सामयिक

क्यों बना नया सहकारिता मंत्रालय

 

यह 2021 को सहकारिता के आन्दोलन के इतिहास मे दो कारणों से जाना जाएगा। पहला- इस आन्दोलनों के सबसे जाज्वल्य मात्र नक्षत्र एवं  अमूल के जन्मदाता वर्जिग कुरियन की जन्मशती इसी वर्ष बड़ी 26 नवम्बर के दिन है; और दूसरा- केन्द्र सरकार ने इस वर्ष  सहकारिता को एक स्वतन्त्र मंत्रालय का दर्जा दे दिया। सहकारिता इसके पहले कृषि मंत्रालय का एक गैर अहम हिस्सा आज करता था। उसे एक स्वतन्त्र मंत्रालय का दर्जा दिया जाना और वह भी एक अत्यंत ताकतवर और सरकार के अंतर्गत प्रधानमंत्री के बाद सबसे महत्वपूर्ण मंत्री के अधीन रखा जाना सचमुच में एक बड़ी घटना है और ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रधानमंत्री इसके माध्यम से क्या संदेश देना चाहते हैं और अपनी प्राथमिकताओं में इसे वे इतना महत्वपूर्ण क्यों मानते हैं।

मूल प्रश्न पर आने के पूर्व सहकारिता आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर एक नज़र डालना आवश्यक लगता है। इस आन्दोलन की नींव अँग्रेजी हुकूमत के द्वारा रखी गई थी; आन्दोलन के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसे कानून में जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसान जब प्राकृतिक आपदाओं के कारण आर्थिक संकट में हो तो ऐसी स्थिति में सरकार की लगान से होने वाली आमदनी पर आँच न आए। इस कानून का नाम था- को ओपरेटिव क्रेडिट सोसाइटीज एक्ट, 1904। इसके पीछे असली इरादा यही था कि आर्थिक संकट के  दौरान किसानों को कर्ज मिलने में कठिनाई नहीं आए और वे लगान का भुगतान आसानी से कर सकें। इस ठोस सच्चाई के पीछे एक कल्याणकारी भाव भी किसी हद तक था- किसानों को महाजनों के चंगुलमें न जाना पड़े।

इस कानून में अँग्रेजी सरकार के शासन के दौरान बदलाव होते रहे। जब देश को आज़ादी मिली तो संविधान में इसे राज्य सूची में रखा गया, यानि सहकारिता पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकारों को मिला। अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए राज्य सरकारों ने अपने-अपने राज्यों के लिए को आपरेटिव सोसाइटीज एक्ट बनाए।

स्वतन्त्रता संग्राम के नेताओं ने नए भारत के निर्माण में सहकारिता के महत्व को समझा था। विशेष तौर पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इसमें छिपी संभावनाओं को बहुत अच्छी तरह से पहचानते थे। उन्हें पता था कि यदि सहकारिता को एक आन्दोलन का रूप दिया जाए तो देश का और खास तौर पर ग्रामीण भारत का काया पलट हो सकता है। वे इस आन्दोलन को लोगों पर जबरन लादे जाने के विरुद्ध थे और उनका मानना था कि लोग अपनी इच्छा से सहकारी समितियों का गठन करें और उनके माध्यम से अपने साझे उद्देश्यों को प्राप्त करने तथा अपनी साझी समस्याओं का समाधान ढूँढने का प्रयत्न करें।

वे इन समितियो को ऐसी स्वायत्त लोकतांत्रिक इकाईयों के रूप में देखते थे जिनका संचालन इनके सदस्यों द्वारा बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के होता हो। नेहरू ने देश के विकास के लिए गढ़ी गई पंचवर्षीय योजनाओं सहकारिता को उचित स्थान दिया।वे देश केयोजनाबद्ध विकास के लिए सहकारिता को एक अच्छे औज़ार और उत्प्रेरक के रूप में प्रयोग करने के हामी थे। राष्ट्रीय नेताओं की तमाम अच्छी मंशाओं के बावजूदयह आन्दोलन पूरे देश में उस प्रकार फैल नहीं पाया जिस प्रकार इसे फैलना चाहिए था। जिन राज्यों ने सहकारिता आन्दोलन को गंभीरता से लिया उनमें हम गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल को गिन सकते हैं। सहकारिता से सम्बन्धित क़ानून तो बाकी राज्यों ने भी बनाएं और उनमें सहकारिता विभाग भी स्थापित हुए लेकिन देश के आर्थिक विकास और ग्रामीण भारत को समृद्ध और आत्म निर्भर बनाने में कोई विशेष योगदान नहीं दे पाए।

