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लोकतन्त्र, पत्रकारिता और राष्ट्रकवि दिनकर

“ऐसी स्वतन्त्रता, जो आत्मा को बेचकर मिले, वह स्वतन्त्रता नहीं है।”
 — रामधारी सिंह ‘दिनकर’

लोकतन्त्र केवल संवैधानिक संस्थाओं से नहीं, बल्कि उन नैतिक मूल्यों से संचालित होता है जो सार्वजनिक जीवन को दिशा देते हैं। संसद, न्यायपालिका और कार्यपालिका अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभाती हैं, किन्तु लोकतान्त्रिक चेतना का निर्माण समाज और सत्ता के बीच सतत संवाद से होता है। इस संवाद की सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी पत्रकारिता है। उसका दायित्व केवल समाचार देना नहीं, बल्कि जनमत को जागरूक करना, सत्ता को उत्तरदायी बनाना और समाज के नैतिक विवेक को सक्रिय रखना भी है। इसलिए पत्रकारिता की स्वतन्त्रता का प्रश्न अन्ततः लोकतन्त्र की गुणवत्ता, उसकी विश्वसनीयता और जनविश्वास का प्रश्न है।                                                                      रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को सामान्यतः राष्ट्रकवि के रूप में याद किया जाता है, किन्तु राज्यसभा में दिए गये उनके वक्तव्य उनके व्यक्तित्व का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष सामने लाते हैं। 13 सितम्बर 1955 को प्रेस आयोग के प्रतिवेदन तथा 24 फरवरी 1961 को आकाशवाणी के कार्यकलापों पर दिए गये उनके भाषण पत्रकारिता और जनसंचार के प्रति उनकी गम्भीर लोकतान्त्रिक दृष्टि का परिचय देते हैं। इन दोनों वक्तव्यों को साथ पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि वे पत्रकारिता को केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतन्त्र की नैतिक और सांस्कृतिक संरचना का आधार मानते थे।

प्रेस आयोग पर चर्चा के दौरान दिनकर ने स्पष्ट किया कि प्रेस की स्वतन्त्रता केवल सरकारी नियन्त्रण से मुक्ति का नाम नहीं है। यदि पत्रकारिता आर्थिक दबावों, वैचारिक आग्रहों या निजी स्वार्थों की बन्धक बन जाए, तो उसकी स्वतन्त्रता अर्थहीन हो जाती है। इसी सन्दर्भ में उन्होंने कहा था— “हम उन्हें स्वतन्त्रता देना चाहते हैं… जो आत्मा को मारकर लिख रहे हैं… वे कहेंगे कि स्वतन्त्रता खतरे में है।” यह टिप्पणी केवल तत्कालीन पत्रकारिता की आलोचना नहीं थी, बल्कि स्वतन्त्र पत्रकारिता की नैतिक कसौटी भी थी। दिनकर के लिए पत्रकारिता का मूल आधार निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा और लोकहित था। उनका विश्वास था कि अधिकार और उत्तरदायित्व एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि पत्रकारिता अपनी नैतिक चेतना खो देती है, तो अभिव्यक्ति की औपचारिक स्वतन्त्रता भी लोकतन्त्र की रक्षा नहीं कर सकती।

दिनकर ने प्रेस की स्वतन्त्रता को विचारों की बहुलता से भी जोड़ा। उनका मानना था कि लोकतन्त्र तभी सशक्त होगा, जब विभिन्न मतों और आवाजों को समान अवसर मिलेगा। यदि आर्थिक या संस्थागत कारणों से कुछ ही समाचार-पत्र जनमत को नियन्त्रित करने लगें, तो लोकतान्त्रिक विमर्श सीमित हो जाएगा। इसलिए उन्होंने छोटे और मध्यम समाचार-पत्रों के अस्तित्व को लोकतन्त्र की आवश्यकता माना। उनके अनुसार स्थानीय समाज की समस्याएँ और जनता की वास्तविक आकाँक्षाएँ प्रायः इन्हीं पत्रों के माध्यम से सामने आती हैं। यदि ऐसे समाचार-पत्र आर्थिक कठिनाइयों के कारण समाप्त होने लगें, तो विचारों की विविधता भी कमजोर पड़ जाएगी। आज, जब मीडिया का स्वरूप प्रिण्ट से आगे बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित माध्यमों तक फैल चुका है, तब दिनकर के ये विचार और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। तकनीक बदल गयी है, लेकिन पत्रकारिता के मूल प्रश्न आज भी वही हैं—सत्य के प्रति निष्ठा, वैचारिक स्वतन्त्रता, आर्थिक स्वायत्तता और लोकतान्त्रिक उत्तरदायित्व। यही कारण है कि दिनकर के संसदीय वक्तव्य केवल ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, बल्कि आज की पत्रकारिता के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण नैतिक मार्गदर्शक हैं।

