चर्चा मेंदेशसामयिक

कुल राष्ट्रीय आय में 73% सिर्फ 1% के पास

 

अब लगता है कि डार्विन को लेकर गंभीर माहौल बनेगा। पहले महसूस हुआ था कि मानव संसाधन राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने विकासवाद के विरुद्ध जोश में कहा है। वेदों के प्रति रूढ़िवादियों के स्वाभाविक आग्रह की तरह उनके बयान को देखा। पर आईआईटी गुवाहाटी में कल उन्होंने फिर दोहराया कि वानर से नर का विकास नहीं हुआ क्योंकि हमारे पूर्वजों ने ऐसा होते नहीं देखा। वे इस विषय पर वैज्ञानिकों का अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन करने वाले हैं जहाँ विकासवाद और सनातनवाद के बीच अंतिम फ़ैसला होगा। इसलिए अब यह विषय हल्का या सरल नहीं रह गया है।

यदि विकास नहीं होता, सब कुछ सनातन है तो मानना चाहिए कि सूरज से पृथ्वी नहीं बनी; न कोई ग्रह या नक्षत्र उतपन्न होता है, न नष्ट; मनुष्य को ईश्वर ने बनाकर एक ही बार में उपस्थित कर दिया; न कोई नयी प्राणी-प्रजाति जन्म लेती है, न विलुप्त होती है।

यदि ऐसा है तो गीता का ज्ञान निरर्थक है क्योंकि कृष्ण वहाँ सृष्टि के उद्भव, विकास और विलीन होने का विस्तृत वर्णन करते हैं। पुराणों में भी चार युगों की कल्पना है और ये चारों युग बार-बार आते हैं। यानी, हर बार नये सिरे से सृष्टि का जन्म, विकास और विनाश होता है।

 अब, यह भी किसी ने नहीं देखा कि पहली सृष्टि कैसी थी, अब की सृष्टि उससे कितनी भिन्न या समान है? सृष्टि का रचयिता स्वयं कैसा है? पिछली सृष्टि के मनुष्यों ने उसका कौन सा स्वरूप माना था? सब कुछ नष्ट होने के बाद नये सिरे से शुरू हुआ है!

हिंदू पुराणकथाओं में ब्रह्मा ने सृष्टि बनायी लेकिन उनसे पहले बाज और हाथी जैसे अनेक प्राणी थे। ब्रह्मा ने शिव को नहीं बनाया, वे आदिदेव हैं और अपनी पुत्री उषा से पहले-पहल व्यभिचार करने पर वे ब्रह्मा को अपने धनुष से एक तीर मारते हैं जिससे उनकी जाँघ पर घाव हो जाता है। अर्थात् सृष्टि के अनेक प्राणी और समाज के अनेक नियम पहले से मौजूद थे। तब ब्रह्मा ने कौन सी सृष्टि बनायी?

मनुष्य रूपी ईश्वर ने ईसाइयों की सृष्टि भी बनायी। आदम-हौवा की कहानी बताने की ज़रूरत नहीं है। जैसे आदिसृजनकर्ता ब्रह्मा का कार्य अनैतिक था, उसी तरह आदम-हौवा का ज्ञान-फल चखना भी अमान्य था। पर दैवी संसार से मानवीय संसार तब अलग हुआ जब ज्ञान का फल चखा गया! (हम वापस अज्ञान की तरफ़ जाने को क्यों व्याकुल हैं?)

सभी धार्मिक कथाएँ विकास का एक स्वरूप प्रस्तुत करती हैं। पर हमारे वेद—ऋग्वेद— में क्रमिक विकास का भरा-पूरा वर्णन है। यह एक बार भी नहीं कहा गया कि हम ज्ञान की पराकाष्ठा पर पहुँच गये हैं, हमारे बाद कोई नया विकास नहीं होगा!! लेकिन हमारे कूढ़मगज़ राजनीतिज्ञ केवल वेदों और पुरखों की माला जपते हैं, समाज को पीछे ढकेलने के लिए क्योंकि वे जनता की वर्तमान समस्याएँ सुलझा नहीं सकते। देश में आय की असमानता इतनी बढ़ गयी है कि पिछले एक साल में कुल राष्ट्रीय आय में से 73% आय केवल 1% लोगों के पास गयी है और 80% लोगों के हाथ केवल 1% आय आयी है। केवल धनिकों की सेवा करने वाले राजनीतिज्ञ ऐसे भड़कावे वाले और अज्ञानमूलक विषय उठाकर लोगों को भरमाते, भटकाते और लड़ाते हैं ताकि विषमता पर लोगों का ध्यान न जाय। हम सब लेखकों और बुद्धिजीवियों का कर्तव्य है कि इस नीति और तिकड़म को समझें और लोगों को इसे समझने में सहायता करें

.

Show More

अजय तिवारी

लेखक हिन्दी के प्रसिद्द आलोचक हैं। सम्पर्क +919717170693, tiwari.ajay.du@gmail.com
5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments

Related Articles

Back to top button
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x