सहकारिता तो एक ऐसा अस्त्र है जिसके माध्यम से देश की आर्थिक व्यवस्था के किसी भी घटक का सफल, सुचार और लोकतांत्रिक संचालन संभव है। ऐसा कोई उद्योग, कोई संस्था नहीं है जहाँ सहकारिता की अवधारणा का इस्तेमाल नहीं हो सकता है। लेकिन इसअस्त्र की शक्ति का प्रयोग कुछ क्षेत्रों तक ही मूलत: सीमित रहता आया है; जैसे बैंकिंग, दुग्ध विपणन, जूट, चीनी, कपास, फल एवं कृषि उत्पाद इत्यादि। केवल केरल ने सहकारिता के औजार का इस्तेमाल आई. टी. और मेडिकल कॉलेज के क्षेत्र में किया है। वैसे, सहकारी समितियों ने शहरी इलाकों में कम से कम एक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है, वह है- मध्य आय वर्ग के लोगों के लिए उचित मूल्य के घरों का निर्माण। मगर यह सच है कि सहकारिता आन्दोलन में छिपी विशाल संभावनाओं के एक छोटे से हिस्से का ही अभी तक दोहन हो पाया है।

यदि हम सहकारिता आन्दोलन की अत्यंत सीमित एवं सफलता के कारणों पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि नेहरू के बाद के वर्षों में देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थितियाँ कुछ ऐसी रहीं जिनके कारण सहकारिता आन्दोलन सरकार की प्राथमिकताओं में पीछे छूटता चला गया। जहाँ तक केन्द्र सरकार का प्रश्न है, सहकारिता एक विषय के रूप में संघीय सूची में शामिल नहीं है अतः यह राज्य सरकारों के दायरे में आता है। राज्य सरकारों के मंत्रिमंडलों में सहकारिता मंत्री हमेशा से रहते आए हैं और सचिवालयों मे अन्य विभागों के साथ-साथ सहकारिता विभाग भी काम करता रहा है। मगर एक विभाग के रूप में इसकी हैसियत दूसरे-तीसरे दर्जे की रही है। सहकारिता मंत्री का पद शायद ही कोई बड़ा नेता लेना चाहता है, कुछ राज्यों को छोड़कर। इस विभाग में पदस्थापित होने वाले नौकरशाह भी या तो वे होते रहे हैं जिन्हें या तो नाकारा माना जाता है या फिर वे जो सरकार को रास नहीं आते। सरकारी जुमले में हम कहें तो इसे शंटिंग यह साइबेरिया पोस्टिंग के रूप में देखा जाता रहा है।

सहकारिता के संघीय सूची में नहीं शामिल होने के बावजूद केन्द्र सरकार अपनी इच्छा शक्ति के द्वारा राज्य सरकारों को इस दिशा में प्रभावित करने की क्षमता रखती है। केन्द्र सरकार सहकारिता के क्षेत्र में नीतियाँ बना कर तथा आवश्यक अनुदान, संसाधनों, प्रशिक्षण, मार्ग दर्शक सिद्धान्तों इत्यादि के माध्यम से राज्य सरकारों को उत्प्रेरित, प्रोत्साहित और प्रभावित करने की पूरी क्षमता रखती है। मगर ऐसा लगता है कि आगे चल कर, खासकर उदारीकरण, निजीकरण और भूमण्डलीकरण के जोर पकड़ने के बाद, सरकार की कार्यशैली की दिशा में भी काफी कुछ बदलाव आया।

इस बदलाव में सहकारिता आन्दोलन पीछे छूटने लगा। सन 2002 में इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास जरुर हुआ। केन्द्र सरकार ने एक कानून पारित किया- द मल्टी-स्टेट को ओपरेटिव  सोसाइटीज एक्ट, 2002। इस कानून के पीछे उद्देश्य था वैसे सहकारिता संगठनों को न्यायिक वैधता और सुविधा प्रदान करना जिनका कार्यक्षेत्र किसी एक ही राज्य तक सीमित नहीं हो। इस उल्लेखनीय प्रयास को छोड़ दिया जाए तो नई सदी में सहकारिता आन्दोलन उपेक्षित रहा।

