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दो रुपये का लोकतन्त्र

 

क्या भारतीय लोकतन्त्र की कीमत मात्र दो रुपये हो गयी है? सुनने में यह बात बहुत अजीबो गरीब और अटपटी लगेगी लेकिन सच पूछा जाए तो आज हकीकत यही है। हालाँकि लोकतन्त्र को कभी खरीदा नहीं जा सकता है और नहीं उसे कभी बेचा जाना सकता पर इस लोकतन्त्र को आज खरीदने और बेचने की कोशिशें की जा रहीं है और वह भी महज दो रुपये में आप सोचेंगे कि यह कैसे संभव है? दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में, जिसके लोकतन्त्र की एक लम्बी और प्राचीन परम्परा रही है, 21वीं सदी में महज ₹2 में लोकतन्त्र में कैसे खरीदा जा सकता है। इस घटना पर किसी का आश्चर्य चकित होना स्वभाविक है।

इस दौर मे “दो रुपये” के इस लोकतन्त्र के रूपक को समझने के लिए पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आइटी सेल कार्यालय में काम करने वाले एक युवक की कहानी को समझना होगा जिसके ऑडियो क्लिप बाहर आने से में पिछले दिनों मीडिया में अच्छा खासा विवाद हो गया लेकिन उस ऑडियो क्लिप के माध्यम से पहली बार इस सच्चाई का पता चला कि योगी सरकार के समर्थन में प्रचार प्रसार करने के लिए आई टी सेल में कार्यरत युवक को एक ट्वीट पर ₹2 मिलते हैं।

 

यानी दो रुपये में आपको सरकार के समर्थन में कुछ भी ट्वीट करना होगा या फिर सरकार के विरोधियों के जवाब में ट्वीट करना होगा। यह है ₹2 का लोकतन्त्र। अगर आज यह कहा जाए कि प्रति ट्वीट ₹2 की दर से भारतीय लोकतन्त्र को खरीदने का प्रयास किया जा रहा है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह एक युवक की मजबूरी में आइटी सेल में नौकरी का मामला भर नही है बल्कि इस लोकतन्त्र के भविष्य पर सवालिया निशान है।

आखिर हम कैसा देश बना रहे हैं। कैसा राष्ट्रनिर्माण कर रहे हैं। अपने नागरिक का कैसा जीवन बना रहे हैं जिसका जीवन एक झूठ पर टिका है। भारतीय जनता पार्टी जब से सत्ता में आई है उसने अपने “झूठ तन्त्र” को मजबूत बनाने के लिए सोशल मीडिया का जबरदस्त इस्तेमाल किया है। इस समय देश में 1.18 बिलियन मोबाइल धारक लोग हैं और 775 मिलियन लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। भारतीय जनता पार्टी ने तो 72000 व्हाट्सएप ग्रुप बनाए हैं यानी पूरा का पूरा देश और लोकतन्त्र इस नई टेक्नोलॉजी से संचालित किया जा रहा है। झूठ की यह नई खेती है।

पहले तो यह कहा जाता रहा है कि दुनिया का तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा लेकिन अब सोशल मीडिया के आने के बाद यह कहा जा सकता है कि तीसरा विश्व युद्ध भले ही पानी के लिए लड़ा जाए या ना लड़ा जाए लेकिन यह तय है कि चौथा विश्व युद्ध “ट्विटर” पर ही लड़ा जाएगा। यह ट्वीटर वार का युग है। हैश टैग का युग है। यह ट्रेंड कराने और कराने का युग है यानी जिस तरह से सच को झूठ और झूठ को सच बदलने के लिए ” ट्विटर वॉर” चल रहा है उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि लोकतन्त्र की परिभाषा और अर्थ भी बदल गया है।

यह बात कही जाती रही है कि भारतीय जनता पार्टी ने 18000 फेक अकाउंट भी खोल रखे हैं जिसके माध्यम से वह फेक खबरें फैलाने का काम करती है। आपको पता ही होगा कि पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर एक टूल किट बनाने का आरोप लगाया लेकिन कांग्रेस ने दावा किया कि यह फर्जी टूल किट है जिसे भाजपा ने ही बनाया है। ट्वीटर ने भाजपा नेताओं की ट्वीट को मैनिपुलेटेड पोस्ट की श्रेणी में डाल दिया और इस तरह भाजपा के फर्जीवाड़े की पोल खोल दी। तब सरकार ने कहा कि ट्वीटर किसी बात के सच और झूठ होने का कैसे प्रमाणपत्र दे सकता है।

यह तो जांच एजेंसियां या अदालत ही कर सकती है। इस तरह इस दलील की आड़ में सोशल मीडिया की नकेल कस ने की तैयारी हुई और भारत में ट्वीटर के सीई ओ से पूछ ताछ भी शुरू हुई। इस फर्जी टूल के संबंध में कांग्रेस ने एफआईआर भी दर्ज कराया है जिसकी पुलिसिया जांच चल रही है। इसकी सच्चाई का पता बाद में पता चलेगा कि वाकई कांग्रेस सच बोल रही है या झूठ बोल रही है या भाजपा ने टुलकिट खुद बनाया था लेकिन इस सच और झूठ की लड़ाई के बीच अब कांग्रेस ने घोषणा की है कि वह भाजपा के झूठ से लडने के लिए 500000 युवकों को अपने आईटी सेल में भर्ती करेगी देगी ताकि भारतीय जनता पार्टी के सोशल मीडिया से फैलाई जा रही फेक खबरों को रोका जा सके।

