चर्चा मेंदेशसमाज

भीड़-तंत्र का जातीय चेहरा

  • जयप्रकाश कर्दम

हाल के समय में देश भर में मॉब लिंचिंग की सिलसिलेवार हुई घटनाओं ने प्रेम, अहिंसा, शांति और सह-अस्तित्वपूर्ण जीवन की कामना करने वाले लोगों को विचलित किया है। ’मोब लिंचिंग’ अर्थात लोगों द्वारा भीड़ बनकर किसी की हत्या कर देने के सफल प्रयोग ने आज दमन और दहशतगर्दी का सर्वथा नया माहौल पैदा किया है| यह भीड़ अपना काम करके बड़ी सहजता से तितर-बितर हो जाती है| भीड़ उन्मादी होती है| वह सही गलत नहीं देखती, न कोई तर्क सुनती है| यह भीड़ केवल लक्षित व्यक्ति/व्यक्तियों की हत्या करती है| मॉब या भीड़ कहीं भी,किसी भी चिन्हित व्यक्ति या व्यक्तियों की हत्या कर देती और बड़ी सहजता से घटना स्थल से ग़ायब हो जाती है। भीड़ ने कब किसको घेरकर मार दिया, पुलिस को कुछ पता नहीं चलता। पता चलता भी है तो भीड़ द्वारा अपना लक्ष्य पूरा कर तितर-बितर हो जाने के बाद।

कहीं भी, किसी भी स्थान पर भीड़ अचानक कहाँ से एकत्र हो जाती है? किसी एकाध स्नान पर ऐसा होना संयोग माना जा सकता है, किंतु ऐसी घटनाओं का बार-बार घटित होना संयोग नहीं हो सकता। यह एक सुनियोजित तरीक़े से एक ख़ास मनोवृत्ति के लोगों द्वारा किसी चिन्हित या निर्देशित स्थान पर एकत्र होकर घटना को सामूहिक रूप से अंजाम देने की ओर संकेत करता है। भीड़तंत्र की अराजकता को लेकर आज व्यक्त की जा रही चिंता और उसके विरुद्ध उठ रही आवाज़ों से ऐसा प्रतीत होता है कि यह भीड़तंत्र आज आज पैदा हुई समस्या नहीं है। किंतु ऐसा नहीं है। भीड़तंत्र आज विकसित नहीं हुआ है। भीड़तंत्र का इतिहास काफ़ी पुराना है। बहुत दूर ना जाकर स्वतंत्र भारत में, क़ानून के राज्य में ही भीड़ द्वारा लोगों की सामूहिक हत्या करने के अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं।

सत्तर के दशक में बेलछि, कंझवाला, साढ़ूपर, शेरगढी, लक्षमणपुर बाथे आदि अनेक स्थानों पर निहत्थे, निरीह दलितों की नृशंसतापूर्वक सामूहिक हत्या भीड़ द्वारा ही की गयी थी। भीड़ द्वारा की गयीं दिल दहला देने वाली ये सारी हत्या और सामूहिक हत्याएँ जातीय अहं और वर्चस्व की भावना से प्रेरित थीं। पुलिस कार्रवाई की औपचारिकता पूरी हुई, एफआईआर दर्ज हुई, मुकदमे भी चले लेकिन कितने लोगों को सज़ा हुई? अधिकांश मामलों में पुलिस कोई ठोस सबूत किसी अभियुक्त के ख़िलाफ़ न्यायालय में प्रस्तुत नहीं कर सकी और हत्यारे सरे आम पूरे रोब और दबदबे के साथ छुट्टे साँड़ की तरह घूमते रहेऔर आज भी घूम रहे हैं। यह जाति का भीड़-तंत्र या भीड़तंत्र का जाति संस्करण था। भीड़तंत्र से लोकतंत्र और मनुष्यता की रक्षा की चिंता करने वाले अधिकांश बौद्धिक और भद्रजन भी उच्च-जातीय हैं इसलिए उन जातीय नर-संहारों के विरुद्ध,समाज की तो बात छोड़िए बौद्धिक वर्ग के अंदर भी कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं हुई। मीडिया और समाज में सब देखते, पढ़ते और सुनते वे मौन बने रहे। यहाँ यह उल्लेख करना भी अप्रसांगिक नहीं होगा कि दलित स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार करने वाले लोगों के समूह भी ‘जाति’ की छोटी भीड़ ही होते है।

