शिक्षा

कोरोना क़ालीन शैक्षिक संकट और रास्ते

 

कोविद 19 के रूप में, बिना किसी पूर्वाभास के, अचानक आ गयी इस सर्वग्रासी वैश्विक महामारी ने न केवल आर्थिक चक्के को जाम कर दिया है, बल्कि शैक्षिक गतिविधियों को भी ठप कर दिया है। आर्थिक गतिविधियों की सुचारुता तात्कालिक गतिविधियों के लिए जरूरी है। लेकिन वह शिक्षा ही होती है, जो आर्थिक उन्नयन के लिए भी आवश्यक बौद्धिक एवं मानवीय संसाधन उपलब्ध कराती है। इसलिए आर्थिक गतिविधियों को गतिशील बनाने की चिन्ता जितनी जरूरी है, उतनी ही दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाली शैक्षिक गतिविधियों की भी चिन्ता की जानी चाहिए। परन्तु वर्तमान माहौल में स्वास्थ्य और आर्थिक चिन्ता ही इतनी विराट हो गयी है कि शैक्षिक जरूरत की ओर से ध्यान एकदम हट गया है। यह उसी तरह है, जैसे घर में लगी आग को बुझाने की व्यस्तता में बच्चा उसी आग लगे घर में ही छूट जाय।

कोरोना की संक्रामकता के कारण विद्यालय-महाविद्यालय जब बन्द किए गये तो अधिकतर संपन्न निजी शैक्षिक संस्थाओं ने व्हाट्सऐप, जूम आदि पर शिक्षा की वैकल्पिक राह तलाश ली। वे वीडिओ पर क्लास लेने लगे और व्हाट्सऐप पर होमवर्क देने लगे। परिणाम हुआ कि छोटे-छोटे बच्चों को मोबाइल के छोटे स्क्रीन को एकटक ताकते रहना पड़ रहा है, उनके माता-पिता को अपना मोबाइल ही उन्हें नहीं देना पड़ रहा है, बल्कि मोबाइल के सामने बच्चों के बैठाने की देखरेख भी करनी पड़ रही है, जो पहले शिक्षकों की जवाबदेही थी। बीच-बीच में आने वाले फोन के कारण बच्चे के क्लास में बार-बार व्यवधान उत्पन्न होता है।

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दिए गये होमवर्क को तैयार करवाना भी माता-पिता के माथे पर ही है, जिसके पूर्ण-अपूर्ण, सही-गलत की जाँच की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। उन संस्थाओं को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि अधिक देर तक किसी गजट के स्क्रीन को देखने के कारण बच्चे की आँखें खराब हो रही हैं और बह बुद्धिमंदता का शिकार होता जा रहा है। उन्हें इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इस व्यवस्था से बच्चों के परिवार के सम्मुख क्या परेशानियाँ खड़ी हो गयी हैं। बच्चे सीख भी रहे हैं या नहीं, व्यावसायिक संस्थानों को इस बात की भी चिन्ता नहीं है। उन्हें मतलब तो केवल इस बात से है कि उनकी आय की निरन्तरता दुरुस्त हो रही है या नहीं। इसलिए व्यावहारिक प्रक्रिया के निरस्त होते ही उन्होंने आभासी शैक्षिक प्रक्रिया का दामन पकड़ लिया।

इस नवव्यवहृत शैक्षिक प्रक्रिया पर शिक्षायी, सामाजिक, स्वास्थ्य-सम्बन्धी हज़ार प्रश्न हैं, लेकिन नाक-भौं सिकोड़ते हुए भी लोग उसी में चल भी रहे हैं, उसी तरह, जैसे जाना जरूरी है, इसलिए कीचड़ सूखने की राह देखते हुए बैठे रहने की अपेक्षा कीचड़ सने रास्ते पर फिसलते हुए भी चल रहे हैं। यह समृद्ध संस्थाओं के समर्थ छात्रों की कहानी है।

