सिनेमा

तलाक़-त्रासदी से उत्सव तक का सफ़र ‘डीकपल्ड’

 

मनू जोसफ की कहानी, हार्दिक मेहता का निर्देशन, आर माधवन और सुरवीन चावला की नेटफ्लिक्स वेब सीरिज़ ‘डीकपल्ड’ जो आपको दिल्ली-एनसीआर गुरुग्राम के हाईप्रोफाइल जोड़े की टूटते रिश्तों की कहानी लगेगी लेकिन वास्तव में यह रिश्तों के टूटने की नहीं बल्कि वैवाहिक सम्बन्धों के टूटने की कहानी है, परम्परागत वैवाहिक संस्था जिसमें अब नये जोड़-तोड़ की ज़रूरत महसूस हो रही है।

‘डीकपल्ड’ अपनी बेटी के कारण इस रिश्ते को तलाक़ के बाद भी बनाए रखना चाहते हैं, दोस्ती की तरह निभाना चाहते हैं, एक ही छत के नीचे रहकर एक दूसरे का ख्याल रखना चाहतें हैं, फिर आप भी नायिका श्रुति की माँ की तरह कहेंगे ‘तो फिर शादी में और क्या होता है?’ यह प्रश्न वास्तव में परम्परागत वैवाहिक सम्बन्धों के भीतर बन्धनों की घुटन की ओर इशारा करता है, कहानी इसी घुटन से निजात पाने की नयी खोज कर रही है जिसे हमारी मध्यवर्गीय मानसिकता अभी स्वीकार कर पाने की स्थिति में नहीं आई है क्योंकि जिस तरह वैवाहिक उत्सवों पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, इस संस्था का हमारे समाज में महत्व को इनकार नहीं किया जा सकता।

सीरीज़ की कहानी रिश्ता नहीं टूटने पर नहीं बल्कि इस टूटे हुए रिश्ते को नये नाम के साथ कैसे समेटे इस पर फोकस करने में है और यही एक ट्विस्ट पॉइंट है इस कहानी का। हालाँकि दोनों विवाहेतर सम्बन्धों में की कोशिश भी करते हैं लेकिन सक्सेसफुल नहीं हो पाते, शायद कारण है कि कहीं ना कहीं विवाह की गाँठ अभी भी बहुत मजबूत है चाहे वे कितने ही हाई-प्रोफाइल क्यों न हो! नाम भी भले ही अंग्रेजी में है ‘डीकपल्ड’।

कहानी सीधी-सादी है, पति आर्या आर माधवन एक सफल पल्प-फिक्शन लेखक है जो सुप्रसिद्ध चेतन भगत को अपना प्रतिद्वंद्वी मानकर उसके ऊपर आने की कोशिश कर रहा है। लुगदी साहित्य का लेखक सामान्य मानव की इच्छाओं को बिना किसी नैतिक-बन्धनों के प्रस्तुत करता है, यथार्थ की उन तमाम विकृतियों को उघाड़कर हमारे सामने रख देता है जिसे हम व्यवहार में आसानी से स्वीकार नहीं करते, यानी समाज पल्प के आईने में अपना विकृत रूप देखकर घबरा जाता है।

आर्या का व्यवहार ऐसा ही है हमें अटपटा लगना लाज़िमी है, उसकी पत्नी श्रुति सुरवीन चावला अब उसके इस व्यवहार से थक चुकी है और तलाक लेने का मन बना चुकी है। सोफिस्टिकेटेड माने जाने कॉर्पोरेट जगत से जुड़ी सफल श्रुति के ख्यालात और सोच बिलकुल नये ढंग के हैं जो ‘स्त्री सशक्तिकरण’ के संघर्ष से कुछ अलग है, जिसने 13 साल की उम्र से अपने बाथरूम को अपने पिता को भी इस्तेमाल नहीं करने दिया, जिसका दु:ख आज तक उसके पिता को है।

श्रुति तलाक को तलाकशुदा महिला की त्रासदी के रूप में नहीं जीना चाहती अपने ख्यालातों और निर्णयों में वो बिलकुल स्पष्ट है अपने पिता से साफ़ कहती है कि मैं वेल सेट्टलड हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि मुझे आपकी जायदाद से कुछ नहीं चाहिए। आप सब कुछ अपने बेटे को नहीं दे सकते। दोनों अपने तलाक का जश्न बनाकर यह साबित करना चाहते हैं कि ‘वैवाहिक बन्धन’ जब बन्धन लगने लगे तो अलग होने की प्रक्रिया दु:खदायी नहीं होनी चाहिए, अगर अलग होने में ख़ुशी है तो इस ख़ुशी को अभिव्यक्त करना चाहिए वरना समाज तो आपके चेहरे पर हमेशा बेचारगी देखना चाहता है।