सामूहिक हत्या और बलात्कार के द्वारा हिंसा के आतंक से भयभीत कर दलितों में पैदा हो रही स्वावलम्बन, स्वाभिमान और मानवीय अधिकारों की संघर्ष चेतना को दबाकर कर जहाँ उनके सामाजिक अस्तित्व और अस्मिता को ध्वस्त किया जाता है वहीं आजीविका के साधन और स्रोतों से बेदख़ल या उन पर क़ब्ज़ा कर आर्थिक रूप से भी उनकी कमर तोड़ी जाती है। ये वो प्रयास हैं जिनके द्वारा उन पर विभिन्न प्रकार के निषेध और वर्जनाएं लादकर उन्हें सहजता से गुलाम बनाया जा सकता है। एक लोकतांत्रिक राज्य में लोकतंत्र विरोधी कार्यों और कार्रवाइयों पर कोई अंकुश न लग पाना लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है। भले ही कहने के लिए जाति एक सामाजिक व्यवस्था हो, किंतु व्यवहार के धरातल पर यह धर्म द्वारा संचालित व्यवस्था है, उसे धर्म का संरक्षण, समर्थन और मर्गदर्शन प्राप्त है। जाति का यह धार्मिक चरित्र ही उस हिंसक हिंदुत्व का आधार है जिसे सदियों से दलितों द्वारा हिंसा, आतंक और दमन के रूप में देखना और भोगना पड़ा है, और आज भी वे उसकी पीड़ा और दंश को भोगने के लिए विवश हैं। मौजूदा दौर में गौ या गौवंश-वध और गौ-मांस सेवन को गैर-कानूनी बनाना या बीफ सेवन करने तक का विरोध करना हिंदुत्व के उसी दिशा में बढते कदम हैं।

किसी भी व्यक्ति या समाज को पंगु या गुलाम बनाने के लिए उसकी निजता के अधिकारों से वंचित करना पहली आवश्यकता है, ताकि वह वही करे, खाए या पहने जो करने, खाने या पहनने की अनुमति या स्वतंत्रता उसका मालिक या शासक उसे दे। खान-पान, पहनावा आदि व्यक्ति की निजी रूचि या स्वतंत्रता की चीजें हैं। धर्म के नाम पर गाय/गोवंश हत्या पर प्रतिबंध, गोरक्षा के नाम पर हो रही हत्याएँ आदि चिंताजनक है| गौरक्षा में कुछ भी गलत नहीं है। जीव-हत्या के विरुद्ध अभियान एक मानवीय कृत्य है। गाय ही क्यों ग़ैर-पालतू सभी जीवों की रक्षा और देखभाल करना सरकार का काम है। इसे सरकार पर छोड़ देना चाहिए। सरकार को सुझाव दिए जा सकते हैं, सरकार के कार्यों की प्रशंसा या आलोचना की जा सकती है, किंतु कानून या सरकार के अधिकारों को अपने हाथों में लेने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में कानून का शासन है। गौरक्षकों का कार्य सड़कों, गलियों में भूखी-प्यासी घूम रही गायों को उचित जगह ले-जाकर उन की देखभाल करना होना चाहिए। गौरक्षा के निमित्त उनका यह महत्वपूर्ण योगदान होगा। किंतु, गौ-रक्षा के नाम पर भीड़ द्वारा जिस प्रकार की आतंक और अराजकता का मौहौल पैदा किया जा रहा है यह दमन के साम्राज्य के उदय का प्रतीक है। यह उस धार्मिक उन्माद की उपज है, जो उनकी राह से अलग चल रहे लोगों पर ज़बरन अपनी आस्था, विश्वास और सैद्धांतिकी थोपकर उन पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। यह तथ्य छिपा नहीं रह गया है कि वर्तमान में भीड़ द्वारा जिन लोगों की हत्या की गयी है वे प्रायः: मुस्लिम और दलित है। अपवादस्वरूप एकाध जगह सवर्ण हिंदू भी इस भीड़तंत्र की चपेट में आ गए हैं। भीड़तंत्र  के चरित्र को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आज का भीड़तंत्र जाति के भीड़तंत्र का साम्प्रदायिक संस्करण है। जातिगत हिंसा और हत्या के पीछे मुख्य कारण कमर सीधी करके, सिर उठाकर स्वाभिमान के साथ जीने की कोशिश कर रहे दलितों की कमर तोड़कर उन पर अपना जातीय वर्चस्व क़ायम रखना था तो साम्प्रदायिक हिंसा और हत्याओं के पीछे मुख्य कारण मुसलमानों एवं अल्पसंख्यकों की कमर तोड़कर उन पर अपना साम्प्रदायिक वर्चस्व स्थापित करना है। लोकतंत्र में आपसी समानता, समझ और सामंजस्यपर आधारित लोकवाद विकसित होना चाहिए था, जो लोकतंत्र के विकास के लिए शुभ होता, किंतु दु:खद है कि लोकवाद की जगह अलगाव, अतिवाद और वैमनस्यता पर आधारित भीड़वाद विकसित हो रहा है, जो देश के सामाजिक एवं सांस्कृतिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है।

 

जयप्रकाश कर्दम

लेखक और सामाजिक चिंतक

मो. नं -9871216298

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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