
जन्तर-मन्तर खाली है, सवाल नहीं
इन दिनों यह धारणा तेजी से प्रचारित की जा रही है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की माँग को लेकर जन्तर-मन्तर से शुरू हुआ आन्दोलन अब समाप्त हो चुका है। कहा जा रहा है कि मोदी सत्ता ने अपनी राजनीतिक कुशलता से विरोधियों को अलग-अलग कर दिया, आन्दोलन के प्रमुख चेहरों को गिरफ्तार करके उसकी गति रोक दी और युवाओं तथा महिलाओं की जिस नयी राजनीतिक ऊर्जा ने इस आन्दोलन को पहचान दी थी, उसे दबा दिया। इस दृष्टिकोण के अनुसार, आन्दोलनकारी अब अपने घरों को लौट चुके हैं और सत्ता के सामने कोई गम्भीर चुनौती शेष नहीं है। लेकिन क्या किसी आन्दोलन की सफलता या विफलता का फैसला केवल इस आधार पर किया जा सकता है कि आज किसी धरना-स्थल पर कितनी भीड़ दिखाई दे रही है? क्या सड़कों से लोगों का हट जाना उनके भीतर पैदा हुए सवालों का भी समाप्त हो जाना है? और क्या किसी आन्दोलन को तत्काल राजनीतिक सफलता नहीं मिलने का अर्थ यह है कि उसने समाज पर कोई प्रभाव ही नहीं डाला?
इन सवालों का उत्तर खोजने के लिए जन्तर-मन्तर की मौजूदा स्थिति से आगे बढ़कर भारतीय समाज में हो रहे उन परिवर्तनों को समझना होगा, जिनकी अभिव्यक्ति इस आन्दोलन में दिखाई दी। किसी आन्दोलन का एक पक्ष उसका प्रत्यक्ष प्रदर्शन होता है, लेकिन दूसरा पक्ष वह राजनीतिक चेतना है, जो उसके माध्यम से समाज में जन्म लेती है। धरना समाप्त हो सकता है, भीड़ बिखर सकती है, नेतृत्व कमजोर पड़ सकता है और संगठन अपने आन्तरिक विरोधाभासों के कारण निष्क्रिय भी हो सकता है; लेकिन यदि आन्दोलन ने समाज के भीतर किसी वास्तविक समस्या को लेकर बेचैनी पैदा कर दी है, तो उसके प्रभाव को केवल धरना समाप्त होने के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। इतिहास में अनेक आन्दोलनों का वास्तविक प्रभाव उनके तत्काल परिणामों के बजाय उन सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों में दिखाई दिया, जिन्हें उन्होंने आगे बढ़ाया। इसलिए जन्तर-मन्तर की आज की स्थिति को आन्दोलन के अन्त का निर्णायक प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी।
ज्ञानेश कुमार को हटाने की माँग का महत्त्व भी इसी व्यापक सन्दर्भ में समझा जाना चाहिए। यह प्रश्न केवल किसी एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को हटाने तक सीमित नहीं है। इसके केन्द्र में चुनाव आयोग की स्वतन्त्रता, मतदाता सूची की विश्वसनीयता, विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात् एसआईआर की प्रक्रिया में पारदर्शिता और चुनावी व्यवस्था के प्रति नागरिकों का विश्वास जैसे गम्भीर प्रश्न हैं। लोकतन्त्र में स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि जनता की सम्प्रभुता की बुनियादी शर्त हैं। यदि मतदाता को अपने नाम के मतदाता सूची में बने रहने, उसके सही ढंग से दर्ज होने अथवा उसके मताधिकार की सुरक्षा को लेकर सन्देह पैदा होता है, तो उस सन्देह का उत्तर पारदर्शी प्रक्रिया, प्रामाणिक आँकड़ों और जवाबदेह संस्थाओं के माध्यम से दिया जाना चाहिए। ऐसे प्रश्नों को केवल विपक्षी राजनीति या सत्ता-विरोधी अभियान बताकर खारिज कर देना समस्या का समाधान नहीं है। इसी तरह, आन्दोलनकारियों के प्रत्येक आरोप को बिना जाँच के सही मान लेना भी उचित नहीं होगा। लोकतान्त्रिक व्यवस्था की कसौटी यह है कि आरोपों की निष्पक्ष जाँच हो, तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए और संस्थाएँ अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक जवाबदेही स्वीकार करें।
