
गाँधी और आम्बेडकर : मतभेद, संवाद और आज की राजनीति
गाँधी और आम्बेडकर भारतीय आधुनिकता के दो ऐसे नाम हैं, जिन्हें आज कुछ लोग एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करके अपनी-अपनी वैचारिक राजनीति को मजबूत करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। एक तरफ गाँधी की आलोचना को आम्बेडकर के प्रति निष्ठा का प्रमाण मान लिया जाता है, तो दूसरी तरफ आम्बेडकर की प्रासंगिकता कम करने के लिए गाँधी की प्रशंसा को आधार बनाया जाता है। इस तरह दो असाधारण व्यक्तित्वों के बीच हुए वास्तविक वैचारिक मतभेदों को एक स्थायी संघर्ष में बदल दिया गया है। यह इतिहास को समझने का तरीका नहीं, बल्कि उसका राजनीतिक सरलीकरण है।
गाँधी और आम्बेडकर के बीच मतभेद वास्तविक और गम्भीर थे। जाति, वर्ण-व्यवस्था, अस्पृश्यता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, पृथक निर्वाचक मण्डल, सामाजिक परिवर्तन के तरीकों और राज्य की भूमिका जैसे प्रश्नों पर दोनों की दृष्टि एक जैसी नहीं थी। आम्बेडकर ने गाँधी की कई नीतियों और विचारों की कठोर आलोचना की और गाँधी ने भी आम्बेडकर की अनेक राजनीतिक माँगों से असहमति व्यक्त की। इसलिए दोनों के मतभेदों को छिपाना या दोनों को एक ही विचार का प्रतिनिधि बताना भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
लेकिन मतभेद और शत्रुता एक ही चीज नहीं हैं। लोकतान्त्रिक समाज में दो बड़े विचारकों के बीच असहमति स्वाभाविक है। असली समस्या तब पैदा होती है, जब उनकी असहमति को ऐसी राजनीतिक लड़ाई में बदल दिया जाए जिसमें एक को स्वीकार करने का अर्थ दूसरे को अस्वीकार करना मान लिया जाए।
गाँधी को समझने के लिए आम्बेडकर को नकारना आवश्यक नहीं है और आम्बेडकर को समझने के लिए गाँधी को खारिज करना भी जरूरी नहीं है। बल्कि दोनों को साथ पढ़ने पर भारतीय समाज के परिवर्तन की जटिलता कहीं अधिक स्पष्ट होती है। लेकिन साथ पढ़ने का अर्थ उनके मतभेदों को मिटा देना नहीं, बल्कि उन मतभेदों के ऐतिहासिक और वैचारिक आधार को समझना है।
गाँधी ने भारतीय राजनीति को व्यापक जनसमाज तक पहुँचाने का काम किया। उन्होंने स्वतन्त्रता के प्रश्न को केवल शिक्षित अभिजात वर्ग या राजनीतिक संगठनों का प्रश्न न रहने देकर उसे गाँवों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं और सामान्य नागरिकों के जीवन से जोड़ा। अस्पृश्यता के प्रश्न को भी उन्होंने राष्ट्रीय सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाने के लिए व्यापक अभियान चलाया। 1932 के पूना समझौते के बाद हरिजन सेवक संघ की स्थापना, ‘हरिजन’ पत्र का प्रकाशन और देशव्यापी हरिजन यात्रा इसी अभियान का हिस्सा थे।
लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि आम्बेडकर का सामाजिक आन्दोलन गाँधी की देन था। यह ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। आम्बेडकर ने गाँधी के व्यापक जन-अभियानों से स्वतन्त्र अपनी सामाजिक और राजनीतिक चेतना विकसित की थी। महाड़ सत्याग्रह जैसे उनके आन्दोलन गाँधी के हरिजन अभियान से पहले ही भारतीय समाज में दलित अधिकारों का प्रश्न निर्णायक ढंग से उठा चुके थे। आम्बेडकर किसी के बनाए हुए मंच पर आए हुए व्यक्ति नहीं थे; वे स्वयं एक स्वतन्त्र सामाजिक-राजनीतिक शक्ति थे।
