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भोजपुर, जगदीश महतो और सामाजिक प्रश्न

भारतीय लोकतन्त्र का इतिहास केवल चुनावों का इतिहास नहीं है। वह उन संघर्षों का भी इतिहास है, जिन्होंने संविधान से जन्मे अधिकारों को समाज में परिपक्व बनने में मदद की। इसी अर्थ में भोजपुर का नक्सली आन्दोलन केवल राज्य के विरुद्ध विद्रोह नहीं था। वह ग्रामीण बिहार की उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध भी संघर्ष था, जिसने संविधान द्वारा प्रदत्त बराबरी को व्यवहार में स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।

भोजपुर का आन्दोलन लोकतन्त्र का निषेध नहीं था। वह लोकतन्त्र को सामाजिक आधार देने का एक हिंसक, जटिल और अन्तर्विरोधों से भरा प्रयास था। उसकी पद्धतियों पर गम्भीर असहमति हो सकती है, लेकिन उसके मूल प्रश्नों की अनदेखी करना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। इस इतिहास की शुरुआत किसी जंगल से नहीं होती, न ही किसी गुप्त क्रान्तिकारी दस्ते से। इसकी शुरुआत मतदान केन्द्र से होती है।

1967 भारतीय राजनीतिक इतिहास का एक निर्णायक वर्ष था। काँग्रेस पार्टी नौ विधानसभाओं में अपना बहुमत खो बैठी थी। मई के महीने में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी में किसान विद्रोह हुआ। उसी वर्ष बिहार विधानसभा के चुनाव भी हुए। भोजपुर जिले के सहार प्रखण्ड के एकवारी गाँव में एक युवा शिक्षक ने बूथ कैप्चरिंग का विरोध किया। सामन्ती गुण्डों ने उनकी बुरी तरह पिटाई की। उस शिक्षक का नाम था—जगदीश महतो (1935–1972)।

इस घटना ने भारतीय लोकतन्त्र की एक गहरी विडम्बना उजागर की। संविधान ने दलितों, पिछड़ों और खेतिहर मजदूरों को मताधिकार तो दे दिया था, लेकिन गाँव की सत्ता अब भी जमींदारों की बन्दूकों, उनके लठैतों और जातीय वर्चस्व के हाथों में थी। कानून दबे-कुचलों को नागरिक बना चुका था; समाज अब भी उन्हें प्रजा मानता था। जगदीश महतो की राजनीति नागरिक और प्रजा होने की इसी फाँक से जन्म लेती है।

वे पेशे से विज्ञान के शिक्षक थे, लेकिन मार्क्सवादी वैज्ञानिक सिद्धान्तों के विशेषज्ञ नहीं थे। उनकी राजनीति किसी पुस्तकालय से नहीं, बल्कि गाँव की सामाजिक वास्तविकता से निकली। शीघ्र ही उनकी भेंट रामेश्वर अहीर से हुई। दोनों ने पश्चिम बंगाल जाकर चारु मजूमदार (1918–1972) और नक्सलबाड़ी आन्दोलन से जुड़े नेताओं से सम्पर्क स्थापित किया। 1969 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के गठन के बाद भोजपुर उसके सबसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक आधारों में बदल गया। बाद के वर्षों में विनोद मिश्र (1947–1998) के नेतृत्व में यही धारा सीपीआई (एमएल) लिबरेशन बनी।

सामाजिक इतिहास का पहलू

भोजपुर का संघर्ष भूमि-सुधार से शुरू होकर वहीं समाप्त नहीं होता। उसका सबसे बड़ा सवाल इज्जत का था। जमींदार केवल भूमि के मालिक नहीं थे; वे सामाजिक सत्ता के भी मालिक थे। खेतिहर मजदूर किस रास्ते से चलेगा, किसके सामने बैठेगा, किस कुएँ का पानी पिएगा, किसे वोट देगा और किससे न्याय माँगेगा—इन सबका निर्णय अक्सर जमींदार करते थे।

जगदीश महतो इसी व्यवस्था को चुनौती दे रहे थे। उनका प्रसिद्ध कथन—‘जमीन्दार की मूँछ तो जल गयी है, लेकिन ताव अभी बाकी है’—दरअसल सामाजिक सत्ता का विश्लेषण था। ब्रिटिश राज अब नहीं था। 1950 के दशक में आधिकारिक तौर पर जमीन्दारी उन्मूलन भी हो चुका था, लेकिन गाँव की मानसिक संरचना में सामन्तवाद अब भी जीवित था।