प्रेस आयोग पर हुई चर्चा के दौरान दिनकर ने पत्रकारों की आर्थिक स्थिति को भी लोकतन्त्र से जुड़ा हुआ प्रश्न माना। उनका स्पष्ट मत था कि आर्थिक असुरक्षा से घिरा पत्रकार स्वतन्त्र और निर्भीक पत्रकारिता नहीं कर सकता। उन्होंने सदन का ध्यान समाचार-पत्रों के सम्पादकीय विभाग में कार्यरत पत्रकारों की कठिन परिस्थितियों की ओर आकर्षित करते हुए कहा था— “भारतवर्ष में पत्रों के सम्पादन विभाग में काम करने वाले वे अभागे हैं, जिन्होंने अपने माथे पर जीवन का अभिशाप लिया है… एक-एक आदमी के ऊपर पाँच-पाँच, छह-छह कॉलम लिखने का भार है। यदि इनकी शक्ति को संख्या के बजाय गुण की ओर लगाया जाए, तो बड़े अखबार अधिक सुन्दर और स्वस्थ हो जाएँगे।” इस टिप्पणी में केवल पत्रकारों के प्रति सहानुभूति नहीं, बल्कि पत्रकारिता की गुणवत्ता का प्रश्न भी निहित है। दिनकर का मानना था कि जब पत्रकार असुरक्षित परिस्थितियों में अत्यधिक कार्यभार के बीच काम करने के लिए विवश होंगे, तो उनसे स्वतन्त्र चिन्तन और उच्च नैतिक आदर्शों की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा। इसलिए पत्रकारों का सम्मानजनक वेतन, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ और सामाजिक सुरक्षा लोकतान्त्रिक व्यवस्था की भी आवश्यकता हैं।

दिनकर ने प्रेस की आर्थिक संरचना पर भी गम्भीर चिन्ता व्यक्त की। उन्होंने संकेत किया कि बड़े उद्योग-समूहों के स्वामित्व वाले समाचार-पत्रों को विज्ञापन सहज रूप से प्राप्त हो जाते हैं, जबकि छोटे और मध्यम समाचार-पत्र लगातार आर्थिक संकट से जूझते रहते हैं। इस असमानता को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा था— “बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को खा रही हैं। यदि अखबारी तालाब की छोटी मछलियों को बचाया नहीं गया, तो समाज के अन्य तालाबों की मछलियों को बचाने में भी कठिनाई होगी।” यह रूपक आज भी उतना ही सार्थक दिखाई देता है। यदि विज्ञापन और आर्थिक संसाधन कुछ सीमित संस्थानों तक सिमट जाएँ, तो विचारों की विविधता भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। परिणामतः जनमत का निर्माण कुछ प्रभावशाली समूहों के हाथों में केन्द्रित होने लगता है, जो लोकतान्त्रिक विमर्श के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं है। इन विचारों से स्पष्ट है कि दिनकर पत्रकारिता की स्वतन्त्रता को केवल संवैधानिक अधिकार के रूप में नहीं देखते थे। उनके लिए उसकी विश्वसनीयता तीन आधारों पर टिकी थी—नैतिक स्वतन्त्रता, आर्थिक स्वायत्तता और वैचारिक बहुलता। इन तीनों में से किसी एक के भी कमजोर पड़ने पर लोकतान्त्रिक संवाद प्रभावित होता है।

आज जब मीडिया के स्वामित्व, कॉरपोरेट प्रभाव, सरकारी विज्ञापनों के वितरण और आर्थिक दबावों को लेकर लगातार बहस हो रही है, तब दिनकर के ये विचार आश्चर्यजनक रूप से समकालीन प्रतीत होते हैं। उन्होंने छह दशक पहले ही यह संकेत कर दिया था कि आर्थिक रूप से पराधीन पत्रकारिता अन्ततः वैचारिक रूप से भी स्वतन्त्र नहीं रह सकती। इसलिए लोकतन्त्र की मजबूती के लिए स्वतन्त्र पत्रकारिता के साथ-साथ उसकी आर्थिक स्वायत्तता भी समान रूप से आवश्यक है।