यहीं से दोनों को समझने की सही शुरुआत होती है। गाँधी ने भारतीय समाज के भीतर नैतिक और सामाजिक परिवर्तन का प्रश्न उठाया, जबकि आम्बेडकर ने समानता, प्रतिनिधित्व, अधिकार और संवैधानिक संरक्षण को राजनीतिक संघर्ष का केंद्रीय प्रश्न बनाया। गाँधी का जोर सामाजिक चेतना और जन-सक्रियता पर था; आम्बेडकर ने सामाजिक न्याय को संस्थागत और संवैधानिक आधार देने पर जोर दिया। दोनों के रास्ते अलग थे, लेकिन दोनों के प्रश्न भारतीय समाज की संरचना से जुड़े हुए थे।
हालाँकि, इन दोनों दृष्टियों के बीच का अन्तर केवल कार्य-पद्धति का नहीं था। जाति के प्रश्न पर यह अन्तर बुनियादी वैचारिक टकराव का रूप लेता है। आम्बेडकर जाति-व्यवस्था के उन्मूलन को सामाजिक मुक्ति की अनिवार्य शर्त मानते थे। गाँधी की जाति और वर्ण के बारे में धारणाएँ समय के साथ बदलीं, लेकिन उनके विचारों में इस प्रश्न को लेकर एक जटिलता बनी रही। आम्बेडकर की पुस्तक ‘जाति का विनाश’ इस वैचारिक टकराव को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण आधार है। पूना समझौते के पीछे की परिस्थितियाँ और उसके प्रति आम्बेडकर की असहमति भी इस इतिहास का अनिवार्य हिस्सा हैं।
इसलिए गाँधी और आम्बेडकर को दो पूरक धाराओं के रूप में प्रस्तुत करने से पहले यह समझना जरूरी है कि सामाजिक समानता का अर्थ दोनों के लिए एक जैसा नहीं था। आम्बेडकर के लिए यह केवल नैतिक चेतना का प्रश्न नहीं, बल्कि सत्ता, संसाधनों, प्रतिनिधित्व और सामाजिक संरचना में परिवर्तन का प्रश्न था। गाँधी की सामाजिक दृष्टि और आम्बेडकर की मुक्ति की अवधारणा के बीच इस बुनियादी अन्तर को स्वीकार किये बिना उनके बीच संवाद की बात अधूरी रह जाती है।
आम्बेडकर का महत्त्व इस बात में भी दिखाई देता है कि स्वतन्त्र भारत की संविधान-निर्माण प्रक्रिया में उनके योगदान को उनके विरोधी भी नकार नहीं सकते। 1947 में संविधान सभा में उनकी वापसी के लिए कॉंग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने सक्रिय भूमिका निभायी। राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हें तत्काल संविधान सभा में वापस लाने का आग्रह किया और सरदार पटेल ने भी उनके निर्वाचन का समर्थन किया। बाद में जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपनी सरकार में विधि मन्त्री बनने का प्रस्ताव दिया। 30 जुलाई 1947 के नेहरू के पत्र में स्पष्ट रूप से दर्ज है—“मैंने आम्बेडकर से बात की है और वे सहमत हो गये हैं।”
यह तथ्य इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि आज गाँधी और आम्बेडकर के सम्बन्धों को जिस तरह एक सरल विरोध की कहानी में बदल दिया जाता है, वह उस समय की राजनीतिक जटिलताओं को मिटा देता है। असहमति के बावजूद संवाद था, संघर्ष के बावजूद सहयोग की स्थितियाँ थीं और व्यक्तिगत मतभेदों के बावजूद राष्ट्र-निर्माण के प्रश्न पर विभिन्न धाराओं के बीच सम्पर्क बना हुआ था।
