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भूमिहारी अस्मिता के बारे में कुछ वाजिब सवाल और बेगूसराय का चुनाव – विजय कुमार

  • विजय कुमार
ऐसा नहीं है कि ऊँची  जात के अन्दर ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं है। जो लोग पुराने ग्रामीण समाज  को जानते हैं उन्हें पता है कि ग्रामीण समाज में खासकर भूमिहार समाज में कभी अपनी ही जाति के लोगों को भात पकाने वाला, छोटका और धामा जात कह कर बुलाया जाता था। भोज-भात में एक साथ खाने नहीं देते थे। गोलटी-पलटी एक ऐसी परम्परा थी जिसमें दो परिवारों के बीच विवाह में लड़की का बहु के रूप में लेन-देन होता है। ऐसे परिवारों को छोटका माना जाता है। जात के बरका (बड़ा) के साथ बेचारा छोटका भी बरका जात बनने के चक्कर में पिसा गया। आज भी नमधोतिया और लंगोटिया का विभाजन है। कन्हैया इसी लंगोटिया का मनैया (अगुआ) है। दुर्भाग्य से भूमिहार कह कर सामाजिक न्याय के नाम पर दबंग पिछड़ों का हमला इसी लंगोटिया पर हुआ। आज भी ढेर सारे भूमिहार नौजवान जिनकी शादी जात में नहीं हो पाती है वह दूसरी जातियों से लड़कियाँ खरीद कर या पटाकर लाते हैं और अपना घर बसाते  हैं। यहाँ तक कि दरभंगा, मधुबनी  इलाके के ढेर सारे लंगोटिया ब्राह्मण  भूमिहारों के घर बेटियों का ब्याह रचाते हैं। अगर आपको ध्यान हो तो इस प्रकार के ऊँच-नीच का विभाजन राजपूत परिवारों में भी है। गरीबों के लिए संवेदना कायस्थ परिवारों के दबंगों में भी नहीं मिलता है। हम देखते हैं कि जात के अन्दर-अन्दर वशिष्ठी और विश्वामित्री परम्परा की दो धारा चल रही है। दरअसल लालू प्रसाद और अखिलेश यादव जैसे लोग वशिष्ठी परम्परा का ही अनुसरण करते हैं। यह मानने  में कोई गलती नहीं करनी चाहिए  कि अगड़ी जातियों में जो समर्थ हैं , ताकतवर हैं, वह भी अपनी ही जाति के कमजोर लोगों की मदद में आगे नहीं आते हैं। 90 के दशक में बिहार में लालू प्रसाद जब सत्ता में आये तब उनके आगे-पीछे अगड़ी जाति के जो लोग आये उनका विश्लेषण करना चाहिए। कौन नहीं जानता है कि लालू के गुरु कभी राधा नन्दन झा और जगन्नाथ मिश्रा जैसे लोग थे। भूमिहारों में भी लालू प्रसाद ने सीपी ठाकुर, महाचन्द्र सिंह, राजेंद्र बिस्मिल, अनिल शर्मा जैसे कथित आरक्षण विरोधी नेताओं को सामने रखकर बिहार के पिछड़ों के मन में यह बात बिठायी कि तुम्हारे दुश्मन ब्राह्मण हैं , भूमिहार हैं, आदि आदि। कुछ लोग कन्हैया कुमार से ब्रह्मेश्वर मुखिया के सवाल पर स्टैंड क्लियर करने की बात उठा रहे हैं। मुझे लगता है कि यह तथाकथित बुद्धिजीवी किसी भी सिरे से सामाजिक न्याय का हीरो नहीं हो सकता है, यह तो  विलन  है। यह सवाल तो लालू प्रसाद से और कुछ अन्य नेताओं से पूछना चाहिए कि ब्रह्मेश्वर मुखिया को संरक्षण किसने दिया? और उसकी हत्या का राज क्या है? 90 के दशक से आज तक बिहार में सैकड़ों ऐसे नेता और कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने सामाजिक न्याय और समतावादी समाज रचना के लिए, सत्ता और सम्पत्ति के वितरण के लिए अपना जीवन लगा दिया। क्या नाम बताना पड़ेगा? खासकर भूमिहार बिरादरी में कपिल देव सिंह, रामजीवन सिंह और डॉ. रामजी सिंह को कौन नहीं जानता है? ऐसे लोगों को राजनीति से दरकिनार किसने किया? समय-समय पर पप्पू देव, अशोक सम्राट, सुनील पांडे, धूमल, अनंत सिंह, सूरजभान जैसे लोगों को भूमिहारी चेहरा बनाने का काम किसने किया? अखिलेश सिंह, वीणा शाही को उपकृत किसने किया? लालू प्रसाद या नितीश कुमार या सुशील मोदी क्या सबने अच्छे विहार को निहार कर अच्छे भूमिहारों को दरकिनार करने का काम नहीं किया? कैलाशपति मिश्र, चन्द्रमोहन राय और ताराकान्त झा को किसने भगाया? दरअसल सत्ता और सम्पत्तित के लिए शक्ति के रूप में जाति का इस्तेमाल किया गया। क्या लालू प्रसाद यह बताएँगे कि आदरणीय कर्पूरी ठाकुर के मन्त्रिमण्डल  में आरक्षण का प्रस्ताव आदरणीय कैलाशपति मिश्रा ने रखा था? जिस विक्रम कुंवर ने आरक्षण का विरोध किया था, उसे लालू प्रसाद ने अपने मन्त्रिमण्डल में मन्त्री  किस कारण से बनाया? यहाँ तक कि यादव परिवार से भी गजेन्द्र प्रसाद, हिमांशु, अनूप लाल यादव, देवेन्द्र प्रसाद यादव जैसे, सबको साथ लेकर चलने वाले नेताओं को किसने कमजोर किया? खैर। सच तो यह है कि एक निश्चित योजना के तहत बिहार में भूमिहार बिरादरी को गैर राजनीतिक पहचान दी गयी।  असामाजिक पहचान दी गयी।  उन्हें उनकी विरासत से अलग किया गया। आज जब सामाजिक न्याय के लिए जाति को तोड़ने और छोड़ने की आवश्यकता है, ध्रुवीकरण के रोग से लोकतन्त्र को बचाने की आवश्यकता है, तब यह साफ-साफ कहने की जरुरत है कि किस-किस ने कहाँ-कहाँ आवेदन देकर किसी जाति में जन्म लिया है? अगर किसी को पता है तो बताएँ मैं जाति आवेदन देकर बदलना चाहता हूँ। ऐतिहासिक कारणों से और उच्चता बोध के कारण अलग अलग जातियों की दुर्बलताएँ, अहँकार, आत्महीनता को किसी जाति के अपमान का तार्किक आधार बनाना ही भाजपा और दूसरी अन्य कट्टर ताकतों के मजबूती का कारण भी हो सकता है।

