न्यायक्षेत्रे

न्याय की अवमानना कौन करता है?

न्यायपालिका की प्रतिष्ठा उसके न्यायाधीशों के पद, न्यायालयों की भव्य इमारतों या अवमानना के लिए दण्डित करने की शक्ति से नहीं, बल्कि न्याय, निष्पक्षता और संविधान के प्रति उसकी निष्ठा से निर्धारित होती है। लोकतन्त्र में न्यायाधीश का सम्मान आवश्यक है, लेकिन न्यायाधीश और न्याय को एक-दूसरे का पर्याय मान लेना खतरनाक है। किसी न्यायिक आदेश की आलोचना करना न्यायपालिका का अपमान नहीं है और न्यायिक आचरण पर सवाल उठाना संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं है। दूसरी ओर, आलोचना के नाम पर हिंसा, धमकी, न्यायालय में तोड़फोड़ और न्यायिक कार्यवाही को बाधित करना भी किसी परिस्थिति में न्याय की रक्षा नहीं हो सकता। 28 अक्टूबर 2026 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायालय कक्ष संख्या 49 में हुई घटना ने एक बार फिर इसी बुनियादी सवाल को सामने ला दिया है—न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा कैसे हो और उसकी शक्ति की सीमाएँ क्या हों?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इतिहास में न्यायालय कक्ष संख्या 34 से जुड़ी पुरानी घटना भी इस सन्दर्भ में याद की जाती है, जब न्यायिक कार्यवाही को लेकर अधिवक्ताओं के उग्र विरोध और न्यायालय परिसर में तोड़फोड़ की घटना सामने आयी थी। उस घटना का व्यापक सबक आज भी प्रासंगिक है। जब न्यायालय के भीतर असहमति का समाधान संवाद, विधिक उपचार और संस्थागत जवाबदेही के बजाय सामूहिक आक्रोश से खोजा जाता है, तब नुकसान केवल न्यायाधीश या न्यायालय की सम्पत्ति का नहीं होता; न्याय पाने के लिए वहाँ आने वाले आम नागरिक का विश्वास भी चोटिल होता है। वर्तमान घटना में भी कथित मारपीट, तोड़फोड़ और अपमानजनक भाषा के आरोपों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। किसी न्यायिक आदेश से असहमति हिंसा को उचित नहीं ठहरा सकती, लेकिन हिंसा की निन्दा करते हुए मूल शिकायतों की जाँच से भी मुँह नहीं मोड़ा जा सकता।

न्यायपालिका का प्राधिकार संविधान से आता है। अनुच्छेद 129 सर्वोच्च न्यायालय और अनुच्छेद 215 उच्च न्यायालयों को अभिलेख न्यायालय का दर्जा देते हुए अवमानना के लिए दण्डित करने की शक्ति प्रदान करते हैं। इस शक्ति का उद्देश्य न्यायिक कार्यवाही को बाधारहित रखना, न्याय के निष्पादन की रक्षा करना और न्यायालय की संस्थागत क्षमता को सुरक्षित रखना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि न्यायाधीश का प्रत्येक आदेश सही है या उसके प्रत्येक व्यवहार को आलोचना से परे रखा जा सकता है। न्यायिक स्वतन्त्रता किसी व्यक्ति की निरंकुशता नहीं, बल्कि संविधान के अनुसार निर्भीकतापूर्वक न्याय करने की स्वतन्त्रता है।

अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(ग) न्यायालय की प्राधिकारिता को कलंकित करने, न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने अथवा न्याय-प्रशासन में बाधा डालने वाले कृत्यों को आपराधिक अवमानना के दायरे में रखती है। दूसरी ओर, धारा 5 न्यायिक कार्यवाही के गुण-दोष पर उचित आलोचना को संरक्षण देती है। सर्वोच्च न्यायालय ने पी. एन. दुदा बनाम पी. शिव शंकर (1988) में स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की आलोचना को केवल इसलिए अवमानना नहीं माना जा सकता कि उससे न्यायाधीशों की भावनाएँ आहत होती हैं। इसी प्रकार, इन री एस. मुलगांवकर (1978) में अवमानना की शक्ति के प्रयोग में संयम और विवेक पर बल दिया गया। न्यायपालिका की प्रतिष्ठा इतनी कमजोर नहीं होनी चाहिए कि प्रत्येक आलोचना उसे अपनी सत्ता के लिए खतरा दिखाई देने लगे। हाँ, धमकी, हिंसा और न्यायिक कार्यवाही में वास्तविक हस्तक्षेप को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

