पेसा कानून
मध्यप्रदेशसामयिक

पेसा कानून का इतिहास और वर्तमान

 

मध्यप्रदेश के कुल भू -भाग का 22.07 प्रतिशत (68 हजार वर्ग किलोमीटर) अनुसूचित क्षेत्र है  जो संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत पांचवी अनुसूचि के अन्तर्गत वर्गीकृत है। इस क्षेत्र का विस्तार मध्यप्रदेश के 89 आदिवासी विकास खंडो में है। संविधान के भाग (10) के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन स्थानीय आदिवासी समाज की सहमति से संचालित किया जाएगा। संविधान के अनुच्छेद (40) में राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियां तथा अधिकार प्रदान करेगा जो उन्हे स्वायत शासन की इकाईयों के रूप में कार्य करने योग्य आवश्यक हों। 1992 में संविधान में 73 वां संशोधन हुआ।

जिसमें पंचायतों के चुनाव और उनके अधिकारों के लिए ढांचा बना। इस तरह संविधान के भाग(9) में पंचायतों के लिए व्यवस्था की गई। बिहार छोड़कर बांकी सब राज्यों में 1994 में चुनाव प्रक्रिया शुरू हुए और पंचायतों का गठन हुआ।  चुनाव में आरक्षण के मुद्दों पर झारखंड में हलचल शुरू हो गया। पांचवी अनुसूची को देखा गया। पंचायतों  के बारे में संविधान के भाग(9) में  जो उपबंध किए गए हैं,वे अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं होंगे। इसको लेकर आदिवासी क्षेत्रों में कार्यरत संगठन और आदिवासी समुदाय ने तीव्र विरोध किया। तब केंद्र की सरकार ने 1994 में उच्च स्तरीय समिति का गठन किया , जिसका अध्यक्ष दिलीप सिंह भूरिया को बनाया गया।

इस समिति को यह जिम्मेदारी सौंपी गई की वह सरकार को बताये कि पंचायतों की सामान्य व्यवस्था में किस तरह का फेरबदल करके अनुसूचित क्षेत्रों में लागू किया जाए।  इस समिति ने 17 जनवरी 1995 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। भूरिया रिपोर्ट के आधार से आंध्र प्रदेश में जहां पंचायत चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गयी थी,उस चुनाव को ही उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। उच्च न्यायालय ने चुनाव को असंवैधानिक घोषित कर वोटों की गिनती रोक दिया। संसद ने भूरिया कमिटी की सिफारिशों को मानते हुए कानून बनाया और वह कानून पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996 यानि पेसा कानून 24 दिसंबर 1996 को राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित होकर अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू हुआ।

पेसा कानून असली मतलब

राज्य की बजाय ग्राम सभा के रूप में गांव समाज सर्वशक्ति संपन्न है। इस तरह गांव समाज और ग्राम सभा एक ही असलियत के दो नाम है। गांव समाज उसका परम्परागत रूप है और ग्राम सभा संविधान से मान्यताप्राप्त औपचारिक रूप है। यही हमारी परम्परा और आधुनिक व्यवस्था का मिलन बिंदु है। सामान्य इलाकों में ग्राम का मतलब राज्यपाल द्वारा लोक अधिसूचना से ग्राम के रूप में विनिर्दिष्ट ग्राम अभिप्रेरित है।

जबकि अनुसूचित क्षेत्रों के लिए समाज केंद्रित परिभाषा की गई है,पेसा कानून की धारा 4(ख) के तहत ग्राम अर्थात लोगों की समझ का अपना गांव, ऐसी बस्तियां व बस्तियों का समूह होगा। जिनके सभी निवासी सहज रूप से अपने को उस गांव समाज का हिस्सा मानते हैं और अपने सभी कामकाज गांव समाज की परम्परा के अनुसार चलाते हों।  पेसा कानून की धारा 4 (घ) कहता है कि प्रत्येक ग्राम सभा आम लोगों की परम्परा और रूढ़ियों की सांस्कृतिक पहचान बनाये रखने ,अपने गांव की सीमा में आने वाले सभी संसाधनों की व्यवस्था एवं प्रबंधन करने तथा गांव समाज में हर तरह के विवादों की अपनी परम्परा के अनुसार निपटाने के लिए सक्षम होगी।

