corona and society
समाज

कोरोना संकट और भारत के वंचित समुदाय

 

  • जावेद अनीस

 

कोरोना स्वास्थ्य के साथ आर्थिक आपदा भी साबित हुआ है। इसकी वजह से एक बड़ी आबादी के सामने जीवन को का संकट पैदा हो गया है। समाज के सबसे निर्बल तबकों पर इसका बहुत घातक असर पड़ा है। आज करोड़ों की संख्या में पलायन पर गये मजदूर, किसान, बच्चे, महिलाएँ, विकलांग, शहरी गरीब उपेक्षा, अपमान और भूख से जूझ रहे हैं। आज भारत अभूतपूर्व स्थिति से गुजर रहा है। यह ऐसा संकट है जो कोरोना संक्रमण से उबरने के बाद भी लम्बे समय तक बने रहने वाला है। बिना किसी पूर्व तैयारी के किया गया लॉकडाउन एक जोखिम भरा कदम साबित हुआ हैं, भारत की चुनौती दोहरी है, हम स्वास्थ के साथ भूखमरी, बेरोजगारी और रिवर्स पलायन से भी जूझ रहे हैं।

 अन्य देशों के मुकाबले हमारी स्थिति बहुत जटिल है, कोरोना के खिलाफ लड़ाई को भारत की विशाल आबादी, गैरबराबर और बंटा हुआ समाज, सीमित संसाधन, और जर्जर स्वास्थ्य सुविधायें और चुनौतीपूर्ण बना देते हैं। इन सबके बीच भारत कोरोना रिलीफ के नाम पर अपने जीडीपी का करीब एक प्रतिशत ही खर्च कर रहा है जोकि अपर्याप्त से भी कम है इस मामले में हम बांग्लादेश से भी पीछे हैं जोकि भारत से दोगुना खर्च कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा चेतावनी दी गयी है कि कोरोना संक्रमण से पहले दुनिया भर में करीब 13.5 करोड़ लोग भुखमरी का सामना कर रहे थे जिसके अब कोरोना 26.5 करोड़ हो जाने की सम्भावना है। भूख और कुपोषण के मामले में भारत की स्थिति तो पहले से ही बहुत खराब थी। इधर लॉकडाउन में तो हालात और खराब हो गये हैं। घरों से बाहर निकलने और इस वजह से काम करने पर लगी पाबन्दी ने उन करोड़ों गरीब परिवार को दाने-दाने का मोहताज कर दिया है। देश की अधिकतर आबादी पहले से ही खाद्य सुरक्षा, कुपोषण और स्वास्थ्य की गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है और उनकी रोग प्रतिरोधक बहुत कमजोर है, ऊपर से हमारी स्वास्थ्य सेवायें भी बदहाल हैं। ऐसे में अगर कोरोना का और फैलाव व्यापक खासकर ग्रामीण और कस्बों के स्तर होता है तो स्थिति बहुत ही भयावाह हो सकती है।

यह भी पढ़ें- मजदूर आन्दोलन की तरफ बढ़ता देश

इस समय भारत के मजदूर किसान और मेहनतकश अकल्पनीय पीड़ा और संकट के दौर से गुजर रहे हैं। वे अपने ही देश में विस्थापित और शरणार्थी बना दिये गये हैं। उन्हें प्रवासी मजदूर कहा जा रहा है जबकि वे गावों से शहरों की तरफ पलायन पर गये मजदूर हैं जिन्हें हमारी सरकारें उनके गावों और कस्बों में रोजगार देने में नाकाम रहे हैं। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़ भारत में करीब 45 करोड़ से अधिक आबादी रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ पलायन पर थी जो कि देश की कुल आबादी का 37 प्रतिशत है। पिछले दस सालों के दौरान इस आंकड़े में करोड़ों के वृद्धि की सम्भावना है।MIGRANTS WORKERS

सबसे अधिक पलायन से प्रभावित राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखण्ड और छतीसगढ़ जैसे बीमारू प्रदेश शामिल है। शहरों की तरफ पलायन पर गये मजदूरों में अधिकतर असंगठित के दिहाड़ीदार मजदूर और स्व-पोषित श्रमिकों के तौर पर काम करते हैं। इन्हें किसी भी तरह का कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती है और वे शहरों में बहुत ही खराब परिस्थितियों में रहने को मजदूर होते हैं। अब कोरोना संकट के बाद इस बड़ी आबादी की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कोरोना असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोगों को और गरीबी में धकेल देगा।