सहकारिता अपने आप में अलादीन के चिराग की तरह है। इसकी क्षमता असीम है, बशर्ते इसे घिसने का सही तरीका मालूम हो जिन्होंने इस में छिपे जिन्न की शक्ति को पहचान कर इसे सही तरीके से घिसा वे सचमुच ही कमाल कर गए। ऐसे लोगों में एक विभूति ये वर्गिज कुरियन, जिन्होंने गुजरात को आपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन की स्थापना कर उसका अत्यंत सफल और कल्पनाशील संचालन किया। इस संस्था के उत्पाद ‘अमूल’ नाम से बाजार में आते हैं, जो आज देश के शीर्ष ब्रांडों में एक है।

इस संस्था ने तो जैसे दुग्ध उत्पादन और उससे तैयार होने वाले उत्पादों के क्षेत्र में क्रांति कर दी जो “श्वेत क्रांति के नाम से जानी गई। इस संस्था की वजह से छोटे गो पालकों का व्यापारियों द्वारा शोषण बंद हो गया और उन्हें अपने दूध का सही मूल्य मिलने लगा। आज इस संगठन को जो भी आय होती है उसका तीन चौथाई हिस्सा किसानों को अपने दूध की कीमत के रूप प्राप्त होता है और शेष एक चौथाई हिस्सा संगठन के प्रबंधन तथा शोध कार्यों पर खर्च किया जाता है।

इस संगठन में न तो राजनेताओं की दखलंदाजी है और न ही नौकरशाहों की घुसपैठ। इसका प्रबंधन दुग्ध उद्योग और व्यापार की समझ रखने वाले कुशल और पेशेवर मैनेजरों द्वारा किया जाता है जो किसान प्रतिनिधियों के साथ सीधे संपर्क में होते हैं और धरातल की वास्तविकताओं से पूरी तरह से अवगत होते हैं। इस संगठन का फैलाव गुजरात के तेरह हज़ार गाँवों तक हैऔर इन गाँवों के गोपालकों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बदलाव लाने में इसकी बहुत बड़ी भूमिका है। अमूल ने यह तो साबित कर ही दिया है कि सहकारिता की अवधारणा को यदि पूरी ईमानदारी, संकल्प शक्ति और पेशेवर कुशलता के साथ लागू किया जाए तो यह गरीबी मिटाने, ग्रामीण रोजगार पैदा करने तथा देश की सामाजिक आर्थिक स्थिति में क्रांतिकारी बदलाव लाने की असीम संभावनाएं समेटे हुए हैं।

सहकारिता आन्दोलन की सीमित सफलता के एक अन्य नमूने के रूप में इफ्को यानि इन्डियन फार्मर्स फर्टिलाइज़र कोआपरेटिव का उल्लेख भी आवश्यक है। यह देश का सबसे बड़ा खाद निर्माता है और इसका लाभ देश के पाँच करोड़ किसानों को मिलता है। एक अन्य महत्वपूर्ण नाम इन्डियन कॉफी हाउस का भी है। यह रेस्टोरेंटों की एक देशव्यापी श्रृंखला है जिसका संचालन इसके अपने कामगारों के सहकारी संगठन द्वारा किया जाता है। सफल सहकारी संगठनों में कर्नाटक मिल्क फेडरेशन की भी गिनती होती है, जो दूध के क्षेत्र में अमूल बाद दूसरे नंबर पर आता है। कर्नाटक में ही एक अन्य अत्यंत सफल सहकारी संगठन है, जो हॉपकॉम्स के नाम से जाना जाता है। इसका उद्देश्य है, कृषि उत्पादों की सीधी मार्केटिंग।