प्रेस आयोग पर दिए गये अपने वक्तव्य में जहाँ दिनकर ने पत्रकारिता की स्वतन्त्रता, आर्थिक स्वायत्तता और वैचारिक बहुलता पर बल दिया, वहीं 24 फरवरी 1961 को राज्यसभा में आकाशवाणी के कार्यकलापों पर बोलते हुए उन्होंने जनसंचार के सांस्कृतिक दायित्व को रेखांकित किया। उनके लिए रेडियो केवल समाचार प्रसारित करने वाली सरकारी संस्था नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय जीवन के सांस्कृतिक निर्माण का एक सशक्त माध्यम था। उन्होंने कहा था, “यदि हम रेडियो को सिर्फ इस नजर से देखें कि यह समाचार की एक एजेंसी है, तो यह रेडियो के साथ अन्याय होगा। रेडियो के अधिकांश कार्यक्रम सांस्कृतिक होते हैं।”

इस कथन से स्पष्ट है कि दिनकर जनसंचार का मूल्य केवल सूचना के प्रसार से नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक चेतना के निर्माण से निर्धारित करते थे। उनका विश्वास था कि किसी भी संचार माध्यम का वास्तविक महत्त्व इस बात में है कि वह समाज की भाषायी विविधता, साहित्य, कला और लोकसंस्कृति को कितना व्यापक मंच उपलब्ध कराता है। इसी सन्दर्भ में उन्होंने आकाशवाणी की उस भूमिका की सराहना की, जिसके माध्यम से विभिन्न भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों को राष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति मिली। उनके शब्दों में, रेडियो ने अनेक भाषाओं और साहित्यकारों को ऐसा साझा मंच प्रदान किया, जहाँ वे एक-दूसरे से संवाद कर सके और देश के व्यापक सांस्कृतिक जीवन को समृद्ध बना सके।

दिनकर भारतीय संस्कृति को विविधताओं से निर्मित एक जीवन्त परम्परा मानते थे। उनके अनुसार राष्ट्रीय एकता का आधार एकरूपता नहीं, बल्कि विविधताओं का सम्मान और संवाद है। इसलिए वे चाहते थे कि जनसंचार के माध्यम केवल मनोरंजन या सूचना तक सीमित न रहें, बल्कि समाज में सांस्कृतिक संवेदना, भाषा के प्रति सम्मान और लोकतान्त्रिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करें। इस दृष्टि से आकाशवाणी उनके लिए प्रशासनिक संस्था से अधिक एक सांस्कृतिक संस्था थी।

दिनकर के 1955 और 1961 के दोनों संसदीय वक्तव्यों को साथ पढ़ने पर उनकी जनसंचार-दृष्टि का एक स्पष्ट स्वरूप सामने आता है। प्रेस के सन्दर्भ में वे स्वतन्त्रता और उत्तरदायित्व की बात करते हैं, जबकि आकाशवाणी के सन्दर्भ में संस्कृति और लोकशिक्षा को महत्त्व देते हैं। किन्तु दोनों के केन्द्र में एक ही विश्वास है कि पत्रकारिता और जनसंचार का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि लोकतान्त्रिक समाज के नैतिक और सांस्कृतिक आधारों को सुदृढ़ करना है।

आज संचार के साधन अभूतपूर्व रूप से विकसित हो चुके हैं। चौबीसों घण्टे प्रसारित होने वाले समाचार चैनल, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों ने सूचना के प्रवाह को अत्यन्त तीव्र बना दिया है। इसके साथ ही तथ्य और प्रचार, संवाद और शोर, सूचना और दुष्प्रचार के बीच की सीमाएँ भी धुँधली होती जा रही हैं। ऐसे समय में दिनकर के विचार हमें स्मरण कराते हैं कि किसी भी माध्यम की विश्वसनीयता उसकी तकनीकी क्षमता से नहीं, बल्कि उसकी नैतिक प्रतिबद्धता, सम्पादकीय स्वतन्त्रता और लोकहित के प्रति उत्तरदायित्व से निर्धारित होती है।

इसी कारण दिनकर के संसदीय वक्तव्य आज केवल ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं रह गये हैं। वे समकालीन पत्रकारिता और जनसंचार के लिए एक नैतिक कसौटी भी हैं। लोकतन्त्र को जीवन्त बनाए रखने के लिए पत्रकारिता की स्वतन्त्रता, आर्थिक स्वायत्तता, वैचारिक बहुलता और सांस्कृतिक उत्तरदायित्व—इन चारों मूल्यों की रक्षा आवश्यक है। यही दिनकर के चिन्तन का सार है और यही उनके संसदीय हस्तक्षेपों की स्थायी प्रासंगिकता भी।

 

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अनुज

Anuj (अनुज) : लेखक कहानीकार, समीक्षक एवं सम्पादक हैं तथा ‘कला-संगम’ ट्रस्ट का संचालन करते हैं। aakhta@gmail.com +919868009750.
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