मध्यप्रदेश

निमाड़ अंचल के पिछड़ेपन का जिम्मेदार कौन

 

कहते हैं कि जो रोता है मां भी उसे ही दूध पिलाती है लेकिन मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री रूपी एक ऐसी भी कथित मां है जिसे निमाड़ के बच्चों का रोना पिछले पन्द्रह साल से सुनाई ही नहीं दे रहा है। यहां के बाशिंदों की एक नहीं बल्कि अनेक मांगें और समस्याएं हैं लेकिन इस बहरी मां को अब तक किसी एक बच्चे की किलकारी तक नहीं सुनाई दी है। जबकि आवाजें चहूं और से लगाई जा रही है कि घोषणावीर मामा कभी इधर भी मां रूपी भाव से देख लो।

पर मजाल है कि उनका दिल पसीज जाए। निमाड़ अंचल के प्रति सीएम का सौतेला भाव जगजाहिर है। वे इस इलाके में जब भी आए बड़ी-बड़ी बातें तो कर गए लेकिन आधारभूत समस्याओं के समाधान के लिए आज तक एक कदम नहीं उठाया है।

निमाड़ एमपी का एक ऐसा अंचल है जहां अस्सी फीसदी लोगों ने अपने जीवन की नैया का खेवैया खेतीबाड़ी को बना रखा है। मतलब साफ है कि यहां के किसान और आम इंसान खेती किसानी के सहारे ही जिंदगी काट रहे हैं। ये सर्वविदित है कि भारत में खेती किसानी कभी भी लाभ का सौदा नहीं रही है। तिस पर प्राकृतिक आपदा का कहर जान का दुश्मन बनकर सामने आता है। ऐसी स्थिति में निमाड़ के लोगों के लिए आसान तरीके से जीवन यापन कर पाना किसी युद्ध को जीत लेने से कम नहीं है।

आज भी निमाड़ में घोर गरीबी देखी जा सकती है। पिछड़े वर्ग के चंद ठीक-ठाक किसानों को छोड़ देते तो यहां अधिकांश वर्ग के लोग सम्मानजनक रूप से दो वक्त की रोटी तक को मोहताज हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों का तो खुदा ही मालिक है।

ऐसी स्थिति में इस अंचल के खरगोन, बड़वानी, खंडवा, बुरहानपुर और धार जिले की कुक्षी, मनावर, धरमपुरी तहसील से बड़ी तादात में लोग पेट पालने के लिए इंदौर, भोपाल, गुजरात और राजस्थान के पत्थर खदान वाले इलाकों में पलायन कर रहे हैं। अंचल से हाने वाले पलायन का आलम यह है कि कई जिलों की दलित और आदिवासी बस्तियां इंसान विहिन होकर सुनसान पड़ी है। इन जिलों के जवान लडक़े और अधेड़ उम्र के लोग दो वक्त की रोटी के लिए माटी से महरूम होकर शहरों में बस्तियां आबाद कर रहे हैं। इधर, बुढ़े मां बाप गांव में ही भूखे प्यासे रह कर मौत का पल पल इंतजार कर रहे हैं। जबकि यहां की भूमि खासी उर्वरा है। पर सत्तारूढ़ सरकार की सौतेली मां वाले रूख व व्यवहार के चलते सब गुड़ गोबर हो रहा है।

सच तो यह है कि अंचल के लोगों को होने वाली दिक्कतों के समाधान के लिए बातें तो खूब हुई है और होती रहती है लेकिन मजाल है कि कोई भी जिम्मेदार इसके लिए ईमानदार पहल कर दे। आज भी मध्यप्रदेश के नाम पर निमाड़ अंचल की बदहाली, पिछड़ापन और गरीबी किसी बदनूमा दाग से कम नहीं है, लेकिन निर्लज्जों को कोई फरक नहीं पड़ता है।

चलो अब हम बात करते हैं सीएम शिवराज सिंह चौहान की नीति और नियत में खोट की। काबिलेगौर हो कि इंदौर और निमाड़ अंचल की तीस-बत्तीस तहसीलों में निमाड़ महासंघ नाम का एक संगठन निमाड़ीजनों के बीच पिछले कई सालों से काम कर रहा है। यह संगठन सभी भेदों से परे होकर सर्वधर्म, जाति, संप्रदाय से सरोकार रखने वाले निमाड़ीजनों की बेहतरी के लिए जुटा है। इस संगठन का मुख्य काम निमाड़वासियों के दुख-तकलीफ और परेशानियों को सरकार के कर्ताधर्ताओं के सामने रखना है ताकि वहां का सच इनकी नजर से बेखबर ना हो।