भारतीय समाज में वैवाहिक बन्धन की पवित्रता और इस संस्था पर अटूट विश्वास के साथ यह दंभ है कि हमारे यहाँ तो तलाक होते ही नहीं अपितु सम्बन्ध विच्छेद की कोई संकल्पना ही नहीं रखी गई, इसलिए कि यहाँ तलाक के लिए कोई शब्द भी नहीं है। यह ठीक है तलाक बहुत पुरानी संकल्पना नहीं इस पर ‘मिस्टर एंड मिसेज़ 55’ गुरुदत्त मधुबाला की फिल्म आई थी जिसमें नायिका की माँ अपनी बेटी के लिए किराये का पति खोज रही है जो बाद में उसे तलाक दे दे, ताकि वह ‘वुमन लिबरेशन’ का झंडा फहरा सके, लेकिन अंत में जीत भारतीय संस्कारों की ही होती है और नायिका खुद ही तलाक देने से इनकार कर देती है।

पर आज हम डिजिटल युग में जी रहें हैं जहाँ चीज़ें पलक झपकते बदल जाती हैं। आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ में विकास की तीव्र गति में हमारे कदम कहाँ पड़ रहें है हमें भी नहीं मालूम, अंग्रेजी में सोचने वाला आज का युवा दोस्ती, प्रेम, विवाह, परिवार और तलाक की नई परिभाषाएं गढ़ने की प्रक्रिया में है। इसी सीरीज़ में ओशो की छाप लिए ‘अग्नि गुरु’ है, मनु जोसेफ की कहानी कहीं ना कहीं ओशो के विचारों से प्रभावित मानी जा सकती है जो समाज में वैवाहिक गठबन्धन को ‘बन्धन’ ही मानते थे जिनसे किसी का भला नहीं होता जिसके अनुसार सम्बन्धों के बन्धनों के बीच स्त्री पुरुष की सनातन भूख जो आदम हव्वा से शुरू हुई थी उसमें कोई कोई परिवर्तन नहीं आया है। ‘मैं एक्टिंग नहीं करता’ अग्नि-गुरु का यह संवाद हमारे आसपास के दिखावटी दुनिया पर टिप्पणी है जहाँ सुख भी दिखावा है तो दु:ख भी, सहानुभूति भी मुखौटे में लिपटी हुई है।

वैसे तो विवाह और तलाक पर भी समाज की सोच पुरातन ही है, भारतीय समाज में विशेषकर स्त्री के लिए तलाक किसी त्रासदी से कम नहीं है स्त्री का तलाक मतलब उसके जीवन में फुलस्टॉप। लेकिन श्रुति इसे नई शुरुआत की तरह लेना चाहती है। इसलिए दोनों डीकपल्ड गोवा में पार्टी रखतें हैं जिसमे वे यह संदेश दे रहें हैं कि तलाक़ से वे दोनों दु:खी नहीं बल्कि खुश है। फिल्म के अंत में अग्नि गुरुजी दोनों की बेटी रोहिणी को समझाते हैं कि जब चीज पास से समझ में न आए तो उन्हें दूर से देखना चाहिए क्योंकि स्पष्टता के लिए उचित दूरी ज़रूरी है और दूर से देखना वास्तव में परिवार में एक दूसरे को स्पेस देने की बात को ही स्पष्ट करता है।

स्त्री-पुरुष का यह बन्धन कहीं ना कहीं स्त्री पुरुष को बहुत कसकर बाँध देता है जो आप की गति को रोक देता है और एक टाइम के बाद हम इतना थक जाते हैं या तो आगे बढ़ना भूल जाते हैं या हथियार डाल देते हैं या फिर लड़ाई झगड़े करते हैं और तलाक जैसी नौबत आती है। रोहिणी आने वाली पीढ़ी बात को समझ जाती है उसके चेहरे पर मुस्कान छा जाती है। हालाँकि तलाक़ के उत्सव को अभी स्वीकार करने में बरसों लगेंगे लेकिन फिल्म बताती है पति पत्नी का रिश्ता कितना ही पवित्र घोषित कर दिया जाए दोस्ती से बेहतर कुछ नहीं।

आर्या अपनी हरकतों से समाज के नियमों के व्यवहारिक दोगलापन को बताता है। उसका तरीका हमें असामान्य लगता है जबकि हम खुद भी वह जानते समझते हैं पर अभिव्यक्त नहीं कर पाते। आर्या का ससुर एक ओर गणपति बप्पा का गुहार लगाते हुए पड़ोस के नवयुवकों के पॉप गीतों पर अपनी आपत्ति जताता है, उन्हें भला-बुरा कहता है, डीसी पद से रिटायर्ड अपने इस ससुर को आर्या को समझाना पड़ता है कि असुरक्षित शारीरिक सम्बन्ध स्त्री के लिए कितने खतरनाक होते हैं वह दृश्य आपको हास्यस्पद लग सकता है लेकिन एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण सन्देश उसमें छिपा है।