यह प्रश्न भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि क्या न्यायाधीश स्वयं न्यायालय की अवमानना कर सकता है। विधिक दृष्टि से न्यायाधीश का अनुचित व्यवहार, कठोर टिप्पणी या गलत आदेश अपने आप में अवमानना का अपराध नहीं है; उसके लिए सम्बन्धित कानूनी प्रावधानों और आवश्यक तत्वों की जाँच करनी होती है। फिर भी न्यायिक पद किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं रखता। अवमानना अधिनियम की धारा 16 न्यायाधीशों और न्यायिक रूप से कार्य करने वाले व्यक्तियों को भी निर्धारित परिस्थितियों में अवमानना के लिए उत्तरदायी मानती है। न्यायिक आचरण से जुड़े अन्य प्रश्न न्यायिक नैतिकता, संस्थागत शिकायत, अनुशासनात्मक प्रक्रिया अथवा अपीलीय समीक्षा के विषय हो सकते हैं। इसलिए न्यायाधीश के अनुचित व्यवहार और कानूनी अर्थ में अवमानना के बीच अन्तर बनाए रखना आवश्यक है।

भारतीय न्यायिक इतिहास में न्यायमूर्ति सी. एस. कर्णन का मामला इस प्रश्न का असाधारण उदाहरण है। मई 2017 में सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों की पीठ ने उन्हें आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराते हुए छह महीने के कारावास की सजा सुनाई। इससे पहले बरदाकांत मिश्र बनाम उड़ीसा उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार (1974) में सर्वोच्च न्यायालय ने एक जिला न्यायाधीश के विरुद्ध अवमानना की दोषसिद्धि पर विचार किया था। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि न्यायिक पद अपने आप में पूर्ण प्रतिरक्षा प्रदान नहीं करता। लेकिन इन मामलों को न्यायाधीशों की आलोचना रोकने का सामान्य आधार भी नहीं बनाया जा सकता। प्रत्येक मामले में आरोप, प्रमाण, कानूनी तत्व और निष्पक्ष प्रक्रिया निर्णायक हैं।

दुनिया के लोकतन्त्रों में भी न्यायिक प्रतिष्ठा और आलोचना की स्वतन्त्रता के बीच सन्तुलन पर गंभीर विवाद हुए हैं। अमेरिका के ब्रिजेज बनाम कैलिफोर्निया (1941) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने लम्बित मुकदमों पर प्रकाशित टिप्पणियों के कारण दिये गये अवमानना दण्डों को निरस्त करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का महत्त्व रेखांकित किया। ब्रिटेन से जुड़े सण्डे टाइम्स बनाम यूनाइटेड किंगडम (1979) मामले में यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय ने भी न्यायपालिका की प्राधिकारिता की रक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के बीच सन्तुलन पर बल दिया। इन निर्णयों का भारतीय कानून पर स्वतः नियंत्रण नहीं है, लेकिन उनका लोकतान्त्रिक सन्देश स्पष्ट है : न्यायपालिका की प्रतिष्ठा की रक्षा आवश्यक है, मगर उस नाम पर आलोचना को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।

न्यायालय के भीतर न्यायाधीश, अधिवक्ता और प्रशासनिक अधिकारियों के पारस्परिक व्यवहार की मर्यादा भी इसी संवैधानिक दृष्टि से समझी जानी चाहिए। पुलिस अधिकारी, जिलाधिकारी या सरकारी सचिव न्यायालय में तलब किये जा सकते हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति का उद्देश्य आवश्यक तथ्य प्राप्त करना और न्यायिक आदेशों के अनुपालन की स्थिति जानना है, उन्हें अपमानित करना नहीं। उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय न्यायाधीश संघ (2024) में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति के सम्बन्ध में दिशा-निर्देश दिये। न्यायालय ने अनावश्यक रूप से अधिकारियों को तलब करने, अवमानना की धमकी से दबाव बनाने और न्यायालय में उनके साथ अनुचित व्यवहार के प्रति सावधानी बरतने पर बल दिया। जहाँ दस्तावेजों या शपथपत्रों से काम चल सकता हो, वहाँ व्यक्तिगत उपस्थिति को नियमित प्रक्रिया नहीं बनाया जाना चाहिए। आवश्यक उपस्थिति के लिए उचित कारण और पर्याप्त सूचना होनी चाहिए तथा अधिकारियों को पूरी सुनवाई के दौरान खड़े रहने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।

