पुस्तक-समीक्षा

दलित, सामाजिक, राजनीतिक चेतना से भरपूर ‘गूदड़ बस्ती’

 

गूदड़ बस्ती उपन्यास का आरम्भ पूर्वदीप्ति शैली में है। जिसमें कई सारे पात्र हैं किन्तु मुख्य पात्र सुरेन्द्र तथा मीनू का परिवार है। सुरेन्द्र अपने बचपन की यादों में खोया है और अपनी अब तक की जीवन यात्रा का तथा उसके साथ चली आ रही अन्य तमाम घटनाओं का वह आंकलन कर रहा है। एक सिलसिलेवार तरीके से उसे वह सब चीजें स्मरण होती चली जाती हैं। उसके सपने जिनको न जाने कितने लोगों ने पाला पोसा उनके प्रति भी वह कृतज्ञ जान पड़ता है और दूसरी और उसकी संघर्षशील माँ जिसने उसे हर कदम आगे बढ़ने को प्रेरित किया। उसके संघर्षों को भी तिलांजली नहीं देता। उपन्यास में आवंतर कथा प्रसंगों के रूप में शिव की कांवड़ यात्रा, आपातकाल का दौर, इंदिरा गाँधी की हत्या आदि जैसे मर्मान्तक प्रसंग भी हैं।

उपन्यास की कथा पूर्वदीप्ति शैली से प्रारम्भ होकर पुन: कब लौटती है।  इसका सहज अंदाजा लगाना मुश्किल है  आम पाठक वर्ग के लिए। कांवड़ यात्रा का जिक्र करते हुए लेखिका प्रज्ञा हास्य, विनोद की भाषा के साथ रोचक तरीके से उसे गढ़ती है। जहाँ सुरेन्द्र स्काउट बनकर जाता है और जुलूस को एक दिशा, एक लाइन प्रदान करने में मदद करता है। ताकि वह एक सीध में चले किन्तु उस झांकी में विभिन्न देवताओं के प्रतीक बनकर बैठे हुओं की परवाह न करते हुए सुरेन्द्र अपनी ही रौ में चलता चला जाता है।

लेकिन अचानक ही एक बैल बेकाबू हो जाता है। फलस्वरूप कथावाचक सुरेन्द्र को चोट आती है और वह स्वयं को अस्पताल में पाता है। इस घटना से सुरेन्द्र का मन भगवान के प्रति कठोर होने लगता है। साथ ही वह अस्पताल से छुट्टी पाकर घर में अपने पिता को रूप बदलते देखता है। जिसमें वे दलित से स्वर्ण हो जाते हैं और ब्राह्मण बन अपने व्यवसाय को चले जाते हैं। उसकी भी इच्छा साथी दोस्तों को अपने पिताओं का हाथ बंटाते देख अपने पिता जैसा बनने की होती है परन्तु उसकी माँ  उसे सिर्फ पढाई पर ध्यान केन्द्रित करने को कहती है।

भले ही अंगूरी (सुरेन्द्र की माँ)  से कौशल्या नाम उसके पति (सुरेन्द्र के पिता) ने बदल दिया किन्तु वह पहले की तरह प्रगतिशील सोच की धर्मिणी होने के बावजूद भी स्वयं का जमीन पर हक़ छोड़ देती है। उसके लिए वह कोई संघर्ष करती नहीं दिखाई देती। जिस इलाके में सुरेन्द्र का परिवार रहता है उस बस्ती का भी आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक चित्रण उपन्यास में समांनातर चलता रहता है। इसके अलावा आवंतर कथा प्रसंगों में सुरेन्द्र के अध्यापक वासुदेव सर का मृदु स्वभाव तथा दूसरी ओर आर्या सर का घोर जातिवादी होना भी है। आर्या जैसे लोग दलितों से ही काम करवाने की सोच रखते हैं। इन दोनों अध्यापकों के परस्पर व्यवहार तथा उसके अलावा सहपाठियों के साथ होते दो व्यवहार से भी सुरेन्द्र की भी सोच वैसे ही बदलती जाती है।

आर्या सर का पक्षपाती व्यवहार तथा उसके चलते थूक गिरा हुआ पानी भी चाव से पीना मानों उनके लिए सही सजा निर्धारित की गई हो। इस तरह कहानी स्कूल, गली में लगातार तेजी से घटती चली जाती है और इस घटनाक्रम में दशहरे का, रामलीला का जिक्र तथा वहाँ भी भेदभाव यह दिखाता है कि हर छोटा-बड़ा, उंच-नीच भले वह उम्र में हो या जाति में दिखाई दे ही जाता है। रामलीला के लिए जुटाए जाने वाले अंशदान में भी धर्मभीरुता का डर दिखाया जाता है। हर तरफ शोषण तथा उसकी दहलीज पर बड़े लोग और सुरेन्द्र तथा उसके साथ भाषण प्रतियोगिता, गायन प्रतियोगिता आदि जैसी गतिविधियों में भी हमेशा तीसरे दर्जे पर रखे जाते।