इस आन्दोलन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता युवाओं की भागीदारी रही है। जन्तर-मन्तर पर दिखाई देने वाली युवा उपस्थिति को केवल किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम में शामिल भीड़ के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इस भागीदारी के भीतर एक ऐसी पीढ़ी की बेचैनी दिखाई देती है, जो अपने भविष्य और लोकतान्त्रिक व्यवस्था के सम्बन्ध को नये सिरे से समझना चाहती है। आज का युवा रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, अवसरों की समानता और सामाजिक सुरक्षा जैसे सवालों से जूझ रहा है। उसे यह भी समझ में आने लगा है कि इन समस्याओं का समाधान केवल व्यक्तिगत संघर्ष से सम्भव नहीं है; इनके पीछे नीतियों, संस्थाओं और राजनीतिक निर्णयों की भी भूमिका होती है। जब यही युवा चुनाव आयोग की जवाबदेही, मताधिकार और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतन्त्रता पर सवाल उठाता है, तो वह अपने निजी भविष्य को लोकतन्त्र की गुणवत्ता से जोड़ रहा होता है। इस बदलाव को किसी एक आन्दोलन की उपलब्धि घोषित करना उचित नहीं होगा, लेकिन इसे महज क्षणिक उत्तेजना मानकर उपेक्षित करना भी सामाजिक यथार्थ से आँखें मूँदना होगा।
महिलाओं की सक्रिय भागीदारी इस परिवर्तन को और महत्त्वपूर्ण बनाती है। भारतीय राजनीति में महिलाओं की उपस्थिति लम्बे समय तक मुख्यतः मतदान, राजनीतिक दलों की रैलियों और प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व के सन्दर्भ में देखी जाती रही है। लेकिन जब युवा महिलाएँ स्वयं राजनीतिक सवाल उठाती हैं, सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात रखती हैं, विरोध प्रदर्शनों में भाग लेती हैं और अपने अधिकारों के लिए जोखिम उठाने को तैयार होती हैं, तो यह राजनीतिक नागरिकता के विस्तार का संकेत होता है। इसका महत्त्व केवल इतना नहीं है कि किसी आन्दोलन में महिलाओं की संख्या बढ़ गयी; महत्त्वपूर्ण यह है कि वे राजनीति को अपने जीवन से अलग कोई विषय मानने के बजाय अपने वर्तमान और भविष्य से जुड़ा प्रश्न समझ रही हैं। एक ऐसी महिला, जो शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और समान अवसरों के लिए संघर्ष करती है, वह जब संविधान और मताधिकार पर भी सवाल उठाती है, तो उसके राजनीतिक अनुभव का दायरा व्यापक होता है। ऐसी भागीदारी को केवल किसी संगठन की उपलब्धि या किसी नेता के प्रभाव का परिणाम मानना उस सामाजिक परिवर्तन को छोटा कर देना होगा, जिसकी सम्भावनाएँ इससे कहीं अधिक व्यापक हैं।
हालाँकि, यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि युवाओं और महिलाओं की भागीदारी अपने आप में किसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन की गारण्टी है। किसी भी आन्दोलन को लम्बे समय तक प्रभावशाली बनाए रखने के लिए स्पष्ट विचार, विश्वसनीय नेतृत्व, लोकतान्त्रिक संगठन, व्यापक सामाजिक सम्पर्क और निरन्तर कार्यक्रम की आवश्यकता होती है। केवल आक्रोश किसी आन्दोलन को स्थायी शक्ति नहीं दे सकता। उसे सामाजिक प्रश्नों की गहरी समझ, तथ्यपरक तर्क और ऐसे कार्यक्रमों में बदलना पड़ता है, जिनसे अलग-अलग वर्गों के लोग अपने जीवन का सम्बन्ध देख सकें। यदि आन्दोलन अपने सवालों को व्यापक जनजीवन से नहीं जोड़ पाता, तो उसकी प्रारम्भिक ऊर्जा धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है। इसलिए जन्तर-मन्तर पर युवाओं की उपस्थिति को सम्भावनाओं के संकेत के रूप में देखना चाहिए, न कि इस प्रमाण के रूप में कि कोई निर्णायक सामाजिक क्रान्ति पहले ही घटित हो चुकी है। वास्तविक परीक्षा यह होगी कि इस भागीदारी से कितनी स्थायी राजनीतिक समझ, संगठनात्मक क्षमता और नागरिक सक्रियता विकसित होती है।
