शख्सियत

लेखक की दुनिया

 

सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के जाने-माने साहित्यकार-पत्रकार सतीश जायसवाल किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पिछले कई वर्षों से उनसे मिलना-जुलना लगातार बना हुआ है। लेकिन पहली बार उनके घर जाने का अवसर 17 दिसंबर 2023 को मिला। कई लोगों से मैंने सुना था कि सतीश सर घर में बिना ताला लगाये ही कहीं भी घूमने निकल जाते हैं, कई बार तो मोबाईल भी छोड़ कर चले जाते हैं। मैंने सोचा कि जिनका घर बिल्‍कुल बीच बाजार में स्थित हो, वे ऐसा कैसे कर सकते हैं? लेकिन जब हम घर पहुंचे तब भी आलम यही मिला, बस गनीमत यह था कि सर अपना फोन साथ ले गये थें। हमने घर जाने के पहले सतीश सर को फोन भी किया था और उनसे मिले समय के हिसाब से ही हम पहुंचे थे। जब हम घर पहुंचे तो वे घर पर मौजूद नहीं थे, किंतु घर का दरवाजा खुला हुआ था। घर के भीतर प्रवेश करने से पहले मैंने कई बार आवाज लगाई। परंतु, अंदर से कोई आवाज नहीं आई। कुछ देर पश्चात हमने घर के भीतर प्रवेश किया। लेकिन सर वहां भी नहीं मिलें। जैसे ही पहले कमरे में प्रवेश किया तो पाया कि एक पुराना टेबल, तीन पुरानी कुर्सी और एक पुरानी चारपाई बेहद व्‍य‍वस्थित ढंग से रखी हुई थी। टेबल पर भांति-भांति प्रकार की हिंदी, अंग्रेजी, छत्तीसगढ़ी भाषा की अनेक किताबें रखी हुई थी, जिसे देखकर साहित्य के सेवा के प्रति लेखक का समर्पण भाव स्पष्ट दिख रहा था। शायद यही वजह थी कि वह अपने-आप को पारिवारिक बंधनों से मुक्‍त रखें। लेकिन, सर ने पारिवारिक दुनिया के इतर एक बृहद दुनिया बसा रखी है। ऐसे समर्पित लेखक बिरले ही होते हैं।

घर पर सर जब नहीं दिखें तब हमने उन्‍हें फोन लगाया, किंतु उन्‍होंने फोन नहीं उठाया। थोड़ी देर बाद उनका फोन आया और उन्‍होंने कहा मैं 10 मिनट में आ रहा हूँ, तुमलोग अंदर बैठो। अंदर तीन कुर्सियां लगी हुई थी, जिस पर मैं और मेरी पत्नी बैठ गए। मेज के सबसे ऊपर गीतांजलि श्री की बुकर अवार्ड से सम्मानित उपन्यास ‘रेत-समाधि’ रखी हुई थी, जिसे उठाकर उसके पन्नों को पलटने लगा। इसी बीच सतीश सर का आगमन हो गया। उनके आते ही सबसे पहले हमने कहा कि घर का दरवाजा खुला हुआ था, आप घर में ताला क्यों नहीं लगाते हैं? उन्‍होंने बड़ी सहजता से कहा मेरे पास आज के तथाकथित लोगों की तरह भौतिक सुख-सुविधा की कोई वस्तु नहीं है और ना ही इतना धन है कि कोई चुराकर ले जाये। सिर्फ किताबें हैं जो कोई ले नहीं जाता। सर जिस किराए के मकान में रहते हैं, वह अत्यंत व्यस्त मार्ग पर स्थित है, जहां सुबह से लेकर देर रात तक हजारों की संख्या में लोग आते-जाते रहते हैं। इसके बावजूद यदि कोई व्यक्ति अपने घर में ताला लगाए बिना कहीं चला जाता है, तो वह एक सादगी और निश्चलता से भरा हुआ व्यक्ति ही हो सकता है, जिसको कुछ खोने का भय ही न हो। वे जानते हैं कि उनकी असली पूंजी उनका ज्ञान है, जिसे कोई चुरा ही नहीं सकता है। आज के समय में जब लोग भौतिकवादी सुख-सुविधाओं से अपने-आप को अलग नहीं कर पा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं, जिनके लिए यह सब कुछ अर्थहीन है।

बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा, तो बड़े प्रेम भाव से उन्होंने कहा, मुझे पता था कि मेरे लिए कुछ बहुमूल्य वस्तु आने वाली है, जिसे मैं किसी अन्य के साथ साझा नहीं करूंगा। जबकि वह कोई बहुमूल्य वस्तु नहीं थी बल्कि मेरे घर का अमरूद था। अमरूद के बहाने पर्यावरण पर चर्चा होने लगी। तब मेरी पत्नी ने कहा फल तो सब खाना चाहते हैं, किंतु पेड़ लगाने की जब बात आती है, तो लोग पीछे हट जाते हैं। इसी संदर्भ में सतीश सर ने रवींद्रनाथ टैगोर का एक बेहद रोचक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया एक बार रवीन्द्रनाथ टैगोर टहल रहे थे। तभी रास्ते में फल से लदा हुआ एक पेड़ दिखाई दिया। उन्हें यह देखकर बेहद आश्चर्य हुआ। उन्‍होंने एक व्‍यक्ति से पूछा कि यहां आस-पास बच्चे नहीं रहते हैं क्या? पेड़ में इतने फल कैसे बचे हैं? सर का कहने का तात्पर्य यह था कि बचपन में फल चुराकर खाने का अलग ही आनंद होता है।

छत्‍तीसगढ़ में सर बेहद ख्‍यातिलब्‍ध हैं। एक बार नदी किनारे किसी व्यक्ति ने सर से पूछा आपने मुझे पहचाना नहीं? सर ने कहा नहीं। फिर उस सज्‍जन ने बताया कि एक कार्यशाला में आपसे भेंट हुई थी। फिर अपने सधे हुए अंदाज में सर ने कहा, आप अपना परिचय देकर फंस गए हैं। मैं अब आपको कुछ काम दे रहा हूँ। गतौरा गांव के आसपास जितने लोग हैं, उनसे पूछो कि नदी किनारे और अपनी बाड़ी में क्या फलों का पेड़ लगा सकते हैं? सतीश सर ने यह वाक्य उनको भगाने के उद्देश्‍य से किया था, किंतु वह व्‍यक्ति कर्मठ निकल गया और चार-पांच दिनों के बाद पूरे आंकड़े लगाकर उन्होंने 1200 पौधों का हिसाब बताया। तब सर ने पूछा कि 1200 पौधों में से कितनों को बचा पाओगे? वह व्यक्ति थोड़ी देर चुप रहकर जवाब दिया ज्यादा तो नहीं किंतु, 90 प्रतिशत तक बच जाएंगे। इस आश्वासन के साथ सर ने 1200 पौधे दिलवा दिये। जब ये पौधे तीन-चार वर्षो में फल देने लगे, तब वह व्यक्ति फल खाने का निमंत्रण लेकर सर के पास पहुंच गया। सर ने कहा कि सब फलों को तोड़कर एक स्थान में रख दो और गांव के जितने बच्चे हैं, उनसे कह दो कि जितना खा सके, खा लें। उसके बाद बचे फलों को सारे गांव वाले मिलकर आस्वादन करें और फल उत्‍सव मनायें।

इसके बाद अरपा को लेकर भी उन्‍होंने अपनी चिंता जाहिर की। 50-60 वर्ष पूर्व अरपा नदी अपनी मस्ती में बहती थी, जिसके दोनों तरफ हरियाली के साथ सीताफल, आम और अमरूद के पेड़ हुआ करते थे। हमारी शिक्षिका ने एक बार पिकनिक के लिए नदी किनारे लेकर गई। हम लोग बहुत ही आनंदित हो रहे थे। इसी बीच हमलोग अमरूद के बगीचे में घुसकर फलों को चुराकर खाने लगे। किंतु, वहां कोई चौकीदार नहीं आया और ना ही कोई रोक-टोक करने वाला। तब हमें बेहद आश्चर्य हुआ। बाद में पता चला कि मैडम ने बगीचे के मालिक से कह दिया था कि बच्चों को फल खाने से कोई रोके-टोकेगा नहीं। आपका जितना भी नुकसान होगा, उसकी भरपाई मैं करूंगी। पिकनिक से वापस लौटने से पहले जब हिसाब हुआ तो दोनों पक्षों ने नैतिकता और मानवीयता का परिचय दिया। चौकीदार ने कहा बच्चों ने फल खा लिया उसका मैं मूल्य लूं, ऐसा नहीं हो सकता। अंततः चौकीदार जीत हुई। पर्यावरण के प्रति एक लेखक की संवेदना को देखकर सुख के साथ-साथ दुख का भी अनुभव हुआ। मानो ऐसा लगा कि निजी और व्यक्तिगत जीवन में समाज और पर्यावरण के प्रति हमारी चेतना निरंतर मरती जा रही है। ऐसे प्रसंग गंभीर एवं विचलित कर देने के साथ पर्यावरण के प्रति संवेदनाशील रवैया अपनाने की भी प्रेरणा देती है।