उपन्यास गूदड़ बस्ती में धार्मिक अंधविश्वास तथा कुरीतियाँ जमकर तब दिखाई देने लगती हैं जब गंदगी में रहने के कारण बिमारियाँ चपेट में लेने लगती हैं और दवा-दारु के नाम पर फर्जी डॉक्टर या फिर झाड़-फूंक ही नजर आता है। संघर्षों से पार पाती हुई कौशल्या, सुरेन्द्र की माँ तथा एक स्कूल से दूसरे स्कूल में सुरेन्द्र का दाखिला एक नए घटनाक्रम को अंजाम तक पहुंचाता है। जहाँ एक बार पुन: पिछले स्कूल से ज्यादा घोर जातिवाद से उसका सामना होता है और यहाँ आकर वह एस० सी०, एस० टी० के सही मायनों से रूबरू होता है और घर में पिता से भी इसके बारे में पूछता है। इस स्कूल में जातिगत भेदभाव ही नहीं अपितु शारीरिक शोषण भी मुँह बाए खड़ा नजर आता है। लेकिन यहाँ शोषक का नाम न देना भी एक संकेत है कि वह अवश्य ही सवर्णवादी रहा होगा।

इसके अलावा बड़े स्कूलों में एक और रोचक बात होती है जिसका जिक्र करते हुए लेखिका कहती है कि यहाँ मास्टरों मैडमों के नाम भी उनके व्यवहार के अनुसार बदल दिए जाते हैं जैसे करेला, चवन्नी, चरसी, चोंचु आदि। ये नाम भी उपन्यास में इसलिए हैं कि ये अध्यापक किसी न किसी तरह बच्चों को मारने, पीटने की तरकीब निकाल ही लेते हैं। कभी काम न पूरा होने पर तो कभी वर्दी ठीक न होने पर, कभी कॉपी पर कवर न होने के कारण या कभी कुछ यूँ ही। यहाँ भी घटनाएँ तेजी से बदलती हुई पुन: मोहल्ले में लौटती है। जहाँ सुरेन्द्र का बड़ा भाई दिनेश पड़ोस की किसी लड़की को कोई दूसरा आदमी छेड़कर चला जाता है और प्रतिउत्तर में दिनेश इस वाक्यात को खड़ा देखता रहता है।

फिर पड़ोस की पुष्पा चाची चिल्लाते हुए कहती है- जयपाल सरमा नाम रखने से कोई पंडिज्जी जात नहीं बदल जाती, रहोगे तो जाटव ही। यहाँ फिर सुरेन्द्र जिज्ञासु भाव से अपनी माँ से सच जानना चाहता है। इस प्रकरण में उसकी माँ बताती है कि गिरीस चौहान, जवाहर सागर, सूरज सिंह पल्ली बस्ती का तेरे पाता सभी एक ही जाति के हैं। भगवान ने सबको एक बनाया है। ऊँच-नीच इंसानों की बनाई बातें  हैं। यहाँ पुन: ईश्वर में आस्था जगती है। सुरेन्द्र की और अपनी बच्चों- बच्चों की टोली बना घर की छत पर भजन मंडली चलाने लगता है। इस बीच शादी ब्याह, मंदिर आदि जैसे कई आवंतर प्रसंग भी आते रहते हैं।

इसके बाद पुन: कहानी जब स्कूल से जुड़ती है तो पिछले स्कूल से कहीं ज्यादा यहाँ नए स्कूल में भेदभाव के चलते सुरेन्द्र को सरस्वती वंदना ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे’ गाने के लिए नहीं दी जाती उल्टा वह अपने अध्यापक भारद्वाज सर से थप्पड़ खाता है। इन सबमें अशोक, गंगा, दीपू, मनोज आदि भी होते हैं जो सरस्वती वंदना प्रतियोगिता से चलते कर दिए जाते हैं। यहाँ फिर एक बार भगवान से जब सुरेन्द्र नाराज होता है तो लगता है पूरे उपन्यास में वह एक भाव से भगवान को नहीं देख पाता। उसकी आस्था , अनास्था परिस्थिति दर परिस्थति बदलती जाती है।  इसके बाद गली मोहल्ले के पार्कों में होने वाले खेलों से जुड़ती हुई कहानी द्रौण और अश्वत्थामा के मिथक से जुड़ती है और उसके बाद पुन: तोड़-फोड़, माँ- बहन की गालियों, एक-दूसरे के सिर फोड़ने से जुड़ती है तथा अवसरवादी राजनीति हर पात्र में नजर आने लगती है।