आपको बता दें कि निमाड़ महासंघ के पदाधिकारियों ने अनेक मौकों पर सरकार के जिम्मेदार अफसरों व राजनीतिक नुमाइंदों को अंचल की समृद्धि और बेहतरी के लिए अनेक सुझाव दिए लेकिन इन सुझावों को मानना तो दूर रहा बल्कि इसके पदाधिकारियों को काली पीली नजरों से देख कर अपमानित ही किया गया। निमाड़ महासंघ पिछले आठ दस साल से प्रदेश सरकार से निमाड़ विकास प्राधिकरण बनाने की मांग को लेकर जद्दोजहद कर रहा है लेकिन इस सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंगी।

हालाकि इस मामा रूपी सीएम ने एक बार खंडवा जिले के हनुमंत्या में संपन्न हुई कैबिनेट में घोषण कर दी थी कि हम निमाड़ महासंघ की जायज मांग को ध्यान में रखते हुए निमाड़ विकास प्राधिकरण बनाएंगे। इसको लेकर घोषणा भी कर दी थी लेकिन आज का दिन है और वो घोषणा है। घोषणा अब भी घोषणा ही है। सीएम की घोषणा के बाद भी यह पूरी नहीं हुई तो सरकार के नुमांइदों से पूछा गया कि आखिर क्या कारण है कि इस पर अमल नहीं किया जा रहा है, तो दो टूक कहा गया कि सरकार की माली हालत ठीक नहीं है। ऐसे में निमाड़ अंचल के कुछ नया कर पाना संभव नहीं है।

लेकिन सीएम और सरकार में बैठे जिम्मेदारों के दोगलेपन का आलम यह है कि उनने हिंदूओं का तुष्टिकरण करने के लिए ओंमकारेश्वर में ओंमकार पर्वत को तहस नहस करके शंकराचार्य नामक एक बेनाम की 108 फीट की ऊंची मुर्ति बिठा दी। इसके साथ ही अनेक छोटे बड़े धार्मिक महत्व के संस्थान व मंदिर बनाकर सीमेंट और लोहे का जाल मांधाता पर्वत की छाती पर बिछा दिया। कुल मिलाकर दो हजार एक सौ करोड़ रूपये की लागत से एक धार्मिक परियोजना बनाने के लिए तो राशि कर्ज पर ले ली लेकिन निमाड़ विकास प्राधिकरण बनाने के लिए सरकार की माली हालत खराब होने का हवाला देकर उस मांग को आज तक ठंडे बस्ते में ड़ाल दिया है।

शिवराज और उनके हठधर्मी अफसरों ने न केवल वहां के पहाडों को काट कर पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ दिया है बल्कि इस मांधाता पहाड़ के आजू-बाजू बस कर जंगल की रक्षा करने वाले आदिवासियों और गरीबों को घर से बेघर भी कर दिया है। कोई भी इंसान धरातल पर जाकर शिवराज सरकार की इस सांमती दादागिरी से आहत हुए लोगों के दुख-दर्द और गुस्से से रूबरू हो सकता है।

असल में आने वाले समय में मांधाता पर्वत में तबाही को बुलावा देने का यह कुत्सित प्रयास शिवराज सरकार ने एक जाति विशेष के लोगों को खुश करने के लिए किया है। जबकि चााहिए ये था कि निमाड़ विकास प्राधिकरण का गठन करके संपूर्ण निमाड़ में विकास का द्वार खोलकर बेहतरी की पहल की जाती।

सच तो यह है कि इस सरकार ने इंसान की असल समस्याओं को दरकिनार ये सब कथित हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने के लिए किया है। अंचल के लोगों में इस धार्मिक परियोजना को लेकर खासा गुस्सा है। गुस्सा इसलिए नहीं कि धार्मिक आडंबर में करोड़ों रूपये क्यूं लगा दिए बल्कि गुस्सा इसलिए है कि आखिर यहां जरूरी सुविधाओं के अभाव के बावजूद इस तरह के फिजूल काम में करोड़ों रूपये क्यूं खर्च कर दिया। इसमें दो राय नहीं है कि यहां के लोग इलाज के अभाव में मरे जा रहे हैं लेकिन जनसंख्या के अनुपात में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं तक नहीं है। शिक्षा की बदहाली भी अजीबो-गरीब है। इलाके में शिक्षा के नाम पर कहीं भवन है तो शिक्षक नहीं है। कहीं शिक्षक है तो जरूरी सुविधाएं नहीं है। ऐसे में आने वाला भविष्य भी अंधकार में ही है।