यानी अब भारतीय लोकतन्त्र का भविष्य सच को झूठ और झूठ को सच बनाने के खेल पर ही निर्भर है। शायद यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस बात को समझते हुए ₹2 में हर ट्वीट कराने की एक नई स्कीम शुरू की जिसके तहत योगी आदित्यनाथ के कार्यालय में काम करने वाले उस लड़के के ऑडियो क्लिप से सच सामने आ गया। 2014 के चुनाव के समय ही भाजपा ने मीडिया के माध्यम से मोदी का नैरेटिव रचा। उसने इस लोकतन्त्र को ₹2 के लोकतन्त्र में बदलने पर अधिक ध्यान दिया और हर दिन सोशल मीडिया पर ताबड़तोड़ ट्वीट की बाढ़ आ गयी। इस ट्वीट अभियान ने पोस्ट ट्रुथ रचने का काम किया।

पहले पूंजीपतियों के सहारे यह लोकतन्त्र चलता रहा है, फिर उसमे नौकरशाह और नीति निर्धारक शामिल हुए और राजनेताओं के साथ गठबंधन बना लेकिन शायद सत्ता को इससे भी भरोसा नहीं हुआ। वह मानती रही कि केवल विधायिका कार्यपालिका न्यायपालिका से ही यह लोकतन्त्र संचालित नही होगा बल्कि जनता की सोच को नियंत्रित करने के मीडिया का सहारा लेना होगा। उसने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को गोदी मीडिया में तब्दील किया लेकिन सोशल मीडिया पर उसका नियन्त्रण नहीं था। तब उसने ट्वीटर और व्हाट्सएप के माध्यम से झूठ फैलाना शुरू किया क्योंकि उसे लगा कि जनता की मानसिकता को बदलने के लिए अब सोशल मीडिया ही एकमात्र सहारा है और इस सोशल मीडिया के सहारे लोकतन्त्र को हड़पने का काम किया जाए।

शायद इसीलिए भाजपा आईटी सेल लगातार अपने इस कार्य को फैला रही है लेकिन दूसरी तरफ सरकार बार-बार चेतावनी भी दे रही है कि सोशल मीडिया सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहा है और फेक न्यूज़ फैला रहा हैं। वह लगातार फेसबुक व्हाट्सएप ग्रुप इंस्टाग्राम ट्विटर को निगरानी करने का काम कर रही है। लोग भी शिकायतें कर रहे हैं कि उनके पोस्ट की रीच कम कर दी गयी है या उनके अकाउंट को बंद किया जा रहा है या पोस्ट डिलीट किया जा रहा है, पोस्ट हटाने की चेतावनी दी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी ऊपर से खुद को जितना लोकतांत्रिक होने का दावा करती रही है वह अपने चरित्र में उनकी ही गैर लोकतांत्रिक है।

वह जिस तरह कानून का दुरुपयोग कर विरोधियों को प्रताड़ित करने का काम कर रही है उसे देखते हुए लगता है कि ब्रिटिश शासन काल में भी तत्कालीन सत्ता जनता को इस तरह प्रताड़ित और परेशान नहीं करती रही। आज दिल्ली दंगों के बारे में या भीमा कोरेगांव के बारे में तमाम समाजिक कार्यकर्ता या तो जेल में है या उन्हें जेल से जमानत पाने के लिए एड़ी चोटी का पसीना बहाना पड़ रहा है। इनका कसूर सिर्फ इतना था कि ये सभी ₹2 के इस लोकतन्त्र की पोल खोलने में लगे थे और झूठ तन्त्र को बेनकाब कर रहे थे जो सरकार की नजर में राजद्रोह है। जब किसी देश में लोकतन्त्र दो रुपये में बिकने लगे तो उसका हश्र यही होता है

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लेखक वरिष्ठ कवि और पत्रकार हैं। सम्पर्क +919968400416, vimalchorpuran@gmail.com

One response to “दो रुपये का लोकतन्त्र”

  1. Ratnesh Kumar Sinha says:

    महोदय, इस देश में हर पार्टी का अपनी हैसियत के अनुसार आईटी सेल है और ये वही काम करते हैं, जिसके बारे में आपने अपने एकांगी लेख में केवल सत्तासीन पार्टी को घसीट कर जो रहस्योद्घाटन किया है, वह सर्वविदित है, कोई रहस्य नहीं है, यह आधुनिक युग में पार्टी प्रचार का सशक्त माध्यम है। मैं यह इसलिए कह रहा हूँ कि जब हम लोकतन्त्र के स्वास्थ्य की बात करते हैं तो हमें रोग के सभी पहलुओं का उल्लेख करना चाहिए।आपकी चिन्ता जायज है, लेकिन यह केवल एक पार्टी पर निशाना करके यौक्तिक सिद्ध नहीं किया जा सकता। हर पार्टी के आईटी सेल में शिक्षित युवा ‘पर्क’ के रूप हर ट्वीट पर कुछ अतिरिक्त राशि से लाभान्वित होते हैं। यह सर्वविदित है, इसलिए भ्रष्ट और निकम्मी सरकार की तीखी आलोचना करें, लेकिन आलोचना ऐसी हो कि वह समरस लगे, एकांगी और पार्टी प्रेरित नहीं। आपके लेख पर भी तो कहा जा सकता है कि आपका लेख विरोधी खेमे की मीडिया रणनीति का हिस्सा है। इसलिए मेरे विचार में यह लेख थोडी़ और जानकारी इकट्ठी करके लोकतन्त्र के समग्र सामयिक मूल्यांकन के रूप में प्रस्तुत किया जाता तो अत्यधिक विश्वसनीय और निष्पक्ष होता।लेख के लिए बधाई!

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