धीरे- धीरे अवसरवादी राजनीति ही नहीं अवसरवादिता हर क्षेत्र में नजर आने लगती है। जैसे अधपढ़े लिखे, झोला-छाप डॉक्टर जो दवाईयों के नाम पर नशाखोरी का धंधा भी चलाते हैं और इस धंधे में तेजा जैसे लोग भी सामने आते हैं। जो जेल में जाने पर भी उसके भीतर से भी इस कारोबार को अनवरत चलाए रखते हैं और इनके नाम पर मलाई चाटते पुलिसिए भी खुलकर सामने आने लगते हैं तथा इसी के साथ हँसी-ख़ुशी के चंद लम्हे भी स्वत: लक्षित होने लगते हैं। जो कि उनके सजीव होने तथा ज़िंदा होने का प्रमाण देते हैं। इन घटनाओं में राजनीति के स्तर पर बड़ी घटना इंदिरा गाँधी का मारा जाना और इस बीच सुरेन्द्र के पिता की तबियत का बिगड़ जाना भी समानांतर चलता रहता है और भावनात्मक समुद्र में डुबकियाँ खाते लोग, कठोर पत्थर दिल लोग, स्वार्थी लोग सभी एक साथ नजर आने लगते हैं।

इनमें से एक सुरेन्द्र का बड़ा भाई दिनेस भी शामिल है। जो लूट पाट मचाता है और लोगों के घरों से जबरन सामान उठा लाता है। दंगे, कर्फ्यू सब जब धीरे-धीरे क्रोध और गुस्से की अग्नि को कम करने लगते हैं तब जीवन सामान्य होने लगता है। किन्तु इस सबमें बड़ी दुर्घटना पंडिज्जी की अपेंडिक्स के कारण मृत्यु भी शामिल है। अस्पताल से घर लौट आने के बाद पंडिज्जी की तकलीफ़देह मौत से परिवार पुन: सदमे में आ जाता है और अन्तिम संस्कार में भी वही पुरानी रीति-नीति दोहराई जाती है कि बड़ा बेटा भले कैसा हो अन्तिम उत्तरदायित्व पूर्ण करने का अधिकारी वही होगा। यहाँ आकर कहानी के पात्रों में आशा की किरण नजर नहीं आती और पंडिज्जी के परिवार को उनकी कमी खलती है।

साथ ही जो समानांतर राजनीतिक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है वे भी लगातार अखबार की सुर्ख़ियों में बनी रहती हैं। इसके बाद पुन: संघर्षों का दौर प्रारम्भ होता है। बच्चों को पढ़ाकर प्रिंटिंग प्रेस में काम करके जैसे-तैसे घर चलता है। इतने कष्टों के बाद भी जब मीनू बारहवीं में अव्व्ल आकर कॉलेज तक पहुँचती है तो गूदड़ बस्ती में एक इतिहास कायम हो जाता है। क्योंकि वह उस इलाके ही नहीं घर-परिवार की भी पहली लड़की थी जो कॉलेज तक पहुंची थी। उसके बाद सुरेन्द्र का भी कॉलेज में दाखिला होना मानो उपन्यास की कहानी को अंत तक आते-आते पूर्व दीप्ति शैली से बाहर निकाल लाता है।

सुरेन्द्र को कॉलेज में मीनू और उसके दोस्त दीपक को आपस में बैठे देखना धीरे-धीरे उनका आपस में यूँ ही घंटों बिताना भी विचलित करता है। दूसरी ओर राजेन्द्र उसका बड़ा भाई फ़िल्मी गानों को कैसेट में भरने का काम-धंधा भी सुचारू रूप से बंटी के साथ मिलकर चला रहा होता है। इधर दूसरी ओर कॉलेज में भी जातिगत प्रसंग आते रहते हैं और दूसरी ओर मीनू व दीपक का प्रेम हिलौरें लेने लगता है यह सब बात जब दिनेश तक पहुंचती है तो वह मरने-मारने पर उतारू हो जाता है और एक दिन मीनू गायब हो जाती है।

काफी इधर-उधर, कॉलेज, दोस्तों के घर ढूंढने पर भी वह नहीं मिलती तो थक हारकर सुरेन्द्र और उसकी माँ लुईस स्टेशन जाने को उद्यत होते हैं। ऐसा नहीं है ये सिर्फ मीनू की कहानी कहता उपन्यास है। अपितु इसमें रितु, विपिन, किशोर, साहिल जैसे पात्र भी हैं। जिनका भी दूसरी ओर प्रेम प्रस्ताव चलता है उसे लेकर लड़ाईयां भी होती हैं और उच्च जाति की रितु साहिल को पिटता देख खुश भी होती है। इस तरह उपन्यास संक्षिप्त कथावस्तु की खूबी  लिए हुए हमारे सामने आता है और कई विचार तथा प्रश्न हमारे मन के अनेक कौनों में कौंधा कर चला जाता है

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लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क +919166373652 tejaspoonia@gmail.com

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