यत्र-तत्र

कहानी के आधुनिक ढाँचे की तलाश में

पिछले दिनों हरि भटनागर की कहानी ‘पंडूक’ पढ़ते हुए सोचने लगा कि एक मुकम्मल कहानी का सर्वमान्य मॉडल कैसा होना चाहिये। कहानी-जैसी नाजुक विधा में तोड़फोड़ और प्रयोगों की ज्यादा गुंजाइश न होते हुए भी उसकी काया का बार-बार विच्छेदन होता रहा है। निस्सन्देह कहानी प्रेमचन्द से बहुत दूर चली आयी है, लेकिन प्रेमचन्द ने जिस प्रारूप को चुना था, शायद वही आधुनिक कहानी का मान्य प्रारूप है—किस्सागोई की कला का आधुनिक संस्करण है। इस प्रारूप का विकास प्रेमचन्द के समकालीन और परवर्ती कथाकारों ने बख़ूबी किया। लेकिन उन्होंने आधुनिक कहानी के मान्य प्रारूप को पूरी तरह बदलकर सर्वथा  भिन्न प्रारूप प्रस्तावित नहीं किया। उस वक्त यानी आजादी के पहले की हिन्दी-कहानी में न इसकी आवश्यकता थी, न सम्भावना। आजादी मिलने के बाद उसमें अनेक प्रयोग हुए, जिनके  चलते कहानी के रूप-गुण-स्वभाव में तब्दीली होने लगी। आज प्रयोगधर्मी कहानीकारों ने प्रेमचन्दीय प्रारूप को पुराना और अप्रासंगिक करार दिया है। मगर मुझे लगता रहा है कि कहानी की ऊपरी काया और शिल्प बदलने से उसका आमूल कायाकल्प नहीं हो जाता। यदि वह सचमुच कहानी है तो उसका बुनियादी स्वरूप अक्षुण्ण रहता है। जिन चारित्रिक लक्षणों के कारण वह आधुनिक कहानी कहलाती है, उनमें प्रमुख है—मनुष्य जीवन और उसकी सामाजिकता के भीतर उभरते अन्तर्विरोधों और विडम्बनाओं की अचूक पहचान और एक अप्रत्याशित स्थिति में उसका अवसान। ‘अप्रत्याशित’ की अनुपस्थिति और ‘विडम्बना’ के क्षण तक पहुँचने में नाकामी कहानी को भी नाकाम कर देती है। दूसरा लक्षण है, आदि-मध्य-अन्त की एकरैखिक आख्यान विधि। एक अच्छी कहानी इन दोनों पूर्व-शर्तों का निर्वाह करते हुए अपने समकालीन जीवन यानी देश-काल में पैठ बनाकर भी उससे  परे जा सकती है। ऐसा नहीं है कि एकरैखिक संरचना को भंगकर लिखी गयी कहानी का विफल होना अवश्यम्भावी है, लेकिन जीवन के अन्तर्विरोध, अप्रत्याशित और विडम्बनात्मक क्षण को हासिल करने में सफलता उसकी सफलता को सुनिश्चित करती है। खुले अन्त वाली (ओपेन एंडेड) कहानियाँ प्रायः एकरैखिक नहीं होतीं लेकिन वे किसी सघन अनुभव को अत्यन्त बारीक़ ब्यौरों में रचती हैं, और जीवन के अन्तर्विरोध पर एकाग्र होती हैं।