आम्बेडकर का 25 नवम्बर 1949 का संविधान सभा में दिया गया भाषण इस पूरे प्रश्न को समझने के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने संवैधानिक तरीकों को लोकतन्त्र की अनिवार्य शर्त माना, राजनीतिक जीवन में अन्धभक्ति और नायक-पूजा से सावधान किया और कहा कि राजनीतिक लोकतन्त्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता, जब तक उसके आधार में सामाजिक लोकतन्त्र न हो। सामाजिक लोकतन्त्र का अर्थ था—स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुता।
इस दृष्टि से आम्बेडकर को केवल गाँधी-विरोध के प्रतीक में बदल देना स्वयं आम्बेडकर के विचारों को छोटा करना है। आम्बेडकर का सबसे बड़ा योगदान गाँधी की आलोचना नहीं, बल्कि उस भारत की कल्पना है जिसमें नागरिक अधिकार, समानता, सामाजिक न्याय और संवैधानिक लोकतन्त्र वास्तविक जीवन का हिस्सा बनें।
ठीक इसी तरह गाँधी को केवल आम्बेडकर-विरोधी व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करना भी उनके व्यापक राजनीतिक और सामाजिक कार्य को समझने से इनकार करना है। गाँधी की आलोचना की जानी चाहिए और उनके विचारों की कठोर आलोचना भी की जा सकती है। लेकिन आलोचना और खारिज कर देना दो अलग-अलग बौद्धिक प्रक्रियाएँ हैं। किसी विचारक के योगदान को स्वीकार करने का अर्थ उसकी सीमाओं की अनदेखी करना नहीं हो सकता।
आज समस्या यह है कि गाँधी और आम्बेडकर के बीच संवाद और संघर्ष के पूरे इतिहास को पढ़ने के बजाय सोशल मीडिया की राजनीति ने दोनों को दो विरोधी प्रतीकों में बदल दिया है। गाँधी के नाम पर आम्बेडकर की उपेक्षा और आम्बेडकर के नाम पर गाँधी के सम्पूर्ण अवमूल्यन—दोनों ही इतिहास को वर्तमान की वैचारिक जरूरतों के अनुसार काट-छांटकर देखने की प्रवृत्तियाँ हैं।
लेकिन यह प्रवृत्ति केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। गाँधी और आम्बेडकर की विरासत को लेकर राजनीतिक दलों, जातिगत अस्मिताओं और सत्ता की वैचारिक राजनीति के बीच भी संघर्ष जारी है। आम्बेडकर को स्वीकार करने का दावा करने वाली राजनीति से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि वह उनके संविधानवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक न्याय के विचारों के प्रति कितनी प्रतिबद्ध है? इसी तरह गाँधी के नाम का इस्तेमाल करने वाली राजनीति से भी पूछा जाना चाहिए कि वह सत्य, अहिंसा, धार्मिक सहिष्णुता और सत्ता के प्रति नैतिक प्रतिरोध के उनके आग्रहों को कितना स्वीकार करती है?
आम्बेडकर की नायक-पूजा के प्रति चेतावनी और गाँधी की सत्ता-विरोधी नैतिक दृष्टि, दोनों आज की राजनीति के लिए असुविधाजनक प्रश्न खड़े करती हैं। दोनों के नाम का इस्तेमाल करना आसान है, लेकिन उनके विचारों को अपने राजनीतिक आचरण में उतारना कठिन। यही वह बिन्दु है जहाँ इतिहास की बहस वर्तमान की राजनीति से जुड़ती है।
इसमें सबसे अधिक नुकसान भारतीय समाज का होता है। गाँधी और आम्बेडकर को अलग-अलग खेमों में बाँट देने से हम उन प्रश्नों को भी अलग कर देते हैं जिन्हें भारतीय समाज को एक साथ हल करना है—सामाजिक समानता, आर्थिक न्याय, जातिगत भेदभाव, धार्मिक सह-अस्तित्व, राजनीतिक लोकतन्त्र, नागरिक स्वतन्त्रता और नैतिक सार्वजनिक जीवन।
