
विचारधारात्मक सेवा की सशक्त पहल
प्रदीप सक्सेना की पुस्तक ‘काले सूरज की रोशनी अर्थात् प्रतिक्रिया का पुनर्जागरण’ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सुनियोजित विचारधाराओं का तथ्यात्मक संग्रह है। 2006 में प्रकाशित ‘काले सूरज की रोशनी अर्थात् विवेकवादी कसौटियों पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ में वर्तमान संस्करण के दो लेख नहीं थे,जिसके बारे में लेखक ने भूमिका में लिखा है कि परिशिष्ट में छपे ये दोनों लेख डॉ नामवर सिंह द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘आलोचना’ में प्रकाशित हुए थे और यह पुस्तक इन्हीं लेखों की ‘सैद्धान्तिक सामग्री’ है। लेखक ने प्रारम्भ में ही निवेदन किया है-“हिन्दुत्ववादी शक्तियाँ जब सत्ता में होती हैं तब हमें एकदम से फासीवादी खतरे दिखाई पड़ते हैं….क्या समाज का ध्रुवीकरण कोई खतरनाक बात नहीं है? आख़िर फासीवादी राजनीति अपनी खुराक कहाँ से ग्रहण करती है?जहाँ से ग्रहण करती है,वहाँ हम क्यों नहीं पहुँचते?”
प्रदीप सक्सेना ने अपनी इस पुस्तक के लिये आरएसएस के सिद्धान्तकारों की लिखित विचारधाराओं का गहन चिंतन-मनन करके तथ्य जुटाए हैं और उसको प्रस्तुत करके पाठकों को और देश के समस्त आम जनों को इनकी ‘हिन्दू राष्ट्र’ की मूल किन्तु विभाजक अवधारणाओं से बखूबी परिचित कराते हुए आगाह किया है कि अगर हम समय रहते सचेत नहीं हुए तो ‘काले सूरज की यह रोशनी’ हमारी साझी संस्कृति की विरासत को नेस्तनाबूद करके देश की अखण्डता और अनेकता में एकता के सपनों को चकनाचूर कर देगी और तब हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाएँगे। लेखक की यह पुस्तक डॉ हेडगेवार,गुरु गोलवलकर,सावरकर,पुरुषोत्तम नागेश ओक आदि आरएसएस के सिद्धान्तकारों और पुरोधाओं के हिन्दू राष्ट्र समर्थित उद्धरणों को संग्रह करके तैयार की गयी है,जिसमें लेखक के विचार यही हैं कि आरएसएस के ये सिद्धान्त बहुसंख्यक वर्ग द्वारा हिन्दुस्तान की साझी संस्कृति को छिन्न-भिन्न करके उसे रसातल में ले जाने वाले हैं,जो सम्प्रदायवाद और धार्मिक उन्मादों के बल पर छद्म सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के हसीन सपने दिखा कर आम जनों को गुमराह करते जा रहे हैं। लेखक ने इन उद्धरणों के अलावा अपने तर्क को प्रमाणित करने के लिए रघुपति सहाय फिराक,राम मनोहर लोहिया,हजारी प्रसाद द्विवेदी,मर्जिया कासोलारी, पण्डित नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि प्रतिष्ठित विचारकों के लिखित अंश भी उद्धृत किये हैं। पुस्तक में परिशिष्ट को छोड़ कर – ‘दो प्रस्थान’, ‘अथ श्री संघ परिवार कथा’,हिन्दुत्व के शृंगार ‘माधव’,काली घाटी की हलचलें,हिन्दू विश्वास यानी ‘वैज्ञानिक’ इतिहास,प्रतिशोध ही इतिहास है, काला सूरज और उसकी रोशनी जैसे कुल बारह अध्याय हैं। परिशिष्ट के दो लेखों में भी उद्धरणों की ही प्रधानता है। फिर भी, लेखक अपनी चिन्ता को जायज ठहराने में सफल हुआ है। उसने स्वीकार किया है-“संघ-दर्शन की समग्र सामग्री और उससे पूर्ण असहमति और उसकी वजहें सब यहाँ वैचारिक संघर्ष की मेरी अपनी शैली में है…. मैं ही उत्तरदायी हूँ,उस सबके लिए,जो भीतर है।”
