देशकाल

लोकतन्त्र में सरकार संविधान से ऊपर नहीं

10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर दिल्ली में प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन के सन्दर्भ में ट्रेनों को रद्द करने, बड़ी संख्या में मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश-निकास बन्द करने और प्रदर्शन की अनुमति से इनकार करने की खबरें गम्भीर संवैधानिक सवाल खड़े करती हैं। यदि इन कदमों का उद्देश्य शान्तिपूर्ण विरोध में शामिल होने वाले नागरिकों को दिल्ली पहुँचने से रोकना था, तो यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़ा मामला है। हालाँकि, किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले सम्बन्धित आदेशों, उनके आधिकारिक कारणों और वास्तविक प्रभावों की जाँच आवश्यक है।

रिपोर्टों में 10 अक्टूबर को 245 ट्रेनों के रद्द होने और दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों पर प्रवेश-निकास प्रतिबन्धित किए जाने की जानकारी सामने आई है। प्रशासन की ओर से भीड़ नियन्त्रण, सुरक्षा और यातायात बाधित होने की आशंका जैसे कारण बताए गये। लेकिन सवाल यह है कि क्या इतनी व्यापक कार्रवाई वास्तव में आवश्यक थी? क्या सीमित मार्गों पर नियन्त्रण, अतिरिक्त पुलिस बल और वैकल्पिक यातायात व्यवस्था से स्थिति सँभाली जा सकती थी? यदि सुरक्षा के नाम पर हजारों यात्रियों की यात्रा बाधित हुई, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? सर्वोच्च न्यायालय में भी इन प्रतिबन्धों को चुनौती दी गयी और उनकी व्यापकता तथा आनुपातिकता पर सवाल उठे।

यहीं से लोकतन्त्र की असली परीक्षा शुरू होती है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, अनुच्छेद 19(1)(ख) शान्तिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार और अनुच्छेद 19(1)(घ) देश में स्वतन्त्र रूप से आवागमन का अधिकार प्रदान करता है। इन अधिकारों पर उचित प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं, लेकिन प्रतिबन्धों का उद्देश्य और सीमा तर्कसंगत तथा आनुपातिक होना चाहिए। सरकार का काम कानून-व्यवस्था बनाये रखना है, नागरिकों की असहमति को असम्भव बना देना नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ और मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ जैसे मामलों में नागरिक स्वतन्त्रताओं तथा सार्वजनिक व्यवस्था के बीच सन्तुलन की आवश्यकता स्पष्ट की है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग के पीछे मतदाता सूची और चुनावी निष्पक्षता से सम्बन्धित गम्भीर राजनीतिक आरोप हैं। यदि पात्र मतदाताओं के नाम अनुचित रूप से हटाये गये हैं, तो यह लोकतन्त्र की जड़ों से जुड़ा प्रश्न है। निर्वाचन आयोग को ऐसे आरोपों का पारदर्शी और तथ्यपरक उत्तर देना चाहिए। दूसरी ओर, मतदाता सूची का पुनरीक्षण आयोग का वैधानिक दायित्व भी है। इसलिए आरोपों की जाँच प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए, न कि राजनीतिक दावों को स्वतः सिद्ध तथ्य मानकर।

क्या नरेन्द्र मोदी सरकार प्रदर्शन से डर गयी है? व्यापक प्रतिबन्ध इस आशंका को जन्म दे सकते हैं, लेकिन केवल ट्रेनों के रद्द होने और मेट्रो स्टेशनों के बन्द होने से सरकार के भयभीत होने या उसके अवैध होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसी तरह, चुनावी अनियमितताओं के आरोप अपने-आप यह साबित नहीं करते कि केन्द्र सरकार वोट चोरी से बनी है। इसके लिए ठोस साक्ष्य और सक्षम संस्थाओं की जाँच आवश्यक है। लेकिन सरकार की वैधता पर सवाल उठाने वालों को चुप कराना भी किसी लोकतान्त्रिक सरकार का समाधान नहीं हो सकता।

लोकतन्त्र में सरकारें चुनाव जीतकर सत्ता में आती हैं, लेकिन उनकी जवाबदेही नागरिकों के सवालों से तय होती है। यदि चुनावी प्रक्रिया पर सन्देह है, तो उसका उत्तर पारदर्शिता और निष्पक्ष जाँच है; यदि प्रदर्शन से सुरक्षा का खतरा है, तो उसका समाधान लक्षित और आनुपातिक सुरक्षा व्यवस्था है। सार्वजनिक परिवहन को व्यापक रूप से बाधित करना तभी उचित ठहराया जा सकता है, जब उसकी वास्तविक आवश्यकता और कम प्रतिबन्धात्मक विकल्पों की अपर्याप्तता का ठोस आधार मौजूद हो।

असली सवाल यह नहीं है कि सरकार प्रदर्शन से डर गयी है या नहीं; असली सवाल यह है कि क्या सरकार ने नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करते हुए कानून-व्यवस्था बनाये रखने की अपनी जिम्मेदारी निभायी? लोकतन्त्र में सत्ता संविधान से ऊपर नहीं होती, निर्वाचन आयोग जवाबदेही से परे नहीं होता और शान्तिपूर्ण विरोध कोई अपराध नहीं है। जिस सरकार को अपने निर्णयों और चुनावी वैधता पर विश्वास होता है, वह सवालों का जवाब तथ्यों से देती है, नागरिकों की आवाजाही बाधित करके नहीं।

अन्ततः, यह लड़ाई किसी एक सरकार, प्रधानमन्त्री या राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता और नागरिकों के लोकतान्त्रिक अधिकारों की है। भारतीय संविधान सरकार को असीमित शक्ति नहीं देता; वह सत्ता की सीमाएँ तय करता है और नागरिकों को उस सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार देता है। यदि शान्तिपूर्ण विरोध को रोकने के लिए सार्वजनिक परिवहन बाधित किया जाता है, तो सरकार का दायित्व है कि वह अपने निर्णय की आवश्यकता, वैधता और आनुपातिकता साबित करे। सुरक्षा के नाम पर मौलिक अधिकारों को निष्प्रभावी नहीं बनाया जा सकता और प्रशासनिक आदेशों को संवैधानिक जवाबदेही से छूट नहीं मिल सकती। चुनावी अनियमितताओं के आरोपों की जाँच निष्पक्ष होनी चाहिए और विरोध के अधिकार पर किसी भी अनुचित प्रतिबन्ध की न्यायिक समीक्षा होनी चाहिए। क्योंकि लोकतन्त्र में सरकार संविधान से वैधता प्राप्त करती है, संविधान सरकार से नहीं; नागरिक प्रजा नहीं, अधिकार-सम्पन्न नागरिक हैं। सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, यदि वह सवालों से बचने के लिए नागरिकों की आवाज दबाती है, तो उसे संविधान के कठघरे में जवाब देना होगा। यही कानून का शासन है, यही लोकतन्त्र की आत्मा है और यही गणराज्य की अन्तिम कसौटी है।

 

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राकेश कुमार गुप्त

लेखक इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं तथा संस्कृतिकर्म और लेखन में सक्रिय हैं। grakesh80@gmail.com +919839448782
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