इसके अतिरिक्त सीरीज हमारे आसपास के बुद्धिजीवियों पर भी बार-बार टिप्पणी करती चलती है जो दुनिया में होने वाले आपदाओं से दु:खी प्रतीत होते हैं, उन पर शोध कर रहें हैं, और जाताना चाहतें हैं कि वे पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति बच्चों को संवेदनशील बना रहें हैं। एक दृश्य में पेंटिंग प्रदर्शनी के समय एक पेंटिंग में सबसे महँगा अविकाडो फल रखा है और सबसे नीचे की ओर केला रखा है जो अमीर-गरीब बीच में बहुत दूरी को प्रदर्शित कर रहा है लेकिन वहीं जब वह केला खाने वाला उनके बीच में आ जाता है, आर्या का ड्राइवर जिसे आर्या ने ही बुलाया है, तो डॉ बासु उसे देखकर गर्दन घुमा लेता है क्योंकि वो तो खुद इस समय मास्टर पीस बना खड़ा हुआ है, यही सिद्धांत और व्यवहार का अंतर है, सीन बहुत अच्छा बन पड़ा है हालांकि अंत में उसका थप्पड़ मारना अतिवादिता लगता है यद्यपि यह भी माना जा सकता है कि यदि मौका लगे या मौका मिले ये गरीब लोग इन अमीरों को एक झटके में सबक सिखा सकतें हैं।

यही ड्राइवर गणेश दहिया आर्या और श्रुति की 12 साल की वैवाहिक जिन्दगी में किस तरह उतार-चढ़ाव आये उन्हें कुछ संवादों के माध्यम से स्पष्ट कर देता है, जो भारतीय समाज ही नहीं अपितु मानव समाज की विवाह संस्था को नए सिरे से सोचने का मार्गदर्शन दे रहा है। लड़ाई झगड़ा ठीक है लेकिन साइलेंस जीवन में नहीं आना चाहिए, संवाद बने रहने चाहिए। भारतीय समाज में आज भी विवाह का अर्थ सिर्फ लड़का लड़की का नहीं बल्कि परिवारों का भी सम्बन्ध है। परिवार नामक संस्था तेज़ी से मायने बदल रहें हैं एकल परिवार और सिकुड़ चुके हैं जिसमें ‘मैं और मेरा नाता दूसरा आये तो फोड़ू माथा’ जैसा रूप बन रहा है।

आज का युवा समाज की हस्तक्षेप बिलकुल बर्दाश्त नहीं करता। स्त्रियाँ भी अब घर तक सीमित नहीं हैं और न ही रहना चाहती है उनकी प्राथमिकताएं बदल रही हैं, पवित्र रिश्तों के नाम पर स्त्रियाँ अपनी इच्छओं आकांक्षाओं महत्वाकांक्षाओं की बलि देने को तैयार नहीं, शायद यही कारण है कि श्रुति को तलाक की ज्यादा जल्दी है लेकिन उसकी स्वतंत्र सोच भले ही आज कितनी विकसित लगे लेकिन भारतीय माँ के संस्कार अभी भी इसके साथ हैं इसलिए बेटी की ख़ुशी की खातिर वो तलाक के बाद किसी तरह की विडंबना या सदी को नहीं ओढ़ना चाहती, जिससे उसकी बेटी को दुःख हो इसलिए वो तलाक़ को भी वैवाहिक उत्सव की तरह मनाना चाहती है।

फिल्मों में प्रेमी प्रेमिका के ब्रेकअप का जश्न तो हमने देख लिया जिसका असर युवा पीढ़ी ख़ासकर लडकियों पर दिखाई पड़ा, अब तलाक पर स्त्रियों के जीवन पर लगने वाले पूर्णविराम और उनके सिंगल होने की विडंबना को उत्सव की तरह सोचने क ओर यह पहला कदम है। हालाँकि विवाह की पुरातन बेड़ियों को यह नई सोच आसानी से हज़म होने वाली नहीं फिर भी आधे-आधे घंटे का हर एपिसोड आपको हँसायेगा और सामाजिक विडंबनाओं पर की गई टिप्पणियों पर कुछ नया सोचने के लिए भी उकसायेगा खासकर युवा वर्ग को।

सभी का अभिनय चरित्र के साथ बंधा हुआ है, आर माधवन का जवाब नहीं सुरवीन भी आपको सिर्फ अपनी सेक्सी इमेज के कारण नहीं अपितु संवाद अदायगी और अभिनय के बल पर आकषित करती है। उनकी बेटी रोहिणी भी आपको एक संवेदनशील लेकिन जागरूक बढ़ती लड़की के रूप में पसंद आएगी, कुल मिलाकर आपको यह सीरिज़ समय से पहले तलाक के उत्सव में शामिल होने का निमंत्रण दे रही है, इसे स्वीकार करना आपके ऊपर है

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लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com

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