यह निर्णय केवल प्रशासनिक अधिकारियों की सुविधा का प्रश्न नहीं है; यह न्यायिक शक्ति के विवेकपूर्ण प्रयोग की कसौटी है। न्यायाधीश को अधिकारी से जवाब माँगने और विधिसम्मत अनुपालन सुनिश्चित करने का अधिकार है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल व्यक्तिगत अपमान के लिए नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार, अधिवक्ता न्यायाधीश के अधीनस्थ कर्मचारी नहीं हैं। उनका दायित्व अपने मुवक्किल का पक्ष निर्भीकता से रखना, गलत व्याख्या पर आपत्ति करना और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करना है। न्यायाधीश को असहमति और अनुशासनहीनता के बीच अन्तर करना चाहिए, जबकि अधिवक्ता को विधिक आलोचना और व्यक्तिगत अपमान के बीच की सीमा पहचाननी चाहिए। न्यायालय का अनुशासन एकतरफा मौन नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और निष्पक्ष सुनवाई का वातावरण होना चाहिए।

28 अक्टूबर की घटना के सन्दर्भ में इसलिए दो समानान्तर प्रश्नों पर विचार आवश्यक है। यदि न्यायिक आचरण के सम्बन्ध में शिकायतें हैं, तो उनकी निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच होनी चाहिए। यदि किसी अधिवक्ता या अन्य व्यक्ति ने हिंसा की, न्यायालय की सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया अथवा न्यायिक कार्यवाही बाधित की, तो उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी कानून के अनुसार निर्धारित होनी चाहिए। किसी पक्ष की गलती दूसरे पक्ष को उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं करती। बार एसोसिएशन को अधिवक्ताओं की गरिमा और अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन न्यायालय को सामूहिक दबाव में लाने के लिए हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी तरह न्यायिक प्रशासन को अनुशासन बनाए रखना चाहिए, लेकिन अनुशासन के नाम पर वैध शिकायतों को दबाया भी नहीं जा सकता।

न्यायपालिका की वास्तविक प्रतिष्ठा इस बात से नहीं बनती कि वह अपने आलोचकों को कितनी जल्दी दण्डित कर सकती है, बल्कि इससे बनती है कि वह अपने अधिकारों का प्रयोग कितने संयम, निष्पक्षता और पारदर्शिता से करती है। न्यायाधीश, अधिवक्ता और प्रशासन—तीनों संविधान के अधीन अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। किसी को भी पद, संख्या या शक्ति के आधार पर कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं है। न्यायालय की गरिमा की रक्षा के लिए अवमानना की शक्ति आवश्यक हो सकती है, लेकिन न्यायिक आचरण की जवाबदेही और आलोचना की स्वतन्त्रता भी उतनी ही आवश्यक हैं।

अन्ततः न्यायपालिका की अवमानना और न्यायाधीश तथा किसी निर्णय की आलोचना को एक मान लेना उतना ही गलत है, जितना हिंसा को न्याय के लिए वैध विरोध मान लेना। संविधान न्यायपालिका को स्वतन्त्रता देता है, अधिवक्ता को बहस का अधिकार देता है और प्रशासन को विधिसम्मत कार्य करने का दायित्व सौंपता है। इन सबका उद्देश्य एक ही है—नागरिक को न्याय दिलाना। इसलिए वास्तविक प्रश्न यह है कि न्यायपालिका की गरिमा किससे सुरक्षित होगी—आलोचना को भय से रोकने से, या इस साहस से कि न्यायाधीश, अधिवक्ता और प्रशासन, तीनों स्वयं को संविधान और जवाबदेही के समान मानदण्डों के अधीन स्वीकार करें?

—राकेश कुमार गुप्त

 

 

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राकेश कुमार गुप्त

लेखक इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं तथा संस्कृतिकर्म और लेखन में सक्रिय हैं। grakesh80@gmail.com +919839448782
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