मध्यप्रदेश में पेसा कानून का क्रियान्वयन

क्योंकि पंचायत व्यवस्था राज्य का विषय है। इसलिए केन्द्रीय कानून पेसा के क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार को इसका नियम बनाना था,जो पेसा कानून के लागू हुए 25 साल बाद भी नहीं बन पाया है। मध्यप्रदेश शासन ने अपने कुछ कानूनों जैसे साहूकार अधिनियम, भू राजस्व संहिता,अबकारी अधिनियम आदि का पेसा के साथ अनुकूलन किया हुआ है,किन्तु वन,भूमि एवं न्याय सबंधि कानूनों का पेसा के साथ अनुकूलन नहीं हुआ है। इसलिए लघुवनोपज पर ग्राम सभा की मालिकी स्थापित नहीं हुई है। इस बात की तस्दीक 17 मार्च 2011 को विधानसभा में वनमंत्री सरताज सिंह बयान करता है। केन्द्र सरकार ने लघुवनोपज के तहत बांस को शामिल किया है।

परन्तु मध्यप्रदेश शासन ने बांस को लघुवनोपज में शामिल नहीं करने का निर्णय लिया है,इसलिए पेसा कानून से आदिवासी समाज का बांस पर अधिकार कायम नहीं हो सकेगा।  विगत 18 सितंबर 2021 को राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह के बलिदान दिवस कार्यक्रम पर जबलपुर में मुख्यमंत्री ने घोषणा किया है कि पेसा कानून को  चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा और वन प्रबंधन का अधिकार ग्राम सभा को दिया जाएगा।  परन्तु संविधान के भाग (10) के आलोक में मध्यप्रदेश राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों में वन प्रबंधन में ग्राम सभा का अधिकार सुनिचित करने के लिए भारतीय वन अधिनियम 1927 में बदलाव जरूरी है। वन विभाग द्वारा वन प्रबंधन भारतीय वन अधिनियम 1927 के अनुसार किया जाता है जो कि वन को राजस्व प्राप्ति का साधन मानता है।  इस कानून में पर्यावरण,जैव वविधता,

वनौषधि और आदिवासी समाज की आवश्यकताओं जैसे तत्वों का कोई स्थान नहीं है। इसलिए संविधान की मंशा अनुसार पांचवी अनुसूचि वाले क्षेत्रों में वन प्रबंधन आदिवासी समाज केन्द्रित होना चाहिए। चुंकी वन संविधान की समवर्ती सूची में है, इसके लिए केंद्र का ध्यान आकृष्ट किया जाना आवश्यक है। केन्द्र सरकार ने 2008 में ग्राम न्यायालय कानून पारित किया है। यह ग्राम न्यायालय कानून के अमल से अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून द्वारा प्रदत्त ग्राम सभा को विवाद निपटारे के अधिकार पर हस्तक्षेप करता है। इस संभावित हस्तक्षेप को रोकने हेतु राज्य सरकार द्वारा केन्द्र सरकार का ध्यान आकृष्ट करना चाहिए।  प्रश्न उठता है कि बाजार और मुनाफा केन्द्रित विकास के दौर में यह संभव है, जहां अनुसूचित क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधन आदिवासी समाज की बजाय कार्पोरेट को सोंपने के लिए कानूनों में बदलाव किए जा रहे हैं

.

कमेंट बॉक्स में इस लेख पर आप राय अवश्य दें। आप हमारे महत्वपूर्ण पाठक हैं। आप की राय हमारे लिए मायने रखती है। आप शेयर करेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।

लेखक बरगी बाँध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हैं तथा विस्थापन, आदिवासी अधिकार और ऊर्जा एवं पानी के विषयों पर कार्य करते हैं। सम्पर्क-+9194243 85139, rajkumarbargi@gmail.com

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments

डोनेट करें

जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
sablog.in




0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x