इस दृष्टि से सोचते हुए हरि भटनागर की कहानी ‘पंडूक’ की ओर ध्यान गया। कहानी विधा के बुनियादी ढाँचे में हेरफेर किये बगैर, बेहद सादगी से रची गयी यह कहानी न सिर्फ अपनी संवेदनात्मक तीव्रता के कारण, बल्कि अपनी सार्वभौमिक उठान में तात्कालिकता की घेरेबन्दी को लाँघ जाती है, और उस सरहद को छूने का प्रयत्न करती है जहाँ मनुष्य-जीवन के अन्तर्विरोध और विडम्बनाएँ झलक रही होती है। यहाँ  पहुँचकर उसकी मानवीय दृष्टि, संवेदना  की उजली फाँक, सहज ही उजागर हो उठती है। यह कहानी हमारे समय को सम्बोधित करती है, लेकिन सार्वभौमिक और सार्वकालिक संवेदना के वृत्त का भी स्पर्श करने की कोशिश करती है। उसका देश और काल प्रत्यक्ष है, लेकिन उनका परास प्रत्यक्ष से परे फैलता हुआ प्रतीत होता है। प्रतीकों के निर्वाह, सुन्दर काव्यात्मक बिम्बों के सृजन, भाषायी संयम, शिल्पगत अनुशासन और शाब्दिक मितव्ययिता  की दृष्टि से यह एक मुकम्मल, सुगठित और मर्मस्पर्शी रचना है। आस्था, परम्परा, लोकविश्वास, अनिष्ट-विचार और मिथ्या धारणाओं पर टिके बाह्य कौटुम्बिक प्रतिबन्धों को तोड़कर यह कहानी मानवीय संवेदना के स्रोत के जाग्रत होने और छलछलाकर फूट पड़ने के दुर्लभ क्षणों को पकड़ती है।

‘पंडूक’ कहानी भारतीय समाज में व्याप्त गहरे वर्ग-भेद, मिथ्या रूढ़ मान्यताओं, नैतिक छद्म और पितृसत्तात्मक मनोवृत्ति को मार्मिक ढंग से प्रश्नांकित करती है। यह कहानी उच्चमध्यवर्ग और निम्नवर्ग के बीच की वर्गीय दूरी, सामाजिकता और बोध के धरातल पर मौजूद विषमता, और संवेदनात्मक अन्तराल की गहराई से पड़ताल करती है। यह उच्चमध्यवर्गीय श्रेष्ठता-बोध के बरअक्स निम्नवर्गीय जीवन की अव्यक्त पीड़ा को, उसके जाग्रत स्वाभिमान और प्रतिवादधर्मिता को, रेखांकित करती है; वहीं आचरण के स्तर पर व्याप्त पाखण्ड और अतार्किक धारणाओं की मजबूत गिरफ्त पर भारी पड़ती मानवीय संवेदना की पहचान भी करती है।

कहानी की प्रमुख पात्र गायत्री विशाल बंगले में अकेली रहनेवाली सम्पन्न बुजुर्ग महिला है।  इकलौता बेटा अंकुर अमेरिका में है। बहू प्रसव-पूर्व की देखभाल के लिए आयी हुई है। गायत्री ‘गर्भस्थ पोते’ को लेकर अत्यधिक चिन्तित हैं। उसे विश्वास है कि वह पोता ही होगा। परिसर में स्थित बगीचे की देखभाल माली करता है। बगीचे के सुरम्य वातावरण में प्रायः पंडूक पक्षी की मधुर आवाज  सुनाई देती है। सुनकर गायत्री प्रसन्न होती है। उसकी ध्वनि को का घर में  शिशु-जन्म के शुभ संकेत की तरह देखती है। नैरेटर का कौतुकपूर्ण विवरण है कि पंडूक मानो अपनी हरकतों से कन्या-जन्म की सम्भावनाओं की ओर संकेत करता है—‘राधारानी’? लेकिन गायत्री  को केवल पुत्र चाहिये—‘बंशी बजैया’।