बेला भाटिया ने मध्य बिहार पर अपने विस्तृत अध्ययन में बताया है कि नक्सली आन्दोलन का सबसे बड़ा प्रभाव सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि शक्ति-सन्तुलन का परिवर्तन था। खेतिहर मजदूर पहली बार अपने अधिकारों की सामूहिक भाषा सीख रहे थे। न्यूनतम मजदूरी की माँग हो रही थी। गैर-मजरुआ भूमि पर दावा किया जा रहा था। तालाबों और साझा संसाधनों पर बराबरी का अधिकार माँगा जा रहा था। और सबसे महत्त्वपूर्ण—दलित पहली बार संगठित होकर मतदान केन्द्र तक पहुँच रहे थे।

यही वह बिन्दु है जहाँ इतिहासलेखन अक्सर चूक जाता है। राज्य की दृष्टि से यह केवल ‘नक्सली हिंसा’ का इतिहास बन जाता है। दूसरी ओर, कुछ वामपन्थी लेखन इसे लगभग एक निष्कलंक जनक्रान्ति में बदल देता है। दोनों दृष्टियाँ अधूरी हैं। भोजपुर का अनुभव बताता है कि यह संघर्ष एक साथ तीन स्तरों पर चल रहा था—जाति के विरुद्ध, वर्गीय वर्चस्व के विरुद्ध और लोकतन्त्र के सामाजिक विस्तार के लिए। यहीं से इस आन्दोलन की ऐतिहासिक जटिलता शुरू होती है।

10 फरवरी 1972 को जगदीश महतो पुलिस मुठभेड़ में मारे गये। 1975 में रामेश्वर अहीर भी नहीं रहे। लेकिन भोजपुर का आन्दोलन उनके साथ समाप्त नहीं हुआ। वह अब व्यक्तियों का नहीं, सामाजिक परिवर्तन का आन्दोलन बन चुका था।

ऐतिहासिक भेद की समझ

भोजपुर का नक्सली आन्दोलन स्थिर नहीं था। वह बदलता रहा। उसकी रणनीति बदली। उसका नेतृत्व बदला। लोकतन्त्र के प्रति उसकी समझ भी बदली। इसलिए 1969 की सीपीआई (एमएल) और 1990 के दशक की सीपीआई (एमएल) लिबरेशन को एक ही राजनीतिक इकाई मान लेना इतिहास को सपाट बना देना होगा। 1972 में चारु मजूमदार की मृत्यु के बाद पूरा नक्सली आन्दोलन गहरे संकट में चला गया। संगठन टूटे। अनेक धड़े बने। बिहार में भी यही हुआ। लेकिन इसी दौर में विनोद मिश्र का नेतृत्व उभरता है। उन्होंने 1978–79 से आत्मालोचना की प्रक्रिया शुरू की। 1979 के विशेष सम्मेलन और 1982 की तीसरी पार्टी काँग्रेस ने आन्दोलन की दिशा बदल दी। जनसंगठन, किसान आन्दोलन और चुनावी हस्तक्षेप को नयी प्राथमिकता मिली। यह केवल संगठनात्मक परिवर्तन नहीं था; यह लोकतन्त्र की नयी व्याख्या थी।

यहीं से बिहार प्रदेश किसान सभा का विस्तार हुआ। 1982 में इण्डियन पीपुल्स फ्रंट का गठन हुआ। उद्देश्य स्पष्ट था—ग्रामीण संघर्षों को व्यापक लोकतान्त्रिक राजनीति से जोड़ना। 1994 में आईपीएफ को भंग कर दिया गया और 1995 में सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त कर अपने नाम से चुनाव लड़ा। इस परिवर्तन को अक्सर केवल ‘संसदीय मोड़’ कह दिया जाता है। यह अधूरा वर्णन है।

असल प्रश्न यह था कि लोकतन्त्र को बदला कैसे जाए? केवल बन्दूक से या जनता की राजनीतिक भागीदारी से? लिबरेशन ने धीरे-धीरे दूसरा रास्ता चुना। इसीलिए उसके संघर्षों का बड़ा हिस्सा चुनाव नहीं, बल्कि गाँव था। भूमिहीनों के लिए गैर-मजरुआ जमीन पर कब्जा, न्यूनतम मजदूरी के लिए हड़तालें, बटाई की नयी शर्तें, तालाबों पर साझा अधिकार, आर्थिक नाकेबन्दी, धरने, जुलूस, जनसभाएँ, सड़क जाम और सांस्कृतिक कार्यक्रम—ये सब उसके राजनीतिक औजार बने।