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‌निजी तौर पर कन्हैया कुमार से मेरा परिचय नहीं है। न ही रवीश कुमार से है। जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के  प्रसंग में मैं कन्हैया कुमार के स्टैंड से सहमत नहीं था और मैं आज भी अपने स्टैंड पर कायम हूँ। बावजूद इसके कहना चाहता हूँ कि बेगूसराय में प्रायोजित तरीके से दो पूँजीवादी और कट्टर ताकतें टकरा रही हैं। उदारीकरण निजीकरण और भूमण्डलीकरण के औजार के रूप में बाजारीकरण का जो रोड रॉलर चल रहा है उसकी शुरुवात कॉंग्रेस ने की थी और जिसे विस्तार भाजपा दे रही है। इन्ही दो खम्भों के अगल-बगल अन्य राजनीतिक दल बँधे हुए हैं ऐसी सूरत में नागरिक कर्तव्य बनता है कि हम देश दुनिया के सामने विकल्प पेश करें। विकल्प केवल सीटों के तालमेल से नहीं निकलेगा। विकल्प तो राज-काज के तौर-तरीकों को बदलने, नीति तथा नीयत एवं नेतृत्व के स्तर पर देना पड़ेगा। मेरी समझ से आज पूँजीवाद सबसे गम्भीर संकट से गुजर रहा है। उसकी वैश्वीकरण की धारा मानवीय चेहरा देने में विफल रही है। अपने बचाव के लिए अब अमरीका भी राष्ट्रवाद की बात कर रहा है। दुनिया के सभी देश राष्ट्रवाद को नये तरीके से परोस रहे हैं। तब भारतीय मन सहज रुप से राष्ट्रवाद को अपनाने में गौरव महसूस करता है। यहाँ यह सवाल जरूर उठना चाहिए कि राष्ट्र में राष्ट्रप्रेम न्याय विरोधी है? अगर नहीं तो इन बातों पर स्पष्ट होना चाहिए। देश चुनावी मूड में है। इस समय कन्हैया कुमार जैसे नौजवान से अन्य मसलों पर जवाब माँगना सामायिक नहीं है। परन्तु देश के विकास मॉडल तथा आधुनिक सभ्यता और संस्कृति के सवाल पर डिस्टेंस को रेखांकित करने की जरुरत है। जो लेफ्ट और रीयल डेमोक्रेटिक कार्य योजना को सामने रख कर ही सम्भव है। सोशल मीडिया पर देखने को मिला कि माननीय लालू जी ने बिहार की जनता के नाम एक पत्र जारी किया है। इसमें इस बात के लिए ललकार भरी गयी है कि वह जेल में रहते हुए भी दलितों पिछड़ों, अकलियतों की लड़ाई लड़ते रहेंगे।अच्छा लगता है जब योद्धा को अपनी भूमिका याद आती है परन्तु लालू जी से एक अदद सवाल है कि आपको इस लड़ाई से कब किसने रोका? आजादी के बाद शायद आप अकेले ऐसे नेता थे, जिनको बिहार, झारखंड में अपार जन समर्थन मिला। 1974 आन्दोलन के किसी भी जाति में पैदा होने वाला हर साथी खुशी से झूम  उठा जब  सब ने मान लिया कि बिहार भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा। जाति के बन्धन ढीले होंगे। लोगों को बताएँ कि क्या हुआ? वाह गजब कर दिया। हद कर दी आपने। आपको नेता बनाने के लिए जब हम लोग लाठी खाते थे, आरक्षण को लागू करने के लिए लाठी खाते थे, आपके सन्तान को कन्धे पर लेकर घूम आते थे, पटना विश्वविद्यालय में लड़ाई लड़ते थे तब हमकुछ और थे।

