हलफ़नामा

एक फिल्मकार का हलफ़नामा : भाग-2

 

गतांक से आगे…..

खटुआ से मिली किताबों में एक श्री उमाशंकर लिखित खत्री जी की जीवनी- “खत्री जी : एक परिचय”, दूसरी प्रो. विद्यानाथ मिश्र द्वारा संपादित “बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री”, तीसरी “अयोध्या प्रसाद खत्री : व्यक्तित्व एवं कृतित्व (लेखक श्री उमाशंकर) और चौथी किताब थी- “खड़ी बोली का पद्य, पहिला भाग”। चौथी क़िताब के ब्लर्ब पर काशी विश्वविद्यालय के श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने खत्री जी को ‘हिन्दी भाषा का गाँधी’ तो लखनऊ विश्वविद्यालय के डॉ.भगीरथ मिश्र ने ‘खड़ी बोली आंदोलन का तिलक’ लिखा है। पुस्तक से दिलचस्प जानकारी मिलती है कि उस समय भी ‘अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति-समिति’ नाम से एक समिति गठित हुई थी। प्रो.विद्यानाथ मिश्र सन् 1959 ई. में छपी ‘खड़ी बोली का पद्य’ पुस्तक के संपादकीय में लिखते हैं कि “अयोध्या प्रसाद को विस्मृति के अंध-गर्भ से उद्धार कर उनकी हिन्दी-सेवाओं की सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक तथा राजनैतिक दृष्टिकोणों से यथोचित मूल्यांकन करने-कराने के लिए मुजफ्फरपुर में हमलोगों ने ‘खत्री-स्मृति-समिति’ नाम की संस्था की स्थापना विगत वर्ष (1958 ई.) की।”

ये सभी किताबें उक्त समिति द्वारा सन् 1959 ई. में प्रकाशित की गई थी। यह जानना सुखकर लगा कि उस वक़्त की समिति में राजनीतिज्ञ, लेखक-कवि, प्राध्यापक, पत्रकार और समाजसेवी लोग शामिल थे। उस समिति में सभापति के रूप में श्री महेश प्रसाद सिंह, उप-सभापति श्री रामवृक्ष बेनीपुरी, आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री, श्री उमाशंकर, संयोजक प्रो. विद्यानाथ मिश्र, संयुक्त सचिव प्रो. श्रीमती सरोज प्रसाद, श्री कन्हैया शरण, श्री कैलाश प्रसाद खत्री एवं विनोद कुमार थें। दरअसल यह समिति खत्री जी का सौवां जन्मदिवस मनाने के बाद इसलिए गठित की गई थी कि उनपर वृहत काम किया जा सके। ‘खड़ी बोली का पद्य’ पुस्तक के पृष्ठ भाग पर ‘हमारा आगामी प्रकाशन’ की सूचना के साथ खत्री जी की 6 अन्य किताबों के प्रकाशित किये जाने की खबर दी गई है, जिसमें 1. खड़ी बोली का पद्य (दूसरा भाग ), 2. हिन्दी व्याकरण, 3.छोटी-छोटी बातों पर नुक्ताचीनी, 4.संस्कृत जनित यावनी शब्दकोश, 5. मौलवी-स्टाइल की हिन्दी का छंदभेद, 6. खड़ी बोली का आंदोलन, के नाम मुद्रित हैं।

‘खत्री दिवस’ के अवसर पर समिति ने ‘पंचसूत्री कार्यक्रम’ भी निर्धारित किया था-

  1. खत्री जी के स्मृति-चिन्हों की सुरक्षा करना
  2. खत्री-अनुसंधान परिषद की स्थापना
  3. प्रत्येक वर्ष सर्वश्रेष्ठ खड़ी बोली की कविता पर खत्री-पुरस्कार
  4. खत्री जी से संबंधित साहित्य पर आलोचनात्मक ग्रंथ प्रस्तुत करना
  5. मुजफ्फरपुर में खत्री जी की प्रस्तर मूर्ति की स्थापना

इन ‘पंचसूत्री कार्यक्रम’ का क्या हुआ ? यह बताने के लिए उक्त समिति में से आज कोई जीवित नहीं है। फिर भी यह ज्ञात है कि उक्त पाँचों कार्यक्रम में से आजतक कुछ भी घटित नहीं हुआ।स्मृति-चिन्ह के रूप में केवल उनके द्वारा ‘ब्राह्मण टोली’ मुहल्ला में स्थित शंकर का मंदिर आज भी विद्यमान है, जो अब त्रिशूल हिलता मंदिर के नाम से जाना जाता है। 1934 के भूकंप में इस मंदिर का कुछ हिस्सा ढह गया था, जिसका जीर्णोद्धार स्व. जगदीश नारायण नंदा ने कराया था। 34 के भूकंप के बाद से ही इस मंदिर के ऊपर जड़ित त्रिशूल हिलने लगा था, जिसे देखने के लिए उस समय काफी दिनों तक लोग उमड़ते रहें। शायद इसी कारण इसका नाम ‘त्रिशूल हिलने वाला मंदिर’ नाम पड़ गया। आज इस मंदिर पर लोगों ने कब्जा जमाकर इसके मूल स्वरूप को ही नष्ट कर दिया है।