सर ने स्‍कूल के दिनों का भी एक प्रसंग सुनाया। उन्‍होंने बताया कि उस समय कौन सी कंपनी की साइकिल किसके पास है, उसको देखकर ही उनकी हैसियत का अंदाजा लगाया जाता था। सर के पास भी अच्छी कंपनी की साइकिल थी, जिससे गिर जाने की वजह से एक दांत का आधा हिस्सा टूट गया। उन्‍होंने बताया कि दांत टूटने का दर्द कम और दादी अम्मा की डांट का दर्द अधिक हो रहा था, संवेदना तो रत्‍ती भर भी नहीं मिल रही थी, ऊपर से साइकिल भी जब्‍त कर ली गई। स्‍वतंत्रता सेनानी परिवार से होने के कारण मैं भी अनशनरत हो गया, तब कहीं जाकर दादी अम्‍मा पिघली। इन चर्चाओं के दौरान लेखक की कुटिया के चारों ओर नजर दौड़ाई तो पाया कि 25 वर्षों से किराये के मकान में रह रहे दीन-हीन दशा में भी, कुटिया बेहद सुसज्जित और साफ-सुथरी होने के साथ घर के अधिकांश स्थानों पर किताबें इस तरह से रखी हुई है, जैसे किताब ही उनकी पूरी दुनिया हो। कुछ देर बाद हमने सर को चाय पीने के लिए बाहर चलने कहा। रास्‍ते में उन्होंने फर्श पर पड़े श्रृंगार के फूलों का बेहद खूबसूरत अंदाज में वर्णन किया और इस बीच हम चाय की दुकान पर पहुंच चुके थे, जहां स्वादिष्ट चाय का आनंद लेते हुए कहानी कला पर बातचीत होने लगी। इसके साथ ही ज्ञान से परिपूर्ण लेखक की कुटिया की ओर हम लौट पड़े, जहां से हमने भी अपनी घर वापसी कर ली थी। इस दौरान ऐसा लगा, जैसे किसी पाठशाला से ढेर सारा ज्ञान ले‍कर लौटे हों।

सर की कभी घुमावदार तो कभी बेवाक बातें लोगों को यह सोचने के लिए बाध्‍य कर देती है कि वाक कला कितनी आवश्‍यक है। उनकी व्‍यंग्‍यात्‍मक शैली भी लाजवाब है। आज के समय में जब बिना पद के कोई किसी को पूछने वाला नहीं है, ऐसे समय में भी सर के चाहने वालों की लंबी फेहरिस्‍त है। वे जहां भी जाते हैं, अपने परिवार में कुछ नये सदस्‍यों को जोड़ ही लेते हैं। नये रचनाकारों को कुछ करने के लिए हमेशा प्रेरित करते हैं, उन्‍हें हमेशा कुछ-न-कुछ सिखाते रहते हैं। बस यही है इस असाधारण लेखक की अनोखी दुनिया। उनका प्रतिभावान व्‍यक्तित्‍व बेहद साधारण होकर भी अनोखा है। सर ‘सिंपल लिविंग, हाई थिकिंग’ के जीवंत उदाहरण हैं। आज वे 82 वर्ष के हो गए हैं, लेकिन उनके भीतर का युवा मन आज भी उर्जा और जज्बे से लबरेज है

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संतोष बघेल

लेखक शिक्षाविद् एवं स्‍वतन्त्र लेखक हैं| सम्पर्क- +919479273685, santosh.baghel@gmail.com
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