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कविता में दर्ज एक आन्दोलन की आँच

पूनम सिंह की पुस्तक ‘हिन्दी कविता और नक्सलवाद’  को पढना सिर्फ वैचारिक उत्तेजना के अनुभव से गुजरना नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक आन्दोलन और उससे उपजी काव्यधारा को समझना भी है। यह पुस्तक उन कवियों, उनकी रचनात्मक बेचैनी और संघर्ष की स्मृतियों को एक जगह लाती है, जिन्हें इतिहास की मुख्यधारा में पर्याप्त जगह नहीं मिली। इस अर्थ में यह साहित्यिक अध्ययन के साथ एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी है।

हिन्दी में नक्सलवादी आन्दोलन से प्रभावित साहित्य पर कुछ अच्छे लेख जरूर आये हैं, लेकिन इस विषय पर कोई पुस्तक मेरी नजर से नहीं गुजरी थी। सम्भव है, पहले भी कोई काम हुआ हो, लेकिन मेरे लिए यह पहली किताब है। दरअसल, इस विषय पर लिखना एक दुष्कर कार्य था। किताब से गुजरते हुए इसकी कठिनाई महसूस होती है। पूनम जी ने उपलब्ध साहित्य की कमियों को इस आन्दोलन से जुड़े और उसके निकट रहे लोगों से बातचीत करके पूरा किया है। यह बातचीत महज पूरक सामग्री नहीं हैं, बल्कि पुस्तक को विस्तार, वैविध्य और पूर्णता प्रदान करती हैं। इनके माध्यम से पाठक अनुभव, संघर्ष और सृजन के अनेक आयामों से परिचित होता है। सबसे महत्त्वपूर्ण मुझे पूनम जी का अपना लिखा हिस्सा लगा, जो पुस्तक की अहमियत को रेखांकित करने के साथ उसके विवेकसम्मत संयोजन का सार्थक शिल्पन करता है।

जब नक्सलवादी आन्दोलन शुरू हुआ और हिन्दी इलाके में भी पसरने लगा, तब उसने साहित्य और दूसरी कलाओं को गहरे प्रभावित किया। आज नक्सलवाद के नाम पर जो आन्दोलन देखने-सुनने में आता है, उससे उस दौर के आन्दोलन की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।

उस दौर में प्रखर विचारक और तीखी बौद्धिक बहस करने में सक्षम ऐसी प्रतिभाएँ थीं, जिन्होंने आन्दोलन में शहादत दी या अपनी जिन्दगी को भीषण संघर्ष के हवाले कर दिया। कुछ लोग इधर-उधर की पतली पगडंडियों से गुजरते हुए किसी तरह बच निकले। उनके विचलनों और परिवर्तनों पर बोलने वाले लोग न उनके ताप को समझ सकते हैं, न उनके संघर्ष और राजनीतिक पराजय को। उनकी अद्भुत मेधा भाषणों के रूप में बिखरकर रह गयी। वे लेखन को लेकर सचेत नहीं थे। लेखन उनकी चिन्ता के केन्द्र में नहीं था; उनके लिए वह मुख्यतः एक राजनीतिक कार्रवाई थी। इस पुस्तक में शामिल रचनाओं को देखिए। उनमें कितना ताप, कैसी बेचैनी और कैसा सात्त्विक गुस्सा है! सब कुछ बदल देने का जज्बा इतनी मुखरता से इसके पहले शायद ही सामने आया था।

इस पुस्तक से गुजरते हुए उस ताप, संघर्ष और उसके ऐतिहासिक महत्त्व को काफी हद तक महसूस किया जा सकता है। पुस्तक का कविता तक सीमित रहना ही उसकी गम्भीरता का प्रमाण है। वरना कथा-साहित्य, विचार-साहित्य और पत्रकारिता में इस आन्दोलन के प्रभाव पर स्वतन्त्र पुस्तकों की बड़ी गुंजाइश और जरूरत है। पूनम जी ने एक आन्दोलन की काव्यात्मक रचनात्मकता को विस्मृति में जाने से बचा लिया है।