इस सन्दर्भ में विपक्षी दलों की भूमिका पर भी विचार करना आवश्यक है। मोदी सत्ता की राजनीतिक ताकत का एक आधार विपक्ष का बिखराव और विभिन्न विपक्षी दलों के बीच रणनीतिक असहमति रही है। कई बार विपक्ष जनता के असन्तोष को एक साझा राजनीतिक कार्यक्रम में बदलने के बजाय अपने-अपने चुनावी हितों के अनुसार उसका इस्तेमाल करने की कोशिश करता है। आन्दोलन के सवालों पर सहमति होने के बावजूद दलों का अलग-अलग रास्ता अपनाना उसकी व्यापकता और निरन्तरता को प्रभावित कर सकता है। लेकिन विपक्ष की इस कमजोरी को समाज की निष्क्रियता का प्रमाण मान लेना उचित नहीं है। राजनीतिक दलों और नागरिक समाज के बीच सम्बन्ध हमेशा एक जैसा नहीं होता। कोई आन्दोलन राजनीतिक दलों के समर्थन से गति प्राप्त कर सकता है, उनसे दूरी बनाकर अपनी स्वतन्त्रता बचाने की कोशिश कर सकता है अथवा समय के साथ उनसे असहमति भी विकसित कर सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि आन्दोलन की सामाजिक ऊर्जा को किसी एक दल की सफलता या विफलता के साथ पूरी तरह न जोड़ दिया जाए। लोकतन्त्र में नागरिकों के प्रश्न किसी राजनीतिक दल की निजी सम्पत्ति नहीं होते।
यह भी सच है कि राज्य की प्रशासनिक शक्ति किसी आन्दोलन की सार्वजनिक गतिविधियों को सीमित कर सकती है। प्रदर्शन की अनुमति न देना, बैरिकेड लगाना, प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेना और सार्वजनिक स्थलों पर उनकी पहुँच रोकना आन्दोलन की दृश्यता और उसकी तत्काल क्षमता को प्रभावित कर सकता है। ऐसी कार्रवाइयों के औचित्य का मूल्यांकन तथ्यों, लागू कानूनों और परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए। लेकिन यहाँ एक बुनियादी अन्तर समझना जरूरी है: किसी स्थान पर प्रदर्शन को रोक देना और किसी विचार को समाज से समाप्त कर देना दो अलग बातें हैं। लोकतन्त्र में शान्तिपूर्ण असहमति के लिए स्थान होना चाहिए, क्योंकि असहमति कोई असाधारण सुविधा नहीं, बल्कि नागरिक स्वतन्त्रता का आवश्यक अंग है। यदि सार्वजनिक विरोध के रास्ते लगातार संकुचित किए जाते हैं, तो असहमति समाप्त होने के बजाय दूसरे माध्यमों में व्यक्त हो सकती है। विश्वविद्यालयों, सामाजिक संगठनों, न्यायालयों, पत्रकारिता, डिजिटल मंचों और परिवारों के भीतर होने वाली चर्चाओं में भी राजनीतिक चेतना विकसित होती है। हालाँकि, इन माध्यमों में सवालों की मौजूदगी अपने आप में किसी संगठित आन्दोलन के जारी रहने का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह अवश्य बताती है कि सार्वजनिक प्रदर्शन और सामाजिक विमर्श को एक ही चीज नहीं माना जा सकता।
इसीलिए यह प्रश्न कि लोग अपने घर लौट गये या नहीं, अपने आप में अधूरा है। किसी भी आन्दोलन में शामिल लोग अन्ततः अपने काम, पढ़ाई, परिवार और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों की ओर लौटते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे आन्दोलन के मुद्दों से विमुख हो गये। लेकिन इसका उलटा निष्कर्ष निकालना भी ठीक नहीं होगा कि जो भी व्यक्ति घर लौट गया, वह अनिवार्य रूप से अपने भीतर आन्दोलन की चेतना लेकर ही लौटा है। असली प्रश्न यह है कि आन्दोलन के बाद लोगों की समझ, बातचीत और व्यवहार में क्या परिवर्तन आया। क्या वे चुनावी प्रक्रिया को पहले से अधिक गम्भीरता से समझने लगे हैं? क्या वे मतदाता सूची में अपने और अपने परिवार के नाम की स्थिति जाँचते हैं? क्या वे चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही पर चर्चा करते हैं? क्या वे राजनीतिक दावों को बिना जाँचे स्वीकार करने के बजाय उनके प्रमाण खोजते हैं? यदि ऐसी प्रवृत्तियाँ व्यापक रूप से विकसित होती हैं, तो आन्दोलन का प्रभाव धरना-स्थल से बाहर निकलकर नागरिक जीवन में प्रवेश कर रहा होगा। लेकिन इस परिवर्तन को प्रमाणित करने के लिए केवल अनुमान नहीं, बल्कि सामाजिक अनुभव और ठोस तथ्य आवश्यक होंगे।
