Uncategorizedलिए लुकाठी हाथ

यदा यदा हि धर्मस्य

अभी कुछ दिन पहले भारत के बेरोजगार नौजवानों की तुलना कॉकरोच से कर दी गयी, काफी हंगामा मचा। हालाँकि, आशय ऐसा नहीं था जैसा समझा गया, पर इसकी सच्चाई ने मन को छू लिया। कॉकरोच किसी भी हालत में जिन्दा रह लेता है….वही जो हुनर हमने भी विकसित कर लिया है।.. हर हालत में जिन्दा रह लेते हैं, खुश रह लेते हैं।

अब हम खुशहाल देश के खुशहाल नागरिक हैं। कुछ हैं सिरफिरे, जो बताते हैं कि ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ में भारत  का 116वाँ स्थान है और वह पाकिस्तान नेपाल से भी पीछे है; तो क्या हुआ, ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ जाए चूल्हे भाड़ में, हम 2014 से खुशहाल थे, खुशहाल हैं और विजन 2047 तक खुशहाल रहेंगे। 80 करोड़ लोग 5 किलो राशन पर खुश हैं,  और क्या सबूत चाहिए खुशहाली का?

हमारे मनीषियों ने कहा है जो कुछ हमारे पास है, उसी में खुश रहना सीखो। हम सीख चुके हैं..पिछले बारह सालों में परिपक्व हो चुके हैं.. हमारा झोला आज भी हमारे साथ है, कभी भी झोला उठाकर चल देंगे। …. अब  देखिये अलनीनो की वजह से बहुत गर्मी पड़ रही है, पर  हम खुश हैं! मुझे तो एतराज सिर्फ ‘अल नीनो ‘नाम पर है। नीनो तो चल जाएगा पर ‘अल’ लगाने की क्या जरूरत ! ‘अल’ सुनकर आह निकलती है ! इसमें मुझे 50% तुष्टिकरण की बू आती है। तुष्टिकरण से देश आगे नहीं बढ़ता। देश बढ़ता है अनुशासन से।

आज देश में अनुशासित होने का कॉम्पिटिशन चल रहा है।  नयी परिभाषा के अनुसार अनुशासित होने का अर्थ नियमों के अनुसार चलना नहीं, बल्कि नियमों को अपने अनुसार  चलाना है और वह भी इस तरह से कि लगे सब कुछ नियमानुसार ही चल रहा है। भई, होड़ मची है, मीडिया सीबीआई, चुनाव आयोग, ई डी सभी एक दूसरे को अनुशासित होने के मामले में टक्कर दे रहे हैं। अगर ऐसी ही निष्ठा से सब अनुशासित रहे तो देश विश्व गुरु ही नहीं बल्कि विश्व गुरु घंटाल भी बन सकता है !…

 

उधर बंगाल में अनुशासन ने ऐसा ताण्डव किया कि दीदी चारों खाने चित्त गिरीं और इससे पहले कि वह ठीक से खड़ी हो पातीं उनके तमाम भक्तों ने धर्मान्तरण की राह पकड़ ली, इसमें भक्त गणों का भी कोई दोष नहीं है क्योंकि अब  जमाना सिर्फ भक्तों का नहीं रह गया है अब जमाना ‘अन्धभक्तों’ का है और अन्धभक्त बनाने का पेटेंट सिर्फ एक ही के पास है ।

…अब विपक्ष के पास तो कोई खास काम है नहीं सिवाय इसके कि वह राष्ट्र हित में किये जा रहे कार्यों में नुक्स निकाले, बस विपक्ष यही कर रहा है , और इधर  कितनी जिम्मेदारियाँ है – ‘अभी किसानों की आय दुगनी करनी है, परीक्षार्थियों को पास होने के लिए टिप्स देनी है, प्रतिवर्ष 2 करोड़ नौकरियों  की व्यवस्था करनी है, ‘..गिरते हुए रुपये को तसल्ली देना है कि तुम इतना गिरने में ही रोने लगे, हे रुपये! अगर तुम राजनीति कर रहे होते तो जरा सोचो तुम्हें कितना गिरना पड़ता!

 

अब विपक्ष को तो हो रही प्रगति में टांग अड़ाना है, उधर यूपी में अच्छी खासी प्रगति हो रही थी, प्रभु की नगरी चकाचक हो चुकी थी, हजारों श्रद्धालु रोज आ रहे थे, करोड़ों का चढ़ावा चढ़ रहा था, प्रभु की व्यवस्था में जो भक्तगण तैनात थे अपना अपना कार्य कर रहे थे, प्रगति शान्तिपूर्वक चल रही थीं; विपक्ष ने यहाँ भी शोर मचा दिया । आरोप लगाया कि दान और चढ़ावे में मिली रकम और सोने चाँदी के आभूषणों के रखरखाव में हेरा फेरी की जा रही है, चन्दा चोरी किया जा रहा है! देश- विदेश के श्रद्धालु सकते में आ गये! बाहरी भक्त दान में दी गयी चाँदी की ईंटों के बारे में पूछने लगे कि वह कहाँ गयी ?

ये बाहरी भक्त अपनी दान संस्कृति से वाकिफ नहीं है, हमारी संस्कृति में दान दी गयी और जुए में हारी वस्तु पर कोई अधिकार नहीं रह जाता है। कुछ छुटभैये भक्तों पर एफआईआर दर्ज़ कर दी गयी है, दो बड़भय्ये भक्तों ने इस्तीफा दे दिया है।

अब देखिये! अधिकांश श्रद्धालु  इस प्रकरण को लौकिक दृष्टि से देख रहे हैं, जबकि  इसे आध्यात्मिक दृष्टि से देखे जाने की जरूरत है ।

हमारी संस्कृति में जब भक्त की भक्ति उस उच्च अवस्था को पहुँच जाए कि वह भगवान से एकाकार हो जाए, तब नर और नारायण में कोई भेद नहीं रहता; तो फिर उनकी सम्पत्ति में कैसे भेद हो सकता है! जो कुछ भक्त का है वह भगवान का है और जो कुछ भगवान का है वह भक्त का है!

वैसे भी भक्तों का कष्ट दूर करने के लिए प्रभु स्वयं तो प्रकट नहीं होते, वे तो रास्ता दिखाते हैं। जब भक्तों को दान और चढ़ावे का रास्ता दिखाई दिया तब उन्होंने अपनी तरफ से यह मान लिया कि यह प्रभु ने ही दिखाया था!

अब भले ही विपक्षी चिल्लाए कि यह घोर अधर्म है, पाप है;  भले ही न्याय व्यवस्था इन विशेष भक्तों को सजा दे, लेकिन मुझे तो लग रहा है कि इन भक्तों ने इस पावन भूमि पर भगवान के अवतार लेने का मार्ग ही प्रशस्त कर दिया है! पाप के बाद ही तो भगवान आएँगे न! क्योंकि उन्होंने हजारों साल पहले ही कह दिया था “यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…” अर्थात जब-जब धर्म की हानि होती है मैं तब तब अवतार लेता हूँ;  अब अगर अधर्म इतना बढ़ चुका है तो भगवान अपने वायदे के मुताबिक अवतार लेने को मजबूर हैंl  मैं अकिंचन तुच्छ प्राणी हाथ जोड़, आँखें बन्द कर भगवान के अवतार लेने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ! हे प्रभु!!

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पृथ्वीराज चौहान

लेखक व्यंग्यकार, कवि एवं आकाशवाणी के पूर्व निदेशक हैं। prithvi99air@gmail.com 9415013305
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