यह भी पढ़ें- कोरोना संकट और सामाजिक उत्तरदायित्व

अपने देश में हम इस असर को महसूस भी कर रहे हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के सिर्फ अप्रैल महीने में बेरोजगारी दर में 14.8 फीसदी का इजाफा हुआ है और करीब 12 करोड़ से ज्यादा लोगों को नौकरी गंवानी पड़ी है जिसमें अधिकतर दिहाड़ी मजदूर, स्व-पोषित श्रमिक और छोटे कारोबारी प्रभावित हुए हैं। आज मजदूरों के इस विशाल आबादी के सामने वर्तमान और भविष्य दोनों का संकट है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा किये गये एक अध्ययन में बताया गया कि 13 अप्रैल तक जिन मजदूरों से उन्होंने संपर्क किया उनमें 44 फीसदी ऐसे थे, जिन्हें तत्काल रूप से भोजन और पैसे की जरूरत थी।

इसी प्रकार से वर्कर्स एक्शन नेटवर्क (स्वान) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार लॉकडाउन के बाद से शहरों में फंसे 89 फीसदी मजदूरों को उनके नियोक्ताओं द्वारा कोई राशि नहीं दी गयी हैं। ऊपर से सरकारी राहत भी उन तक नहीं पहुँच रही है। रिपोर्ट के अनुसार उनके द्वारा सम्पर्क किये गये कुल मजदूरों में से 96 प्रतिशत मजदूरों द्वारा बताया गया कि उन्हें सरकार की तरफ राशन तक नहीं मिला है। शहरों में इस कदर उपेक्षा के बाद मजदूरों के चलते लाखों मजदूरों के पास बस यही विकल्प बचा कि वे सैकड़ों-हजारों किलोमीटर अपने-अपने गावों तक पहुँचने के लिए वे पैदल ही निकल पड़ें और बड़ी संख्या में मजदूरों ने यही किया भी।

जिसके चलते हम भारत में श्रमिकों के सबसे बड़े रिवर्स विस्थापन के गवाह बने जोकि बहुत ही दर्दनाक और अमानवीय है। इस रिवर्स विस्थापन में पुरुष के साथ महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। इसमें से बड़ी संख्या में बड़ी संख्या में लोग मौत का भी शिकार हुए हैं।

यह भी पढ़ें- छटपटाते भारतीय प्रवासी मजदूर

लेकिन इन मजदूरों की चुनौती यहीं पर समाप्त नहीं होती है। वे अपने जिन गावों की तरफ वापस लौट रहे हैं वे पहले से ही बेहाल हैं। काम के तलाश में ही तो गाँव उजड़े थे। अब हमारे गावों में इतनी ताकत नहीं बची है कि वे अपने पलायन से आये लोगों का पेट पाल सकें। गाँव और कस्बों में जो काम हैं वो यहाँ पहले से रह रहे लोगों के लिये ही नाकाफी था जो पलायन पर गये लोगों द्वारा भेजे गये पैसों से पूरी होती थी। ऐसे में बड़ी संख्या में रिवर्स पलायन करके अपने गावों की तरफ वापस जा रहे लोगों का गुजारा कैसे होगा?

Coronavirus Reuters

Coronavirus Reuters

इस महामारी ने भारत सहित दुनिया भर के करोड़ों बच्चों को भी जोखिम में डाल दिया है। बच्चे इस महामारी के सबसे बड़े पीड़ितों में से एक हैं खासकर गरीब और वंचित समुदायों के बच्चे। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि कोरोना संक्रमण और इसके प्रभावों के चलते दुनिया भर में करीब 42 से 66 मिलियन बच्चे अत्यधिक गरीबी की दिशा में धकेले जा सकते हैं। महामारी के कारण करोड़ों बच्चे कई अन्य तरह संकटों से भी घिर गये हैं, गरीब बच्चों की औपचारिक शिक्षा व्यापक रूप बाधित हुई है, उनके पोषण पर असर पड़ा है और वे पहले से ज्यादा असुरक्षित हो गये हैं।