गायत्री गर्भवती बहू की देखभाल बड़े एहतियात से करती है, लेकिन उसे अनिष्ट से बचाने के नाम पर कठोर बन्दिशों में रखती है। बंगले बाहर के परिसर में भी उसे निकलने  नहीं देती। गेट के बाहर कचरा बीनने वाले गरीब लोग एकत्र होते हैं लेकिन उन्हें अवांछित समझकर हिकारत से देखती है। उसे लगता है कि उनकी छाया पड़ने पर, यहाँ तक कि उनके देखने तक से, गर्भस्थ शिशु को नुकसान हो सकता है।  उन्हें  अभागा और अनिष्ट मानती है, उन्हें अपने घर के आसपास से भगाती रहती है। माली को गायत्री के इस रवैये से इत्तेफाक नहीं है। घरेलू नौकरानी सरला भी बहू पर लागू कठोर पाबन्दियों को और गरीबों के प्रति मालकिन के रवैये को गलत मानती है। बहू सुशिक्षित और संवेदनशील है। लेकिन वह सास का विरोध  नहीं कर सकती, क्योंकि पति अंकुर ने उसे माँ  को दुखी नहीं करने की हिदायत दी है।

कहानी में पंडूक एक प्रतीक है। उसका आगमन गायत्री के लिये पुत्रजन्म का शुभ  संकेत है, जबकि बहू के मन में वह प्रसन्नता, माधुर्य और सौन्दर्य का सकारात्मक भाव जगाता है। वह बहू के मन में पाबन्दियाँ तोड़कर घर से बाहर आने की इच्छा को सुलगा देता है। एक दिन बहू पंडूक को देखने की उत्सुकता  में कमरे से बाहर आयी। लेकिन गायत्री ने उसे वापस अन्दर भेज दिया। बहू घर के दमघोंटू माहौल से ऊबकर बाहर आने तथा खुले वातावरण और फूलों की खुशबू को महसूसकर कुछ पलों के लिये खुश होना चाहती है । एक दिन गेट से बाहर कचरा बीनने वाले एक बूढ़े को भगाने से मना  करने पर गायत्री माली को डांट रही थी। माली गरीब बूढ़े को भगाने से इनकार कर रहा था। अपनी सास को इस तरह माली से उलझते और माली के दो-टूक इनकार को बहू देख-सुन रही थी। वह पंडूक की आवाज सुनकर उसकी छवि को कैमरे में कैद करने के बहाने बाहर आयी। सहसा उसे देखकर माली से उलझती सास शर्मिंदगी  से झेंप गयी। लेकिन बहाने से उसने बहू को  फिर लौटा दिया।

इस घटनाक्रम के बाद कहानी अपनी उठान हासिलकर चरम क्षणों में पहुँचती है, जब फाटक खुलने पर बहू की नजर सहसा सड़क के दूसरी ओर कचरा बीनने वाली एक गर्भवती स्त्री पर पड़ती है जो सड़क-किनारे पेड़ से टिककर कराहती हुई प्रसव-पीड़ा के भीषण कष्ट से जूझ रही थी। देखते-ही-देखते उसने वहीं एक बच्चे को जन्म दिया। उस वक्त उसका कोई मददगार न था; प्रसव के लिये सुरक्षित स्थान या देह पर पर्याप्त कपड़े भी नहीं थे।

यह दृश्य देखकर बहू के भीतर मानवीय संवेदना का ज्वार अनियन्त्रित वेग से उमड़ पड़ा। वह बिना सोचे-समझे और सास की हिदायतों की परवाह न कर उस लाचार स्त्री की मदद के लिए दौड़ पड़ी, और अपनी देह की रेशमी साड़ी उतारकर प्रसूता और नवजात शिशु को ढक दिया। सास गायत्री के लिये यह नितान्त अप्रत्याशित झटका था। वह पछाड़ खाकर गिर पड़ी।

कहानी का यह अन्त इष्ट-अनिष्ट विचार की अतार्किकता और निरर्थकता को उजागर करता है।  गायत्री के  मन में सुलगती ‘अनिष्ट’ की आशंका बहू के नजरिये से सोचने पर गरीब स्त्री के अप्रत्याशित शिशु-जन्म की ‘मंगलकारी’ घटना में रूपान्तरित हो जाती है। कहानी का यह अन्त अत्यन्त विडम्बनापूर्ण और प्रतीकात्मक है। यह संकेत  करता है कि पंडूक के बोलने को शुभ मानना, कचरा बीनने वाले गरीबों को अनिष्ट समझना निहायत ही बेतुका विचार है। पंडूक की प्रतीकात्मकता को हरि भटनागर ने अत्यन्त सूक्ष्म और जहीन तरीक़े से विन्यस्त किया है।