भारत को केवल राजनीतिक स्वतन्त्रता से सन्तुष्ट नहीं होना था। उसे सामाजिक लोकतन्त्र भी बनना था। गाँधी ने समाज की नैतिक चेतना और जनभागीदारी को प्रभावित करने का प्रयास किया; आम्बेडकर ने संविधान के माध्यम से स्वतन्त्रता, समानता और न्याय को संस्थागत आधार दिया। इन दोनों प्रक्रियाओं को एक-दूसरे का विकल्प मानना भारतीय परिवर्तन की पूरी कहानी को अधूरा कर देता है। लेकिन इन दोनों को एक ही विचारधारा में समेट देना भी उतना ही अनुचित होगा। उनके बीच का संवाद तभी सार्थक हो सकता है, जब उनकी असहमतियों को भी पूरी ईमानदारी से स्वीकार किया जाए।
यहाँ एक और महत्त्वपूर्ण फर्क समझना होगा। आम्बेडकरवादी होना गाँधी-विरोधी होना नहीं है। उसी तरह गाँधी के विचारों से सहमत होना आम्बेडकर के विचारों को अस्वीकार करना नहीं है। आम्बेडकर का संविधानवाद, सामाजिक न्याय और समान नागरिकता का विचार स्वयं किसी व्यक्ति-पूजा पर आधारित नहीं था। उन्होंने राजनीतिक जीवन में नायक-पूजा के खतरों की चेतावनी दी थी। इसलिए आम्बेडकर को किसी दूसरे महापुरुष के विरोध तक सीमित कर देना उनके विचारों के साथ अन्याय है।
आज जरूरत गाँधी और आम्बेडकर में से किसी एक को चुनने की नहीं, बल्कि दोनों को उनके अपने ऐतिहासिक सन्दर्भों में पढ़ने की है। जहाँ गाँधी की सीमाएँ हैं, वहाँ उनकी आलोचना होनी चाहिए। जहाँ आम्बेडकर के विचारों की अपनी ऐतिहासिक सीमाएँ और सन्दर्भ हैं, वहाँ उनकी भी आलोचनात्मक समीक्षा हो सकती है। किसी विचारक को समझने का सबसे कमजोर तरीका यह है कि पहले उसे किसी राजनीतिक खेमे में रखा जाए और फिर उसी खेमे के आधार पर उसके पूरे विचारों का मूल्यांकन कर दिया जाए।
भारतीय समाज को आज गाँधी और आम्बेडकर के बीच युद्ध नहीं, बल्कि उनके बीच हुए संवाद और संघर्ष के इतिहास को समझने की जरूरत है। उनके मतभेद हमें लोकतन्त्र में असहमति का मूल्य बताते हैं और उनकी समान चिन्ताएँ हमें सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता का बोध कराती हैं। संवाद का अर्थ यह नहीं कि हम मतभेदों को भुला दें, बल्कि यह है कि असहमति के बावजूद एक-दूसरे के विचारों को सुनने और उनसे सीखने की लोकतान्त्रिक क्षमता विकसित करें।
गाँधी को देवता बनाना भी उनके साथ न्याय नहीं है और उन्हें खलनायक बना देना भी नहीं। आम्बेडकर को केवल गाँधी-विरोध का प्रतीक बना देना भी उनके विचारों के साथ न्याय नहीं है। दोनों को उनके पूरे व्यक्तित्व, संघर्षों, सीमाओं और योगदान के साथ पढ़ना ही अधिक ईमानदार इतिहास-बोध है।
आज भारत के सामने चुनौती यह नहीं है कि गाँधी जीते या आम्बेडकर। चुनौती यह है कि क्या हम ऐसा भारत बना सकते हैं जिसमें गाँधी की जनभागीदारी और सामाजिक नैतिकता, आम्बेडकर की समानता और संवैधानिकता के प्रश्नों से टकराने के बजाय एक व्यापक लोकतान्त्रिक चेतना का हिस्सा बनें? क्या हम ऐसा समाज बना सकते हैं जिसमें राजनीतिक स्वतन्त्रता के साथ सामाजिक समानता भी हो और नागरिक अधिकार केवल संविधान के पन्नों तक सीमित न रहें?
शायद यही वह प्रश्न है जिसे गाँधी और आम्बेडकर को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने वाली राजनीति जानबूझकर हमारी दृष्टि से ओझल कर देती है। गाँधी और आम्बेडकर को साथ पढ़ने का अर्थ उनके बीच के संघर्ष को मिटाना नहीं, बल्कि उस संघर्ष से भारतीय लोकतन्त्र के लिए जरूरी सवालों को फिर से हासिल करना है। यही आज की राजनीति के सामने सबसे बड़ी वैचारिक चुनौती है।