अब हम बात करते हैं निमाड़ अंचल में औद्योगिक विकास की। इस विकास को लेकर निमाड़ महासंघ द्वारा पिछले दस बारह साल से लगातार यह प्रयास किया जा रहा है कि यहां उत्पादन होने वाली फसलों के आधार प्रोसेसिंग ईकाइयां लगाई जाए। सबसे पहले तो यह जान लें कि निमाड़ अंचल में हर तरह की फसल पैदा होती है। निमाड़ में जिस तरह से कपास का उत्पादन किया जाता है उस मामले में यहां के किसान का कोई सानी नहीं है। यहां उद्यानिकी फसलें भी खासी तादाद में पैदा होती है। करीब करीब हर तरह का फल यहां पैदा किया जाता है।

इन सबको ध्यान में रखते हुए निमाड़ महासंघ ने इस इलाके में फसल आधारित फुड प्रोसेसिंग उद्योग लगाने की मांग कई दफा की है। इसके बाद कॉटन और मिर्च पर आधारित छोटी छोटी इकाईयां बनाने की गुहार लगाई लेकिन सरकार कुंभकरण की नींद सोयी रही जो अब तक नहीं जागी है। ये कटू सत्य है कि कॉटन और मिर्च के उत्पादन में प्राकृतिक आपदा आती रहती है। कभी अतिवृष्टि तो कभी अल्पवर्षा कपास व मिर्च पैदा करने वाले किसान की कमर तोड़ देते हैं। इसके अलावा व्यापारियों द्वारा इन फसलों का उचित दाम नहीं देना किसान की कमर पर पहाड़ के गिरने जैसा ही है।

इन दिक्कतों और परेशानियों को मद्देनजर रखते हुए ही निमाड़ महासंघ ने कॉटन व मिर्च आधारित छोटे-छोटे उद्योग लगाने की गुहार सरकार से लगाई मगर क्या मजाल कि इस पर किसी प्रकार का विचार किया जाता। घोषणावीर सीएम का तमगा पाने वाले शिवराज ने जितनी अवहेलना और दोहन निमाड़ का किया उससे अधिक किसी और का नहीं किया होगा।

दरअसल, आज भी निमाड़ में औद्योगिक विकास की राह में सबसे बड़ी अड़चन सत्तारूढ सरकार की बेरूखी ही है। हालाकि सरकार की इस नजरअंदाजी के लिए यहां के आलस से भरे लोग भी है। इस सरकार का तो काम ही गरीब को और गरीब बनाना। इलाके के संसाधनों का दोहन कर क्षेत्र को तबाह करना है पर लोगों ने भी तो एकजुट होकर सरकार के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं किया। हालाकि चुनावी मुहाने पर कुछ लोगों ने एकजुट होकर बड़वाह या ओंमकारेश्वर को जिला बनाने की पहल की थी लेकिन दलगत लोगों ने उनका भी साथ नहीं दिया। निमाड़ में रेल लाओ की मांग उठाने वाले प्रबुद्धजनों का भी यही हश्र हुआ। ये सब बातें भी मुठ्टठीभर लोग ही कहते रह गए। गर, माटी की बेहतरी और तरक्की के लिए सब एकजुट होकर जोरदार आवाज में अपनी बात रखते तो किसी की क्या मजाल होती कि अनसुना करता।

लेकिन निमाड़ की इस बदहाली और पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण एक यह भी है कि यहां के लोग माटी के प्रति वफादार कम हैं और राजनीतिक विचारधाराओं की कुंठित और कुत्सित मानसिकता से ग्रसित अधिक हैं। इसका खामियाजा आज भी निमाड़ के लोग भुगत रहे हैं।

बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे

अब थोड़ा निमाड़ के उलट यूपी के बुंदेलखंड की ओर चलते हैं। यूपी का बुंदेलखंड भी निमाड़ अंचल की तरह काफी पिछड़ा इलाका है। यहां से भी रोजी रोटी के लिए बड़ी तादात में पलायन होता है, पर यहां के लोग अपने हक अधिकारों के प्रति निमाड़ के लोगों जैसे व्यक्तिवादी नहीं है। वे अंचल की समृद्धि के लिए एक हैं। बुंदेलखंड के लोग निमाड़ के लोगों से कहीं गुना अधिक सजग भी है। ये उनकी सजगता का ही प्रमाण है कि वहां चुनावी बयार न बहने के बाद भी उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को झुककर बुंदेलखंड के सर्वांगीण विकास के लिए बुंदेलखंड औद्योगिक विकास प्राधिकरण के गठन को मंजूरी देनी पड़ी है। इसके साथ ही बुंदेलखंड के झांसी में एक नया हवाई अड्डा भी बनाया जा रहा है जबकि निमाड़ के प्रसिद्ध तीर्थस्थल ओमकारेश्वर में रात आठ बजे के बाद वहां से वापस आने के लिए तीर्थयात्री को किसी भी प्रकार का कोई सार्वजनिक साधन नहीं मिलता है। हवाई अड्डा और रेल की सुविधा तो किसी ख्वाब से कम नहीं है।

यूपी के संसदीय कार्य मंत्री खन्ना को यह कहना पड़ा कि एक नई औद्योगिक टाउनशिप बुंदेलखंड में विकसित करने की राह के सारे रोड़े खत्म हो गए हैं। अब 6,312 करोड़ रुपए की लागत से 35,000 एकड़ भूमि पर विकास की गंगा बहाई जाएगी जबकि निमाड़ में विकास की नर्मदा को मगरूर औलादों ने ड़ाबरे-ड़ाबरे बना दी है।

इधर एमपी के सीएम निमाड़ को कंगाल बनाने में लगे रहे वहीं यूपी के मुख्यमंत्री ने औद्योगिक क्षेत्र विस्तार एवं नवीन औद्योगिक क्षेत्र प्रोत्साहन योजना के तहत कर्ज के रूप में 5,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त प्रावधान करके बुंदेलखंड की सुरत और सीरत बदल दी है। ये है बुंदेलखंड के लोगों की ताकत। ये बात दीगर है कि इस इलाके में बड़े औद्योगिक निवेश के आने की राह इतनी आसान नहीं है। पर निमाड़ में ऐसा नहीं है, यहां तो हर तरह के ओद्यौगिक विकास की संभावना है। बस नहीं है तो यहां के लोगों की इच्छाशक्ति। खैर।

एमपी में इस समय चुनावी बयार बह रही है। निमाड़ एमपी के माथे पर गरीबी और पिछड़ेपन के काले बदनूमा दाग की तरह लगा है। अब निमाड़ के लोगों को चाहिए कि निमाड़ की अवहेलना करने वाले राजनेताओं और राजनीतिक दल को सत्ता से हटाए कर अपनी ताकत का अहसास कराए।

कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि चुनाव होने के बाद भी निमाड़ की तरफ ध्यान नहीं दिया गया। इससे बड़ी अपेक्षा और क्या होगी कि यहां चुनाव के दौरान स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व को उभारने की बजाय अंचल के लोगों का जीवन बेहूदा किस्म के आयातितों के हाथ में सौपने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। जिनकी गिनती अपराधी और गुंड़ों के रूप में होती है उनको निमाड़ के लोगों का नेता बनाकर उनके माथे पर बिठाया जा रहा है। खासकर अंचल की दलित बाहुल्य सीट पर।

सच तो यह है कि जब तक निमाड़ के लोग अपने हक अधिकारों के लिए एकजुट होकर अपने नेताओं और सरकारों को आंख नहीं दिखाएंगें तब तक यूं ही सत्तारूढ दल ऐरे-गैरे-नत्थूखेरों को छाती पर मूंग दलने के लिए बिठाते रहेंगे। इसके साथ ही अंचल के विकास के मामले में हीलाहवाली करते रहेगें। ये चुनावी समय है और इससे मुफीद कोई वक्त नहीं हो सकता है कि निमाड़ की अवहेलना करने वालों को सत्ता से बेदखल किया जाए। अब यहां के लोगों को अंचल व खुद की खुशहाली के लिए एक बार यह जरूर सोचना चाहिए आाखिर उनका हितैषी कौन हो सकता है

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संजय रोकड़े

लेखक पत्रकारिता जगत से सरोकार रखने वाली पत्रिका मीडिय़ा रिलेशन का संपादन करते हैं और सम-सामयिक मुद्दों पर कलम भी चलाते हैं। सम्पर्क +919827277518, mediarelation1@gmail.com
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