हरि भटनागर ने इस कहानी में एक बाइनरी की रचना की है। एक ओर गायत्री की दुनिया है, जिसमें एक ओर ऊँची चहारदीवारी से घिरा विस्तृत परिसर, सुन्दर परिवेश, धन-दौलत, साथ ही अन्धविश्वास, शुद्धता-अशुद्धता की धारणा और सामाजिक दूरी है; दूसरी ओर गरीब स्त्री का संसार है—अभाव, पीड़ा, संघर्ष और जिजीविषा की अदम्य शक्ति से दमकता उसका निर्धन जीवन है। कहानी इस प्रक्रिया में उस पाखण्ड को उजागर करती है जिसके चलते गायत्री तुलसी के पौधे पर दीया जलाने के कथित पुण्यकर्म को श्रेयस्कर और काम्य समझती  है, लेकिन सड़क पर तड़पती अभागी गर्भवती स्त्री उसे अपशकुन जान पड़ती है। गायत्री अपनी ही दुनिया में जीती है—नितान्त आत्मकेन्द्रित संसार में, जहाँ उसकी संवेदना का वृत्त भी संकीर्ण है। निम्नवर्ग के कचरा बीनने वाले गरीबों का अस्तित्व उसके तईं कचरे से अधिक नहीं हैं, वे अपशिष्ट (डिस्पोजेबल) हैं। मनुष्य को कचरा समझकर पानी की बौछार से दूर भगा देना बेहद अमानवीय कृत्य है, मगर गायत्री को उस पर कतई अफसोस नहीं है। लेकिन माली और सरला को गायत्री का यह रवैया अनुचित लगता है। उनकी वर्गीय सहानुभूति कचरा बीननेवालों के प्रति है।

कहानी अन्त में जाकर गायत्री की अन्तश्चेतना में मौजूद अमीर-गरीब के छद्म विभाजन को ध्वस्त कर देती है। अपनी रेशमी साड़ी उतारकर लाचार प्रसूता स्त्री को ओढ़ाने के साथ मानो बहू अमीर-गरीब के दुर्लंघ्य सामाजिक भेद को ढहा देती है। उसकी रेशमी साड़ी उसकी समृद्धि और मर्यादा का प्रतीक नहीं रह जाती, अब वह अभागी स्त्री की मर्यादा और बहू की संवेदनशीलता का प्रतीक बन जाती है। इसके साथ ही वह उस वर्जित वास्तविकता को बेसाख़्ता उघार देती है जिससे गायत्री डरती और जिसे बरजती रही थी।