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‌जब आप मुख्यमन्त्री बने तब हम सब कुछ और हो गये और आप कुछ और हो गये। माफ़ करिए लालू जी रास्ता आपने बदला हमने नहीं। जाना कहाँ था, कहाँ चले गये? हमारे एक मित्र ने लिखा कि अगर  लालू जी बेगूसराय का एक सीट  कन्हैया के लिए छोड़ देते तो क्या जाता? यही असली प्रश्न है। हाले दिल में यही सवाल लालू जी को परेशान करता है। क्योंकि विगत समय में कन्हैया कुमार ने राष्ट्रीय स्तर पर जो पहचान  बनायी है उससे नफरत की राजनीति कमजोर होती है। होगी। अगर वह पहचान वोट में बदलेगा तो बिहार में जिस राजनीति का जन्म होगा उसका लालू की राजनीति से सुमेल नहीं है। सबसे दुखद बात यह है कि जो लोग वंचित  की बात करते हैं, अकलियत की बात करते हैं, वह भी कन्हैया को भूमिहार घोषित करने पर तुले हुए हैं। अगर कन्हैया को भूमिहार मान लिया जाए और उसके इस कथन पर कि वह वंचित, शोषित, गरीब, किसान, मजदूर, कारीगर की लड़ाई लड़ रहा है, सत्ता और सम्पत्ति के वितरण की लड़ाई लड़ रहा है, भरोसा न किया जाए तो जो दूसरे मित्र ऐसी बात कह रहे हैं उस पर भी भरोसा कैसे किया जाए? धन बल के मुकाबले जनबल को खड़ा करना, एक दूसरे पर भरोसा कर ही किया जा सकता है। बेगूसराय में अगर लँगोटिया नामधोतिया से निपटता है तो यह बड़ी बात होगी। देश को एक जनभागीदारी वाला रास्ता मिल सकता है। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा क़ि साम्यवादी साथी भविष्य में भी अपने तंग घेरे से कितना बाहर निकल कर आगे आते हैं?

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आओ मिलकर कुछ करते हैं आज। कुछ गपशप ही करते हैं आज। हम, तुम, वो और अपना समाज। तेरा,मेरा और उसका अन्दाज। दुःख सुख और साज-बाज। देश-दुनिया और राज काज का हिसाब मिलकर करते हैं। मिल के चलो, मिल के चलो ये वक्त की है आवाज।

 लेखक गांधीवादी चिन्तक हैं|

सम्पर्क- +919431875214, vijaygthought@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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