँगे नहीं। यह वैसे ही था जैसे 2004 में केन्द्र की सत्ता में आए कॉंग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सत्ता 2009 के लोकसभा चुनाव में भी बरकरार रह गयी तो उसने मान लिया कि चूँकि वह धर्मनिरपेक्षता का अपनी तरह का इकलौता अलम्बरदार है, कुछ भी करता रहे, साम्प्रदायिकताओं और संकीर्णताओं के विरोधी मतदाता उससे जुड़े ही रहेंगे।

ऐसे में भाजपा के लिए यह एक बड़ा सबक है कि अयोध्या की सैकड़ों परियोजनाओं पर केन्द्र व प्रदेश सरकार के राजकोष से कोई पचास हजार करोड़ रुपये खर्च करवाकर भी वह मतदाताओं को बिदकने से नहीं रोक पायी।

इससे पहले पिछले साल निर्माणाधीन राममन्दिर में दर्शन-पूजन के लिए आने वाले तीर्थयात्रियों, श्रद्धालुओं व पर्यटकों की सुख-सुविधा के लिए अयोध्या की सड़कें चौड़ी करने का अभियान चला तो समुचित मुआवजे व पुनर्वास के वादे निभाए बिना नागरिकों के हजारों घरों, दुकानों व प्रतिष्ठानों को ध्वस्त कर दिया गया। वे नाराज हुए तो बेदर्द भाजपाई हलके यह आभास कराते दिखे कि इससे देश भर के रामभक्त खुश हों और राम जी शेष देश में भाजपा का बेड़़ा पार लगा दें तो अयोध्यावासियों की नाराजगी से फैजाबाद की एक सीट हार जाना उसकी बहुत छोटी कीमत होगी। 

मोदी जी

लेकिन प्रधानमन्त्री ने ‘चार सौ पार’ का नारा दिया तो अयोध्या के सांसद व भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह एक वीडियो में संविधान बदलने के लिए उसकी सफलता को जरूरी बताते नजर आये। फिर तो यह नारा भी ‘जो राम को लाये हैं…’ के नारे की तरह ही बैक फायर कर गया। दलित व पिछड़ी जातियों के मतदाता इस अंदेशे में ‘इण्डिया’ के बैनर तले एकजुट हो गये कि उनके पास बाबासाहब के संविधान और उसके दिये आरक्षण को बचाने का यह अन्तिम अवसर है। वे दलित और पिछडे भी जो 2019 में अलग-अलग कारणों से भाजपा की ओर चले गये थे, उसकी ओर से मुँह मोड़कर वापस लौट आये। 

प्रशंसा करनी होगी सपा की भी कि उसने इस बार इस लोकसभा सीट के जातीय समीकरणों के मद्देनजर खूब सोच-समझकर अपने नौ बार के दलित विधायक अवधेश प्रसाद को अपना प्रत्याशी बनाया। अवधेश प्रसाद अपने समूचे प्रचार अभियान में अपनी पार्टी के इस प्रयोग को ‘क्रान्तिकारी’ बताते हुए याद दिलाते रहे कि बसपा के संस्थापक कांशीराम ने कभी दलितों के लिए आरक्षित लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ा और सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने उन्हें पहली-पहल इटावा सीट से लोकसभा पहुँचाया था। इसका समूचे चुनावी परिदृश्य पर असर हुआ और दलितों ने जून, 1995 के बहुचर्चित गेस्ट हाउस कांड के वक्त से ही सपा से चली आ रही दुश्मनी को भूलकर उसके पक्ष में एकजुट मतदान किया। 

जो भी हो, यह अयोध्या ही कर सकती है कि 1989 में साम्प्रदायिक राजनीति से खफा हो तो पिछड़ी जाति के वामपंथी को अपना सांसद चुन ले और 2014 में खफा हो तो समाजवादी दलित को। आइये, कामना करें कि साम्प्रदायिकता की राजनीति का क्लाइमेक्स देख चुकी अयोध्या के लिए यह उसका ऐंटीक्लाइमेक्स सिद्ध हो

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कृष्ण प्रताप सिंह

लेखक अयोध्या से प्रकाशित दैनिक जनमोर्चा के सेवानिवृत्त सम्पादक और स्तंभकार हैं। सम्पर्क +91 9838950948, kp_faizabad@yahoo.com
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