लेकिन सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों में, जिसमें अधिकतर हाशिए पर खड़े लोगों के बच्चे ही पढ़ते हैं, शैक्षिक प्रक्रियाओं की पुनर्बहाली के लिए तो कानाफूसी भी नहीं हो रही है। देहातों और शहरों में खड़े उन गेरुआ रंग के अधिकतर दोमंजिला भवनों में लगभग तीन महीने से शैक्षिक गतिविधियों पर ताला जड़ा हुआ है। अनेक विसंगतियों के बावजूद मध्याह्न भोजन भेजने की रस्म अदायगी हो रही है। शिक्षकों के खाते में पैसे भी जा रहे हैं। लेकिन वे लाखों शिक्षक और करोड़ों नंग-धड़ंग छात्र कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं, आगे की क्या योजना है, इस पर व्यवस्था में रहस्यमयी खामोशी है। जो परिसर कल तक बच्चों के पदचाप और शोर से गूँजता था, आज वहाँ कोरोना से संक्रमित या संक्रमण की संभावना वाले उदास और खीझ से भरे लोग बैठे हैं। आख़िर विद्यालयों को ही क्यों अस्पतालों में तब्दील कर दिया गया?

विद्यालय में क्वारंटाइन में रखे गये मजदूर

क्यों अन्य सरकारी भवनों की ओर नज़र उठाकर भी नहीं देखा गया? यहाँ तक गाँवों में बन्द पड़े प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों, बेकार पड़े पंचायत भवनों, सामुदायिक भवनों, कृषि भवनों आदि को भी आइसोलेशन और क्वेरेंटाइन सेंटर के रूप में नहीं लिया गया। आपदा के नाम पर बच्चों की शिक्षा-प्राप्ति के महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार को ही क्यों निरस्त किया गया? केवल शिक्षा ही नहीं, संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा जीवन, स्वास्थ्य, सुरक्षा, स्वीकृति आदि सार्वभौमिक अधिकारों के संरक्षण के लिए भी कोई चिन्ता व्यक्त नहीं की गयी। यह प्रश्न कुछ लोग पूछ तो रहे हैं, लेकिन जवाब देनेवाला कोई नहीं है। शायद इसलिए कि व्यवस्था, सार्वजनिक शिक्षा को, जरूरी कामों की लिस्ट में सबसे नीचे रखती है और शायद इसलिए भी कि सार्वजनिक शिक्षा की माँग को लेकर आम आदमी सड़कों पर घेराव नहीं करता है।

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अभिजात्य समूह के बच्चों की तर्ज पर हाशिए पर खड़े समूह के बच्चों को नहीं पढ़ाया जा सकता है। वे इस तरह पढ़ेंगे ही नहीं। यह केवल नेटवर्क की उपलब्धता और कई हज़ार रुपए के महँगे फ़ोन खरीदने की सामर्थ्य की ही समस्या नहीं है, केवल बौद्धिक और शारीरिक ह्रास की ही बात नहीं है। यह तो है ही। इसके साथ ही बड़ी समस्या है कि ये उस परिवेश के बच्चे हैं, जिस परिवेश की पहली पीढ़ी घर से निकलकर पहली बार विद्यालय के परिसर में दाखिल हुई है। ये बच्चे उस परिवेश से आते हैं, जिसमें पढ़ाई-लिखाई की नहीं, बल्कि जीवन जीने के जद्दोजहद की चर्चा होती है।

ऐसे में उन्हें मोबाइल, टैब या टीवी उपलब्ध करा भी दिया जाए तो उन्हें उस गजट के सामने कौन बैठाकर रखेगा? माता-पिता काम पर जाएँगे या बच्चों की देखभाल करेंगे? उनका डाटा कौन भरवाएगा? उनका होमवर्क कौन करवाएगा? और, सबसे बड़ी बात उस अनपढ़ परिवार में कौन उसे हाथ पकड़कर ‘अ’ लिखना सिखाएगा?