यह भी पढ़ें- कोरोना क़ालीन शैक्षिक संकट और रास्ते

महामारी के चलते स्कूल बन्द होने के कारण करोड़ों बच्चों के लिए ना केवल शिक्षा बाधित हुई है इसका सबसे ज्यादा प्रभाव वंचित तबकों के बच्चों पर हुआ है उनके शिक्षा के अधिकार को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। अगर स्कूल ज्यादा लम्बे समय तक बन्द रहते हैं तो यह बड़ी संख्या में बच्चों को स्कूलों से बाहर निकाल कर बाल श्रम की तरफ धकेल सकता है। हालाँकि सरकारों द्वारा ऑनलाइन क्लासेस की बात की जा रही है लेकिन देश की बड़ी आबादी आज भी डिजिटल दुनिया के दायरे से बाहर और इस संकट के समय उनके पहली प्राथमिकता शिक्षा नहीं बल्कि आजीविका बन गयी हैं।

इसी प्रकार से भारत बच्चों के कुपोषण की स्थिति पहले से ही डेंजर जोन में है, महामारी और लॉकडाउन ने इसे और पेचीदा बना दिया है। महामारी के चलते करोड़ों के संख्या में बच्चों का पोषण बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। हमारे देश में बड़ी संख्या में बच्चे पोषणाहार के लिये स्कूल और आंगनवाड़ियों पर निर्भर हैं जोकि महामारी के चलते बन्द कर दिये गये हैं ऐसे में इन बच्चों के पोषण पर गंभीर प्रभाव पड़ा हैं।

महामारी के चलते बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिन्ताएँ सामने आई हैं। लॉकडाउन के दौरान बाल दुर्व्यवहार के मामलों की संख्या में वृद्धि सम्बन्धी रिपोर्ट सामने आयी हैं। साथ ही इस दौरान चाइल्ड पोर्नोग्राफी में अप्रत्याशित वृद्धि भी देखने को मिली है। कमज़ोर परिस्थितियों में रह रहे बच्चों के बाल तस्करी का खतरा भी बढ़ गया है। हमारे देश में बड़ी सख्या में ऐसे बच्चे भी हैं जो व्यवस्था और समाज के प्राथमिकताओं से बाहर हैं खासकर सड़क पर रहने वाले बच्चों जिनकी मुश्किल बहुत बढ़ गयी हैं सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ देश भर में 20 लाख से अधिक बच्चे सड़कों पर रहते हैं। इन बच्चों को पहले से कहीं अधिक संरक्षण की जरूरत है।

कोरोना संक्रमण पर काबू पाने के लिए हमारी सरकारों को “इतिहास के सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयास” की ज़रूरत तो है ही लेकिन साथ ही अपने नागरिकों खासकर मजदूर, किसानों, बच्चों, कमजोर तबकों और महिलाओं को सम्मान के साथ विशेष संरक्षण दिये जाने की जरूरत है जिससे वे इसके दोहरी मार से उबर सकें। देश की बड़ी आबादी को तत्काल नगद राशि उपलब्ध कराये जाने की जरूरत है, सावर्जनिक वितरण प्रणाली को सार्वभौमिक बनाते हुए इसके सेवाओं के दायरे को और फैलाने की जरूरत है जिसमें लोगों को अनाज के साथ दाल, तेल, नमक, मसाले, साबुन आदि भी मिल सके।

इसके साथ ही बच्चों के लिए बाल संरक्षण और जीवनदायिनी सेवाओं के दायरे को भी बढ़ाना होगा। महामारी के दौरान बच्चों के अधिकारों की रक्षा और उनकी सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इस सम्बन्ध में राज्यों और केन्द्र सरकार द्वारा दिशा-निर्देश जारी किये जाने की तत्काल जरूरत है।

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं|

सम्पर्क- +919424401459, javed4media@gmail.com

.

कमेंट बॉक्स में इस लेख पर आप राय अवश्य दें। आप हमारे महत्वपूर्ण पाठक हैं। आप की राय हमारे लिए मायने रखती है। आप शेयर करेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
2 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments


डोनेट करें

जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
sablog.in



विज्ञापन

sablog.in






2
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x