जाहिर है, इस प्रतिरोध की सामाजिक लामबन्दी ने हिंसक प्रतिक्रियाओं को भी जन्म दिया। 1990 का दशक बिहार में निजी सेनाओं और प्रतिहिंसा का दशक था। रणवीर सेना, जिसकी स्थापना 1994 में ब्रह्मेश्वर सिंह ‘मुखिया’ ने की, उसी सामाजिक प्रतिक्रिया की उपज थी। इसके बाद बथानी टोला (1996), लक्ष्मणपुर बाथे (1997), शंकरबिघा (1999) और अनेक अन्य नरसंहारों ने बिहार को रक्तरंजित कर दिया। दूसरी ओर, नक्सली संगठनों की हिंसक कार्रवाइयाँ भी जारी रहीं। राज्य की हिंसा भी कम नहीं थी। लोकतन्त्र का यह विस्तार भारी मानवीय कीमत पर हुआ।

यहीं इतिहासकार को सावधान रहना पड़ता है। न तो इस इतिहास को केवल शहादत का आख्यान बनाया जा सकता है और न केवल आतंक का। दोनों ही दृष्टियाँ अधूरी हैं। प्रश्न यह नहीं कि हिंसा हुई या नहीं। प्रश्न यह है कि हिंसा किस सामाजिक संरचना से पैदा हुई और उसने भारतीय लोकतन्त्र को किस दिशा में धकेला।

विचारधारा, न्याय और लोकतन्त्र

भोजपुर का इतिहास हमें लोकतन्त्र के बारे में एक असुविधाजनक प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है। क्या लोकतन्त्र केवल चुनावी प्रक्रिया है? क्या लोकतन्त्र केवल प्रक्रियात्मक है, वास्तविक नहीं? या लोकतन्त्र उन सामाजिक परिस्थितियों का भी नाम है, जिनमें नागरिक अपने अधिकारों का निर्भय होकर उपयोग कर सकें? यहीं जगदीश महतो का ऐतिहासिक महत्त्व है।

उनकी राजनीति का ध्येय राज्यसत्ता पर कब्जा नहीं था। उसका मकसद ग्रामीण सत्ता-सम्बन्धों को बदलना था। इसलिए उनका संघर्ष संसद से पहले गाँव के चौपाल, खेत, मतदान केन्द्र और दलित टोले में दिखाई देता है। यह संयोग नहीं है कि भोजपुर में आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ विधानसभाओं में नहीं, बल्कि सामाजिक सम्बन्धों में दर्ज हुईं।

यही कारण है कि रामनरेश राम, विनोद मिश्र, नागभूषण पटनायक और सैकड़ों गुमनाम कार्यकर्ताओं की भूमिका भी इस कहानी का हिस्सा है। उन्होंने अलग-अलग चरणों में यह समझ विकसित की कि लोकतन्त्र को केवल चुनौती देना पर्याप्त नहीं है; उसे अधिक समान, अधिक प्रातिनिधिक और अधिक न्यायपूर्ण भी बनाना होगा। अनेक कार्यकर्ता जेल गये। अनेक मुठभेड़ों में मारे गये। अनेक निजी सेनाओं और राज्य हिंसा का शिकार हुए। उनकी राजनीतिक विरासत का मूल्यांकन केवल बन्दूक के आधार पर नहीं किया जा सकता।

दरअसल, भारतीय लोकतन्त्र की सबसे बड़ी विडम्बना यह रही है कि संविधान ने 1950 में राजनीतिक बराबरी की घोषणा कर दी, लेकिन सामाजिक बराबरी का संघर्ष समाज पर छोड़ दिया। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में चेतावनी दी थी कि राजनीतिक लोकतन्त्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता, जब तक उसकी नींव सामाजिक लोकतन्त्र पर न टिकी हो। भोजपुर के संघर्ष ने इस चेतावनी को ग्रामीण भारत की ठोस वास्तविकता में बदलकर दिखाया। वहाँ प्रश्न संविधान बदलने का नहीं था; प्रश्न संविधान को लागू कराने का था।

इसीलिए जगदीश महतो की ऐतिहासिक विरासत का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उन्होंने बन्दूक उठायी थी या वे एक ‘नक्सल शिक्षक’ थे। अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्होंने कौन-सा प्रश्न उठाया था। वह प्रश्न आज भी हमारे सामने है—क्या लोकतन्त्र केवल मतदान की व्यवस्था है, या वह ऐसी सामाजिक व्यवस्था भी है, जिसमें सबसे कमजोर नागरिक बिना भय, बिना अपमान और बिना संरक्षण के अपने अधिकारों का उपयोग कर सके?

 

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शान कश्यप

लेखक अनुवादक तथा रेवेंशा विश्वविद्यालय, कटक में आधुनिक इतिहास के शोधार्थी हैं। सम्पर्क +919437849484, shaan.kashyapp@gmail.com
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