लेखक ने भाजपा के उदय और हिन्दू जन के मन में अनवरत मुस्लिम-ईसाई विरोधी तत्त्वों को गहराई से प्रतिरोपित करने वाले संघ की सफलता के लिए काँग्रेस को ही मुख्य रूप से दोषी ठहराया है-“सरदार जैल सिंह और दरबारा सिंह की कलह ने पंजाब को कहाँ पहुँचा दिया? डांगे को हराने के लिए जो कार्ड काँग्रेस ने चला उसके परिणामस्वरूप ही बाल ठाकरे का जन्म हुआ। असम में चुनी हुई सरकार को गिराकर असम को उग्रवादियों के हाथों सौंप दिया। इन सभी मामलों में बदतरीन उग्रवादियों की मदद लेकर कॉंग्रेस ने क्या भाजपा के लिए भूमि तैयार नहीं की?क्या धर्म का उग्रवादी प्रयोग या धर्म और हिंसा का गठजोड़ एक सेकुलर और प्रगतिशील पार्ट का,गाँधी जी के पीछे चलने वाली पार्टी का एजेण्डा हो सकता था?यह प्रयोग देश को बहुत महँगा पड़ा। भाजपा इसकी फसल काट रही है।” इसके समर्थन में सक्सेना जी ने राही मासूम रजा का उद्धरण प्रस्तुत किया है। लेखक ने पुस्तक के आरम्भ में ही फिराक गोरखपुरी और एक संघी साध्वी के वार्तालाप से संघ की धार्मिक दुरभिसन्धि और मिथक को तथ्य मानने की उनकी जिद को उजागर करते हुए यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि संघ की नजर में उनका वास्तविक दुश्मन मुसलमान हैं और हिन्दू बहुल हिन्दुस्तान को वे फ़ासिज्म के रास्ते ले जाने के लिए इतिहास के तथ्यों को तोड़-मरोड़ रहे हैं और धर्म की रूढ़िवादिता की घुट्टी पिला-पिला कर उन्हें मानसिक और नैतिक रूप से कमजोर कर रहे हैं। भाजपा द्वारा शिक्षा में आमूल परिवर्तन करके उसे क्रियान्वित करने की योजना के प्रति भी लेखक ने सचेत किया है।
लेखक संघ के तथ्यों को यथातथ्य रखने और ‘शोले’ फिल्म के गब्बर सिंह के रूपक की चर्चा के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचता है-“अब ऐसी शक्तियों के उभार में देर नहीं है जो गब्बर सिंहों के बल पर इस देश के टुकड़े-टुकड़े कर देंगी और लोकतन्त्र का वह शिशु भी उसके हाथ से नहीं बच सकेगा जो सर्वथा निर्दोष होगा।” तथ्यतः यह पुस्तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सिद्धान्तों एवं उसकी सुनियोजित विचारधाराओं की सफल शल्य-परीक्षा करके पाठकों को उसके छद्म राष्ट्रवाद और तथाकथित सांस्कृतिक पुनर्जागरण के मिथ्या दम्भ को बड़े ही तथ्यात्मक एवं रोचक तरीके से उजागर करती है। सक्सेना जी फासीवाद के पूर्णतः फलित होने की आसन्न आहट से चिन्तित और मर्माहत हैं। फलतः,वे संघियों के धार्मिक उन्माद के साथ-साथ भारत में बसे अन्य धर्मानुयायियों के भी धार्मिक कृत्यों के तथ्यात्मक अध्ययन पर बल देते हैं क्योंकि उनका मानना है कि धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई केवल हिन्दू साम्प्रदायिकता के ही ख़िलाफ़ लड़ना सर्वथा अनुचित होगा। इसलिए यह पुस्तक पठनीय तो है ही,साथ ही एक जरूरी विमर्श के लिए प्रासंगिक चुनौती भी है।
काले सूरज की रोशनी अर्थात् प्रतिक्रिया का पुनर्जागरण प्रदीप सक्सेना संवाद प्रकाशन, मेरठ मूल्य: 400 रुपये