यह कहानी उच्चमध्यवर्गीय पाखण्ड और मिथ्याचरण को अनावृत्त कर मानवीयता के संवेदनात्मक उत्स और नैतिक बल को रेखांकित करती है। यहाँ  इशारा साफ़ है कि असली पवित्रता विशाल कोठी के भीतर के गंगाजल या शालिग्राम की पूजा के बाह्याचार या कर्मकाण्ड में नहीं, बल्कि अपशकुन और अवांछित समझे गये गरीब जनों के प्रति सहानुभूति, संवेदना और करुणा में है। कहानी के अन्त में बहू के कृत्य पर गायत्री पछाड़ खाकर गिर पड़ना स्वाभाविक किन्तु सांकेतिक है। कहानी की अंतिम पंक्ति में इसका वर्णन अत्यन्त मारक है। यह कहानी की असरदार पंचलाइन है। वस्तुतः यह  निपट अप्रत्याशित क्षण है जो गायत्री के लिये एक जबरदस्त सांस्कृतिक आघात लेकर आता है। यही वह बिन्दु है जहाँ पहुँचकर कहानी का तनाव चरम स्थिति में होता है, और अकस्मात जीवन का एक अन्तर्विरोध समूची मार्मिकता में उजागर हो उठता है। इस क्षण का अप्रत्याशित और आकस्मिक आघात गायत्री को गहरे सदमे में डाल देता है। उसका मध्यवर्गीय  आत्मदम्भ, स्व-आरोपित वर्जनाओं, रूढ़ विश्वासों और भीतर के पूर्वाग्रहों से भरी बनावटी दुनिया का तामझाम ढह जाता है। यह उस ईकोसिस्टम का ध्वस्त हो जाना भी है जिसके भीतर गायत्री अपने संस्कारों और वर्गीय बोध की छाया में रहती है। इस तरह देखें तो ‘पंडूक’ कहानी मनुष्य की पारस्परिक संवेदनात्मक संसक्ति को मध्यवर्गीय संकीर्णता, आत्मदम्भ और मिथ्याचार की क्षुद्र सीमाओं से परे जाकर देखती है, और उसे एक विकल्प के रूप में सामने रखती है। यही वह संवेदना है जो वर्गगत श्रेष्ठता की झूठी सीमाओं को लाँघकर श्रमजीवी और वंचित जनों के सरोकारों से कहानी को जोड़ देती  है।

‘पंडूक’ श्रमजीवी वर्ग की गरिमा को स्थापित कर निम्नजनों की परस्पर सहानुभूति को सहज ‘वर्गीय बंधुता’ के रूप में रेखांकित करती है। घरेलू नौकरानी सरला और माली के व्यवहार और उनके दृष्टिकोण में कचरा बीनने वाले गरीबों के प्रति सहानुभूति का केन्द्रीय कारक ‘वर्गीय बंधुता’ है। यह उनके दरम्यान वर्गीय एकजुटता की अन्तर्भूत चेतना को उत्प्रेरित करता है। माली का यह कथन कि ‘फूल-पौधे मेरा काम बोलते हैं, मेरा काम कचरा-पन्नी बीनने वालों को भगाना नहीं है’, उसके स्वाभिमान की गर्व-ध्वनि है। यह श्रम की गरिमा को लेकर उसके इसरार और उसकी वर्गीय प्रतिबद्धता का अकुंठ  आग्रह है। अकारण नहीं है कि माली गायत्री की उच्चता-ग्रंथि  से उपजे ख़ब्त के आगे समर्पण नहीं कर देता।

हरि भटनागर ने संवेदनशीलता और कलात्मक निपुणता के साथ निम्नवर्गीय श्रमजीवी जनों के सहज भावोत्कर्ष,  मानवीय संलग्नता और अमीरों की संवेदनहीनता के प्रति दमित आक्रोश को सरला के किरदार के माध्यम से रेखांकित किया है। इस दृष्टि से एक प्रसंग उल्लेखनीय है। सरला कमरे में घुस आए एक काले झींगुर को मारती नहीं, उसे फूल झाडू से दाबे रखती है। इसका ज़िक्र करने के बाद नैरेटर की टिप्पणी है—‘जैसे कह रही हो, डरो नहीं, तुझे मारूँगी नहीं, बाहर उड़ा दूँगी, आँखों में रोष भरके बहू रानी से दबी आवाज में कहा—किसी को सड़क से कोई कैसे भगा सकता है! वह गरीब किसका क्या बिगाड़ रहा है! आप बोलें न बहूरानी! बैठा रहन दें।’ झींगुर के प्रति करुणा और कचरा बीननेवालों के प्रति सहानुभूति क्या सरला के भीतर मनुष्यता के जीवित-स्पंदित रहने का प्रमाण नहीं है? क्या यह सम्पन्न वर्ग की हृदयहीनता के बरअक्स निम्नवर्ग की मानवीय संसक्ति को इंगित नहीं करता?