इस आन्दोलन ने बंगला, पंजाबी और तेलुगु कविता की क्रान्तिकारी धाराओं से भी एक भाषाई सेतु बनाया था। एम.टी.खान, श्रीश्री और गदर जैसे कवि हिन्दी के पाठकों के अपने कवि बन गये थे। पंजाबी के पाश, लाल सिंह दिल, सुरजीत सिंह पातर और दर्शन खटकड़ की कविताएँ हिन्दी कविता के पाठकों की जुबान पर थीं। बंगला के कवि हिन्दी के कवियों जैसे अपने लगने लगे थे। उन दिनों कॉमरेड कंचन कुमार द्वारा अनूदित और सम्पादित पुस्तक ‘जेलखाना, गोलियों की बौछार और कत्लगाह’ खूब चर्चित हुई। यह बंगला के नक्सलवादी कवियों का संग्रह था, जिसकी हजारों प्रतियाँ छपीं, बिकीं और प्रसारित हुईं। उसकी एक पंक्ति—“तुम मेरे शरीर पर कोड़ों के निशान बना दो, मैं शेर की तरह दिखूँगा”—उस दौर की कविता के तेवर और प्रतिरोध की तीव्रता को सामने लाती है। ऐसी कविताएँ पोस्टरों पर उकेरी गयीं और हिन्दी के कवियों को गहरे प्रभावित करती रहीं।

यह पुस्तक बड़ी सूझ-बूझ, कठोर श्रम और विवेक से तैयार की गयी है। इसकी सामग्री का संयोजन सबसे आकर्षक और महत्त्वपूर्ण है। इसमें तेलंगाना से नक्सलबाड़ी तक की ऐतिहासिक यात्रा है, साथ ही युद्ध, अकाल और असह्य यातना से फूटे वसंत-गर्जना के समय और समाज की पड़ताल भी है। यह बताया गया है कि किन परिस्थितियों में आन्दोलन का जन्म हुआ और उसने साहित्य को किस तरह प्रभावित किया। उस दौर में हिन्दी कविता और आन्दोलन पर बंगाल का गहरा असर था। इसलिए बंगाल के हिन्दी कवियों के लिए अलग खण्ड रखा गया है, जिसका आलोचनात्मक आकलन भी सधा हुआ है।

इसके बाद हिन्दी कवियों का खण्ड है। पूनम जी ने चयन में तथ्यात्मक और वस्तुगत आधार का ध्यान रखा है। उन्हीं कवियों को शामिल किया है, जो सचमुच आन्दोलन के गहरे अनुभव से निकले थे। प्रकाश चंद्रायन जैसे कुछ नाम छूट गये हैं, तो इसका कारण उनके संग्रह का हाल में प्रकाशित होना है। फिर आन्दोलन से प्रभावित बाद के कवियों पर आलोचनात्मक लेख हैं। अगले खण्ड में गैर-हिन्दी भाषी कवियों के अन्तर्गत बंगला, पंजाबी और तेलुगु के चर्चित रचनाकारों को शामिल किया गया है। अन्त में आन्दोलन में शामिल रहे या उससे प्रभावित लोगों के साक्षात्कार हैं। यह खण्ड पुस्तक को न केवल पूर्णता देता है, बल्कि उसे विशिष्ट महत्त्व भी प्रदान करता है।

यह पुस्तक हिन्दी साहित्य में लम्बे समय से खटक रही एक कमी को दूर करती है और बहुत सलीके से करती है। निश्चय ही यह टिप्पणी पुस्तक की विस्तृत आलोचनात्मक समीक्षा नहीं, बल्कि उसका परिचयात्मक आकलन भर है। फिर भी, पूनम जी के इस ऐतिहासिक महत्त्व के  काम के लिए हिन्दी समाज को उनका कृतज्ञ होना चाहिए। संघर्ष, शहादत और बलिदान से उपजी एक सीमित, लेकिन बेहद सशक्त काव्यधारा को उन्होंने विस्मृति से बचाया है। हममें से जो लोग उसकी आँच में थोड़ा-बहुत तपे और निर्मित हुए, वे उनके इस काम के ऋणी रहेंगे।

 

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कर्मेन्दु शिशिर

लेखक हिन्दी के कथाकार, आलोचक और नवजागरण के अध्येता हैं। वे हिन्दी के प्राध्यापक रहे हैं और छात्र जीवन से वामपन्थी राजनीति से जुड़े रहे। हिन्दी नवजागरण, उसकी वैचारिक परम्परा, साहित्यिक पत्रकारिता और भारतीय मुसलमान पर उनकी अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हैं। shishirkarmendu@gmail.com +91 94312 21073
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