अर्थात शिक्षा की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के बगैर शिक्षा का आभास उत्पन्न किया जा सकता है, पूरी और मुकम्मल शिक्षा कभी नहीं दी जा सकती है। अभिवांचित समूह के बच्चों को ही नहीं, अभिजात्य समूह के बच्चों को भी नहीं दी जा सकती है। इस तरह की शिक्षा सामर्थ्यवान समूह के बच्चों के लिए भी पूरक के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है, उसी तरह जैसे भोजन की पूरी सामग्री की उपलब्धता के बाद चटनी का इस्तेमाल स्वाद बढ़ाने के लिए करते हैं। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि चटनी को ही भोजन बना दिया जाय।

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कोरोना का संकट तो लम्बा चलनेवाला है। तो क्या वर्षों तक सार्वजनिक शिक्षा इसी तरह निरस्त रहेगी? या आभासी अनौपचारिक ऑनलाइन शिक्षा-प्रक्रिया बहाल कर दी जाएगी और लम्बे समय तक चलते-चलते धीरे-धीरे वही पद्धति स्थापित हो जाएगी? यदि ऐसा हुआ तो केवल शिक्षायी दृष्टि से ही नहीं, स्वास्थ्य और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत घातक होगा। इसलिए कोरोना से बचाव करते हुए किस प्रकार शिक्षा का पुनर्प्रारम्भ किया जा सकता है, यह शिक्षाविदों और शिक्षाप्रेमियों के लिए बहुत बड़ा प्रश्न है, जिससे उन्हें जूझना चाहिए।corona village

व्यक्तिगत दूरी और सफाई – कोरोना से बचाव के लिए सुझाए गये ये दो महत्वपूर्ण उपाय हैं। प्रत्येक विद्यालय को स्क्रीनिंग किट उपलब्ध करा दिया जाय, जिससे विद्यालय में प्रवेश के समय ही प्रत्येक बच्चे की स्क्रीनिंग कर ली जाएगी। मास्क पहनकर आना अनिवार्य कर दिया जाय। बिना मास्क पहने या बुखार, जुकाम से पीड़ित बच्चों को द्वार पर से ही लौटाकर उसके अभिभावक को सुपुर्द कर दिया जाय। विद्यालय में दाख़िल हो चुके बच्चों को सर्वप्रथम साबुन से हाथ-पैर-मुँह धुलवा देने की व्यवस्था की जाय। रोज वाशिंग पाउडर या साबुन से कपड़ा साफ करके पहनने की हिदायत दी जाय। उन्हें बार-बार मास्क न उतारने और एक-दूसरे को न छूने की हिदायत दी जाती रहे। कक्षा में भी आवश्यक दूरी बनाकर बैठाया जाय और जिन कक्षाओं में बेंच की व्यवस्था नहीं है, उसमें बैठने का घेरा बना दिया जाय।

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शिक्षकों को भी साबुन, मास्क, सेनेटाइजर, ग्लब्स आदि आवश्यक साधन उपलब्ध कराया जाय। चूँकि शिक्षक के भी संक्रमित होने की आशंका होगी, इसलिए वे छात्रों को संजीदगी के साथ आवश्यक निर्देश देते रहेंगे। जिन विद्यालयों में शिक्षा-अधिकार के मानकों के अनुरूप वर्ग और शिक्षक-छात्र अनुपात नहीं है, वहाँ तत्काल 4-4 घंटे के दो शिफ्ट में कक्षाएँ ली जा सकती हैं। लेकिन युद्ध-स्तर पर वर्ग और शिक्षक की कमी दूर कर लेनी होगी। सबके बावजूद जिस पंचायत या मुहल्ला में संक्रमण की खबर हो, वहाँ शून्य संक्रमण होने तक विद्यालय बन्द रखा जाय। आवश्यकतानुसार अन्य एहतियायतों को भी इसमें जोड़ा जा सकता है।

‘जहाँ चाह, वहाँ राह।’ व्यवस्था जब सोचने लगेगी कि बच्चों को कैसे पढ़ने के अवसर से वंचित नहीं होने देना है तो अन्य आवश्यक साधन भी उपलब्ध होने लगेंगे।

anil kumar rai

लेखक आरटीई फोरम, बिहार के संयोजक हैं।

सम्पर्क- +919934036404,  dranilkumarroy@gmail.com

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अनिल कुमार रॉय

लेखक सामाजिक कार्यकर्त्ता और ‘आसा’ के संयोजक हैं| सम्पर्क +919934036404, dranilkumarroy@gmail.com
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