सहकारिता आन्दोलन की पृष्ठभूमि और सीमित सफलता पर चर्चा करने के बाद हम मूलप्रश्न पर आ सकते हैं। आखिर केन्द्र सरकार ने अलग से सहकारिता मंत्रालय का गठन क्यों किया और यह भी एक अत्यंत ताकतवर और कद्दावर मंत्री की देखरेख में।मोदी जी स्वयं गुजरात से हैं और वे सहकारिता आन्दोलन की असीम क्षमता से भली भाँति अवगत हैं। उनकी सरकार ने किसानों से उनकी आय दोगुनी करने का वादा किया हुआ है और ऐसा लगता है कि वे सहकारिता के अस्त्र का प्रयोग इस दिशा में जोरशोर से करना चाहते हैं। अमित शाह का इस विभाग के मंत्री के रूप में होना यह दर्शाता है कि वे सहकारिता की संभावनाओं के दोहन को लेकर गंभीर हैं क्योंकि अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर में अमित शाह एक अच्छी खासी अवधि तक सहकारिता आन्दोलन से जुड़े रहे हैं और धरातल पर इसके कार्यान्वयन में आने वाली कठिनाइयों और उनके संभावित समाधान का व्यावहारिक अनुभव रखते हैं।

पिछले वर्ष मोदी सरकार द्वारा तीन कृषि कानून बनाए गए थे, जिनको लेकर पैदा हुए विवाद अभी भी पूरी तरह से थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। कृषि कानूनों के विरोधियों का कहना है कि कानूनों के बहाने सरकार कृषि क्षेत्र पर उद्योगपतियों का अधिपत्य स्थापित करने की तैयारी में है। यदि मोदी सरकार नव गठित मंत्रालय के माध्यम से सहकारिता को प्रोत्साहित करती है और ‘अमूल’ के मॉडल को अपनाते हुए किसानों द्वारा संचालित सहकारिता संगठनों के माध्यम से कृषि उत्पादों की मार्केटिंग किसानों को आढतियों के शोषण से बचाते उन्हें उनके उत्पादों की न्यायोचित कीमत दिलवा पाती है तो इससे किसानों का तो भला होगा ही, शासक दल को भी अच्छा खासा राजनीतिक लाभ प्राप्त होगा।

लेकिन नए मंत्रालय का गठन और इसके मंत्री का चयन एक लंबी यात्रा का पहला कदम है। इस यात्रा की मंजिल तक पहुंचाने के लिए एक अच्छी रणनीति और सार्थक कार्य योजना के साथ-साथ सफल कार्यान्वयन की भी आवश्यकता पड़ेगी यह तभी संभव हो पाएगा जब सहकारिता के उद्देश्यों को पूरी निष्ठा और राजनीतिक संकल्प शक्ति के साथ लागू किया जाए। साथ ही नवगठित सहकारी संस्थाओं को राजनेताओं के चंगुल में पड़ने और नौकरशाहों की ऐशगाह बनने से बचाना होगा। इसके अलावा हमें बड़ी संख्या में वर्गिज़ कुरियन जैसे कुशल और सहकारिता के प्रति समर्पित प्रबंधक ढूँढ़ने पड़ेंगे। देश में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है; मगर ऐसे लोग अपने आप सामने नहीं आएँगे।

चमचों की भीड़ को किनारे करते हुए ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें सामने लाना होगा। साथ ही शीर्ष प्रबंधकों और धरातल पर काम कर रहे किसानों के बीच सीधा, स्वस्थ और सार्थक संवाद भी बनाए रखना पड़ेगा। अगर कार्यान्वयन के स्तर पर ईमानदारी और कुशलता का अभाव रहा तो नवगठित सहकारी संस्थाएं महाराष्ट्र के सहकारी बैंकों की तरह ही राजनीतिज्ञों का अखाड़ा बन कर फेल हो सकती हैं। इसका खामियाजाउन राजनेताओं को नहीं, बल्कि आम जनता को भुगतना होगा। हमें निराश होने की जरूरत नहीं है, मगर पिछले अनुभवों से सबक लेना भी आवश्यक है। मौजूदा केन्द्र सरकार के साथ एक खास बात यह है कि इसमें संकल्प शक्ति और खतरे उठाने की क्षमता का अभाव नहीं है। ऐसे में यह आशा करनी चाहिए कि आने वाले दिनों में सहकारिता आन्दोलन में नव जीवन और नव ऊर्जा का संचार होगा और यह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करेगा

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धीरंजन मालवे

लेखक प्रसिद्द मीडियाकर्मी हैं। सम्पर्क +919810463338, dhiranjan@gmail.com
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