त्रिशूल हिलने वाला मंदिर
खत्रीजी द्वारा बनवाया गया शिवालय

खैर, ये किताबें तो मिली, किन्तु 1877, 1887, 1888, 1889 में खत्री जी के समय जो पुस्तकें छपी थी, मुझे उसकी खोज थी और खोज थी 15 सेर की उस गठरी की, जिसे खत्री जी ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा को भेजी थी। रंगकर्मी स्वाधीन दास के साथ बनारस कूच कर गया। काशी नागरी प्रचारिणी सभा के पुस्तकालय में किताबों की सूची-पत्र लेकर खोजना शुरू किया तो सूची में वह तमाम किताबें दर्ज मिली। खुशी से दिल उछलने लगा। सूची के अनुसार पुस्तक का नंबर लिखकर पुस्तकालयाध्यक्ष को सौंप किताबों का बेसब्री से इंतजार करने लगा। दो घँटे बाद जब उनसे मिला तो उन्होंने बताया कि वे किताबें उपलब्ध नहीं है। पूछने पर बताया कि पहले लोग पुस्तकालय का मेंबर बन किताबें पढ़ने ले जाते थे। बहुतों ने न तो किताबें ही लौटाई और न फिर कभी लौटे। सामने पड़े ढेरों मेंबर्स के कार्ड की ओर इशारा कर बोलें- “ये किताब लेकर गए लोगों का कार्ड है, जो फिर न कभी लौटे और न किताब ही लौटाई।” तब याद आया कि न जाने कितने लोग मेरे शहर में ऐसे मिलें कि उन्हें जब भी क़िताब दी, लौटाए नहीं कभी। माँगने पर ठठाकर कहते- ‘जो किसी को क़िताब दे, वह बड़ा मूर्ख, और लेकर जो लौटा दे, उससे बड़ा महामूर्ख दूजा नहीं !’ और वे महामूर्ख बनना नहीं चाहते ! महामूर्ख न बनने वालों में ज्यादातर यहाँ के लेखक, हिन्दी-प्राध्यापक और पत्रकार रहें।

बुझे और निराश मन से स्टेशन लौटा। टिकट कटा हमदोनों मुजफ्फरपुर जाने वाली ट्रेन में चढ़े। ट्रेन चल पड़ी तो सिगरेट का पैकेट निकाल हमदोनों ने सिगरेट सुलगाई और बातें करने लगे कि और किस लाइब्रेरी को छाना जाए। एक दो कश ले अभी धुआँ ही छोड़ा था कि एक सिपाही सामने खड़ा हो हमें धुंआ-धुंआ कर दिया। गलती का अहसास होते झट अपनी सिगरेट ट्रेन से बाहर फेंकी लेकिन वह ठहरा बनारसी बाबू, ऊपर से सिपाही ! हजार- हजार रुपये अलिखित जुर्माने की बात कहता, हमारे इर्द-गिर्द घूमता, धमकी देता हमें लपेटता रहा और अंततः बहुत मानमनौव्वल के बाद दो सौ में हमें निबटाकर अपनी जेब गर्म करता चलता बना। स्वाधीन दास बहस करने पर तुले थे किन्तु उनका हाथ दबा रोका। एक तो ट्रेन में सिगरेट सुलगा हमलोगों ने गलती की थी, ऊपर से जेनरल टिकट ले स्लीपर कोच में जा घुसे थे। अभी तक तो सिर्फ़ सिगरेट की ही बात थी, यह भी भेद खुलता तो कितना लपेटता ..। स्वाधीन दा का तो कुछ जाता नहीं, जेब मेरी कटती। सिपाही के जाने के बाद स्वाधीन दास पूरे रास्ते कुतर्क करते उसे गरियाते रहे जिसका कोई मतलब नहीं था। काशी से लौटने के बाद कलकत्ता नेशनल लाइब्रेरी, पटना का खुदाबख्श लाइब्रेरी और मुजफ्फरपुर नगर भवन लाइब्रेरी का ख़ाक छानता ठन ठन गोपाल बैरंग वापस।

( जारी….. )

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वीरेन नन्दा

लेखक वरिष्ठ कवि और संस्कृतिकर्मी हैं। सम्पर्क +919835238170, virenanda123@gmail.com .
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