भारतीय समाज में आज जो बेचैनी दिखाई देती है, उसे केवल चुनावी राजनीति के एक प्रसंग तक सीमित करके भी नहीं समझा जा सकता। रोजगार की अनिश्चितता, प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ियों की शिकायतें, शिक्षा की बढ़ती लागत, आर्थिक असमानता, सामाजिक भेदभाव और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से जुड़े सवाल अलग-अलग समूहों को प्रभावित करते हैं। इन समस्याओं का अनुभव हर वर्ग और हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं है, लेकिन युवा पीढ़ी के एक हिस्से के लिए इनके बीच सम्बन्ध तलाशने की प्रवृत्ति महत्त्वपूर्ण है। वह पूछ सकती है कि शिक्षा और रोजगार की समस्याओं के लिए जिम्मेदार नीतियाँ क्या हैं, सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही कैसे तय होती है और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में नागरिक की आवाज कितनी प्रभावशाली है। यह आवश्यक नहीं कि इन सवालों से गुजरने वाला प्रत्येक युवा सत्ता का विरोधी बन जाए या किसी खास विचारधारा को स्वीकार कर ले। सामाजिक चेतना का अर्थ एक ही राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुँचना नहीं, बल्कि समस्याओं को समझने, प्रश्न उठाने और अपने अधिकारों के प्रति सजग होने की क्षमता विकसित करना है।
यहीं संविधान की भूमिका केन्द्रीय हो जाती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना न्याय, स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुता का जो आदर्श सामने रखती है, वह केवल सरकारी दस्तावेज में दर्ज शब्दों का समूह नहीं है। वह राज्य और नागरिक के सम्बन्धों के लिए एक नैतिक तथा लोकतान्त्रिक कसौटी भी है। मताधिकार का महत्त्व केवल सरकार चुनने में नहीं, बल्कि नागरिक की राजनीतिक गरिमा और समानता में है। चुनावी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अनियमितता की आशंका हो, तो उसका समाधान तथ्यों और संस्थागत जाँच से होना चाहिए; और यदि आरोप निराधार हों, तो उन्हें भी प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट किया जाना चाहिए। सत्ता का दायित्व केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाए रखना भी है, जिसमें नागरिकों को यह भरोसा हो कि उनकी राजनीतिक आवाज का सम्मान किया जाता है। लोकतन्त्र की मजबूती इस दावे से नहीं आती कि सत्ता हमेशा सही है, बल्कि इस विश्वास से आती है कि सत्ता से प्रश्न पूछे जा सकते हैं, संस्थाओं की जाँच हो सकती है और गलतियाँ सामने आने पर उन्हें सुधारा जा सकता है।
इसलिए आज न तो यह घोषणा करना उचित है कि आन्दोलन ने सत्ता को पराजित कर दिया है और न यह दावा कि सत्ता ने उसे पूरी तरह कुचल दिया है। आन्दोलन की तत्काल राजनीतिक उपलब्धियाँ सीमित हो सकती हैं, उसकी संगठनात्मक शक्ति कमजोर पड़ सकती है और उसके समर्थकों में निराशा भी पैदा हो सकती है। यह सम्भावना भी बनी रहती है कि राजनीतिक दल अपने मतभेदों के कारण किसी साझा माँग को आगे न बढ़ा पाएँ। लेकिन इन परिस्थितियों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि आन्दोलन से जुड़े सभी सवाल समाप्त हो गये हैं। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि आन्दोलन की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन ठोस तथ्यों के आधार पर हो—उसकी सार्वजनिक गतिविधियाँ कितनी जारी हैं, उसका सामाजिक समर्थन कितना व्यापक है, उसके प्रश्न संस्थागत विमर्श में कितनी जगह बना पा रहे हैं और उसके सहभागी आगे किस तरह की लोकतान्त्रिक भूमिका निभा रहे हैं। आशा महत्त्वपूर्ण है, लेकिन आशा को वास्तविकता का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