दरअसल गायत्री नैतिक और संवेदनात्मक रूप से अपनी संकीर्ण वर्गीय घेरेबन्दी में आबद्ध स्त्री है। उस घेरे से बाहर की दुनिया उसकी संवेदना के दायरे से भी बाहर रह जाती  है। इस घेरे में वह अन्धविश्वास और दुराग्रह के अलावा पितृसत्ता द्वारा नियन्त्रित मानसिक अनुकूलन की गिरफ्त में है जो उसके कौटुम्बिक-सामाजिक मनोविज्ञान में दृढ़ता के साथ स्थापित है।

हरि भटनागर ने ‘पंडूक’ के किरदारों की आन्तरिक बनावट को खूबसूरती के साथ पकड़ा है। ये किरदार सरल-सपाट हैं और जटिल भी। माली और कामवाली सरला निजी तौर पर अपनी मालकिन के प्रति नहीं, अपने काम के प्रति वफादार हैं। वे निपट आज्ञापालक नौकर नहीं हैं, उनका स्वतन्त्र नजरिया और निजी व्यक्तित्व है। वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मालकिन का विरोध करने की हिम्मत कर सकते हैं। उनका व्यवहार किंचित अप्रत्याशित है, पूर्णतः सेवकोचित नहीं है। वे आक्रोश और असहमति व्यक्त करते हैं। बहू की पीड़ा के प्रति सहानुभूति के चलते सरला मालकिन के खिलाफ  बेसाख्ता कह उठती है—‘मैं तो ऐसी बन्दिश पे लूका लगा दूँ।’ माली का किरदार भी लगभग ऐसा ही है। वह गायत्री के बगीचे की देखभाल के पेशेवर कर्त्तव्य से इतर किसी अन्य कार्य की अपेक्षा किये जाने से, मसलन कचरा बीननेवालों को जबरन भगाने के लिये लट्ठ चलाने से,  नाखुश होता है, और स्पष्ट इनकार कर देता है। गायत्री के उकसाने पर उसका नैतिक विवेक इसकी अनुमति नहीं देता।

बहू का व्यवहार भी उसकी वर्गीय स्थिति के अनुरूप न होकर, सर्वथा अप्रत्याशित है। उसकी  प्रकृति सास से भिन्न है। बहू का किरदार अपेक्षाकृत जटिल है। वह आधुनिक, शिक्षित होते हुए और अमेरिका-जैसे खुले सामाजिक परिवेश में रह आने के बावजूद, पति की हिदायत के मुताबिक़ सास के कठोर अनुशासन में रहना स्वीकार कर लेती है। यह विदेश-प्रवास की स्वतन्त्रता का लुत्फ़ हासिल कर चुकी युवा स्त्री की दृष्टि से सहज-सामान्य और प्रत्याशित नहीं है। कहानी के अन्त में उसका द्वंद्व और भीतरी छटपटाहट संवेदना के एक बड़े सैलाब में फूट पड़ती है। उसके धैर्य का बाँध अन्ततः टूट जाता है। सास के प्रति प्रकट अनादर व्यक्त न करते हुए भी, वह उसकी आज्ञा की अवहेलना करने से स्वयं  को बचा नहीं पाती, और ‘संवेदना की पुकार’ या  ‘अन्तश्चेतना के प्रतिघात’ से उत्पन्न आवेग में अनायास ही लाचार स्त्री की मदद के लिये दौड़ पड़ती है। यथार्थ की विडम्बना का यह मार्मिक क्षण है।

‘पंडूक’ बिम्बात्मक सौन्दर्य और यथार्थ के साथ प्रतीकों के तालमेल की दृष्टि से ही नहीं, कथानक के सुघर विन्यास—उसके उपस्थापन, संघर्ष, आरोह, उत्कर्ष, अवरोह तथा अन्ततः समाधान—और भाषिक मितव्ययिता की दृष्टि से मुझे एक मुकम्मल या मॉडल कहानी लगती है।

 

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जय प्रकाश

लेखक साहित्य-संस्कृति से सम्बन्धित विभिन्न विषयों पर पिछले 25 वर्षों से लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क +919981064205, jaiprakash.shabdsetu@gmail.com
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