जन्तर-मन्तर की घटना का सबसे महत्त्वपूर्ण सम्भावित परिणाम यही हो सकता है कि एक नयी पीढ़ी राजनीति को केवल नेताओं, चुनावी नारों और सत्ता परिवर्तन की प्रतिस्पर्धा के रूप में देखने के बजाय नागरिक अधिकारों और संवैधानिक जवाबदेही के सन्दर्भ में समझना शुरू करे। यदि युवा अपने मताधिकार को केवल मतदान के दिन की गतिविधि नहीं, बल्कि लोकतन्त्र में अपनी समान भागीदारी का आधार मानते हैं; यदि महिलाएँ सार्वजनिक जीवन में अपनी स्वतन्त्र आवाज को मजबूत करती हैं; यदि विद्यार्थी संस्थाओं से जवाबदेही माँगना सीखते हैं; और यदि नागरिक राजनीतिक दावों की जाँच तथ्यों के आधार पर करते हैं, तो यह भारतीय लोकतन्त्र के लिए सकारात्मक परिवर्तन होगा। लेकिन यह परिवर्तन अपने आप नहीं आएगा। इसके लिए आन्दोलनों को अपने भीतर लोकतान्त्रिक मूल्यों का पालन करना होगा, राजनीतिक दलों को जनसरोकारों के प्रति ईमानदार होना होगा और नागरिक समाज को असहमति के अधिकार की रक्षा करनी होगी। सत्ता-विरोध अपने आप में लोकतान्त्रिक चेतना नहीं है; लोकतान्त्रिक चेतना वह है, जो सत्ता चाहे किसी की भी हो, उससे जवाबदेही माँगने का अधिकार सुरक्षित रखती है।
अन्ततः जन्तर-मन्तर का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वहाँ आज कितनी भीड़ मौजूद है, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि वहाँ उठे सवाल कितनी गम्भीरता से सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ते हैं। यदि आन्दोलन के सहभागी बिखर जाते हैं, उसके संगठन निष्क्रिय हो जाते हैं और उसके मुद्दे सामाजिक विमर्श से गायब हो जाते हैं, तो उसके कमजोर पड़ने की बात स्वीकार करनी होगी। लेकिन यदि मताधिकार, चुनावी पारदर्शिता, संस्थागत स्वतन्त्रता और नागरिक जवाबदेही के प्रश्न समाज में अधिक व्यापक चर्चा का हिस्सा बनते हैं, तो धरना-स्थल की खामोशी को आन्दोलन की अन्तिम पराजय नहीं कहा जा सकता। लोकतन्त्र की रक्षा केवल किसी एक दिन की भीड़ या किसी एक नेता के नेतृत्व से नहीं होती; वह नागरिकों की निरन्तर जागरूकता, संगठित भागीदारी और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से होती है।
इसलिए आज सवाल यह नहीं है कि जन्तर-मन्तर से लोग अपने घर लौट आये हैं या नहीं। सवाल यह है कि वहाँ से लौटने के बाद उन्होंने लोकतन्त्र, मताधिकार और अपनी नागरिक जिम्मेदारी के बारे में क्या सीखा; क्या वे सत्ता के दावों को बिना जाँचे स्वीकार करेंगे या प्रमाण माँगेंगे; क्या वे राजनीतिक मतभेदों के बावजूद नागरिक अधिकारों के सवाल पर एक-दूसरे के साथ खड़े हो सकेंगे; और क्या वे उस लोकतान्त्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए अपनी आवाज उठाते रहेंगे, जिसमें सरकार जनता की मालिक नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेह होती है? जन्तर-मन्तर पर सन्नाटा छा जाना एक दृश्य हो सकता है, लेकिन क्या भारतीय समाज के भीतर उठे सवाल भी सचमुच खामोश हो गये हैं—या उनकी अगली आवाज किसी ऐसे मंच से उठने की तैयारी कर रही है, जिसकी कल्पना आज सत्ता और विपक्ष, दोनों नहीं कर पा रहे हैं?










